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शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

Bihar :ग्रामीण बिहार में पलायन: रोजगार की कमी या बेहतर अवसर की तलाश?

 


ग्रामीण बिहार में पलायन: रोजगार की कमी या बेहतर अवसर की तलाश?

ग्रामीण बिहार में पलायन केवल बेरोजगारी का परिणाम नहीं है। खेती की कम आय, स्थानीय रोजगार की कमी, कौशल के अनुरूप काम का अभाव और बेहतर मजदूरी की तलाश युवाओं को दूसरे राज्यों की ओर ले जाती है। समाधान पलायन रोकना नहीं, बल्कि गांवों में सम्मानजनक रोजगार और बाहर जाने वाले श्रमिकों के लिए सुरक्षित अवसर सुनिश्चित करना है।

पटना। बिहार की पहचान आज भी गांवों, खेतों और मेहनतकश लोगों से जुड़ी है। लेकिन इन गांवों की एक ऐसी तस्वीर भी है, जिस पर अक्सर पर्याप्त चर्चा नहीं होती। सुबह होते ही बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर दूसरे राज्यों की ओर जाने वाले मजदूरों की भीड़ दिखाई देती है। कोई दिल्ली जा रहा है, कोई पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र या गुजरात का रास्ता पकड़ रहा है तो कोई दक्षिण भारत के औद्योगिक शहरों में रोजगार तलाश रहा है। सवाल यह है कि आखिर ग्रामीण बिहार का आदमी अपना गांव, परिवार और खेत छोड़कर बाहर जाने के लिए क्यों तैयार होता है? क्या यह केवल रोजगार की कमी है या फिर बेहतर अवसर की तलाश?

पलायन को केवल बेरोजगारी का परिणाम मानना शायद पूरी तस्वीर नहीं है। बिहार के ग्रामीण इलाकों से होने वाला पलायन कई कारणों का मिला-जुला परिणाम है। रोजगार की कमी निश्चित रूप से इसका बड़ा कारण है, लेकिन इसके साथ मजदूरी का स्तर, काम की निरंतरता, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और बेहतर जीवन की आकांक्षा भी जुड़ी हुई है।

खेती से पूरे परिवार का गुजारा क्यों मुश्किल हो रहा है?

ग्रामीण बिहार में कृषि आज भी बड़ी आबादी की आजीविका का आधार है। लेकिन छोटे और सीमांत किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि खेती से पूरे परिवार का साल भर गुजारा करना कठिन होता जा रहा है। जमीन का आकार छोटा है, खेती की लागत बढ़ रही है और सिंचाई की सुविधा हर क्षेत्र में समान नहीं है। ऐसे में खेती से होने वाली आमदनी और परिवार की जरूरतों के बीच अंतर बढ़ता जाता है।

यही अंतर ग्रामीण युवाओं को दूसरे विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित करता है। गांव में यदि किसी युवक को महीने में कुछ दिनों का ही काम मिलता है, जबकि दूसरे राज्य में उसे लगातार काम और अपेक्षाकृत अधिक मजदूरी मिल सकती है, तो उसका बाहर जाना स्वाभाविक है।

इसलिए हर पलायन को केवल मजबूरी कहना भी सही नहीं होगा। कई युवा आज पलायन को अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने और परिवार का भविष्य बेहतर बनाने के अवसर के रूप में देखते हैं।

मजबूरी का पलायन और अवसर की तलाश अलग है

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। मजबूरी में किया गया पलायन और अवसर की तलाश में किया गया पलायन एक जैसा नहीं होता।

यदि कोई व्यक्ति अपने कौशल के आधार पर दूसरे शहर में नौकरी करता है, बेहतर वेतन पाता है और परिवार का जीवन स्तर ऊपर उठाता है, तो इसे आर्थिक गतिशीलता माना जा सकता है। लेकिन यदि कोई मजदूर गांव में काम न मिलने के कारण असुरक्षित परिस्थितियों में दूसरे राज्य जाता है, अस्थायी जगह पर रहता है और मजदूरी या काम की सुरक्षा को लेकर लगातार चिंतित रहता है, तो यह गंभीर सामाजिक और आर्थिक समस्या है।

ग्रामीण बिहार के सामने चुनौती यह है कि यहां लोगों के पास रोजगार चुनने के विकल्प कितने हैं। अगर विकल्प केवल बाहर जाने का है, तो यह विकास की कमजोरी को दिखाता है।

पढ़ाई के बाद भी गांव में रोजगार क्यों नहीं?

ग्रामीण युवाओं की एक बड़ी समस्या स्थानीय स्तर पर कौशल के अनुरूप रोजगार का अभाव है। शिक्षा का विस्तार जरूर हुआ है, लेकिन शिक्षा और रोजगार बाजार के बीच दूरी अब भी दिखाई देती है।

कई युवा डिग्री या तकनीकी शिक्षा हासिल करने के बाद नौकरी की तलाश करते हैं। लेकिन यदि उनके आसपास उनकी योग्यता के अनुसार रोजगार उपलब्ध नहीं है, तो उन्हें पटना, दिल्ली, मुंबई, सूरत, पुणे, हैदराबाद या अन्य शहरों की ओर जाना पड़ता है।

इसका असर केवल उस युवक पर नहीं पड़ता। गांव की युवा श्रमशक्ति बाहर चली जाती है। इससे स्थानीय बाजार, छोटे कारोबार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की गति भी प्रभावित होती है।

परिवार के लिए प्रवासी मजदूर की कमाई कितनी महत्वपूर्ण है?

पलायन का सबसे गहरा असर परिवार पर पड़ता है। घर में अक्सर बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे रह जाते हैं। खेती और घरेलू जिम्मेदारियों का बड़ा हिस्सा महिलाओं और बुजुर्गों के कंधों पर आ जाता है।

दूसरी तरफ बाहर कमाने गया व्यक्ति परिवार को पैसे भेजता है। इसी आय से बच्चों की पढ़ाई, इलाज, घर का खर्च, खेती में निवेश और मकान जैसी जरूरतें पूरी होती हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो प्रवासी मजदूर केवल अपने परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

लेकिन लंबे समय तक परिवार से दूर रहने की कीमत भी होती है। बच्चों की परवरिश, बुजुर्गों की देखभाल और पारिवारिक जीवन में दूरी का असर दिखाई देता है। प्रवासी श्रमिकों को काम की असुरक्षा, दुर्घटना, बीमारी, मजदूरी में देरी और रहने की खराब परिस्थितियों जैसी समस्याओं का सामना भी करना पड़ सकता है।

गांव में रोजगार पैदा करने का रास्ता क्या है?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बिहार में ऐसे रोजगार पैदा किए जा सकते हैं, जिससे लोगों को केवल मजबूरी में बाहर न जाना पड़े?

इसका जवाब केवल सरकारी नौकरियों में नहीं है। गांवों में कृषि आधारित उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, छोटे विनिर्माण केंद्र, हस्तशिल्प और ग्रामीण सेवा क्षेत्र को मजबूत करने की जरूरत है।

यदि किसान अपनी उपज को केवल कच्चे माल के रूप में बेचने के बजाय गांव या प्रखंड स्तर पर उसका प्रसंस्करण कर सके, तो स्थानीय स्तर पर अतिरिक्त आय और रोजगार दोनों पैदा हो सकते हैं।

इसी तरह ग्रामीण युवाओं को केवल प्रशिक्षण प्रमाणपत्र देने से काम नहीं चलेगा। प्रशिक्षण ऐसा होना चाहिए, जिसके बाद बाजार में वास्तविक रोजगार उपलब्ध हो। इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर, मशीन ऑपरेटर, ड्राइविंग, मोबाइल रिपेयरिंग, कंप्यूटर, स्वास्थ्य सेवाओं और आधुनिक कृषि जैसे क्षेत्रों में मांग के अनुरूप कौशल विकास किया जा सकता है।

सड़क, बिजली और इंटरनेट भी रोजगार से जुड़े हैं

ग्रामीण रोजगार की चर्चा करते समय बुनियादी ढांचे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सड़क, बिजली, इंटरनेट, बैंकिंग और बाजार तक आसान पहुंच किसी भी छोटे व्यवसाय के लिए जरूरी है।

जब किसी गांव तक बाजार पहुंचेगा, तभी वहां व्यवसाय खड़ा करने की संभावना बढ़ेगी। जब व्यवसाय बढ़ेगा, तभी स्थानीय रोजगार पैदा होगा। इसलिए ग्रामीण विकास को केवल सड़क बनाने या भवन तैयार करने तक सीमित करने के बजाय स्थानीय आर्थिक गतिविधियों से जोड़ना होगा।

पलायन रोकना नहीं, सुरक्षित विकल्प देना जरूरी

सरकार का लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि हर व्यक्ति को अपने गांव में ही रोक दिया जाए। देश के भीतर रोजगार के लिए एक राज्य से दूसरे राज्य जाना आर्थिक विकास का हिस्सा भी हो सकता है।

समस्या तब पैदा होती है, जब पलायन मजबूरी, शोषण और असुरक्षा का पर्याय बन जाता है।

इसलिए जरूरत ऐसे ग्रामीण आर्थिक मॉडल की है, जिसमें गांव का युवा चाहे तो गांव में रहकर सम्मानजनक आमदनी कर सके और चाहे तो बाहर जाकर अपनी प्रतिभा और कौशल के अनुरूप बेहतर अवसर हासिल कर सके।

ग्रामीण बिहार के पलायन को केवल आंकड़ों में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके पीछे एक परिवार की जरूरत, एक किसान की आर्थिक मजबूरी, एक युवा की महत्वाकांक्षा और बेहतर भविष्य का सपना छिपा है।

पलायन को पूरी तरह रोकना समाधान नहीं है; मजबूरी वाले पलायन को अवसर में बदलना समाधान है। बिहार के गांवों को ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए, जहां रोजगार के लिए घर छोड़ना मजबूरी न हो और बाहर जाना केवल बेहतर अवसर चुनने का फैसला हो। विकल्प होना ही वास्तविक विकास की निशानी है।

आलोक कुमार