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Adansol : आद्विक की कहानी केवल एक हादसे की कहानी नहीं रहनी चाहिए

 


11 वर्षीय आद्विक की मौत के बाद सवाल: बच्चों की सुरक्षा की जवाबदेही आखिर किसकी?



किसी माता-पिता के लिए बच्चे को स्कूल या समर कैंप के लिए भेजना भरोसे का विषय होता है। उम्मीद होती है कि बच्चा कुछ नया सीखेगा, खेलेगा और सुरक्षित घर लौटेगा। लेकिन मई 2026 में पश्चिम बंगाल के आसनसोल में 11 वर्षीय आद्विक हिलेरियन की स्वीमिंग पूल में डूबने से मौत ने बच्चों की सुरक्षा से जुड़े कई गंभीर सवाल सामने ला दिए। उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, यह घटना St. Vincent’s High and Technical School के समर कैंप के दौरान हुई थी। पुलिस ने मामले की जांच शुरू की और स्वीमिंग पूल को जांच के लिए सील किए जाने की भी रिपोर्ट सामने आई।

यह लेख किसी व्यक्ति या संस्था को जांच पूरी होने से पहले दोषी ठहराने के लिए नहीं है। असली सवाल यह है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाई गई व्यवस्था कितनी मजबूत थी और हादसे के बाद सच्चाई तथा जवाबदेही किस तरह सामने आएगी?

उस दिन आखिर हुआ क्या था?

29 मई 2026 की प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, कक्षा छह के 11 वर्षीय छात्र आद्विक हिलेरियन समर कैंप के दौरान स्वीमिंग सेशन में शामिल थे। Times of India की रिपोर्ट के मुताबिक, उस सत्र में लगभग 30 विद्यार्थी थे और स्कूल अधिकारियों ने बताया कि दो प्रशिक्षक निगरानी कर रहे थे। एक प्रशिक्षक ने आद्विक को परेशानी में देखा और उसे पानी से बाहर निकाला। CPR देने के बाद उसे अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया। पुलिस ने पोस्टमार्टम कराया और यह जांच शुरू की कि कहीं लापरवाही की भूमिका तो नहीं थी।

Telegraph India की रिपोर्ट में भी बताया गया कि स्कूल के समर कैंप के दौरान घटना हुई, पुलिस ने मामले को अप्राकृतिक मृत्यु के रूप में दर्ज कर जांच शुरू की और पूल को जांच के लिए सील किया गया था।

इन तथ्यों के बीच सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हादसे का अंतिम कारण जांच और उपलब्ध आधिकारिक निष्कर्षों से ही स्पष्ट होना चाहिए।

न्याय का पहला मतलब है—पूरी सच्चाई सामने आए

किसी बच्चे की मौत के बाद परिवार के लिए सबसे बड़ा सवाल यही होता है कि आखिर हुआ क्या था।

क्या बच्चा पूल में कब और किस हिस्से में गया? उस समय उसकी निगरानी किस प्रकार हो रही थी? उसे परेशानी में सबसे पहले किसने देखा? बचाव कितनी जल्दी शुरू हुआ? CPR कितनी देर तक दिया गया? अस्पताल तक पहुंचाने में कितना समय लगा?

इन सवालों का जवाब केवल अनुमान से नहीं बल्कि जांच, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान, उपलब्ध रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों के आधार पर सामने आना चाहिए।

यदि कोई CCTV फुटेज उपलब्ध हो, प्रशिक्षकों या कर्मचारियों के बयान हों, कैंप की उपस्थिति सूची हो या सुरक्षा व्यवस्था से संबंधित दस्तावेज हों, तो जांच में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।

CCTV को लेकर भी उठे सवाल

घटना के बाद पूल क्षेत्र में CCTV की अनुपस्थिति को लेकर भी सवाल उठे थे। Times of India ने रिपोर्ट किया कि पूल के आसपास CCTV नहीं था। स्कूल अधिकारियों ने इसका कारण बताते हुए कहा था कि पास के स्थान का इस्तेमाल विद्यार्थी कपड़े बदलने के लिए करते हैं।

यह मुद्दा बच्चों की सुरक्षा के संदर्भ में व्यापक सवाल उठाता है।

जहां कैमरा लगाना निजता के कारण उचित न हो, वहां भी ऐसी सुरक्षा व्यवस्था कैसे बनाई जाए जिससे किसी आपात स्थिति की निगरानी और घटना की जांच संभव हो—इस पर स्कूलों को स्पष्ट नीति बनानी चाहिए।

CCTV हर हादसा रोक नहीं सकता। लेकिन उपयुक्त स्थानों पर निगरानी व्यवस्था घटना की परिस्थितियों को समझने और जवाबदेही तय करने में सहायता कर सकती है।

प्रशिक्षित निगरानी कितनी पर्याप्त है?

स्कूल के अनुसार घटना के समय दो स्वीमिंग प्रशिक्षक मौजूद थे। रिपोर्टों में यह भी कहा गया कि एक प्रशिक्षक ने बच्चे को परेशानी में देखा और बचाव की कोशिश की।

लेकिन बच्चों की संख्या, पूल की गहराई, बच्चों की तैराकी क्षमता और प्रशिक्षकों की जिम्मेदारियों को देखते हुए निगरानी की पर्याप्तता का सवाल जांच का विषय हो सकता है।

एक बच्चे का तैरना जानना भी यह गारंटी नहीं देता कि वह हर परिस्थिति में सुरक्षित रहेगा। अचानक स्वास्थ्य समस्या, थकान, पानी में घबराहट या किसी अन्य परिस्थिति से खतरा पैदा हो सकता है।

इसलिए बच्चों के लिए स्वीमिंग गतिविधियों में निरंतर निगरानी और आपातकालीन प्रतिक्रिया की तैयारी महत्वपूर्ण है।

पूल की गहराई और बच्चों की सुरक्षा

रिपोर्टों के अनुसार जिस पूल में घटना हुई उसकी लंबाई लगभग 25 मीटर और चौड़ाई 10 मीटर बताई गई थी। अलग-अलग हिस्सों में गहराई भी अलग थी और एक रिपोर्ट में गहरे हिस्से की गहराई 12 फीट तक बताई गई।

ऐसी स्थिति में बच्चों की उम्र, तैराकी क्षमता और उन्हें पूल के किस हिस्से में जाने की अनुमति है—इन सभी बातों का स्पष्ट प्रबंधन जरूरी है।

सुरक्षा व्यवस्था केवल प्रशिक्षक की मौजूदगी तक सीमित नहीं होनी चाहिए। प्रवेश, समूह विभाजन, पूल के गहरे और उथले हिस्से की पहचान तथा आपात स्थिति में तुरंत बचाव की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है।

आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था कितनी तैयार थी?

डूबने की घटना में समय बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार बच्चे को पानी से निकालने के बाद CPR दिया गया और फिर अस्पताल ले जाया गया।

ऐसी घटनाएं यह सवाल उठाती हैं कि स्कूल या कैंप में आपातकालीन स्थिति के लिए पहले से क्या व्यवस्था थी।

क्या प्रशिक्षकों को CPR और प्राथमिक चिकित्सा का प्रशिक्षण था? क्या आवश्यक मेडिकल किट उपलब्ध थी? क्या आपातकालीन वाहन या अस्पताल से तत्काल संपर्क की व्यवस्था थी? क्या सभी कर्मचारियों को पता था कि ऐसी स्थिति में किस क्रम से कार्रवाई करनी है?

इन सवालों के जवाब किसी एक घटना के लिए ही नहीं, बल्कि हर स्कूल और बच्चों की गतिविधि के लिए महत्वपूर्ण हैं।

माता-पिता को केवल भरोसा नहीं, जानकारी भी चाहिए

जब माता-पिता अपने बच्चे को किसी समर कैंप, खेल प्रशिक्षण या स्वीमिंग गतिविधि में भेजते हैं तो उन्हें सुरक्षा व्यवस्था के बारे में स्पष्ट जानकारी मिलनी चाहिए।

कितने बच्चे एक समूह में होंगे? कितने प्रशिक्षक होंगे? बच्चों की निगरानी कैसे होगी? आपातकालीन चिकित्सा सुविधा कहां उपलब्ध है? किसी दुर्घटना की स्थिति में अभिभावक से संपर्क की प्रक्रिया क्या है?

इन जानकारियों से अभिभावक अपने बच्चे के लिए बेहतर निर्णय ले सकते हैं और संस्थान पर भी सुरक्षा व्यवस्था को स्पष्ट रखने की जिम्मेदारी आती है।

न्याय केवल मुआवजे का नाम नहीं

आद्विक की मौत के बाद परिवार के लिए न्याय का अर्थ केवल आर्थिक सहायता नहीं हो सकता। किसी भी परिवार के लिए बच्चे की मृत्यु की भरपाई संभव नहीं है।

लेकिन न्याय की प्रक्रिया में कई स्तर हो सकते हैं—घटना की निष्पक्ष जांच, वास्तविक कारणों का पता लगना, यदि लापरवाही प्रमाणित हो तो कानून के अनुसार जवाबदेही, परिवार को उसके वैधानिक अधिकारों के बारे में स्पष्ट जानकारी और भविष्य में ऐसी घटना रोकने के लिए सुरक्षा व्यवस्था में सुधार।

यह भी जरूरी है कि जांच पूरी होने से पहले किसी व्यक्ति या संस्था को दोषी घोषित न किया जाए।

एक बच्चे की मौत से पूरे सिस्टम को क्या सीखना चाहिए?

आद्विक अब वापस नहीं आ सकता। लेकिन ऐसी घटना से स्कूलों, अभिभावकों और संबंधित संस्थाओं को बच्चों की सुरक्षा की व्यवस्था को और मजबूत करने की सीख मिल सकती है।

हर स्वीमिंग कैंप में प्रशिक्षित निगरानी, बच्चों की संख्या के अनुपात में पर्याप्त स्टाफ, स्पष्ट सुरक्षा नियम, प्राथमिक चिकित्सा और CPR की तैयारी, आपातकालीन संपर्क व्यवस्था और नियमित सुरक्षा निरीक्षण जैसे पहलुओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए।

स्कूलों को यह भी देखना चाहिए कि किसी गतिविधि में जोखिम की पहचान पहले से की गई है या नहीं।

जवाबदेही का मतलब दोष तय करना नहीं, सच्चाई तय करना भी है

आद्विक की मौत से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि क्या जांच से उस दिन की पूरी परिस्थितियां स्पष्ट हो पाएंगी?

परिवार यदि न्याय की मांग करता है तो उसकी मांग को संवेदनशीलता से सुना जाना चाहिए। साथ ही जांच को तथ्यों और कानून के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए।

किसी बच्चे की मौत के बाद न्याय तब सार्थक होगा जब घटना की सच्चाई सामने आए, यदि कोई जिम्मेदारी कानूनन बनती है तो वह तय हो, परिवार को उसके अधिकार मिलें और बच्चों की सुरक्षा के लिए ऐसी व्यवस्था मजबूत हो जिससे भविष्य में किसी दूसरे माता-पिता को अपने बच्चे को खोने का ऐसा दर्द न झेलना पड़े।

आद्विक की कहानी केवल एक हादसे की कहानी नहीं रहनी चाहिए। यह सवाल बनकर सामने आनी चाहिए कि बच्चों को किसी स्कूल, खेल या समर कैंप में भेजते समय हम उनकी सुरक्षा के लिए कितनी मजबूत व्यवस्था सुनिश्चित कर रहे हैं।

आसनसोल में 11 वर्षीय आद्विक हिलेरियन की स्वीमिंग पूल में मौत के बाद जांच, निगरानी, CCTV, प्रशिक्षकों और बच्चों की सुरक्षा से जुड़े सवाल सामने आए। जानिए न्याय और जवाबदेही के महत्वपूर्ण पहलू।

आलोक कुमार

Bihar : तकनीकी शिक्षा को अक्सर रोजगार का सीधा रास्ता माना जाता है

 


ITI और Polytechnic के बाद नौकरी तक पहुंचने में युवाओं को किन बाधाओं का सामना करना पड़ता है?

तकनीकी शिक्षा को अक्सर रोजगार का सीधा रास्ता माना जाता है। ITI और Polytechnic में प्रवेश लेते समय युवा और उसका परिवार यही उम्मीद करता है कि कोर्स पूरा होते ही नौकरी या कमाई का रास्ता खुल जाएगा। लेकिन प्रमाणपत्र हाथ में आने के बाद कई युवाओं के सामने एक कठिन सवाल खड़ा हो जाता है—तकनीकी शिक्षा पूरी हो गई, अब नौकरी कहां और कैसे मिलेगी?

ITI और Polytechnic युवाओं को इलेक्ट्रिशियन, फिटर, वेल्डर, मशीनिस्ट, मोटर मैकेनिक, कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सिविल, मैकेनिकल और अन्य तकनीकी क्षेत्रों में प्रशिक्षण देते हैं। फिर भी शिक्षा पूरी करने के बाद नौकरी तक पहुंचना हमेशा आसान नहीं होता। इसके पीछे केवल रोजगार के अवसरों की कमी नहीं, बल्कि व्यावहारिक प्रशिक्षण, अनुभव, अप्रेंटिसशिप, भर्ती प्रक्रिया, नौकरी की जानकारी, शुरुआती वेतन और स्थानीय रोजगार जैसे कई कारण होते हैं।

प्रमाणपत्र और रोजगार के बीच दूरी

किसी तकनीकी संस्थान से प्रमाणपत्र हासिल करना महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन नौकरी के लिए केवल प्रमाणपत्र पर्याप्त नहीं होता। नियोक्ता अक्सर यह देखना चाहते हैं कि उम्मीदवार मशीन, उपकरण या संबंधित तकनीक पर वास्तव में काम कर सकता है या नहीं।

यहीं से नए तकनीकी युवाओं की समस्या शुरू होती है। कई नौकरियों में अनुभव मांगा जाता है, जबकि नए विद्यार्थी के पास अनुभव हासिल करने का पर्याप्त अवसर नहीं होता।

इस स्थिति को दूर करने के लिए पढ़ाई के दौरान ही विद्यार्थियों को वास्तविक कार्यस्थल का अनुभव देने की व्यवस्था मजबूत करनी होगी।

प्रशिक्षण और उद्योग की जरूरत में अंतर

तकनीक तेजी से बदल रही है। उद्योगों में ऑटोमेशन, CNC मशीन, PLC, डिजिटल उपकरण, आधुनिक इलेक्ट्रिकल सिस्टम और कंप्यूटर आधारित तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है।

यदि किसी संस्थान में प्रशिक्षण के लिए उपलब्ध उपकरण और मशीनें उद्योगों में इस्तेमाल होने वाली तकनीक से बहुत पीछे हैं तो विद्यार्थी प्रमाणपत्र तो हासिल कर सकता है, लेकिन नौकरी के लिए आवश्यक व्यावहारिक क्षमता विकसित करने में कठिनाई हो सकती है।

इसलिए तकनीकी संस्थानों में पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण उपकरणों को समय के साथ अपडेट करना जरूरी है।

अप्रेंटिसशिप क्यों महत्वपूर्ण है?

ITI और Polytechnic के बाद अप्रेंटिसशिप युवाओं के लिए शिक्षा और रोजगार के बीच महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है। इससे विद्यार्थी को वास्तविक कार्यस्थल, मशीनों, कार्य अनुशासन और उद्योग की कार्यप्रणाली को समझने का अवसर मिलता है।

लेकिन हर विद्यार्थी तक अप्रेंटिसशिप के अवसर की जानकारी और पहुंच समान नहीं होती। कई युवाओं को यह पता ही नहीं होता कि उनके ट्रेड से संबंधित अप्रेंटिसशिप कहां उपलब्ध है और आवेदन कैसे करना है।

इसलिए संस्थानों को केवल प्रशिक्षण पूरा कराने के बजाय विद्यार्थियों को अप्रेंटिसशिप और रोजगार की अगली प्रक्रिया समझाने पर भी ध्यान देना चाहिए।

नौकरी की जानकारी तक पहुंच भी समस्या है

ग्रामीण और छोटे शहरों से आने वाले युवाओं के लिए एक बड़ी समस्या रोजगार की सही जानकारी प्राप्त करना भी हो सकती है।

किस कंपनी में भर्ती चल रही है, किस ट्रेड के लिए कितनी योग्यता चाहिए, आवेदन की अंतिम तारीख क्या है, अप्रेंटिसशिप कहां उपलब्ध है और कैंपस भर्ती कब होगी—इन सवालों की जानकारी समय पर नहीं मिलने से योग्य युवा अवसर से बाहर हो सकता है।

इसलिए प्रत्येक ITI और Polytechnic में मजबूत करियर सूचना और प्लेसमेंट सहायता व्यवस्था होना उपयोगी होगा।

विद्यार्थियों को सरकारी भर्ती, निजी कंपनियों, अप्रेंटिसशिप, कैंपस प्लेसमेंट और स्वरोजगार के विकल्पों की जानकारी नियमित रूप से मिलनी चाहिए।

नौकरी के लिए दूसरे शहर जाने की मजबूरी

ग्रामीण क्षेत्र के युवा के सामने एक दूसरी चुनौती स्थानीय रोजगार की कमी हो सकती है।

मान लीजिए किसी जिले के युवा ने वहीं ITI या Polytechnic किया, लेकिन उसके ट्रेड से संबंधित नौकरी किसी दूसरे शहर या औद्योगिक क्षेत्र में उपलब्ध है। तब नौकरी पाने के साथ-साथ उसे रहने, भोजन, यात्रा और परिवार से दूर रहने की समस्या का सामना करना पड़ सकता है।

कम शुरुआती वेतन वाली नौकरी के लिए दूसरे शहर में रहने का खर्च कई युवाओं के लिए महत्वपूर्ण सवाल बन जाता है।

इसलिए जिला स्तर पर छोटे उद्योग, तकनीकी सेवा केंद्र, मरम्मत और विनिर्माण इकाइयों तथा अन्य स्थानीय रोजगार अवसरों को बढ़ावा देना भी जरूरी है।

शुरुआती वेतन और नौकरी की गुणवत्ता

तकनीकी शिक्षा पूरी करने के बाद युवा स्वाभाविक रूप से बेहतर आय की उम्मीद करता है। लेकिन शुरुआती स्तर पर मिलने वाला वेतन कई बार उसकी अपेक्षा से कम हो सकता है।

यदि नौकरी की आय से किराया, भोजन, यात्रा और अन्य खर्च मुश्किल से पूरे हों तो युवा के सामने यह सवाल आ सकता है कि वह उसी क्षेत्र में आगे बढ़े या किसी दूसरे रोजगार की तलाश करे।

इसलिए केवल कितने युवाओं को नौकरी मिली, यह देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि उन्हें किस प्रकार का काम, कितनी स्थिरता और आगे बढ़ने की कितनी संभावना मिली।

तकनीकी ज्ञान के साथ संचार कौशल भी जरूरी

आज नौकरी के लिए केवल तकनीकी ज्ञान ही पर्याप्त नहीं माना जाता। इंटरव्यू, रिज्यूमे, कंप्यूटर का सामान्य ज्ञान, कार्यस्थल पर संवाद और बुनियादी अंग्रेजी या तकनीकी शब्दावली की समझ भी कई जगह उपयोगी होती है।

ग्रामीण पृष्ठभूमि का कोई युवा तकनीकी काम में अच्छा हो सकता है, लेकिन इंटरव्यू में अपनी क्षमता ठीक से प्रस्तुत न कर पाए तो उसके सामने अतिरिक्त कठिनाई आ सकती है।

इसलिए तकनीकी संस्थानों में तकनीकी प्रशिक्षण के साथ रिज्यूमे, इंटरव्यू, कंप्यूटर और कार्यस्थल व्यवहार की बुनियादी तैयारी भी कराई जानी चाहिए।

सरकारी नौकरी का इंतजार भी लंबा हो सकता है

तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाले अनेक युवा सरकारी विभागों में तकनीकी पदों को रोजगार का महत्वपूर्ण विकल्प मानते हैं। लेकिन सरकारी भर्तियों में रिक्तियों की संख्या, प्रतियोगिता और भर्ती प्रक्रिया की अवधि के कारण उम्मीदवारों को लंबे समय तक तैयारी करनी पड़ सकती है।

यदि युवा केवल एक ही रोजगार विकल्प पर निर्भर रहता है तो उसके सामने समय और आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।

इसलिए ITI और Polytechnic के विद्यार्थियों को शुरुआत से ही सरकारी नौकरी के साथ निजी क्षेत्र, अप्रेंटिसशिप और स्वरोजगार के विकल्पों की जानकारी मिलनी चाहिए।

संस्थान की सफलता का पैमाना क्या होना चाहिए?

किसी ITI या Polytechnic की सफलता केवल परीक्षा पास करने वाले विद्यार्थियों की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए।

यह भी देखना महत्वपूर्ण है कि प्रशिक्षण पूरा करने के बाद कितने विद्यार्थी:

  • नौकरी तक पहुंचे,

  • अप्रेंटिसशिप में गए,

  • आगे का तकनीकी प्रशिक्षण लिया,

  • अपना काम शुरू कर पाए,

  • या अपनी तकनीकी योग्यता के अनुरूप रोजगार प्राप्त कर सके।

इसके लिए संस्थानों में नियमित प्लेसमेंट गतिविधियां, उद्योगों से संपर्क, कैंपस भर्ती और पूर्व विद्यार्थियों के रोजगार संबंधी रिकॉर्ड को मजबूत किया जा सकता है।

सरकार और उद्योग की भी जिम्मेदारी

तकनीकी शिक्षा को रोजगार से जोड़ने के लिए सरकार, प्रशिक्षण संस्थान और उद्योग—तीनों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है।

जिला स्तर पर यह समझने की कोशिश की जा सकती है कि स्थानीय उद्योगों को किस प्रकार के तकनीकी कर्मचारियों की जरूरत है। उसी आधार पर प्रशिक्षण और रोजगार के बीच बेहतर संबंध बनाया जा सकता है।

उद्योगों के लिए भी नए प्रशिक्षित युवाओं को शुरुआती अवसर देना महत्वपूर्ण है। अप्रेंटिसशिप को केवल प्रशिक्षण की प्रक्रिया न मानकर भविष्य के रोजगार से जोड़ने की व्यवस्था विकसित की जा सकती है।

वहीं जिन युवाओं के पास तकनीकी कौशल है, उन्हें छोटे स्तर पर सेवा या कारोबार शुरू करने के लिए उपलब्ध वित्तीय और संस्थागत सहायता की जानकारी भी दी जानी चाहिए।

तकनीकी शिक्षा तभी सफल होगी जब रोजगार तक रास्ता भी बने

ITI और Polytechnic युवाओं को तकनीकी कौशल देने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। लेकिन प्रमाणपत्र से रोजगार तक की यात्रा अपने आप पूरी नहीं होती।

इसके लिए गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरण, व्यावहारिक अनुभव, अप्रेंटिसशिप, उद्योग से संपर्क, समय पर रोजगार की जानकारी और स्थानीय स्तर पर अवसरों की जरूरत होती है।

किसी गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार का युवा जब तकनीकी शिक्षा में प्रवेश लेता है तो उसके पीछे केवल एक प्रमाणपत्र हासिल करने की इच्छा नहीं होती। उसके पीछे आत्मनिर्भर बनने और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने की उम्मीद होती है।

इसलिए तकनीकी शिक्षा की सफलता का मूल्यांकन केवल इस बात से नहीं होना चाहिए कि कितने विद्यार्थियों ने परीक्षा पास की। असली सवाल यह होना चाहिए कि प्रशिक्षण पूरा करने के बाद कितने युवा अपने कौशल के आधार पर सम्मानजनक और टिकाऊ आजीविका तक पहुंच पाए।

ITI और Polytechnic के बाद नौकरी पाने में युवाओं को किन बाधाओं का सामना करना पड़ता है? जानिए अनुभव, अप्रेंटिसशिप, प्रशिक्षण, रोजगार की जानकारी, स्थानीय नौकरी और शुरुआती वेतन से जुड़ी प्रमुख चुनौतियां।

आलोक कुमार

Bihar : गांव में रोजगार की योजनाएं होने के बावजूद युवा शहरों की ओर क्यों

 


गांव में रोजगार की योजनाएं होने के बावजूद युवा शहरों की ओर क्यों जाते हैं?

गांवों में रोजगार की कमी की चर्चा नई नहीं है। सरकारें ग्रामीण युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार देने के लिए लगातार योजनाएं चला रही हैं। मनरेगा से लेकर स्वरोजगार, कौशल विकास, ग्रामीण आजीविका, स्वयं सहायता समूह, कृषि आधारित रोजगार और छोटे कारोबार को बढ़ावा देने वाली अनेक योजनाएं मौजूद हैं। इसके बावजूद बड़ी संख्या में युवा गांव छोड़कर शहरों की ओर जा रहे हैं। सवाल यह है कि जब रोजगार देने के लिए योजनाएं हैं, तो फिर गांव का युवा अपने घर-परिवार और खेत-खलिहान से दूर शहर की ओर जाने के लिए मजबूर क्यों होता है?

इस सवाल का जवाब केवल बेरोजगारी में नहीं छिपा है। असली समस्या रोजगार की उपलब्धता, निरंतरता, आय, कौशल और सम्मानजनक काम से जुड़ी हुई है।

योजना है, लेकिन नियमित काम नहीं

ग्रामीण रोजगार योजनाओं की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हर योजना हर युवा के लिए उपयुक्त रोजगार उपलब्ध नहीं कराती। उदाहरण के लिए, मजदूरी आधारित काम किसी ऐसे युवक की आकांक्षा पूरी नहीं कर सकता, जिसने इंटर, स्नातक, आईटीआई या किसी तकनीकी संस्थान से पढ़ाई की हो।

युवा केवल कोई भी काम नहीं चाहता। वह ऐसा रोजगार चाहता है जिसमें नियमित आमदनी हो, आगे बढ़ने का अवसर हो और उसकी शिक्षा तथा कौशल का उपयोग हो सके। जब गांव में ऐसा विकल्प नहीं मिलता तो शहर आकर्षक दिखाई देने लगता है।

मजदूरी और आय का बड़ा अंतर

शहर जाने का एक महत्वपूर्ण कारण आय का अंतर भी है। गांव में कृषि मजदूरी, निर्माण कार्य या छोटे-मोटे काम से मिलने वाली आमदनी कई बार अनियमित होती है। दूसरी तरफ शहर में भले ही काम कठिन हो, लेकिन युवा को महीने की निश्चित आय मिलने की उम्मीद रहती है।

कई ग्रामीण परिवारों के लिए यह अंतर इतना महत्वपूर्ण है कि युवा घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर भी काम करने को तैयार हो जाता है। वह जानता है कि शहर में किराया, भोजन और यात्रा का खर्च अधिक होगा, फिर भी बची हुई रकम गांव भेजने की संभावना उसे पलायन के लिए प्रेरित करती है।

कृषि अब हर युवा को रोजगार नहीं दे पा रही

भारत के गांवों की अर्थव्यवस्था लंबे समय तक खेती पर निर्भर रही है। लेकिन छोटे और बंटे हुए खेत, बढ़ती लागत, मौसम की अनिश्चितता, सिंचाई की समस्या और कृषि उत्पादों के उचित मूल्य को लेकर चिंता ने खेती को चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

कई परिवारों के पास इतनी जमीन नहीं है कि परिवार के सभी युवाओं को उससे पर्याप्त आय मिल सके। ऐसे में पढ़ा-लिखा युवा खेती को रोजगार का स्थायी विकल्प नहीं मानता।

समस्या खेती में रोजगार की कमी से ज्यादा कृषि से जुड़ी आय के विविध विकल्पों की कमी की है। अगर गांव में कृषि के साथ डेयरी, मछली पालन, खाद्य प्रसंस्करण, भंडारण, पैकेजिंग और स्थानीय बाजार की मजबूत व्यवस्था हो तो खेती के आसपास ही बड़ी संख्या में रोजगार पैदा किए जा सकते हैं।

कौशल प्रशिक्षण और बाजार के बीच दूरी

सरकार द्वारा कौशल विकास के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाते हैं, लेकिन केवल प्रशिक्षण प्रमाणपत्र रोजगार की गारंटी नहीं है।

कई युवाओं को सिलाई, इलेक्ट्रिशियन, मोबाइल रिपेयरिंग, कंप्यूटर, ड्राइविंग, मशीन संचालन या दूसरे ट्रेड का प्रशिक्षण मिल जाता है, लेकिन प्रशिक्षण के बाद ग्राहक कहां मिलेंगे, पूंजी कहां से आएगी और कारोबार कैसे शुरू होगा—इन सवालों का जवाब नहीं मिलता।

इसलिए जरूरी है कि कौशल प्रशिक्षण को स्थानीय बाजार से जोड़ा जाए। जिस इलाके में जिस प्रकार की मांग है, उसी के अनुसार प्रशिक्षण दिया जाए और प्रशिक्षण के बाद रोजगार या स्वरोजगार तक पहुंच बनाने में सहायता की जाए।

योजनाओं की जानकारी और पहुंच भी बड़ी समस्या

ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक युवाओं को यह तक पता नहीं होता कि वे किन सरकारी योजनाओं के लिए पात्र हैं। कहीं जानकारी की कमी है तो कहीं आवेदन प्रक्रिया जटिल है।

ऑनलाइन आवेदन, दस्तावेज, बैंक खाते, प्रमाणपत्र, तकनीकी प्रक्रिया और अलग-अलग विभागों के चक्कर छोटे गांव के युवक के लिए कठिन हो सकते हैं।

जरूरत है कि पंचायत स्तर पर रोजगार सहायता केंद्र हों, जहां युवा एक ही जगह पर रोजगार, प्रशिक्षण, स्वरोजगार ऋण और सरकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त कर सके।

गांव में काम है, लेकिन भविष्य की गारंटी नहीं

पलायन का एक महत्वपूर्ण कारण भविष्य की चिंता है। युवा यह देखता है कि गांव में आज काम मिल भी गया तो क्या अगले छह महीने या एक साल बाद भी मिलेगा?

यही अनिश्चितता शहर को आकर्षक बनाती है। इसलिए ग्रामीण रोजगार नीति का लक्ष्य केवल कुछ दिनों का रोजगार देना नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को इतना मजबूत बनाना होना चाहिए कि रोजगार लगातार पैदा होता रहे।

महिलाओं और परिवारों पर भी असर

युवाओं का पलायन केवल युवा की व्यक्तिगत समस्या नहीं है। जब परिवार का कमाने वाला सदस्य लंबे समय तक बाहर रहता है तो बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी आ जाती है।

कई बार परिवार में खेती, बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की देखभाल और घरेलू जिम्मेदारियों का पूरा बोझ गांव में रहने वाली महिलाओं पर आ जाता है।

इसलिए गांव में रोजगार बढ़ाना केवल पलायन रोकने की नीति नहीं है। यह परिवार को साथ रखने और ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था को मजबूत करने का भी उपाय है।

सरकार को क्या करना चाहिए?

सबसे पहले ग्रामीण रोजगार योजनाओं का मूल्यांकन केवल खर्च किए गए बजट या बनाए गए परिसंपत्तियों से नहीं, बल्कि कितने युवाओं को स्थायी आय मिली, इससे होना चाहिए।

दूसरा, प्रत्येक प्रखंड में स्थानीय रोजगार की संभावनाओं का सर्वे होना चाहिए। कहीं कृषि प्रसंस्करण की संभावना होगी, कहीं डेयरी, कहीं पर्यटन, कहीं हस्तशिल्प और कहीं निर्माण से जुड़े व्यवसायों की।

तीसरा, कौशल प्रशिक्षण के बाद रोजगार से जोड़ने की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

चौथा, छोटे कारोबार के लिए आसान ऋण, बाजार, डिजिटल भुगतान, प्रशिक्षण और बिक्री की सुविधा एक साथ उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

पंचायतों को भी केवल सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन तक सीमित नहीं रखना चाहिए। उन्हें अपने क्षेत्र में रोजगार पैदा करने वाली स्थानीय परियोजनाओं की पहचान में सक्रिय भूमिका दी जा सकती है।

युवाओं को भी अवसरों की पहचान करनी होगी

सरकार की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है, लेकिन युवाओं की भूमिका भी उतनी ही जरूरी है। आज डिजिटल माध्यमों ने गांव से काम करने के कई नए रास्ते खोले हैं। ऑनलाइन सेवाएं, डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स, कृषि उत्पादों की ऑनलाइन बिक्री, मरम्मत सेवाएं और स्थानीय उद्यम इसके उदाहरण हैं।

जरूरत इस बात की है कि युवा केवल सरकारी नौकरी को रोजगार का एकमात्र रास्ता न माने। स्थानीय संसाधनों और बाजार की जरूरत को समझकर छोटा व्यवसाय भी भविष्य का आधार बन सकता है।

समाधान गांव में ही रोजगार की पूरी श्रृंखला बनाना है

गांव में रोजगार की योजनाएं तभी प्रभावी होंगी जब वे काम से आय, आय से बाजार और बाजार से स्थायी रोजगार की पूरी श्रृंखला बनाएंगी।

सिर्फ मजदूरी देना पलायन की समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। गांव में ऐसा आर्थिक वातावरण बनाना होगा जहां युवा अपने परिवार के साथ रहकर सम्मानजनक और पर्याप्त आय कमा सके।

आखिर गांव का युवा शहर इसलिए नहीं जाता कि उसे अपना गांव पसंद नहीं है। वह इसलिए जाता है क्योंकि उसे अपने भविष्य की सुरक्षा चाहिए। यदि गांव में शिक्षा, कौशल, पूंजी, बाजार और नियमित आय के अवसर उपलब्ध हों, तो पलायन मजबूरी के बजाय विकल्प बन सकता है।

ग्रामीण भारत का भविष्य केवल गांवों में रहने वाले लोगों की संख्या से तय नहीं होगा। यह इस बात से तय होगा कि गांव का युवा अपने भविष्य के लिए गांव में कितने अवसर देख पाता है।

आलोक कुमार

Adansol : आद्विक की कहानी केवल एक हादसे की कहानी नहीं रहनी चाहिए

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