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शनिवार, 29 अगस्त 2026

Bengal : एक मां की आवाज, जो तीन महीने बाद भी जवाब का इंतजार कर रही है।

 Aadvik Hilarian की मौत के तीन महीने बाद मां Sweta Ancel का सवाल- ‘आखिर न्याय कब मिलेगा?’


पश्चिम बंगाल के आसनसोल में 28 मई से 28 अगस्त तक तीन महीने बीत चुके हैं, लेकिन अपने बेटे Aadvik Hilarian को खो चुकी मां Sweta Ancel के लिए समय जैसे वहीं ठहर गया है। बेटे की मौत के तीन महीने पूरे होने पर Sweta Ancel ने सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी पीड़ा और नाराजगी व्यक्त करते हुए न्याय की मांग दोहराई है।

उनका कहना है कि घटना के बाद समय गुजरता गया, लेकिन उनके परिवार के लिए जिंदगी पहले जैसी नहीं रही। एक मां ने अपना बच्चा खो दिया, एक परिवार की दुनिया उजड़ गई और अब भी उनके मन में सबसे बड़ा सवाल यही है—आखिर उनके बेटे की मौत की जिम्मेदारी कब तय होगी और उन्हें न्याय कब मिलेगा?

Sweta Ancel की सार्वजनिक अपील ने एक बार फिर इस मामले को बच्चों की सुरक्षा, स्कूल प्रशासन की जवाबदेही और जांच की गति जैसे महत्वपूर्ण सवालों के केंद्र में ला दिया है।

तीन महीने बाद भी मां के सवाल कायम

किसी माता-पिता के लिए बच्चे को खोने का दर्द शब्दों में व्यक्त करना आसान नहीं होता। Sweta Ancel के लिए भी तीन महीने बीत जाना किसी राहत का संकेत नहीं है। उनका कहना है कि उन्हें ऐसा महसूस हो रहा है जैसे घटना के बाद धीरे-धीरे सब कुछ सामान्य हो गया, जबकि उनके परिवार की जिंदगी पूरी तरह बदल चुकी है।

उनकी पीड़ा का सबसे बड़ा हिस्सा यही है कि उनका बेटा वापस नहीं आ सकता, लेकिन वह चाहती हैं कि उसकी मौत के पीछे यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच हो और जिम्मेदारी तय की जाए।

स्कूल प्रबंधन पर कथित लापरवाही के आरोप

Aadvik Hilarian की मां ने स्कूल प्रबंधन और घटना के समय स्विमिंग पूल में मौजूद बताए गए शिक्षकों की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने स्कूल के प्रिंसिपल Ravi Victor तथा Vikash Gaitano, Alfred Simon और Natal नामक शिक्षकों की भूमिका की जांच और कार्रवाई की मांग की है।

मां का आरोप है कि यदि बच्चे की निगरानी और सुरक्षा को लेकर पर्याप्त सावधानी बरती जाती तो शायद हादसे को रोका जा सकता था।

हालांकि, इन आरोपों को फिलहाल आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए। संबंधित व्यक्तियों की कानूनी जिम्मेदारी तभी तय हो सकती है जब सक्षम जांच एजेंसी तथ्यों, साक्ष्यों और परिस्थितियों की निष्पक्ष जांच करे।

इस मामले में स्कूल प्रबंधन और संबंधित शिक्षकों का आधिकारिक पक्ष सामने आना भी महत्वपूर्ण है, ताकि पूरी तस्वीर एकतरफा न रहे।

स्विमिंग पूल में बच्चों की सुरक्षा पर बड़ा सवाल

यह मामला केवल एक बच्चे की मौत और उसके परिवार के दुख तक सीमित नहीं है। यदि किसी स्कूल परिसर में स्विमिंग पूल संचालित किया जाता है तो वहां बच्चों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त निगरानी, प्रशिक्षित कर्मचारी, सुरक्षा उपकरण और आपात स्थिति से निपटने की व्यवस्था होना बेहद महत्वपूर्ण है।

विशेषकर बच्चों के मामले में कुछ मिनट भी बहुत महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

इसलिए ऐसे हादसे के बाद केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं है कि घटना कैसे हुई। यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि उस समय सुरक्षा प्रोटोकॉल क्या था, बच्चों की निगरानी कौन कर रहा था, आपात स्थिति में क्या प्रक्रिया अपनाई गई और बचाव के लिए उपलब्ध संसाधन पर्याप्त थे या नहीं।

‘सब कुछ फिर सामान्य कैसे हो गया?’

Sweta Ancel की सार्वजनिक पीड़ा में एक सवाल बार-बार सामने आता है—जिस परिवार ने अपना बच्चा खो दिया, उसके लिए सब कुछ खत्म हो गया, लेकिन बाकी दुनिया फिर सामान्य कैसे हो गई?

उनके अनुसार स्कूल की गतिविधियां सामान्य रूप से चल रही हैं। यही स्थिति उनके दर्द को और गहरा करती है।

एक मां के लिए यह स्वीकार करना कठिन है कि जिस जगह से उसका बच्चा वापस नहीं लौटा, वहां कुछ समय बाद रोजमर्रा की गतिविधियां फिर शुरू हो जाएं।

हालांकि किसी संस्था की गतिविधियों का जारी रहना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि जांच या कार्रवाई नहीं हुई है। इसलिए वास्तविक स्थिति जानने के लिए पुलिस, प्रशासन और स्कूल प्रबंधन की आधिकारिक जानकारी महत्वपूर्ण होगी।

पुलिस और प्रशासन से जवाब की उम्मीद

Sweta Ancel ने पुलिस और प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। उनकी नाराजगी इस बात को लेकर है कि तीन महीने बीतने के बाद भी उन्हें वह न्याय नहीं मिला जिसकी वे उम्मीद कर रही हैं।

उनका मूल सवाल सीधा है—

एक बच्चे की मौत की जिम्मेदारी आखिर कब तय होगी?

ऐसे मामलों में परिवार को केवल जांच की सूचना ही नहीं, बल्कि जांच की प्रगति और कानूनी प्रक्रिया के बारे में स्पष्ट जानकारी मिलना भी जरूरी है।

निष्पक्ष जांच का अर्थ यह भी है कि सभी पक्षों के बयान लिए जाएं, उपलब्ध साक्ष्यों की जांच हो और किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्य स्थापित किए जाएं।

एक मां की लड़ाई अब बच्चों की सुरक्षा का सवाल

Sweta Ancel ने संकेत दिया है कि वह अपने बेटे के लिए न्याय की लड़ाई जारी रखेंगी। उनका संघर्ष अब केवल व्यक्तिगत न्याय की मांग नहीं रह गया है। इससे स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर व्यापक सवाल भी उठते हैं।

क्या स्कूलों में स्विमिंग पूल के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित निगरानीकर्मी होते हैं?

क्या बच्चों की संख्या के अनुपात में निगरानी की व्यवस्था रहती है?

क्या आपात स्थिति में तुरंत चिकित्सा सहायता उपलब्ध होती है?

क्या कर्मचारियों को बचाव और प्राथमिक उपचार का प्रशिक्षण दिया जाता है?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या सुरक्षा नियम केवल कागज पर हैं या वास्तव में उनका पालन भी होता है?

इन सवालों का जवाब केवल इसी मामले के लिए नहीं, बल्कि उन सभी संस्थानों के लिए जरूरी है जहां बच्चों को खेल, तैराकी या अन्य गतिविधियों के लिए भेजा जाता है।

न्याय के साथ व्यवस्था में सुधार भी जरूरी

किसी बच्चे की मौत के बाद परिवार के लिए न्याय सबसे महत्वपूर्ण मांग होती है। लेकिन ऐसी घटनाओं से व्यवस्था को भी सीख लेनी चाहिए।

यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय होने के साथ-साथ भविष्य में ऐसी घटना रोकने के लिए सुरक्षा व्यवस्था में सुधार होना चाहिए।

स्कूलों में नियमित सुरक्षा ऑडिट, प्रशिक्षित स्टाफ, आपातकालीन प्रतिक्रिया व्यवस्था और बच्चों की गतिविधियों की उचित निगरानी जैसे कदम हादसों का जोखिम कम कर सकते हैं।

‘Justice for Aadvik’ की मांग

तीन महीने बाद भी Sweta Ancel की सबसे बड़ी मांग वही है—Justice for Aadvik

एक मां अपने बेटे को वापस नहीं ला सकती। लेकिन वह यह जरूर चाहती है कि उसके बच्चे की मौत को भुला न दिया जाए और यदि किसी की लापरवाही या चूक सामने आती है तो कानून के अनुसार जिम्मेदारी तय हो।

इस मामले में सबसे जरूरी है कि भावनाओं और आरोपों से अलग निष्पक्ष जांच तथा तथ्यात्मक निष्कर्ष सामने आएं।

आखिर किसी परिवार को न्याय तभी मिलेगा जब यह स्पष्ट हो कि घटना में वास्तव में क्या हुआ, उस समय सुरक्षा व्यवस्था कैसी थी, किसकी क्या जिम्मेदारी थी और जांच में कौन-से तथ्य सामने आए।

निष्कर्ष

Aadvik Hilarian की मौत के तीन महीने बाद उनकी मां का सवाल आज भी वही है—‘आखिर न्याय कब मिलेगा?’

यह सवाल एक मां के व्यक्तिगत दर्द से निकला है, लेकिन इसके भीतर स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा और संस्थागत जवाबदेही का बड़ा मुद्दा भी छिपा है।

जांच निष्पक्ष हो, सभी पक्षों को सुना जाए, तथ्य सामने आएं और यदि किसी स्तर पर जिम्मेदारी साबित होती है तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो—यही इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण अपेक्षा है।

एक बच्चे की जिंदगी वापस नहीं लाई जा सकती। लेकिन उसकी मौत से व्यवस्था यह सुनिश्चित जरूर कर सकती है कि भविष्य में किसी दूसरे माता-पिता को ऐसा सवाल न पूछना पड़े—

“मेरे बच्चे के साथ ऐसा क्यों हुआ और न्याय कब मिलेगा?”

Justice for Aadvik — एक मां की आवाज, जो तीन महीने बाद भी जवाब का इंतजार कर रही है।


आलोक कुमार