गांव में रोजगार की योजनाएं होने के बावजूद युवा शहरों की ओर क्यों जाते हैं?
गांवों में रोजगार की कमी की चर्चा नई नहीं है। सरकारें ग्रामीण युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार देने के लिए लगातार योजनाएं चला रही हैं। मनरेगा से लेकर स्वरोजगार, कौशल विकास, ग्रामीण आजीविका, स्वयं सहायता समूह, कृषि आधारित रोजगार और छोटे कारोबार को बढ़ावा देने वाली अनेक योजनाएं मौजूद हैं। इसके बावजूद बड़ी संख्या में युवा गांव छोड़कर शहरों की ओर जा रहे हैं। सवाल यह है कि जब रोजगार देने के लिए योजनाएं हैं, तो फिर गांव का युवा अपने घर-परिवार और खेत-खलिहान से दूर शहर की ओर जाने के लिए मजबूर क्यों होता है?
इस सवाल का जवाब केवल बेरोजगारी में नहीं छिपा है। असली समस्या रोजगार की उपलब्धता, निरंतरता, आय, कौशल और सम्मानजनक काम से जुड़ी हुई है।
योजना है, लेकिन नियमित काम नहीं
ग्रामीण रोजगार योजनाओं की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हर योजना हर युवा के लिए उपयुक्त रोजगार उपलब्ध नहीं कराती। उदाहरण के लिए, मजदूरी आधारित काम किसी ऐसे युवक की आकांक्षा पूरी नहीं कर सकता, जिसने इंटर, स्नातक, आईटीआई या किसी तकनीकी संस्थान से पढ़ाई की हो।
युवा केवल कोई भी काम नहीं चाहता। वह ऐसा रोजगार चाहता है जिसमें नियमित आमदनी हो, आगे बढ़ने का अवसर हो और उसकी शिक्षा तथा कौशल का उपयोग हो सके। जब गांव में ऐसा विकल्प नहीं मिलता तो शहर आकर्षक दिखाई देने लगता है।
मजदूरी और आय का बड़ा अंतर
शहर जाने का एक महत्वपूर्ण कारण आय का अंतर भी है। गांव में कृषि मजदूरी, निर्माण कार्य या छोटे-मोटे काम से मिलने वाली आमदनी कई बार अनियमित होती है। दूसरी तरफ शहर में भले ही काम कठिन हो, लेकिन युवा को महीने की निश्चित आय मिलने की उम्मीद रहती है।
कई ग्रामीण परिवारों के लिए यह अंतर इतना महत्वपूर्ण है कि युवा घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर भी काम करने को तैयार हो जाता है। वह जानता है कि शहर में किराया, भोजन और यात्रा का खर्च अधिक होगा, फिर भी बची हुई रकम गांव भेजने की संभावना उसे पलायन के लिए प्रेरित करती है।
कृषि अब हर युवा को रोजगार नहीं दे पा रही
भारत के गांवों की अर्थव्यवस्था लंबे समय तक खेती पर निर्भर रही है। लेकिन छोटे और बंटे हुए खेत, बढ़ती लागत, मौसम की अनिश्चितता, सिंचाई की समस्या और कृषि उत्पादों के उचित मूल्य को लेकर चिंता ने खेती को चुनौतीपूर्ण बना दिया है।
कई परिवारों के पास इतनी जमीन नहीं है कि परिवार के सभी युवाओं को उससे पर्याप्त आय मिल सके। ऐसे में पढ़ा-लिखा युवा खेती को रोजगार का स्थायी विकल्प नहीं मानता।
समस्या खेती में रोजगार की कमी से ज्यादा कृषि से जुड़ी आय के विविध विकल्पों की कमी की है। अगर गांव में कृषि के साथ डेयरी, मछली पालन, खाद्य प्रसंस्करण, भंडारण, पैकेजिंग और स्थानीय बाजार की मजबूत व्यवस्था हो तो खेती के आसपास ही बड़ी संख्या में रोजगार पैदा किए जा सकते हैं।
कौशल प्रशिक्षण और बाजार के बीच दूरी
सरकार द्वारा कौशल विकास के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाते हैं, लेकिन केवल प्रशिक्षण प्रमाणपत्र रोजगार की गारंटी नहीं है।
कई युवाओं को सिलाई, इलेक्ट्रिशियन, मोबाइल रिपेयरिंग, कंप्यूटर, ड्राइविंग, मशीन संचालन या दूसरे ट्रेड का प्रशिक्षण मिल जाता है, लेकिन प्रशिक्षण के बाद ग्राहक कहां मिलेंगे, पूंजी कहां से आएगी और कारोबार कैसे शुरू होगा—इन सवालों का जवाब नहीं मिलता।
इसलिए जरूरी है कि कौशल प्रशिक्षण को स्थानीय बाजार से जोड़ा जाए। जिस इलाके में जिस प्रकार की मांग है, उसी के अनुसार प्रशिक्षण दिया जाए और प्रशिक्षण के बाद रोजगार या स्वरोजगार तक पहुंच बनाने में सहायता की जाए।
योजनाओं की जानकारी और पहुंच भी बड़ी समस्या
ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक युवाओं को यह तक पता नहीं होता कि वे किन सरकारी योजनाओं के लिए पात्र हैं। कहीं जानकारी की कमी है तो कहीं आवेदन प्रक्रिया जटिल है।
ऑनलाइन आवेदन, दस्तावेज, बैंक खाते, प्रमाणपत्र, तकनीकी प्रक्रिया और अलग-अलग विभागों के चक्कर छोटे गांव के युवक के लिए कठिन हो सकते हैं।
जरूरत है कि पंचायत स्तर पर रोजगार सहायता केंद्र हों, जहां युवा एक ही जगह पर रोजगार, प्रशिक्षण, स्वरोजगार ऋण और सरकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त कर सके।
गांव में काम है, लेकिन भविष्य की गारंटी नहीं
पलायन का एक महत्वपूर्ण कारण भविष्य की चिंता है। युवा यह देखता है कि गांव में आज काम मिल भी गया तो क्या अगले छह महीने या एक साल बाद भी मिलेगा?
यही अनिश्चितता शहर को आकर्षक बनाती है। इसलिए ग्रामीण रोजगार नीति का लक्ष्य केवल कुछ दिनों का रोजगार देना नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को इतना मजबूत बनाना होना चाहिए कि रोजगार लगातार पैदा होता रहे।
महिलाओं और परिवारों पर भी असर
युवाओं का पलायन केवल युवा की व्यक्तिगत समस्या नहीं है। जब परिवार का कमाने वाला सदस्य लंबे समय तक बाहर रहता है तो बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी आ जाती है।
कई बार परिवार में खेती, बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की देखभाल और घरेलू जिम्मेदारियों का पूरा बोझ गांव में रहने वाली महिलाओं पर आ जाता है।
इसलिए गांव में रोजगार बढ़ाना केवल पलायन रोकने की नीति नहीं है। यह परिवार को साथ रखने और ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था को मजबूत करने का भी उपाय है।
सरकार को क्या करना चाहिए?
सबसे पहले ग्रामीण रोजगार योजनाओं का मूल्यांकन केवल खर्च किए गए बजट या बनाए गए परिसंपत्तियों से नहीं, बल्कि कितने युवाओं को स्थायी आय मिली, इससे होना चाहिए।
दूसरा, प्रत्येक प्रखंड में स्थानीय रोजगार की संभावनाओं का सर्वे होना चाहिए। कहीं कृषि प्रसंस्करण की संभावना होगी, कहीं डेयरी, कहीं पर्यटन, कहीं हस्तशिल्प और कहीं निर्माण से जुड़े व्यवसायों की।
तीसरा, कौशल प्रशिक्षण के बाद रोजगार से जोड़ने की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।
चौथा, छोटे कारोबार के लिए आसान ऋण, बाजार, डिजिटल भुगतान, प्रशिक्षण और बिक्री की सुविधा एक साथ उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
पंचायतों को भी केवल सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन तक सीमित नहीं रखना चाहिए। उन्हें अपने क्षेत्र में रोजगार पैदा करने वाली स्थानीय परियोजनाओं की पहचान में सक्रिय भूमिका दी जा सकती है।
युवाओं को भी अवसरों की पहचान करनी होगी
सरकार की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है, लेकिन युवाओं की भूमिका भी उतनी ही जरूरी है। आज डिजिटल माध्यमों ने गांव से काम करने के कई नए रास्ते खोले हैं। ऑनलाइन सेवाएं, डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स, कृषि उत्पादों की ऑनलाइन बिक्री, मरम्मत सेवाएं और स्थानीय उद्यम इसके उदाहरण हैं।
जरूरत इस बात की है कि युवा केवल सरकारी नौकरी को रोजगार का एकमात्र रास्ता न माने। स्थानीय संसाधनों और बाजार की जरूरत को समझकर छोटा व्यवसाय भी भविष्य का आधार बन सकता है।
समाधान गांव में ही रोजगार की पूरी श्रृंखला बनाना है
गांव में रोजगार की योजनाएं तभी प्रभावी होंगी जब वे काम से आय, आय से बाजार और बाजार से स्थायी रोजगार की पूरी श्रृंखला बनाएंगी।
सिर्फ मजदूरी देना पलायन की समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। गांव में ऐसा आर्थिक वातावरण बनाना होगा जहां युवा अपने परिवार के साथ रहकर सम्मानजनक और पर्याप्त आय कमा सके।
आखिर गांव का युवा शहर इसलिए नहीं जाता कि उसे अपना गांव पसंद नहीं है। वह इसलिए जाता है क्योंकि उसे अपने भविष्य की सुरक्षा चाहिए। यदि गांव में शिक्षा, कौशल, पूंजी, बाजार और नियमित आय के अवसर उपलब्ध हों, तो पलायन मजबूरी के बजाय विकल्प बन सकता है।
ग्रामीण भारत का भविष्य केवल गांवों में रहने वाले लोगों की संख्या से तय नहीं होगा। यह इस बात से तय होगा कि गांव का युवा अपने भविष्य के लिए गांव में कितने अवसर देख पाता है।
आलोक कुमार