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गुरुवार, 3 सितंबर 2026

Bihar :बिहार की आंगनबाड़ी व्यवस्था: बच्चों और माताओं तक सेवा कितनी पहुंची?

 


बिहार की आंगनबाड़ी व्यवस्था: बच्चों और माताओं तक सेवा कितनी पहुंची?

पटना। किसी गांव की बस्ती में जब एक छोटा बच्चा आंगनबाड़ी केंद्र तक पहुंचता है, तो उसके साथ केवल एक बच्चा नहीं आता। उसके साथ उसके परिवार की उम्मीद आती है—कि उसे समय पर पोषण मिलेगा, उसका वजन और स्वास्थ्य देखा जाएगा, उसे स्कूल जाने से पहले कुछ सीखने का अवसर मिलेगा और उसकी मां को भी गर्भावस्था या प्रसव के बाद जरूरी सलाह और सहायता मिलेगी। लेकिन सवाल यह है कि बिहार की आंगनबाड़ी व्यवस्था वास्तव में इन उम्मीदों पर कितनी खरी उतर रही है?

बिहार में बच्चों और माताओं के स्वास्थ्य, पोषण तथा शुरुआती विकास की जिम्मेदारी में आंगनबाड़ी केंद्रों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। इन केंद्रों का उद्देश्य केवल पोषाहार उपलब्ध कराना नहीं है। बच्चों की वृद्धि की निगरानी, कुपोषण की पहचान, प्रारंभिक बाल देखभाल एवं शिक्षा, गर्भवती और धात्री महिलाओं को पोषण संबंधी जानकारी देना तथा जरूरत पड़ने पर स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ना भी इसकी जिम्मेदारी का हिस्सा है।

ऐसे में आंगनबाड़ी व्यवस्था को केवल सरकारी योजना मानकर नहीं देखा जा सकता। यह ग्रामीण और गरीब परिवारों के लिए स्वास्थ्य और पोषण व्यवस्था की पहली सीढ़ी है।

कागज पर व्यवस्था और जमीन पर हकीकत

सरकारी योजनाओं की सफलता का सबसे बड़ा परीक्षण उनके आंकड़ों में नहीं, बल्कि अंतिम लाभार्थी के जीवन में दिखाई देता है। आंगनबाड़ी व्यवस्था के मामले में भी यही बात लागू होती है।

सरकारी रिकॉर्ड में केंद्रों की संख्या, पंजीकृत लाभार्थियों, पोषाहार वितरण और विभिन्न गतिविधियों का विवरण मौजूद हो सकता है। लेकिन वास्तविक सवाल यह है कि क्या हर पात्र बच्चे और महिला तक सेवा नियमित रूप से पहुंच रही है?

कई जगह आंगनबाड़ी केंद्र सक्रिय रूप से काम करते हैं। सेविका और सहायिका बच्चों तथा महिलाओं तक पहुंचने की कोशिश करती हैं। लेकिन दूसरी ओर भवन की कमी, साफ-सफाई, पेयजल, शौचालय, बैठने की व्यवस्था, बच्चों के अनुकूल वातावरण और जरूरी संसाधनों की कमी जैसी समस्याएं भी सामने आती हैं।

अगर किसी केंद्र पर बच्चे बैठने के लिए उचित स्थान से वंचित हों, साफ पानी उपलब्ध न हो या बच्चों के सीखने के लिए आवश्यक सामग्री पर्याप्त न हो, तो केवल केंद्र के अस्तित्व को व्यवस्था की सफलता नहीं माना जा सकता।

पोषण का मतलब सिर्फ भोजन नहीं

बच्चे को पोषण मिलना जरूरी है, लेकिन पोषण का अर्थ केवल एक पैकेट या एक भोजन उपलब्ध करा देना नहीं है। बच्चे की उम्र, उसकी वृद्धि, स्वास्थ्य और पोषण की वास्तविक जरूरत को समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

बच्चे का वजन और विकास नियमित रूप से देखा जाना चाहिए। यदि किसी बच्चे में कुपोषण के संकेत दिखाई देते हैं तो उसकी पहचान समय पर होनी चाहिए और जरूरत पड़ने पर उसे स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ा जाना चाहिए।

इसी तरह गर्भवती महिलाओं के लिए भी पोषण सेवा केवल खाद्य सामग्री तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें संतुलित आहार, नियमित स्वास्थ्य जांच, आयरन-फोलिक एसिड, टीकाकरण, सुरक्षित मातृत्व और प्रसव से जुड़ी जरूरी जानकारी मिलना आवश्यक है।

धात्री माताओं के लिए स्तनपान, नवजात शिशु की देखभाल और बच्चे के शुरुआती पोषण से संबंधित सही सलाह भी महत्वपूर्ण है।

यानी आंगनबाड़ी की सफलता तभी मानी जाएगी जब भोजन, स्वास्थ्य, पोषण और जागरूकता—चारों एक साथ काम करें।

सेविका पर बढ़ती जिम्मेदारियों का सवाल

आंगनबाड़ी सेविका और सहायिका जमीनी स्तर पर इस पूरी व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। वे सरकार और गरीब परिवारों के बीच संपर्क का माध्यम बनती हैं।

उनसे बच्चों की जानकारी रखने, पोषाहार वितरण, बच्चों के वजन और वृद्धि से जुड़े रिकॉर्ड, गर्भवती महिलाओं की जानकारी, जागरूकता गतिविधियों तथा विभिन्न सरकारी अभियानों में सहयोग जैसी कई जिम्मेदारियां जुड़ी रहती हैं।

यहां सवाल केवल यह नहीं है कि सेविका कितने काम कर रही है। सवाल यह भी है कि उसे इन कामों के लिए पर्याप्त संसाधन, प्रशिक्षण और प्रशासनिक सहयोग मिल रहा है या नहीं।

यदि जमीनी कर्मी का अधिकांश समय रिकॉर्ड और कागजी प्रक्रिया में चला जाए, तो बच्चों और माताओं के साथ सीधे काम करने के लिए समय कम हो सकता है।

इसलिए आंगनबाड़ी कर्मियों की भूमिका को केवल आंकड़े जुटाने वाले कर्मचारी के रूप में नहीं, बल्कि बच्चों और माताओं की पहली जमीनी निगरानी व्यवस्था के रूप में मजबूत करने की जरूरत है।

गांव के साथ शहर की बस्तियों पर भी ध्यान जरूरी

आंगनबाड़ी की चर्चा अक्सर ग्रामीण बिहार के संदर्भ में होती है। लेकिन पटना जैसे शहरों में भी गरीब और मजदूर परिवार बड़ी संख्या में अस्थायी बस्तियों में रहते हैं।

इन परिवारों के बच्चों के सामने भी पोषण, स्वच्छता, स्वास्थ्य और प्रारंभिक शिक्षा की समस्याएं हो सकती हैं। शहरों में एक अतिरिक्त चुनौती परिवारों का लगातार स्थान बदलना है। मजदूरी या रोजगार के कारण परिवार एक इलाके से दूसरे इलाके में चले जाते हैं। इससे बच्चों और माताओं को मिलने वाली सेवाओं की निरंतरता प्रभावित हो सकती है।

इसलिए शहरी आंगनबाड़ी केंद्रों की जरूरतों को ग्रामीण व्यवस्था से अलग समझना होगा। जहां प्रवासी और अस्थायी आबादी अधिक है, वहां लाभार्थियों की पहचान और सेवाओं की निरंतरता पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।

निगरानी हो, लेकिन सिर्फ कागज पर नहीं

आंगनबाड़ी व्यवस्था में पारदर्शिता और सामाजिक निगरानी को मजबूत करना भी जरूरी है। स्थानीय अभिभावकों को यह जानकारी होनी चाहिए कि केंद्र पर बच्चों और महिलाओं के लिए कौन-कौन सी सेवाएं उपलब्ध हैं।

पंचायत और स्थानीय स्तर पर सामाजिक निगरानी को सक्रिय किया जा सकता है। अभिभावकों से समय-समय पर फीडबैक लिया जाए और शिकायतों के समाधान की स्पष्ट व्यवस्था हो।

डिजिटल रिकॉर्ड व्यवस्था उपयोगी हो सकती है, लेकिन उसका उद्देश्य केवल आंकड़े जमा करना नहीं होना चाहिए। तकनीक का इस्तेमाल यह देखने के लिए भी होना चाहिए कि वास्तविक लाभार्थी तक सेवा पहुंच रही है या नहीं।

सफलता का पैमाना बदलना होगा

बिहार में आंगनबाड़ी व्यवस्था की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने केंद्र संचालित हैं या कितने बच्चों और महिलाओं का पंजीकरण हुआ है।

असली सवाल होना चाहिए—कितने बच्चों की नियमित स्वास्थ्य निगरानी हुई? कितने बच्चों में कुपोषण की समय पर पहचान हुई? कितनी माताओं को नियमित पोषण और स्वास्थ्य संबंधी सहायता मिली? कितने आंगनबाड़ी केंद्र


बच्चों के शुरुआती सीखने के लिए बेहतर वातावरण उपलब्ध करा रहे हैं?

सरकार को इन सवालों के आधार पर परिणामों का मूल्यांकन करना चाहिए। जहां भवन की कमी है, वहां भवन और मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हों। जहां पेयजल या शौचालय नहीं हैं, वहां उनकी व्यवस्था हो। जहां कर्मियों पर काम का अत्यधिक बोझ है, वहां आवश्यक सहयोग और संसाधन दिए जाएं।

आखिरकार आंगनबाड़ी किसी सरकारी फाइल का आंकड़ा नहीं है। उसके केंद्र में बैठा बच्चा बिहार के भविष्य का नागरिक है और वहां आने वाली मां आने वाली पीढ़ी के स्वास्थ्य की आधारशिला है।

इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि बिहार में कितने आंगनबाड़ी केंद्र हैं। असली सवाल यह है कि इन केंद्रों तक पहुंचने वाले बच्चों और माताओं को वास्तव में कितना पोषण, कितना स्वास्थ्य संरक्षण, कितनी प्रारंभिक शिक्षा और कितना सम्मान मिल रहा है।

अगर बिहार को कुपोषण और बाल स्वास्थ्य की चुनौतियों से प्रभावी ढंग से लड़ना है, तो आंगनबाड़ी को केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि बच्चे के स्वस्थ भविष्य की पहली सार्वजनिक जिम्मेदारी मानकर मजबूत करना होगा।


आलोक कुमार