लावारिस मरीजों के लिए वार्ड नहीं, फिर भी गुरमीत सिंह की सेवा जारी
जिस पीएमसीएच में रोज हजारों मरीज इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचते हैं, वहां उन मरीजों का दर्द सबसे बड़ा सवाल बन जाता है जिनके सिरहाने अपना कोई नहीं होता। अलग वार्ड नहीं है, परिवार नहीं है, पहचान नहीं है—लेकिन पटना के गुरमीत सिंह हर रात ऐसे बेसहारा मरीजों के बीच पहुंचकर पूछते हैं, “क्या आपको दर्द हो रहा है?”
पटना मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल यानी पीएमसीएच बिहार की राजधानी का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सरकारी अस्पताल है। यहां बिहार के अलग-अलग जिलों से मरीज बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर आते हैं। किसी के साथ परिवार के कई सदस्य होते हैं तो कोई अकेला बीमारी से जूझता हुआ अस्पताल पहुंचता है। लेकिन इन सबके बीच एक वर्ग ऐसा भी है जिसकी पीड़ा सबसे ज्यादा अनदेखी रह जाती है—लावारिस, बेसहारा और मानसिक रूप से अस्वस्थ मरीज।
इन मरीजों के पास न कोई ऐसा व्यक्ति होता है जो अस्पताल की औपचारिकताएं पूरी कर सके, न दवा खरीदने वाला और न ही बीमारी के दौरान उनके सिरहाने बैठने वाला अपना। ऐसे मरीजों के लिए अस्पताल की व्यवस्था अपने आप में बड़ी चुनौती बन जाती है।
फिलहाल पीएमसीएच में लावारिस मरीजों के लिए अलग से कोई समर्पित वार्ड मौजूद नहीं है। अस्पताल के मेगा पुनर्विकास और निर्माण कार्य के दौरान पुराने लावारिस एवं कैदी वार्ड का भवन भी तोड़ा जा चुका है। ऐसे में इन मरीजों को सामान्य वार्डों या उपलब्ध वैकल्पिक स्थानों पर इलाज दिया जाता है। इससे इलाज के साथ-साथ उनकी निगरानी, पहचान, सुरक्षा और पुनर्वास की प्रक्रिया और जटिल हो जाती है।
यह समस्या केवल अस्पताल के बिस्तर की नहीं है। यह उस व्यवस्था की परीक्षा है जिसमें कोई व्यक्ति बीमार तो है, लेकिन उसके साथ खड़ा होने वाला कोई नहीं है।
यहीं पटना के गुरमीत सिंह की कहानी उम्मीद पैदा करती है।
पिछले दो दशकों से अधिक समय से गुरमीत सिंह बेसहारा मरीजों की सेवा कर रहे हैं। पेशे से कपड़ा कारोबारी गुरमीत सिंह के लिए यह सेवा किसी संस्था का अभियान नहीं, बल्कि जीवन का हिस्सा बन चुकी है। हर रात लगभग नौ बजे चिरैयाटांड़ स्थित अपनी रेडीमेड कपड़ों की दुकान से निकलकर वे पीएमसीएच पहुंचते हैं।
अस्पताल जाने से पहले वे मरीजों के लिए भोजन और जरूरत की दवाइयां लेकर निकलते हैं। अस्पताल पहुंचते ही वे मरीजों की स्थिति जानने की कोशिश करते हैं। उनका पहला सवाल अक्सर यही होता है—“क्या आपको दर्द हो रहा है?”
सवाल छोटा है, लेकिन जिस व्यक्ति के पास बीमारी के बीच अपनी बात सुनाने वाला कोई नहीं है, उसके लिए यह बेहद बड़ा सहारा है।
गुरमीत सिंह अकेले नहीं, बल्कि अपने चार भाइयों के सहयोग से वर्षों से इस सेवा को आगे बढ़ा रहे हैं। उनकी आय का एक हिस्सा जरूरतमंद मरीजों के भोजन और दवाओं पर खर्च होता है। उन्होंने इस काम को किसी अवसर विशेष तक सीमित नहीं रखा। रात-दर-रात अस्पताल पहुंचना और मरीजों की जरूरत पूरी करने की कोशिश करना उनकी नियमित दिनचर्या बन चुकी है।
मरीज उन्हें कई बार भगवान का दर्जा देते हैं। लेकिन गुरमीत सिंह खुद को किसी असाधारण व्यक्ति के रूप में पेश नहीं करते। उनके लिए यह सिर्फ एक इंसान के दूसरे इंसान के प्रति जिम्मेदारी है। उनका मानना है कि यदि किसी व्यक्ति का दर्द थोड़ा कम किया जा सकता है तो ऐसा जरूर किया जाना चाहिए।
उनकी सेवा को वर्ष 2016 में लंदन स्थित संस्था की ओर से ‘वर्ल्ड सिख अवॉर्ड’ की ‘सिख्स इन सेवा’ श्रेणी में सम्मान भी मिला। लेकिन किसी पुरस्कार से ज्यादा महत्वपूर्ण वह भरोसा है जो उन मरीजों के बीच उन्होंने वर्षों में बनाया है जिनके पास अपने नाम के अलावा शायद कुछ भी नहीं है।
गुरमीत सिंह की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह समाज को दो अलग-अलग तस्वीरें दिखाती है। पहली तस्वीर उस व्यवस्था की है जहां बड़े अस्पताल में आधुनिक सुविधाओं और नए भवनों की जरूरत है, लेकिन बेसहारा मरीजों के लिए समर्पित व्यवस्था अभी भी सवाल बनी हुई है। दूसरी तस्वीर समाज की संवेदना की है, जहां एक व्यक्ति अपनी कमाई और समय का हिस्सा ऐसे लोगों के लिए देता है जिनसे उसका कोई निजी रिश्ता नहीं है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सवाल भी है—क्या किसी एक व्यक्ति की सेवा को सरकारी व्यवस्था का विकल्प बनाया जा सकता है?
इसका जवाब स्पष्ट रूप से नहीं है।
गुरमीत सिंह जैसे संवेदनशील लोग व्यवस्था की कमी को कुछ हद तक भर सकते हैं, लेकिन स्थायी समाधान सरकार और अस्पताल प्रशासन को ही तैयार करना होगा। पीएमसीएच जैसे बड़े अस्पताल में लावारिस और मानसिक रूप से अस्वस्थ बेघर मरीजों के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल होना चाहिए।
अस्पताल में ऐसे मरीज के पहुंचते ही उसकी पहचान, चिकित्सकीय स्थिति और सामाजिक पृष्ठभूमि का दस्तावेजीकरण हो। पुलिस और सामाजिक कल्याण विभाग के साथ समन्वय हो। संभावित परिजनों की तलाश के लिए प्रभावी तंत्र बनाया जाए। जरूरत पड़ने पर सुरक्षित आश्रय, पुनर्वास केंद्र और संबंधित सामाजिक संस्थाओं से संपर्क कराया जाए।
महिला मरीजों के लिए विशेष सुरक्षा और आश्रय व्यवस्था भी जरूरी है। केवल इलाज कर देना पर्याप्त नहीं है। इलाज के बाद मरीज जाएगा कहां—यह सवाल भी अस्पताल की जिम्मेदारी का हिस्सा होना चाहिए।
पीएमसीएच का वर्तमान पुनर्निर्माण भविष्य की बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए हो रहा है। ऐसे में नई व्यवस्था में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि कोई मरीज केवल इसलिए उपेक्षित न रह जाए क्योंकि उसके साथ कोई रिश्तेदार नहीं है।
अस्पताल की इमारत आधुनिक हो सकती है, मशीनें अत्याधुनिक हो सकती हैं और इलाज की सुविधाएं बढ़ सकती हैं, लेकिन स्वास्थ्य व्यवस्था की असली संवेदनशीलता तब साबित होगी जब वह उस मरीज के लिए भी उतनी ही जिम्मेदार हो जिसके पास अपना कहने वाला कोई नहीं है।
गुरमीत सिंह हर रात यही याद दिलाते हैं कि इंसानियत के लिए बहुत बड़े पद की जरूरत नहीं होती। जरूरत होती है दर्द को पहचानने वाली नजर और मदद के लिए बढ़ने वाले हाथ की।
लेकिन अब समय है कि उनकी सेवा को प्रेरणा मानकर व्यवस्था भी आगे बढ़े। लावारिस मरीजों के लिए अलग वार्ड, पहचान की व्यवस्था, सुरक्षित देखभाल और पुनर्वास की स्पष्ट नीति पीएमसीएच की नई व्यवस्था का हिस्सा बननी चाहिए।
क्योंकि किसी मरीज का परिवार उसके साथ हो या न हो, इलाज के अधिकार के साथ उसकी इंसानी गरिमा हमेशा उसके साथ होनी चाहिए।