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Bihar : नकटा दियारा की जनता की मांग को अनसुना न करें केंद्र सरकार

 नकटा दियारा की जनता की मांग को अनसुना न करें केंद्र सरकार

पटना संसदीय क्षेत्र के लोकप्रिय सांसद एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री Ravi Shankar Prasad ने एक बार फिर गंगा नदी पर निर्माणाधीन छह लेन सड़क पुल परियोजना से जुड़े एक महत्वपूर्ण जनहित के मुद्दे को केंद्र सरकार के समक्ष उठाया है। उन्होंने सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री Nitin Gadkari को पत्र लिखकर आग्रह किया है कि जे.पी. सेतु के समानांतर बन रहे राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 139W के पुल पर पिलर संख्या 16 से 26 के बीच नकटा दियारा क्षेत्र के लिए एक अप्रोच अथवा रैंप रोड का निर्माण कराया जाए।

यह मांग केवल एक सड़क निर्माण की मांग नहीं है, बल्कि लाखों लोगों के जीवन को आसान बनाने का प्रश्न है। सांसद रविशंकर प्रसाद ने अपने पत्र में स्पष्ट किया है कि दीघा-सोनपुर के बीच निर्माणाधीन छह लेन पुल का एक हिस्सा ग्राम नकटा दियारा एवं छितरचक क्षेत्र से होकर गुजरता है। यहां के ग्रामीण लंबे समय से चाहते हैं कि पुल से सीधे दियारा क्षेत्र को जोड़ने के लिए एक रैंप रोड बनाई जाए, जिससे वे मुख्य सड़क नेटवर्क से सीधे जुड़ सकें।

दियारा क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या उसका भौगोलिक स्वरूप है। गंगा और अन्य नदियों से घिरे इन इलाकों में वर्षा ऋतु और बाढ़ के दौरान आवागमन लगभग ठप हो जाता है। कई गांवों का संपर्क जिला मुख्यालय, अनुमंडल मुख्यालय तथा प्रखंड मुख्यालय से कट जाता है। मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में कठिनाई होती है, विद्यार्थियों
की पढ़ाई प्रभावित होती है तथा प्रशासनिक सेवाओं तक पहुंच बाधित हो जाती है। ऐसे में यदि निर्माणाधीन पुल से सीधे एक अप्रोच रोड उतार दी जाए तो यह क्षेत्र पूरे वर्ष राजधानी पटना और अन्य महत्वपूर्ण केंद्रों से जुड़ा रहेगा।

सांसद रविशंकर प्रसाद ने अपने पत्र में यह भी उल्लेख किया है कि इस मांग को पहले भी केंद्र सरकार के समक्ष उठाया गया था। उन्होंने अपने पूर्व पत्र का संदर्भ देते हुए बताया कि तत्कालीन बिहार सरकार के पथ निर्माण मंत्री Nitin Nabin ने भी 14 मई 2025 को इस मांग का समर्थन किया था। इतना ही नहीं, इस विषय पर केंद्र और राज्य सरकार के बीच हुई बैठक में भी चर्चा हुई थी। बाद में नकटा दियारा को किसी अन्य प्रस्तावित मार्ग से जोड़ने का विकल्प सामने आया, किंतु स्थानीय जनता इसे व्यावहारिक समाधान नहीं मानती।

स्थानीय लोगों का कहना है कि शेरपुर के निकट प्रस्तावित वैकल्पिक संपर्क मार्ग नकटा दियारा के निवासियों के लिए सुविधाजनक नहीं होगा। नकटा दियारा से उस प्रस्तावित संपर्क मार्ग तक आने-जाने में लगभग 50 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ेगी। ग्रामीणों के अनुसार यह न केवल समय और धन की बर्बादी होगी, बल्कि बाढ़ के समय स्थिति और भी विकट हो जाएगी। गंगा नदी के फैलाव के कारण लोगों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

नकटा दियारा कोई साधारण गांव नहीं है। यह एक प्राचीन एवं ऐतिहासिक क्षेत्र है, जिसके संपर्क में लगभग दस पंचायतें आती हैं। अनुमानतः दो से तीन लाख लोगों की आबादी इस प्रस्तावित रैंप रोड से सीधे लाभान्वित होगी। यदि यहां अप्रोच रोड का निर्माण होता है तो कृषि, व्यापार, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा रोजगार के अवसरों में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। दियारा क्षेत्र के किसानों को अपनी उपज बाजार तक पहुंचाने में आसानी होगी तथा युवाओं को रोजगार और शिक्षा के बेहतर अवसर प्राप्त होंगे।

इस मांग को केवल सांसद रविशंकर प्रसाद ने ही नहीं उठाया है। पूर्णिया (बिहार) के वर्तमान सांसद राजेश रंजन (पप्पू यादव) हैं।सांसद Pappu Yadav ने भी जनभावनाओं का सम्मान करते हुए अप्रोच रोड निर्माण का समर्थन किया है। वहीं बिहार सरकार के सहकारिता मंत्री Ram Kripal Yadav भी इस मांग के पक्ष में अपनी आवाज बुलंद कर चुके हैं। जब विभिन्न राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों की राय एक समान हो तथा जनता की मांग भी स्पष्ट हो, तब सरकार को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

विकास का वास्तविक अर्थ केवल बड़े-बड़े पुल और राजमार्ग बनाना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि उन परियोजनाओं का लाभ स्थानीय जनता तक पहुंचे। यदि करोड़ों रुपये की लागत से बनने वाला पुल दियारा क्षेत्र के लोगों को प्रत्यक्ष लाभ नहीं दे पाता, तो विकास का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। एक रैंप रोड का निर्माण अपेक्षाकृत कम लागत में लाखों लोगों के जीवन में बड़ा परिवर्तन ला सकता है।

केंद्रीय मंत्री नितिन गड़करी देश में आधुनिक सड़क अवसंरचना के निर्माण के लिए जाने जाते हैं। उनके नेतृत्व में अनेक महत्वाकांक्षी परियोजनाएं सफलतापूर्वक पूरी हुई हैं। ऐसे में नकटा दियारा की इस जनहितकारी मांग पर सकारात्मक निर्णय लेना न केवल स्थानीय जनता के हित में होगा, बल्कि यह सरकार की जनसंवेदनशीलता का भी परिचायक बनेगा।

आज आवश्यकता इस बात की है कि केंद्र सरकार, राज्य सरकार और संबंधित विभाग मिलकर नकटा दियारा क्षेत्र की वास्तविक परिस्थितियों का पुनर्मूल्यांकन करें। यदि तकनीकी दृष्टि से संभव हो, तो पिलर संख्या 16 से 26 के बीच एक उपयुक्त अप्रोच अथवा रैंप रोड का निर्माण कराया जाए। इससे लाखों लोगों की वर्षों पुरानी मांग पूरी होगी और दियारा क्षेत्र विकास की मुख्यधारा से स्थायी रूप से जुड़ सकेगा। जनता की अपेक्षा भी यही है कि उनकी आवाज को सुना जाए और विकास का लाभ उनके दरवाजे तक पहुंचाया जाए।

आलोक कुमार


World :"पीड़ित मानवता के लिए प्रार्थना करने का आह्वान किया "

 विश्व शांति के लिए रोजरी माला विनती : सन्त पापा लियो 14वें की विशेष पहल

कैथोलिक कलीसिया में मई का महीना माता मरियम को समर्पित माना जाता है। इस पूरे महीने में विश्व भर के श्रद्धालु माता मरियम के प्रति अपनी भक्ति व्यक्त करते हुए रोजरी माला का पाठ करते हैं। इस वर्ष मई माह के समापन पर सन्त पापा लियो 14वें ने विश्व शांति के लिए एक विशेष पहल की है। उन्होंने युद्धों, हिंसा और संघर्षों से पीड़ित मानवता के लिए प्रार्थना करने का आह्वान किया है तथा स्वयं 30 मई को वाटिकन गार्डन्स में पवित्र रोजरी माला विनती की अध्यक्षता करने का निर्णय लिया है।

सन्त पापा लियो 14वें अपने परमाध्यक्षीय कार्यकाल के आरम्भ से ही विश्व में शांति स्थापित करने की आवश्यकता पर जोर देते रहे हैं। उन्होंने विभिन्न अवसरों पर युद्धरत देशों और संघर्षों से जूझ रहे क्षेत्रों के लिए प्रार्थना की अपील की है। उनका मानना है कि प्रार्थना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानव हृदय को बदलने और शांति का मार्ग प्रशस्त करने का एक प्रभावशाली साधन है। इसी सोच के साथ वे मई माह के अंतिम दिनों में विश्व के सभी लोगों को एकजुट होकर शांति के लिए प्रार्थना करने के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। 

30 मई की शाम रोम समयानुसार 7 बजे, वाटिकन गार्डन्स में स्थित लूर्द की रानी माता मरियम को समर्पित गुफा के सामने यह विशेष रोजरी माला विनती आयोजित की जाएगी। इस प्रार्थना में सन्त पापा स्वयं नेतृत्व करेंगे और विश्व भर के श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक रूप से इसमें सहभागी बनने का अवसर मिलेगा। यह आयोजन केवल वाटिकन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया के अनेक प्रमुख तीर्थस्थल भी इसमें सहभागी होंगे।

विशेष बात यह है कि इस रोजरी विनती के प्रत्येक भेद को युद्ध और हिंसा से प्रभावित लोगों के लिए समर्पित किया जाएगा। सामान्यतः रोजरी माला के भेद प्रभु यीशु और माता मरियम के जीवन की विभिन्न घटनाओं पर आधारित होते हैं, किन्तु इस अवसर पर प्रत्येक भेद के साथ युद्ध पीड़ित परिवारों, विस्थापित लोगों, घायल नागरिकों, चिकित्सकों, राहत कर्मियों और स्वयंसेवकों के लिए विशेष प्रार्थनाएं की जाएंगी। इस प्रकार यह परंपरागत रोजरी पाठ के साथ-साथ समकालीन मानवीय पीड़ा को भी अपने भीतर समाहित करेगा।

कलीसिया में ऐसी परंपरा पहले भी देखी गई है। विशेषकर लेंट काल के दौरान कई चर्चों में पारंपरिक प्रार्थनाओं के साथ वर्तमान समाज के दुख-दर्द और चुनौतियों को जोड़कर विशेष पाठ किए जाते हैं। जिस प्रकार क्रूस मार्ग की चौदह मंजिलों के चिंतन में मानव जीवन की कठिनाइयों को शामिल किया जाता है, उसी प्रकार इस रोजरी विनती में भी विश्व की पीड़ाओं को ईश्वर और माता मरियम के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।

इस आयोजन में विश्व के अनेक प्रसिद्ध मरियम तीर्थस्थलों और धार्मिक केंद्रों को भी आमंत्रित किया गया है। जिन प्रमुख तीर्थस्थलों ने अपनी सहभागिता की पुष्टि की है, उनमें यूक्रेन का मरियम तीर्थस्थल, फिलीपींस में शांति की रानी माता मरियम का अंतरराष्ट्रीय तीर्थ, पुर्तगाल का प्रसिद्ध फातिमा तीर्थस्थल, बोस्निया और हर्जेगोविना का मेज्जुगोर्ये तीर्थ, फ्रांस का लूर्द तीर्थस्थल, लेबनान का संत चारबेल अन्नाया तीर्थ और इटली का लॉरेटो स्थित परमधर्मपीठीय हाउस ऑफ लॉरेटो शामिल हैं। इन सभी स्थानों पर श्रद्धालु उसी समय प्रार्थना में सहभागी होंगे और इस प्रकार विश्वभर के लाखों लोग एक आध्यात्मिक सूत्र में बंध जाएंगे।

आज जब दुनिया के अनेक हिस्सों में युद्ध, आतंकवाद, राजनीतिक संघर्ष और सामाजिक अस्थिरता बनी हुई है, तब यह पहल और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। युद्ध केवल सैनिकों को ही प्रभावित नहीं करता, बल्कि असंख्य परिवारों को बिखेर देता है। बच्चे अनाथ हो जाते हैं, माता-पिता अपने प्रियजनों को खो देते हैं और लाखों लोग अपने घरों से विस्थापित हो जाते हैं। अस्पतालों में कार्यरत चिकित्सक और स्वास्थ्यकर्मी दिन-रात घायलों की सेवा करते हैं, जबकि राहतकर्मी और स्वयंसेवक कठिन परिस्थितियों में मानवता की सेवा में लगे रहते हैं। सन्त पापा लियो 14वें ने विशेष रूप से इन सभी लोगों को अपनी प्रार्थनाओं में शामिल करने का निर्णय लिया है।

रोजरी माला विनती में सुख के पाँच भेदों का पाठ किया जाएगा। प्रत्येक भेद के माध्यम से विश्व के विभिन्न संकटग्रस्त क्षेत्रों के लिए ईश्वर से शांति, न्याय और मेल-मिलाप की याचना की जाएगी। साथ ही माता मरियम, जिन्हें “शांति की रानी” कहा जाता है, के संरक्षण और मध्यस्थता की प्रार्थना की जाएगी। विश्वासियों का मानना है कि माता मरियम की मध्यस्थता मानवता को ईश्वर के और निकट लाती है तथा कठिन समय में आशा प्रदान करती है।

रोम में उपस्थित तीर्थयात्रियों और श्रद्धालुओं के लिए भी विशेष व्यवस्था की गई है। वे सन्त पेत्रुस महागिरजाघर के प्रांगण में स्थापित विशाल स्क्रीन के माध्यम से इस प्रार्थना में सहभागी बन सकेंगे। इससे हजारों लोग एक साथ इस आध्यात्मिक आयोजन का हिस्सा बनेंगे और विश्व शांति के लिए अपनी प्रार्थनाएं अर्पित करेंगे।

यह कार्यक्रम सुसमाचार प्रचार संबंधी परमधर्मपीठीय परिषद के तत्वावधान में आयोजित किया जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल एक धार्मिक समारोह आयोजित करना नहीं, बल्कि विश्व भर के लोगों को शांति, करुणा और भाईचारे के संदेश से जोड़ना है। आज की विभाजित दुनिया में यह पहल हमें याद दिलाती है कि प्रार्थना और एकता के माध्यम से मानवता बेहतर भविष्य की ओर बढ़ सकती है।

सन्त पापा लियो 14वें की यह पहल इस बात का प्रतीक है कि शांति केवल राजनीतिक समझौतों से नहीं, बल्कि मानव हृदयों के परिवर्तन से भी आती है। जब लाखों लोग एक साथ शांति के लिए प्रार्थना करते हैं, तब आशा की एक नई किरण जन्म लेती है। यही संदेश इस विशेष रोजरी माला विनती का भी है—विश्व में शांति स्थापित हो, युद्ध समाप्त हों और समस्त मानवता प्रेम, न्याय तथा भाईचारे के मार्ग पर आगे बढ़े।


आलोक कुमार


World : इतिहास, महत्व और आत्ममंथन का अवसर

 मई माह का अंतिम दिन 30 मई वर्ष के उन विशेष दिनों में से एक है

मई माह का अंतिम दिन 30 मई वर्ष के उन विशेष दिनों में से एक है, जो हमें बीते हुए महीने का मूल्यांकन करने और आने वाले समय के लिए नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। वर्ष का पाँचवाँ महीना मई अपने साथ गर्मी, संघर्ष, परिश्रम और अनेक ऐतिहासिक घटनाओं की स्मृतियाँ लेकर आता है। जब हम 30 मई पर पहुँचते हैं, तब यह केवल एक कैलेंडर की तारीख नहीं रह जाती, बल्कि जीवन के अनेक पहलुओं पर विचार करने का अवसर भी प्रदान करती है।

30 मई का दिन इतिहास में कई महत्वपूर्ण घटनाओं के लिए जाना जाता है। विभिन्न देशों में इस दिन राजनीतिक, सामाजिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में उल्लेखनीय घटनाएँ घटी हैं। भारत के संदर्भ में भी मई का महीना अनेक ऐतिहासिक आंदोलनों, स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान तथा राष्ट्रीय विकास की उपलब्धियों की याद दिलाता है। यह दिन हमें उन महान व्यक्तित्वों को स्मरण करने का अवसर देता है जिन्होंने अपने कार्यों से समाज और राष्ट्र को नई दिशा प्रदान की।

मई का महीना विद्यार्थियों के लिए भी विशेष महत्व रखता है। अधिकांश विद्यालयों और महाविद्यालयों में इस समय ग्रीष्मावकाश प्रारंभ हो जाता है। बच्चे पूरे वर्ष की पढ़ाई के बाद विश्राम, मनोरंजन और नई गतिविधियों के लिए समय निकालते हैं। 30 मई तक पहुँचते-पहुँचते वे अपने अवकाश का आनंद लेते हुए नई कक्षाओं और भविष्य की योजनाओं के लिए भी तैयार होने लगते हैं। यह समय आत्मविकास, पुस्तक-पठन, खेलकूद और पारिवारिक संबंधों को मजबूत करने का भी अवसर देता है।

कृषि प्रधान भारत में मई का अंतिम सप्ताह किसानों के लिए भी महत्वपूर्ण होता है। इस समय वे मानसून के आगमन की प्रतीक्षा करते हैं। खेतों की तैयारी, बीजों का चयन और आगामी खरीफ फसलों की योजना बनाना इसी अवधि में शुरू होता है। 30 मई किसानों के लिए आशा और अपेक्षा का प्रतीक बन जाता है, क्योंकि कुछ ही दिनों बाद वर्षा ऋतु का आगमन होने वाला होता है। प्रकृति भी इस समय एक परिवर्तन के दौर से गुजरती दिखाई देती है।

धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी मई का अंतिम दिन महत्वपूर्ण माना जा सकता है। ईसाई परंपरा में मई का महीना माता मरियम को समर्पित होता है। पूरे महीने श्रद्धालु विशेष प्रार्थनाएँ, जपमाला और आराधना के माध्यम से माता मरियम के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं। 30 मई को मरियम माह के समापन की तैयारी होती है और भक्त ईश्वर के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। यह दिन प्रेम, सेवा, विनम्रता और विश्वास के मूल्यों को अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा देता है।

सामाजिक दृष्टि से देखा जाए तो 30 मई हमें यह सोचने का अवसर देता है कि हमने पूरे महीने समाज और परिवार के लिए क्या योगदान दिया। क्या हमने किसी जरूरतमंद की सहायता की? क्या हमने अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से पालन किया? क्या हमने अपने संबंधों को बेहतर बनाने का प्रयास किया? ऐसे प्रश्न व्यक्ति को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करते हैं और जीवन को अधिक सार्थक बनाने में सहायता करते हैं।

पर्यावरण के संदर्भ में भी मई का अंतिम दिन विशेष संदेश देता है। भीषण गर्मी, बढ़ता तापमान और जल संकट हमें प्रकृति के संरक्षण की आवश्यकता का एहसास कराते हैं। जल बचाने, पेड़ लगाने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने के लिए यह समय लोगों को जागरूक करने का उपयुक्त अवसर है। यदि प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी समझे, तो आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित और स्वस्थ पर्यावरण प्रदान किया जा सकता है।

आज के आधुनिक युग में समय बहुत तेजी से गुजरता है। ऐसे में 30 मई जैसे दिन हमें ठहरकर यह सोचने का अवसर देते हैं कि हमने अपने लक्ष्यों की दिशा में कितना कार्य किया है। यदि कोई लक्ष्य अधूरा रह गया है तो उसे पूरा करने की नई योजना बनाई जा सकती है। यदि कोई सफलता मिली है तो उसके लिए ईश्वर और अपने सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया जा सकता है।

30 मई हमें यह भी सिखाता है कि जीवन में प्रत्येक अंत एक नई शुरुआत का संकेत होता है। मई का समापन जून के आगमन का मार्ग प्रशस्त करता है। उसी प्रकार जीवन में आने वाली चुनौतियाँ और परिवर्तन हमें नए अवसरों की ओर ले जाते हैं। इसलिए हमें निराश होने के बजाय हर अनुभव से सीख लेकर आगे बढ़ना चाहिए।

अंततः, मई माह का अंतिम दिन 30 मई केवल एक तारीख नहीं, बल्कि चिंतन, कृतज्ञता, योजना और नई आशाओं का प्रतीक है। यह दिन हमें अपने अतीत से सीखने, वर्तमान को बेहतर बनाने और भविष्य के लिए सकारात्मक संकल्प लेने की प्रेरणा देता है। यदि हम इस भावना के साथ प्रत्येक महीने का समापन करें, तो हमारा जीवन अधिक अनुशासित, सार्थक और सफल बन सकता है। 30 मई इसी संदेश के साथ हमें आगे बढ़ने का आह्वान करता है कि समय अमूल्य है, इसलिए हर दिन को उद्देश्यपूर्ण और मानवता की सेवा के लिए समर्पित करना चाहिए।

आलोक कुमार

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