गांव से शहर जाने वाले मजदूरों की असली चुनौतियां
गांव से शहर जाने वाले मजदूरों के सामने रोजगार की अनिश्चितता, समय पर मजदूरी न मिलना, सुरक्षित आवास की कमी, स्वास्थ्य जोखिम, सामाजिक सुरक्षा और परिवार से दूरी जैसी कई चुनौतियां होती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय रोजगार के अवसर बढ़ाने के साथ प्रवासी मजदूरों के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक काम की व्यवस्था करना जरूरी है।
पटना। गांव की पगडंडी से निकलकर जब कोई मजदूर शहर की ओर जाता है, तो उसके साथ केवल एक छोटा-सा बैग नहीं होता। उसके कंधे पर पूरे परिवार की उम्मीदें होती हैं। आंखों में बच्चों की पढ़ाई, घर की मरम्मत, बेटी की शादी, बुजुर्ग माता-पिता की दवा और दो वक्त की रोटी का सपना होता है। वह गांव इसलिए नहीं छोड़ता कि उसे अपना घर पसंद नहीं, बल्कि इसलिए कि घर में उसके श्रम के बदले पर्याप्त आमदनी का रास्ता नहीं बन पाता।
बिहार जैसे राज्यों में गांव से शहर की ओर मजदूरों का जाना कोई नई घटना नहीं है। वर्षों से लाखों परिवारों की अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा प्रवासी मजदूरी पर टिका हुआ है। लेकिन पलायन की तस्वीर अक्सर इतनी भर दिखाई जाती है कि मजदूर शहर गया, काम किया और पैसा घर भेज दिया। इसके पीछे छिपी वास्तविक चुनौतियों पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है।
रोजगार मिलने की गारंटी नहीं
शहर पहुंचते ही मजदूर को स्थायी नौकरी मिल जाए, यह जरूरी नहीं है। बहुत से प्रवासी मजदूर ठेकेदारों या बिचौलियों के माध्यम से निर्माण स्थल, फैक्टरी, होटल, गोदाम, ईंट-भट्ठे और दूसरे असंगठित क्षेत्रों में काम तलाशते हैं।
आज काम मिला तो मजदूरी मिली, कल काम नहीं मिला तो आमदनी भी नहीं। दूसरी तरफ शहर में रहने का खर्च लगातार चलता रहता है। किराया, भोजन, आने-जाने का खर्च और मोबाइल जैसी जरूरतों के लिए पैसा चाहिए, चाहे उस दिन काम मिले या नहीं।
यही वजह है कि शहर में काम करने वाला मजदूर अक्सर रोजगार के साथ-साथ रोजगार की निरंतरता की चिंता भी करता है।
समय पर मजदूरी मिलना भी चुनौती
असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों के सामने कई बार सबसे बड़ी समस्या मजदूरी के भुगतान को लेकर होती है। काम पूरा होने के बाद भुगतान के लिए कई दिनों या हफ्तों तक इंतजार करना पड़ सकता है।
बाहर से आए मजदूर के पास स्थानीय स्तर पर मजबूत सामाजिक नेटवर्क नहीं होता। उसे यह भी डर रहता है कि ज्यादा सवाल पूछने या शिकायत करने पर अगली बार काम न मिले।
मजदूरी में देरी का सीधा असर उसके परिवार पर पड़ता है। गांव में घर चलाने के लिए भेजे जाने वाले पैसे रुक जाते हैं। बच्चों की फीस, राशन, दवा और खेती से जुड़े खर्च प्रभावित होने लगते हैं।
रहने के लिए सुरक्षित जगह कहां मिले?
शहर में मजदूरों के लिए सस्ता और सुरक्षित आवास मिलना आसान नहीं है। कई मजदूर छोटे कमरों में कई लोगों के साथ रहते हैं। कहीं झुग्गी में रहना पड़ता है तो कहीं निर्माणाधीन इमारत के आसपास अस्थायी ठिकाना बनाना पड़ता है।
स्वच्छ पानी, शौचालय, बिजली और साफ-सफाई जैसी बुनियादी सुविधाएं भी हर जगह उपलब्ध नहीं होतीं। काम की जगह और रहने की जगह के बीच लंबी दूरी होने पर आने-जाने का खर्च भी बढ़ जाता है।
कम आय वाले मजदूर के लिए आवास की समस्या केवल सुविधा का सवाल नहीं है। यह उसकी आय, स्वास्थ्य और परिवार की सुरक्षा से भी जुड़ी हुई है।
स्वास्थ्य और कार्यस्थल की सुरक्षा
मजदूर की जिंदगी की एक और बड़ी चुनौती स्वास्थ्य और सुरक्षा है। निर्माण कार्य, फैक्टरी, सड़क निर्माण, भारी सामान उठाने और मशीनों के आसपास काम करने में दुर्घटना का खतरा बना रहता है।
लंबे समय तक काम करने से शारीरिक थकान और बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। गर्मी, बारिश, धूल, प्रदूषण और असुरक्षित कार्यस्थल में लगातार काम करना शरीर पर भारी पड़ता है।
दुर्घटना होने पर समस्या और गंभीर हो जाती है। मजदूर घायल हुआ तो कुछ समय के लिए उसकी कमाई बंद हो सकती है, जबकि परिवार का खर्च चलता रहता है। ऐसे समय में इलाज का खर्च और आय का नुकसान दोनों परिवार पर दबाव डाल सकते हैं।
शहर में सामाजिक पहचान का संकट
प्रवासी मजदूरों की सामाजिक असुरक्षा भी कम गंभीर समस्या नहीं है। गांव में व्यक्ति को लोग पहचानते हैं। पड़ोसी, पंचायत, स्थानीय दुकानदार और रिश्तेदार उसके सामाजिक जीवन का हिस्सा होते हैं। शहर में पहुंचने के बाद वही व्यक्ति अक्सर केवल एक श्रमिक बनकर रह जाता है।
स्थानीय प्रशासन, अस्पताल, बैंक, स्कूल और सरकारी सेवाओं तक पहुंच बनाने में उसे कठिनाई हो सकती है। भाषा, दस्तावेज, स्थानीय जानकारी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जानकारी की कमी उसके लिए अतिरिक्त बाधा बन जाती है।
इसलिए प्रवासी मजदूर के लिए शहर केवल रोजगार की नई जगह नहीं, बल्कि एक पूरी तरह नया सामाजिक वातावरण भी होता है।
परिवार से दूरी की कीमत
कई मजदूर अकेले शहर में रहते हैं और उनका परिवार गांव में रहता है। बाहर कमाने वाला व्यक्ति पैसे भेजता है, लेकिन बच्चों की परवरिश, बुजुर्गों की देखभाल और खेती की जिम्मेदारी पीछे छूटे परिवार पर आ जाती है।
दूसरी स्थिति में पूरा परिवार शहर चला जाता है। तब बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होने का खतरा रहता है। बार-बार जगह बदलने के कारण उनकी शिक्षा की निरंतरता टूट सकती है।
महिलाओं के लिए भी शहर में नए वातावरण के साथ तालमेल बैठाना आसान नहीं होता। सुरक्षित आवास, स्वास्थ्य सुविधा और बच्चों की देखभाल जैसी जरूरतें परिवार के सामने नई चुनौतियां खड़ी करती हैं।
बिचौलियों की भूमिका पर सवाल
मजदूर और काम देने वाले के बीच बिचौलियों या ठेकेदारों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। रोजगार दिलाने के नाम पर कई स्तर के लोग शामिल हो जाएं तो मजदूर की वास्तविक मजदूरी और उसके हाथ में आने वाली रकम के बीच अंतर पैदा हो सकता है।
कई मजदूर काम शुरू करते समय काम के घंटे, भुगतान की तारीख, अतिरिक्त काम की मजदूरी और रहने की व्यवस्था जैसी बातों की पूरी जानकारी नहीं ले पाते। इसकी एक वजह यह भी है कि उनके सामने तत्काल काम पाने की जरूरत होती है।
इसलिए रोजगार व्यवस्था में पारदर्शिता और लिखित शर्तों की जानकारी मजदूरों के हित में महत्वपूर्ण हो सकती है।
शहरों के विकास में मजदूरों का योगदान
इन तमाम कठिनाइयों के बावजूद प्रवासी मजदूर शहरों की अर्थव्यवस्था को गति देते हैं। सड़कें, पुल, मकान, बाजार, फैक्ट्रियां, होटल और अनेक सेवाएं उनके श्रम से चलती हैं।
शहर की चमक के पीछे जिन हाथों का पसीना है, उन्हीं हाथों को अक्सर सबसे कम सुविधाएं मिलती हैं। इसलिए मजदूर को केवल सस्ता श्रम मानना उसके योगदान को कम करके आंकना है।
सवाल यह नहीं है कि मजदूर गांव छोड़कर शहर क्यों जाता है। सवाल यह है कि शहर पहुंचने के बाद उसके साथ कैसा व्यवहार होता है?
यदि मजदूर देश के आर्थिक विकास में योगदान दे रहा है, तो उसे सुरक्षित कार्यस्थल, समय पर मजदूरी, सम्मानजनक आवास, स्वास्थ्य सुविधा, सामाजिक सुरक्षा और कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए।
गांव में रोजगार के विकल्प भी जरूरी
शहर की समस्याओं का समाधान केवल शहर में नहीं है। गांवों में रोजगार के स्थायी अवसर पैदा करना भी उतना ही जरूरी है।
कृषि आधारित उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, मत्स्य पालन, छोटे उद्योग, ग्रामीण निर्माण, हस्तशिल्प और कौशल आधारित सेवाओं को बढ़ावा देकर स्थानीय रोजगार बढ़ाया जा सकता है।
जब गांव के मजदूर के सामने एक से अधिक विकल्प होंगे, तब उसका शहर जाना मजबूरी के बजाय उसकी पसंद और आर्थिक रणनीति का हिस्सा बन सकता है।
किसी मजदूर का शहर जाना अपने आप में समस्या नहीं है। समस्या तब शुरू होती है, जब उसके श्रम की कीमत कम और उसकी मजबूरी की कीमत ज्यादा हो जाती है।
गांव का मजदूर केवल मजदूरी करने वाला व्यक्ति नहीं है। वह अपने परिवार, गांव और देश की अर्थव्यवस्था को संभालने वाला नागरिक है। उसके संघर्ष को आंकड़ों के पीछे छिपाने के बजाय उसकी वास्तविक परिस्थितियों को समझना जरूरी है।
शहर की चमक के पीछे जिन हाथों का पसीना है, उन हाथों को सम्मान, सुरक्षा और अधिकार मिलना ही सच्चे विकास की पहचान होगी।