🔴 ताजा खबर
खबरें लोड हो रही हैं...
ग्रामीण रोजगार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ग्रामीण रोजगार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

Bihar : गांव में रोजगार की योजनाएं होने के बावजूद युवा शहरों की ओर क्यों

 


गांव में रोजगार की योजनाएं होने के बावजूद युवा शहरों की ओर क्यों जाते हैं?

गांवों में रोजगार की कमी की चर्चा नई नहीं है। सरकारें ग्रामीण युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार देने के लिए लगातार योजनाएं चला रही हैं। मनरेगा से लेकर स्वरोजगार, कौशल विकास, ग्रामीण आजीविका, स्वयं सहायता समूह, कृषि आधारित रोजगार और छोटे कारोबार को बढ़ावा देने वाली अनेक योजनाएं मौजूद हैं। इसके बावजूद बड़ी संख्या में युवा गांव छोड़कर शहरों की ओर जा रहे हैं। सवाल यह है कि जब रोजगार देने के लिए योजनाएं हैं, तो फिर गांव का युवा अपने घर-परिवार और खेत-खलिहान से दूर शहर की ओर जाने के लिए मजबूर क्यों होता है?

इस सवाल का जवाब केवल बेरोजगारी में नहीं छिपा है। असली समस्या रोजगार की उपलब्धता, निरंतरता, आय, कौशल और सम्मानजनक काम से जुड़ी हुई है।

योजना है, लेकिन नियमित काम नहीं

ग्रामीण रोजगार योजनाओं की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि हर योजना हर युवा के लिए उपयुक्त रोजगार उपलब्ध नहीं कराती। उदाहरण के लिए, मजदूरी आधारित काम किसी ऐसे युवक की आकांक्षा पूरी नहीं कर सकता, जिसने इंटर, स्नातक, आईटीआई या किसी तकनीकी संस्थान से पढ़ाई की हो।

युवा केवल कोई भी काम नहीं चाहता। वह ऐसा रोजगार चाहता है जिसमें नियमित आमदनी हो, आगे बढ़ने का अवसर हो और उसकी शिक्षा तथा कौशल का उपयोग हो सके। जब गांव में ऐसा विकल्प नहीं मिलता तो शहर आकर्षक दिखाई देने लगता है।

मजदूरी और आय का बड़ा अंतर

शहर जाने का एक महत्वपूर्ण कारण आय का अंतर भी है। गांव में कृषि मजदूरी, निर्माण कार्य या छोटे-मोटे काम से मिलने वाली आमदनी कई बार अनियमित होती है। दूसरी तरफ शहर में भले ही काम कठिन हो, लेकिन युवा को महीने की निश्चित आय मिलने की उम्मीद रहती है।

कई ग्रामीण परिवारों के लिए यह अंतर इतना महत्वपूर्ण है कि युवा घर से सैकड़ों किलोमीटर दूर जाकर भी काम करने को तैयार हो जाता है। वह जानता है कि शहर में किराया, भोजन और यात्रा का खर्च अधिक होगा, फिर भी बची हुई रकम गांव भेजने की संभावना उसे पलायन के लिए प्रेरित करती है।

कृषि अब हर युवा को रोजगार नहीं दे पा रही

भारत के गांवों की अर्थव्यवस्था लंबे समय तक खेती पर निर्भर रही है। लेकिन छोटे और बंटे हुए खेत, बढ़ती लागत, मौसम की अनिश्चितता, सिंचाई की समस्या और कृषि उत्पादों के उचित मूल्य को लेकर चिंता ने खेती को चुनौतीपूर्ण बना दिया है।

कई परिवारों के पास इतनी जमीन नहीं है कि परिवार के सभी युवाओं को उससे पर्याप्त आय मिल सके। ऐसे में पढ़ा-लिखा युवा खेती को रोजगार का स्थायी विकल्प नहीं मानता।

समस्या खेती में रोजगार की कमी से ज्यादा कृषि से जुड़ी आय के विविध विकल्पों की कमी की है। अगर गांव में कृषि के साथ डेयरी, मछली पालन, खाद्य प्रसंस्करण, भंडारण, पैकेजिंग और स्थानीय बाजार की मजबूत व्यवस्था हो तो खेती के आसपास ही बड़ी संख्या में रोजगार पैदा किए जा सकते हैं।

कौशल प्रशिक्षण और बाजार के बीच दूरी

सरकार द्वारा कौशल विकास के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाते हैं, लेकिन केवल प्रशिक्षण प्रमाणपत्र रोजगार की गारंटी नहीं है।

कई युवाओं को सिलाई, इलेक्ट्रिशियन, मोबाइल रिपेयरिंग, कंप्यूटर, ड्राइविंग, मशीन संचालन या दूसरे ट्रेड का प्रशिक्षण मिल जाता है, लेकिन प्रशिक्षण के बाद ग्राहक कहां मिलेंगे, पूंजी कहां से आएगी और कारोबार कैसे शुरू होगा—इन सवालों का जवाब नहीं मिलता।

इसलिए जरूरी है कि कौशल प्रशिक्षण को स्थानीय बाजार से जोड़ा जाए। जिस इलाके में जिस प्रकार की मांग है, उसी के अनुसार प्रशिक्षण दिया जाए और प्रशिक्षण के बाद रोजगार या स्वरोजगार तक पहुंच बनाने में सहायता की जाए।

योजनाओं की जानकारी और पहुंच भी बड़ी समस्या

ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक युवाओं को यह तक पता नहीं होता कि वे किन सरकारी योजनाओं के लिए पात्र हैं। कहीं जानकारी की कमी है तो कहीं आवेदन प्रक्रिया जटिल है।

ऑनलाइन आवेदन, दस्तावेज, बैंक खाते, प्रमाणपत्र, तकनीकी प्रक्रिया और अलग-अलग विभागों के चक्कर छोटे गांव के युवक के लिए कठिन हो सकते हैं।

जरूरत है कि पंचायत स्तर पर रोजगार सहायता केंद्र हों, जहां युवा एक ही जगह पर रोजगार, प्रशिक्षण, स्वरोजगार ऋण और सरकारी योजनाओं की जानकारी प्राप्त कर सके।

गांव में काम है, लेकिन भविष्य की गारंटी नहीं

पलायन का एक महत्वपूर्ण कारण भविष्य की चिंता है। युवा यह देखता है कि गांव में आज काम मिल भी गया तो क्या अगले छह महीने या एक साल बाद भी मिलेगा?

यही अनिश्चितता शहर को आकर्षक बनाती है। इसलिए ग्रामीण रोजगार नीति का लक्ष्य केवल कुछ दिनों का रोजगार देना नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को इतना मजबूत बनाना होना चाहिए कि रोजगार लगातार पैदा होता रहे।

महिलाओं और परिवारों पर भी असर

युवाओं का पलायन केवल युवा की व्यक्तिगत समस्या नहीं है। जब परिवार का कमाने वाला सदस्य लंबे समय तक बाहर रहता है तो बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी आ जाती है।

कई बार परिवार में खेती, बच्चों की पढ़ाई, बुजुर्गों की देखभाल और घरेलू जिम्मेदारियों का पूरा बोझ गांव में रहने वाली महिलाओं पर आ जाता है।

इसलिए गांव में रोजगार बढ़ाना केवल पलायन रोकने की नीति नहीं है। यह परिवार को साथ रखने और ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था को मजबूत करने का भी उपाय है।

सरकार को क्या करना चाहिए?

सबसे पहले ग्रामीण रोजगार योजनाओं का मूल्यांकन केवल खर्च किए गए बजट या बनाए गए परिसंपत्तियों से नहीं, बल्कि कितने युवाओं को स्थायी आय मिली, इससे होना चाहिए।

दूसरा, प्रत्येक प्रखंड में स्थानीय रोजगार की संभावनाओं का सर्वे होना चाहिए। कहीं कृषि प्रसंस्करण की संभावना होगी, कहीं डेयरी, कहीं पर्यटन, कहीं हस्तशिल्प और कहीं निर्माण से जुड़े व्यवसायों की।

तीसरा, कौशल प्रशिक्षण के बाद रोजगार से जोड़ने की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

चौथा, छोटे कारोबार के लिए आसान ऋण, बाजार, डिजिटल भुगतान, प्रशिक्षण और बिक्री की सुविधा एक साथ उपलब्ध कराई जानी चाहिए।

पंचायतों को भी केवल सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन तक सीमित नहीं रखना चाहिए। उन्हें अपने क्षेत्र में रोजगार पैदा करने वाली स्थानीय परियोजनाओं की पहचान में सक्रिय भूमिका दी जा सकती है।

युवाओं को भी अवसरों की पहचान करनी होगी

सरकार की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है, लेकिन युवाओं की भूमिका भी उतनी ही जरूरी है। आज डिजिटल माध्यमों ने गांव से काम करने के कई नए रास्ते खोले हैं। ऑनलाइन सेवाएं, डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स, कृषि उत्पादों की ऑनलाइन बिक्री, मरम्मत सेवाएं और स्थानीय उद्यम इसके उदाहरण हैं।

जरूरत इस बात की है कि युवा केवल सरकारी नौकरी को रोजगार का एकमात्र रास्ता न माने। स्थानीय संसाधनों और बाजार की जरूरत को समझकर छोटा व्यवसाय भी भविष्य का आधार बन सकता है।

समाधान गांव में ही रोजगार की पूरी श्रृंखला बनाना है

गांव में रोजगार की योजनाएं तभी प्रभावी होंगी जब वे काम से आय, आय से बाजार और बाजार से स्थायी रोजगार की पूरी श्रृंखला बनाएंगी।

सिर्फ मजदूरी देना पलायन की समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। गांव में ऐसा आर्थिक वातावरण बनाना होगा जहां युवा अपने परिवार के साथ रहकर सम्मानजनक और पर्याप्त आय कमा सके।

आखिर गांव का युवा शहर इसलिए नहीं जाता कि उसे अपना गांव पसंद नहीं है। वह इसलिए जाता है क्योंकि उसे अपने भविष्य की सुरक्षा चाहिए। यदि गांव में शिक्षा, कौशल, पूंजी, बाजार और नियमित आय के अवसर उपलब्ध हों, तो पलायन मजबूरी के बजाय विकल्प बन सकता है।

ग्रामीण भारत का भविष्य केवल गांवों में रहने वाले लोगों की संख्या से तय नहीं होगा। यह इस बात से तय होगा कि गांव का युवा अपने भविष्य के लिए गांव में कितने अवसर देख पाता है।

आलोक कुमार

Bihar : बिहार में कृषि से जुड़ा रोजगार कैसे बढ़ाया जा सकता है?

 


बिहार में कृषि से जुड़ा रोजगार कैसे बढ़ाया जा सकता है?

बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि की भूमिका केवल खेतों में फसल पैदा करने तक सीमित नहीं है। गांवों की बड़ी आबादी खेती, पशुपालन, बागवानी, मत्स्य पालन, डेयरी, कृषि मजदूरी और इससे जुड़े छोटे कारोबार पर निर्भर है। इसके बावजूद कृषि क्षेत्र से मिलने वाला रोजगार अक्सर मौसमी और कम आय वाला होता है। खेती के मौसम में काम मिलता है, लेकिन फसल कटने के बाद रोजगार के अवसर सीमित हो जाते हैं। यही वजह है कि बड़ी संख्या में ग्रामीण युवा रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर जाते हैं।

इस स्थिति को बदलने के लिए बिहार में कृषि को केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि रोजगार की पूरी श्रृंखला के रूप में देखने की जरूरत है। खेत से बाजार तक जितने अधिक काम स्थानीय स्तर पर विकसित होंगे, उतने ही अधिक रोजगार गांवों में पैदा किए जा सकते हैं।

खेती से आगे बढ़कर कृषि आधारित रोजगार

किसान यदि केवल धान, गेहूं या मक्का बेचता है तो उसकी आय उत्पादन और बाजार मूल्य तक सीमित रहती है। लेकिन उसी फसल की सफाई, ग्रेडिंग, पैकेजिंग, प्रसंस्करण और ब्रांडिंग गांव या प्रखंड स्तर पर होने लगे तो रोजगार के कई नए अवसर पैदा होंगे।

मसलन, मक्का केवल अनाज नहीं है। इससे पशु आहार, स्टार्च और अन्य उत्पाद बनाए जा सकते हैं। मखाना खेत से निकलने वाला उत्पाद भर नहीं है। सफाई, ग्रेडिंग, रोस्टिंग, पैकेजिंग और ब्रांडिंग के बाद उसका मूल्य बढ़ाया जा सकता है। इसी तरह लीची, केला, आम, सब्जियों और अन्य बागवानी उत्पादों के लिए स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयां विकसित की जा सकती हैं।

यानी कृषि रोजगार का भविष्य केवल खेत में नहीं, बल्कि खेत के बाहर होने वाली गतिविधियों में भी है।

गांव में कृषि प्रसंस्करण केंद्र

हर प्रखंड में स्थानीय कृषि उत्पादों के आधार पर छोटे और मध्यम प्रसंस्करण केंद्र विकसित किए जा सकते हैं। इन केंद्रों पर सफाई, सुखाने, छंटाई, पैकेजिंग और भंडारण की सुविधा हो। इससे किसानों को अपनी उपज तुरंत कम कीमत पर बेचने की मजबूरी कम हो सकती है।

ऐसे केंद्र किसान उत्पादक संगठनों, स्वयं सहायता समूहों, सहकारी संस्थाओं और स्थानीय उद्यमियों के माध्यम से चलाए जा सकते हैं। इससे मशीन संचालन, पैकिंग, लेखा, परिवहन और विपणन से जुड़े स्थानीय रोजगार भी पैदा होंगे।

कोल्ड स्टोरेज और भंडारण का विस्तार

कृषि रोजगार बढ़ाने में भंडारण की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। फल और सब्जियों का उत्पादन होने के बावजूद किसानों को कई बार उचित बाजार नहीं मिल पाता। जल्दी खराब होने वाली उपज के कारण उन्हें कम कीमत पर बिक्री करनी पड़ती है।

प्रखंड और पंचायत स्तर के आसपास छोटे कोल्ड स्टोरेज, वैज्ञानिक गोदाम और नियंत्रित तापमान वाली भंडारण व्यवस्था विकसित की जाए तो उपज को कुछ समय सुरक्षित रखना संभव होगा। इन सुविधाओं के निर्माण और संचालन में भी स्थानीय युवाओं को रोजगार मिल सकता है।

कृषि मशीनरी को रोजगार का साधन बनाना

खेती में आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल बढ़ रहा है, लेकिन छोटी जोत वाले किसानों के लिए हर मशीन खरीदना आसान नहीं होता। यहां कस्टम हायरिंग सेंटर ग्रामीण रोजगार का माध्यम बन सकते हैं।

युवा किसान या ग्रामीण उद्यमी ट्रैक्टर, रीपर, थ्रेशर, पावर टिलर, ड्रोन, पंप और अन्य कृषि उपकरण किराये पर उपलब्ध करा सकते हैं। युवाओं को मशीन संचालन, तकनीकी देखभाल और मरम्मत का प्रशिक्षण दिया जाए तो कृषि सेवा आधारित छोटे उद्यम विकसित हो सकते हैं।

पशुपालन और डेयरी को खेती से जोड़ना

कृषि रोजगार की चर्चा पशुपालन के बिना अधूरी है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए गाय, भैंस, बकरी और मुर्गी पालन अतिरिक्त आय का स्रोत बन सकता है।

गांवों में दूध संग्रह केंद्र, पशु आहार की दुकान, पशु चिकित्सा सेवाएं, कृत्रिम गर्भाधान से जुड़ी सेवाएं और दुग्ध उत्पादों की छोटी प्रसंस्करण इकाइयां विकसित की जा सकती हैं। दूध से दही, पनीर, घी और दूसरे उत्पाद तैयार कर स्थानीय बाजार में बेचे जा सकते हैं।

बकरी पालन और मुर्गी पालन को छोटे उद्यम के रूप में बढ़ावा देने से महिलाओं और युवाओं के लिए भी रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं।

मत्स्य पालन में भी रोजगार की संभावना

बिहार में तालाब और अन्य जल संसाधन मत्स्य पालन के लिए अवसर उपलब्ध कराते हैं। इसे केवल मछली उत्पादन तक सीमित न रखकर मछली बीज उत्पादन, चारा निर्माण, सफाई, पैकेजिंग, परिवहन और बिक्री से जोड़ा जा सकता है।

ग्रामीण युवाओं को आधुनिक मत्स्य पालन, तालाब प्रबंधन और बाजार व्यवस्था का प्रशिक्षण मिले तो यह कृषि आधारित रोजगार का एक स्वतंत्र क्षेत्र बन सकता है।

महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना जरूरी

कृषि कार्यों में महिलाओं की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन उनके श्रम को हमेशा औपचारिक आर्थिक गतिविधि के रूप में पर्याप्त पहचान नहीं मिलती। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से सब्जी प्रसंस्करण, अचार, पापड़, मसाले, मखाना उत्पाद, मधु, दुग्ध उत्पाद और स्थानीय खाद्य पदार्थों की छोटी इकाइयां विकसित की जा सकती हैं।

सिर्फ प्रशिक्षण देना पर्याप्त नहीं होगा। महिलाओं को बाजार, ऋण, पैकेजिंग, डिजिटल भुगतान और ब्रांडिंग से भी जोड़ना होगा। उत्पादन से लेकर बिक्री तक उनकी भागीदारी बढ़ेगी तो आय के अवसर भी मजबूत होंगे।

कृषि शिक्षा को रोजगार से जोड़ना

बिहार के युवाओं के लिए कृषि शिक्षा का अर्थ केवल सरकारी नौकरी की तैयारी तक सीमित नहीं होना चाहिए। कृषि विश्वविद्यालयों, कृषि विज्ञान केंद्रों और प्रशिक्षण संस्थानों को ग्रामीण उद्यमिता से जोड़ने की जरूरत है।

युवाओं को मिट्टी परीक्षण, ड्रोन सेवा, कृषि सलाह, जैविक इनपुट, बीज उत्पादन, मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, नर्सरी, सिंचाई प्रबंधन और कृषि विपणन जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित किया जा सकता है।

एक प्रशिक्षित युवा कई किसानों को सेवा देकर स्वयं रोजगार हासिल कर सकता है।

डिजिटल कृषि और बाजार

मोबाइल और इंटरनेट ने कृषि बाजार की संभावनाएं बढ़ाई हैं। किसानों और कृषि उद्यमियों को डिजिटल माध्यम से बाजार, मौसम, कीमत और खरीदारों से जुड़ी जानकारी मिल सकती है।

गांवों में डिजिटल कृषि सेवा केंद्र विकसित किए जाएं तो युवाओं के लिए बाजार सूचना, ऑनलाइन बिक्री और कृषि संबंधी डिजिटल सेवाओं में रोजगार के नए अवसर पैदा हो सकते हैं। स्थानीय उत्पादों को बिहार से बाहर के बाजारों तक पहुंचाने की व्यवस्था भी मजबूत की जा सकती है।

सरकार की भूमिका

सरकार की भूमिका केवल अनुदान देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। किसान, बैंक, निजी उद्यमी, सहकारी संस्थाएं और स्थानीय निकाय मिलकर कृषि आधारित उद्योग विकसित कर सकें, इसके लिए बेहतर वातावरण बनाना जरूरी है।

सड़क, बिजली, सिंचाई, इंटरनेट, गोदाम, कोल्ड चेन और आसान ऋण जैसी बुनियादी सुविधाएं आवश्यक हैं। सरकारी योजनाओं का लाभ वास्तविक लाभार्थियों तक पहुंचे और छोटे उद्यमियों के लिए कागजी प्रक्रिया सरल हो, यह भी महत्वपूर्ण है।

कृषि को रोजगार का पूरा चक्र बनाना होगा

बिहार में कृषि रोजगार बढ़ाने का रास्ता खेती को उत्पादन से प्रसंस्करण, प्रसंस्करण से बाजार और बाजार से उद्यमिता तक जोड़ने में है।

यदि किसान की उपज गांव में ही साफ हो, पैक हो, कुछ हिस्सा प्रसंस्कृत हो और फिर स्थानीय या राष्ट्रीय बाजार तक पहुंचे, तो एक फसल कई लोगों के लिए रोजगार पैदा कर सकती है। किसान उत्पादक संगठन, महिला समूह और ग्रामीण युवा इस बदलाव के महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।

बिहार के सामने चुनौती केवल यह नहीं है कि कृषि की संभावनाएं कितनी हैं। असली सवाल यह है कि इन संभावनाओं को रोजगार और स्थायी आय में कैसे बदला जाए। खेत को केवल अन्न पैदा करने की जगह न मानकर रोजगार पैदा करने वाला ग्रामीण उद्योग बनाने की दिशा में काम किया जाए तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और युवाओं को गांव में ही अवसर देने में मदद मिल सकती है।

कृषि का भविष्य केवल अधिक उत्पादन में नहीं, बल्कि उत्पादन से मूल्यवर्धन और मूल्यवर्धन से रोजगार पैदा करने में भी है। बिहार में कृषि आधारित रोजगार की नई संभावनाएं इसी सोच से विकसित की जा सकती हैं।

आलोक कुमार

Bihar :ग्रामीण बिहार में पलायन: रोजगार की कमी या बेहतर अवसर की तलाश?

 


ग्रामीण बिहार में पलायन: रोजगार की कमी या बेहतर अवसर की तलाश?

ग्रामीण बिहार में पलायन केवल बेरोजगारी का परिणाम नहीं है। खेती की कम आय, स्थानीय रोजगार की कमी, कौशल के अनुरूप काम का अभाव और बेहतर मजदूरी की तलाश युवाओं को दूसरे राज्यों की ओर ले जाती है। समाधान पलायन रोकना नहीं, बल्कि गांवों में सम्मानजनक रोजगार और बाहर जाने वाले श्रमिकों के लिए सुरक्षित अवसर सुनिश्चित करना है।

पटना। बिहार की पहचान आज भी गांवों, खेतों और मेहनतकश लोगों से जुड़ी है। लेकिन इन गांवों की एक ऐसी तस्वीर भी है, जिस पर अक्सर पर्याप्त चर्चा नहीं होती। सुबह होते ही बस अड्डों, रेलवे स्टेशनों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर दूसरे राज्यों की ओर जाने वाले मजदूरों की भीड़ दिखाई देती है। कोई दिल्ली जा रहा है, कोई पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र या गुजरात का रास्ता पकड़ रहा है तो कोई दक्षिण भारत के औद्योगिक शहरों में रोजगार तलाश रहा है। सवाल यह है कि आखिर ग्रामीण बिहार का आदमी अपना गांव, परिवार और खेत छोड़कर बाहर जाने के लिए क्यों तैयार होता है? क्या यह केवल रोजगार की कमी है या फिर बेहतर अवसर की तलाश?

पलायन को केवल बेरोजगारी का परिणाम मानना शायद पूरी तस्वीर नहीं है। बिहार के ग्रामीण इलाकों से होने वाला पलायन कई कारणों का मिला-जुला परिणाम है। रोजगार की कमी निश्चित रूप से इसका बड़ा कारण है, लेकिन इसके साथ मजदूरी का स्तर, काम की निरंतरता, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और बेहतर जीवन की आकांक्षा भी जुड़ी हुई है।

खेती से पूरे परिवार का गुजारा क्यों मुश्किल हो रहा है?

ग्रामीण बिहार में कृषि आज भी बड़ी आबादी की आजीविका का आधार है। लेकिन छोटे और सीमांत किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि खेती से पूरे परिवार का साल भर गुजारा करना कठिन होता जा रहा है। जमीन का आकार छोटा है, खेती की लागत बढ़ रही है और सिंचाई की सुविधा हर क्षेत्र में समान नहीं है। ऐसे में खेती से होने वाली आमदनी और परिवार की जरूरतों के बीच अंतर बढ़ता जाता है।

यही अंतर ग्रामीण युवाओं को दूसरे विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित करता है। गांव में यदि किसी युवक को महीने में कुछ दिनों का ही काम मिलता है, जबकि दूसरे राज्य में उसे लगातार काम और अपेक्षाकृत अधिक मजदूरी मिल सकती है, तो उसका बाहर जाना स्वाभाविक है।

इसलिए हर पलायन को केवल मजबूरी कहना भी सही नहीं होगा। कई युवा आज पलायन को अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने और परिवार का भविष्य बेहतर बनाने के अवसर के रूप में देखते हैं।

मजबूरी का पलायन और अवसर की तलाश अलग है

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। मजबूरी में किया गया पलायन और अवसर की तलाश में किया गया पलायन एक जैसा नहीं होता।

यदि कोई व्यक्ति अपने कौशल के आधार पर दूसरे शहर में नौकरी करता है, बेहतर वेतन पाता है और परिवार का जीवन स्तर ऊपर उठाता है, तो इसे आर्थिक गतिशीलता माना जा सकता है। लेकिन यदि कोई मजदूर गांव में काम न मिलने के कारण असुरक्षित परिस्थितियों में दूसरे राज्य जाता है, अस्थायी जगह पर रहता है और मजदूरी या काम की सुरक्षा को लेकर लगातार चिंतित रहता है, तो यह गंभीर सामाजिक और आर्थिक समस्या है।

ग्रामीण बिहार के सामने चुनौती यह है कि यहां लोगों के पास रोजगार चुनने के विकल्प कितने हैं। अगर विकल्प केवल बाहर जाने का है, तो यह विकास की कमजोरी को दिखाता है।

पढ़ाई के बाद भी गांव में रोजगार क्यों नहीं?

ग्रामीण युवाओं की एक बड़ी समस्या स्थानीय स्तर पर कौशल के अनुरूप रोजगार का अभाव है। शिक्षा का विस्तार जरूर हुआ है, लेकिन शिक्षा और रोजगार बाजार के बीच दूरी अब भी दिखाई देती है।

कई युवा डिग्री या तकनीकी शिक्षा हासिल करने के बाद नौकरी की तलाश करते हैं। लेकिन यदि उनके आसपास उनकी योग्यता के अनुसार रोजगार उपलब्ध नहीं है, तो उन्हें पटना, दिल्ली, मुंबई, सूरत, पुणे, हैदराबाद या अन्य शहरों की ओर जाना पड़ता है।

इसका असर केवल उस युवक पर नहीं पड़ता। गांव की युवा श्रमशक्ति बाहर चली जाती है। इससे स्थानीय बाजार, छोटे कारोबार और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की गति भी प्रभावित होती है।

परिवार के लिए प्रवासी मजदूर की कमाई कितनी महत्वपूर्ण है?

पलायन का सबसे गहरा असर परिवार पर पड़ता है। घर में अक्सर बुजुर्ग, महिलाएं और बच्चे रह जाते हैं। खेती और घरेलू जिम्मेदारियों का बड़ा हिस्सा महिलाओं और बुजुर्गों के कंधों पर आ जाता है।

दूसरी तरफ बाहर कमाने गया व्यक्ति परिवार को पैसे भेजता है। इसी आय से बच्चों की पढ़ाई, इलाज, घर का खर्च, खेती में निवेश और मकान जैसी जरूरतें पूरी होती हैं। इस दृष्टि से देखा जाए तो प्रवासी मजदूर केवल अपने परिवार के लिए ही नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

लेकिन लंबे समय तक परिवार से दूर रहने की कीमत भी होती है। बच्चों की परवरिश, बुजुर्गों की देखभाल और पारिवारिक जीवन में दूरी का असर दिखाई देता है। प्रवासी श्रमिकों को काम की असुरक्षा, दुर्घटना, बीमारी, मजदूरी में देरी और रहने की खराब परिस्थितियों जैसी समस्याओं का सामना भी करना पड़ सकता है।

गांव में रोजगार पैदा करने का रास्ता क्या है?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बिहार में ऐसे रोजगार पैदा किए जा सकते हैं, जिससे लोगों को केवल मजबूरी में बाहर न जाना पड़े?

इसका जवाब केवल सरकारी नौकरियों में नहीं है। गांवों में कृषि आधारित उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, छोटे विनिर्माण केंद्र, हस्तशिल्प और ग्रामीण सेवा क्षेत्र को मजबूत करने की जरूरत है।

यदि किसान अपनी उपज को केवल कच्चे माल के रूप में बेचने के बजाय गांव या प्रखंड स्तर पर उसका प्रसंस्करण कर सके, तो स्थानीय स्तर पर अतिरिक्त आय और रोजगार दोनों पैदा हो सकते हैं।

इसी तरह ग्रामीण युवाओं को केवल प्रशिक्षण प्रमाणपत्र देने से काम नहीं चलेगा। प्रशिक्षण ऐसा होना चाहिए, जिसके बाद बाजार में वास्तविक रोजगार उपलब्ध हो। इलेक्ट्रिशियन, प्लंबर, मशीन ऑपरेटर, ड्राइविंग, मोबाइल रिपेयरिंग, कंप्यूटर, स्वास्थ्य सेवाओं और आधुनिक कृषि जैसे क्षेत्रों में मांग के अनुरूप कौशल विकास किया जा सकता है।

सड़क, बिजली और इंटरनेट भी रोजगार से जुड़े हैं

ग्रामीण रोजगार की चर्चा करते समय बुनियादी ढांचे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सड़क, बिजली, इंटरनेट, बैंकिंग और बाजार तक आसान पहुंच किसी भी छोटे व्यवसाय के लिए जरूरी है।

जब किसी गांव तक बाजार पहुंचेगा, तभी वहां व्यवसाय खड़ा करने की संभावना बढ़ेगी। जब व्यवसाय बढ़ेगा, तभी स्थानीय रोजगार पैदा होगा। इसलिए ग्रामीण विकास को केवल सड़क बनाने या भवन तैयार करने तक सीमित करने के बजाय स्थानीय आर्थिक गतिविधियों से जोड़ना होगा।

पलायन रोकना नहीं, सुरक्षित विकल्प देना जरूरी

सरकार का लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि हर व्यक्ति को अपने गांव में ही रोक दिया जाए। देश के भीतर रोजगार के लिए एक राज्य से दूसरे राज्य जाना आर्थिक विकास का हिस्सा भी हो सकता है।

समस्या तब पैदा होती है, जब पलायन मजबूरी, शोषण और असुरक्षा का पर्याय बन जाता है।

इसलिए जरूरत ऐसे ग्रामीण आर्थिक मॉडल की है, जिसमें गांव का युवा चाहे तो गांव में रहकर सम्मानजनक आमदनी कर सके और चाहे तो बाहर जाकर अपनी प्रतिभा और कौशल के अनुरूप बेहतर अवसर हासिल कर सके।

ग्रामीण बिहार के पलायन को केवल आंकड़ों में नहीं देखा जाना चाहिए। इसके पीछे एक परिवार की जरूरत, एक किसान की आर्थिक मजबूरी, एक युवा की महत्वाकांक्षा और बेहतर भविष्य का सपना छिपा है।

पलायन को पूरी तरह रोकना समाधान नहीं है; मजबूरी वाले पलायन को अवसर में बदलना समाधान है। बिहार के गांवों को ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए, जहां रोजगार के लिए घर छोड़ना मजबूरी न हो और बाहर जाना केवल बेहतर अवसर चुनने का फैसला हो। विकल्प होना ही वास्तविक विकास की निशानी है।

आलोक कुमार

Jharkhand : खूंटी में आखिर चल क्या रहा है?

खूंटी में आखिर चल क्या रहा है? अमन-चैन पर मंडराता खतरा खूंटी में एक के बाद एक सामने आ रही हिंसक घटनाएं और उनके विरोध में हो रहे प्रदर्शन कई ...