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सोमवार, 8 जून 2026

India : 12 साल का इंतज़ार, हजार रुपये की पेंशन और बुजुर्गों की उम्मीदें

 12 साल का इंतज़ार, हजार रुपये की पेंशन और बुजुर्गों की उम्मीदें: क्या 9 जुलाई की बैठक से निकलेगा कोई रास्ता?

जिस उम्र में व्यक्ति को सम्मान, सुरक्षा और सुकून मिलना चाहिए, उस उम्र में यदि उसे दवा, भोजन और जीवनयापन के लिए संघर्ष करना पड़े, तो यह केवल आर्थिक समस्या नहीं बल्कि सामाजिक संवेदनशीलता की भी परीक्षा है।

देश के लाखों ईपीएस-95 (EPS-95) पेंशनभोगी पिछले एक दशक से अधिक समय से इसी चुनौती का सामना कर रहे हैं। एक ओर महंगाई लगातार बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर हजार से डेढ़ हजार रुपये मासिक पेंशन पाने वाले अनेक बुजुर्ग अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी करने के लिए सं
घर्ष कर रहे हैं। न्यूनतम पेंशन को 7,500 रुपये प्रतिमाह करने, महंगाई भत्ता लागू करने तथा बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग को लेकर वर्षों से आंदोलन जारी है।

12 वर्षों से जारी है संघर्ष

ईपीएफओ पेंशनभोगियों की विभिन्न मांगों को लेकर वर्ष 2013-14 के दौरान राष्ट्रीय संघर्ष समिति का गठन किया गया था। इसके बाद देशभर में पेंशनभोगियों ने धरना, प्रदर्शन, ज्ञापन और जनजागरण अभियान चलाए।

समिति के अध्यक्ष अशोक राउत के नेतृत्व में पेंशनभोगियों की समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया गया। लाखों सेवानिवृत्त कर्मचारियों का कहना है कि उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान नियमित अंशदान देकर देश की औद्योगिक और आर्थिक प्रगति में योगदान दिया है, इसलिए वृद्धावस्था में उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार मिलना चाहिए।

क्यों उठ रही है 7,500 रुपये न्यूनतम पेंशन की मांग?

पेंशनभोगियों का कहना है कि वर्तमान न्यूनतम पेंशन आज की आर्थिक परिस्थितियों में पर्याप्त नहीं है। दवाइयों, स्वास्थ्य सेवाओं, बिजली, भोजन और अन्य आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों के बीच 1,000 या 1,500 रुपये मासिक पेंशन में जीवनयापन करना बेहद कठिन हो गया है।

उनका तर्क है कि यदि न्यूनतम पेंशन को 7,500 रुपये तक बढ़ाया जाता है, तो लाखों बुजुर्गों को आर्थिक सुरक्षा मिल सकती है और वे अपनी बुनियादी जरूरतें बेहतर तरीके से पूरी कर सकेंगे।

 महंगाई भत्ते की मांग भी प्रमुख मुद्दा

पेंशनभोगियों की दूसरी प्रमुख मांग परिवर्तनीय महंगाई भत्ता (DA) लागू करने की है।

वर्तमान व्यवस्था में पेंशन राशि वर्षों तक स्थिर बनी रहती है, जबकि महंगाई लगातार बढ़ती रहती है। इसका परिणाम यह होता है कि समय के साथ पेंशन की वास्तविक क्रय शक्ति घटती चली जाती है।

पेंशनभोगियों का मानना है कि यदि महंगाई भत्ता लागू किया जाए, तो बढ़ती कीमतों का प्रभाव कुछ हद तक संतुलित किया जा सकता है।

 स्वास्थ्य सुविधाओं की बढ़ती जरूरत

वृद्धावस्था में स्वास्थ्य संबंधी खर्च सबसे बड़ी चिंताओं में से एक होता है। राष्ट्रीय संघर्ष समिति लंबे समय से पति-पत्नी दोनों के लिए समुचित स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग करती रही है।

उनका कहना है कि बढ़ती उम्र के साथ नियमित जांच, दवाइयां और अस्पताल सेवाएं आवश्यक हो जाती हैं। ऐसे में स्वास्थ्य सुरक्षा का दायरा बढ़ाना लाखों परिवारों को राहत दे सकता है।

आश्वासन बहुत मिले, समाधान अब भी बाकी

पिछले कई वर्षों में पेंशनभोगियों के प्रतिनिधिमंडलों और विभिन्न सरकारी विभागों के बीच अनेक दौर की बातचीत हुई है। कई बार मांगों पर सकारात्मक विचार करने का आश्वासन भी दिया गया।

हालांकि अब तक ऐसा कोई व्यापक निर्णय सामने नहीं आया है जिससे सभी पेंशनभोगियों को अपेक्षित राहत मिल सके। यही कारण है कि बुजुर्गों के बीच उम्मीद और निराशा दोनों साथ-साथ दिखाई देती हैं।

9 जुलाई की बैठक पर टिकी हैं निगाहें

पेंशनभोगियों के बीच चर्चा है कि पेंशन संबंधी मुद्दों पर आगामी 9 जुलाई को एक महत्वपूर्ण बैठक हो सकती है, जिसमें विभिन्न मांगों पर विचार-विमर्श किया जा सकता है। हालांकि इस संबंध में अंतिम निर्णय या आधिकारिक घोषणा का इंतजार है।

यही वजह है कि देशभर के लाखों पेंशनभोगियों की निगाहें इस संभावित बैठक पर टिकी हुई हैं। उन्हें उम्मीद है कि इस बार केवल चर्चा नहीं, बल्कि कोई ठोस पहल देखने को मिल सकती है।

केवल आर्थिक नहीं, सामाजिक प्रश्न भी

यह मुद्दा केवल पेंशन राशि का नहीं है। यह उन लोगों के सम्मान, सुरक्षा और जीवन की गरिमा का भी प्रश्न है, जिन्होंने अपने जीवन के सबसे सक्रिय वर्ष देश के विकास और उद्योगों की प्रगति में लगाए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि वृद्धावस्था में आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करना किसी भी कल्याणकारी व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। ऐसे में पेंशनभोगियों की समस्याओं को केवल आंकड़ों के आधार पर नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण से भी देखने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष

ईपीएस-95 पेंशनभोगियों का संघर्ष अब 12 वर्ष से अधिक पुराना हो चुका है। न्यूनतम पेंशन वृद्धि, महंगाई भत्ता और स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग लगातार उठाई जाती रही है। आने वाले समय में सरकार इस दिशा में क्या निर्णय लेती है, इस पर लाखों परिवारों की उम्मीदें टिकी हुई हैं।

फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि यह मुद्दा केवल आर्थिक सहायता का नहीं, बल्कि उन बुजुर्गों के सम्मानजनक जीवन का है जिन्होंने अपने श्रम और योगदान से देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

आलोक कुमार