महंगाई जब रसोई तक पहुंचती है तो उसके साथ जनता का सवाल भी पहुंचता है—सरकार आखिर किसलिए है? पेट्रोल-डीजल महंगा हो, सब्जियों के दाम बढ़ें, दाल की कीमतें आसमान छुएं या चीनी की मिठास जेब के लिए कड़वी हो जाए, आम आदमी की नजर सरकार की ओर ही जाती है। ऐसे में अगर जवाब मिले कि कीमतें बाजार तय करता है और सरकार की कोई भूमिका नहीं है, तो सवाल सिर्फ चीनी का नहीं, सरकार की जवाबदेही का बन जाता है।
चीनी के बढ़ते दामों को लेकर भाजपा सांसद और प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी का कथित बयान इसी सवाल को जन्म देता है। यदि उनका तर्क यही है कि चीनी की कीमत बाजार तय करता है और सरकार की इसमें कोई भूमिका नहीं है, तो यह जवाब सिर्फ एक वस्तु की कीमत का नहीं, बल्कि शासन की आर्थिक जिम्मेदारी का सवाल भी बन जाता है।
विडंबना देखिए। जब नागरिकों को प्रभावित करने वाली संस्थाओं और व्यवस्थाओं की बात आती है तो सत्ता पक्ष अक्सर मजबूत और निर्णायक सरकार की तस्वीर पेश करता है। लेकिन जैसे ही महंगाई का सवाल सामने आता है, जिम्मेदारी बाजार के सिर डाल दी जाती है। तब सवाल उठना स्वाभाविक है—सरकार का नियंत्रण जहां जरूरी है, वहां बाजार स्वतंत्र और जहां राजनीतिक सुविधा हो, वहां सरकार निर्णायक कैसे?
बाजार निश्चित रूप से कीमतों को प्रभावित करता है। मांग और आपूर्ति अर्थव्यवस्था के बुनियादी सिद्धांत हैं। लेकिन खाद्य पदार्थों की कीमतें केवल बाजार की अदृश्य ताकतों से तय नहीं होतीं। उत्पादन, भंडारण, आयात-निर्यात, कर व्यवस्था, स्टॉक सीमा, जमाखोरी पर कार्रवाई और आपूर्ति व्यवस्था जैसे कई कारक कीमतों को प्रभावित करते हैं।
चीनी इसका बड़ा उदाहरण है।
अगर सरकार की चीनी की कीमत में कोई भूमिका ही नहीं है तो फिर उत्पादन और उपलब्धता को लेकर सरकारी फैसले क्यों होते हैं? स्टॉक सीमा क्यों लगाई जाती है? जमाखोरी रोकने के लिए प्रशासनिक कार्रवाई क्यों होती है? जरूरत पड़ने पर आयात नीति क्यों बदली जाती है? सरकार चीनी उद्योग के लिए अलग-अलग नीतिगत फैसले क्यों लेती है?
सवाल सिर्फ चीनी के एक किलो पैकेट का नहीं है। सवाल उस सोच का है जिसमें मुनाफा निजी क्षेत्र का हो तो बाजार की स्वतंत्रता और संकट पैदा हो तो समाधान के लिए सरकार से उम्मीद की जाती है।
जनता सरकार से यह नहीं कहती कि वह हर दुकान पर खड़े होकर चीनी का भाव तय करे। जनता की अपेक्षा इतनी है कि आवश्यक वस्तुओं की कीमतें उसकी पहुंच से बाहर न हों। अगर बाजार में किसी वस्तु की कीमत असामान्य रूप से बढ़ रही है तो सरकार को उसके कारण तलाशने चाहिए।
उत्पादन कम है तो उत्पादन बढ़ाने की नीति बने। आपूर्ति बाधित है तो रास्ता साफ किया जाए। जमाखोरी है तो कार्रवाई हो। आयात जरूरी है तो समय पर फैसला लिया जाए। किसानों और उपभोक्ताओं के हितों के बीच संतुलन बनाया जाए।
यही सरकार की भूमिका है।
सरकार का काम केवल कीमत लिख देना नहीं, बल्कि ऐसा आर्थिक वातावरण तैयार करना है जिसमें बाजार जनता के खिलाफ न खड़ा हो जाए।
यहां एक और महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है। जब सरकार कई बार कीमतों को नियंत्रित करने के लिए नीतिगत हस्तक्षेप करती है, तब यह कहना कि बाजार कीमत तय करता है और सरकार की कोई भूमिका नहीं है, अधूरा तर्क लगता है। अगर सरकार बाजार में किसी भी तरह का हस्तक्षेप नहीं करेगी तो संकट की घड़ी में राहत कौन देगा?
किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य चाहिए। उपभोक्ता को सस्ती वस्तु चाहिए। चीनी मिल को आर्थिक रूप से टिकाऊ कीमत चाहिए। व्यापारी को कारोबार चाहिए। सरकार का काम इन सभी हितों के बीच संतुलन बनाना है। केवल यह कह देना कि बाजार तय करेगा, शासन की जिम्मेदारी से मुक्ति का रास्ता नहीं हो सकता।
राजनीतिक प्रवक्ताओं की भी बड़ी जिम्मेदारी होती है। वे सिर्फ अपनी पार्टी का बचाव नहीं करते, बल्कि जनता के सामने सरकार की नीतियों और फैसलों का पक्ष रखते हैं। इसलिए जब महंगाई पर सवाल पूछा जाए तो जवाब ऐसा होना चाहिए जो जनता की चिंता को समझाए, न कि सवाल को ही बाजार के हवाले कर दे।
आज चीनी महंगी है तो कल कोई दूसरी जरूरी वस्तु महंगी हो सकती है। अगर हर बार जवाब यही होगा कि बाजार कीमत तय करता है, तो फिर जनता सरकार से किस चीज की उम्मीद करे?
सरकार बाजार को नियंत्रित करने वाली संस्था भले न हो, लेकिन वह बाजार के लिए नियम बनाने वाली संस्था जरूर है। वह कर नीति तय करती है, आयात-निर्यात नीति बनाती है, जमाखोरी के खिलाफ कार्रवाई करती है, उपभोक्ता हितों की रक्षा करती है और जरूरत पड़ने पर हस्तक्षेप भी करती है।
इसलिए ज्यादा सटीक बात यह होगी कि कीमत बाजार में बनती है, लेकिन बाजार का माहौल सरकार की नीतियों से बनता है।
यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक बचाव और शासन की जवाबदेही के बीच अंतर दिखाई देता है।
जनता को भाषण नहीं चाहिए। जनता को चीनी चाहिए—वह भी ऐसी कीमत पर जिसे खरीदते समय घर का बजट न बिगड़े।
सत्ता पक्ष के नेताओं को यह समझना होगा कि महंगाई का सवाल विपक्ष का राजनीतिक हथियार भर नहीं है। यह रसोई का सवाल है। यह मध्यम वर्ग की चिंता है। यह गरीब परिवार के मासिक बजट का सवाल है। जब किसी जरूरी वस्तु की कीमत बढ़ती है तो उसका असर सिर्फ बाजार पर नहीं, परिवार की थाली और पूरे घरेलू बजट पर पड़ता है।
इसलिए सवाल सुधांशु त्रिवेदी के कथित बयान से आगे बढ़कर सरकार से पूछा जाना चाहिए—
अगर चीनी का भाव बाजार तय करता है, तो सरकार बाजार को जवाबदेह बनाने के लिए क्या कर रही है?
अगर सरकार की कोई भूमिका नहीं है, तो फिर महंगाई के समय जनता सरकार से राहत की उम्मीद क्यों न करे?
और सबसे बड़ा सवाल—
अगर सरकार दूसरे क्षेत्रों में मजबूत और निर्णायक भूमिका का दावा करती है, लेकिन चीनी के भाव पर आते ही कहती है कि बाजार स्वतंत्र है, तो जनता आखिर किस बात के लिए सरकार चुने?
लोकतंत्र में सरकार का मतलब हर वस्तु की कीमत खुद तय करना नहीं है। लेकिन सरकार का मतलब जनता को बाजार की मनमानी के भरोसे छोड़ देना भी नहीं है।
सरकार की असली परीक्षा यही है कि वह बाजार की स्वतंत्रता और जनता के हित के बीच संतुलन कैसे बनाती है। बाजार में प्रतिस्पर्धा जरूरी है, लेकिन उपभोक्ता संरक्षण भी उतना ही जरूरी है। उद्योग की आर्थिक सेहत महत्वपूर्ण है, लेकिन परिवार की रसोई भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
चीनी का स्वाद मीठा होता है। लेकिन महंगाई पर दिया गया ऐसा राजनीतिक बचाव जनता के लिए बेहद कड़वा साबित हो सकता है।
बाजार भाव तय कर सकता है, लेकिन बाजार को संतुलित रखने और जनता के हितों की रक्षा करने की जवाबदेही सरकार की ही होती है।
आलोक कुमार