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शुक्रवार, 28 अगस्त 2026

Bihar : बेरोजगार युवाओं के लिए सरकारी नौकरी ही एकमात्र रास्ता क्यों नहीं?

 बेरोजगार युवाओं के लिए सरकारी नौकरी ही एकमात्र रास्ता क्यों नहीं?


भारत, खासकर बिहार जैसे राज्यों में सरकारी नौकरी आज भी युवाओं के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक भविष्य का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लाखों युवा वर्षों लगा देते हैं। सुबह से रात तक किताबों के बीच समय बिताना, कोचिंग करना, परीक्षा की तारीख का इंतजार करना और फिर परिणाम के लिए महीनों बेचैनी में रहना—यह आज बड़ी संख्या में युवाओं की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है।

सरकारी नौकरी की चाहत गलत नहीं है। सवाल यह है कि क्या बेरोजगार युवाओं के भविष्य का एकमात्र रास्ता सरकारी नौकरी ही हो सकता है?

सरकारी नौकरी की अपनी अहमियत है। नियमित आय, नौकरी की स्थिरता, सामाजिक सुरक्षा और कई तरह की सुविधाएं इसे आकर्षक बनाती हैं। खासकर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए सरकारी नौकरी केवल रोजगार नहीं, बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति बदलने का माध्यम बन सकती है। यही कारण है कि बिहार में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं की संख्या लगातार बड़ी बनी हुई है।

लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब एक पूरी युवा पीढ़ी अपने भविष्य को सीमित संख्या में सरकारी पदों से जोड़ देती है।

कुछ हजार पद, लाखों दावेदार

हर साल विभिन्न सरकारी विभागों में रिक्तियां निकलती हैं और लाखों युवा उनके लिए आवेदन करते हैं। एक पद के लिए सैकड़ों या हजारों उम्मीदवारों के बीच मुकाबला होता है। परीक्षा की तैयारी में वर्षों लगाने के बावजूद चयन की गारंटी किसी के पास नहीं होती।

इसका सबसे बड़ा असर युवाओं के समय पर पड़ता है। 22 से 25 वर्ष की उम्र ऐसी होती है, जब किसी युवा के पास ऊर्जा, सीखने की क्षमता, रचनात्मकता और जोखिम उठाने का साहस होता है। यदि यही पूरा समय केवल एक या दो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में निकल जाए और सफलता न मिले तो युवा के सामने अचानक रोजगार और भविष्य का बड़ा सवाल खड़ा हो सकता है।

यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं है। जब बड़ी संख्या में युवा अपनी क्षमता का उपयोग रोजगार या उत्पादन में करने के बजाय वर्षों तक परीक्षा की तैयारी में लगाए रखते हैं, तो इसका असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।

बिहार में सामाजिक दबाव भी बड़ी वजह

बिहार में सरकारी नौकरी को लेकर सामाजिक मानसिकता काफी मजबूत है। कई परिवारों में बेटे या बेटी के लिए सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण सरकारी नौकरी को माना जाता है। परिवार आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद वर्षों तक कोचिंग, किराया, किताब और रहने-खाने का खर्च उठाते हैं।

पटना समेत कई शहरों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं की बड़ी संख्या इसी उम्मीद के साथ रहती है कि एक दिन सरकारी नौकरी मिलेगी और परिवार की स्थिति बदल जाएगी।

लेकिन वास्तविकता यह है कि हर उम्मीदवार का चयन संभव नहीं है।

ऐसे में जरूरत सरकारी नौकरी की इच्छा खत्म करने की नहीं, बल्कि करियर के विकल्पों का विस्तार करने की है।

रोजगार का मतलब केवल सरकारी नौकरी नहीं

आज रोजगार के अनेक क्षेत्र मौजूद हैं। निजी कंपनियां, बैंकिंग, बीमा, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, तकनीकी क्षेत्र, पर्यटन, लॉजिस्टिक्स, निर्माण, कृषि आधारित उद्योग और डिजिटल सेवाएं युवाओं के लिए अवसर पैदा कर रहे हैं।

डिजिटल अर्थव्यवस्था ने तो रोजगार के कई ऐसे रास्ते खोले हैं, जो कुछ वर्ष पहले युवाओं के लिए बहुत सीमित थे। ग्राफिक डिजाइन, वीडियो एडिटिंग, डिजिटल मार्केटिंग, वेब डेवलपमेंट, सोशल मीडिया प्रबंधन, ऑनलाइन शिक्षा और तकनीकी सेवाओं जैसे क्षेत्रों में कौशल रखने वाला युवा नौकरी के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से काम भी कर सकता है।

हालांकि इसके लिए डिग्री से आगे बढ़कर कौशल की जरूरत है।

डिग्री के साथ कौशल जरूरी

आज सिर्फ स्नातक या स्नातकोत्तर की डिग्री रोजगार की गारंटी नहीं देती। कंपनियां और संस्थान ऐसे युवाओं की तलाश करते हैं, जिनके पास व्यावहारिक ज्ञान और काम करने की क्षमता हो।

इसलिए कॉलेज और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई को रोजगार की वास्तविक जरूरतों से जोड़ना होगा। विद्यार्थियों को इंटर्नशिप, कंप्यूटर ज्ञान, संचार कौशल, डिजिटल दक्षता, वित्तीय समझ और व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना और डिग्री हासिल करना नहीं होना चाहिए। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो युवा को रोजगार खोजने के साथ-साथ अवसर पैदा करने की क्षमता भी दे।

स्वरोजगार को छोटा समझना बंद करना होगा

सरकारी नौकरी के प्रति सम्मान होना ठीक है, लेकिन छोटे कारोबार या स्वरोजगार को कमतर समझना उचित नहीं है।

मोबाइल रिपेयरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, डेयरी, खाद्य प्रसंस्करण, मछली पालन, मुर्गी पालन, कृषि आधारित व्यवसाय, कपड़ा कारोबार, परिवहन, सर्विस सेंटर और स्थानीय डिजिटल सेवाएं जैसे काम रोजगार के मजबूत माध्यम बन सकते हैं।

कई छोटे व्यवसाय समय के साथ बड़े उद्यम में बदलते हैं। फर्क केवल इतना है कि नौकरी में युवा किसी संस्था के लिए काम करता है, जबकि उद्यमिता में वह स्वयं रोजगार पैदा करने की क्षमता विकसित करता है।

सरकार की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी

युवाओं से केवल यह कहना कि सरकारी नौकरी के पीछे मत भागिए और व्यवसाय कीजिए, पर्याप्त नहीं है।

यदि सरकार युवाओं को उद्यमिता की ओर बढ़ाना चाहती है तो उसे आसान ऋण, प्रशिक्षण, बाजार, तकनीकी सहायता और आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी। बिजली, सड़क, इंटरनेट और सरल प्रशासनिक प्रक्रियाएं छोटे व्यवसायों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल कौशल और बाजार के बीच तालमेल का है। यदि किसी युवा को ऐसा प्रशिक्षण दिया जाए जिसकी बाजार में मांग ही नहीं है, तो प्रशिक्षण पूरा करने के बाद भी बेरोजगारी बनी रहेगी।

इसलिए प्रशिक्षण संस्थानों और उद्योगों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। युवाओं को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि वर्तमान ही नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में किन क्षेत्रों में रोजगार की मांग बढ़ सकती है।

सरकारी नौकरी की जरूरत फिर भी बनी रहेगी

इसका मतलब यह नहीं है कि सरकारी नौकरी की आवश्यकता समाप्त हो गई है। सरकारी क्षेत्र में पर्याप्त और समयबद्ध भर्ती जरूरी है। वर्षों तक रिक्त पद पड़े रहना, परीक्षा में देरी होना या परिणाम के लिए लंबा इंतजार युवाओं की उम्र और ऊर्जा दोनों को प्रभावित करता है।

सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता, समयबद्ध परीक्षा और परिणाम तथा रिक्तियों की नियमित जानकारी युवाओं को अनिश्चितता से बचा सकती है।

लेकिन सरकारी भर्ती को मजबूत करने के साथ-साथ रोजगार के निजी और स्वरोजगार वाले क्षेत्रों को भी मजबूत करना होगा।

सफलता की परिभाषा बदलनी होगी

समाज की सोच बदलना भी जरूरी है। सरकारी अधिकारी बनना निश्चित रूप से सफलता का एक रास्ता है, लेकिन सफल शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर, किसान, तकनीशियन, कारोबारी, कलाकार या उद्यमी बनना भी उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है।

एक युवा यदि दस लोगों को रोजगार देता है तो उसका योगदान किसी नौकरी पाने वाले व्यक्ति से कम नहीं है। इसी तरह एक कुशल तकनीशियन, अच्छा शिक्षक या आधुनिक तरीके से खेती करने वाला किसान भी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

युवाओं को एक ही दरवाजे पर क्यों खड़ा करें?

असल समस्या सरकारी नौकरी की चाहत नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब सरकारी नौकरी को सफलता का एकमात्र पैमाना बना दिया जाता है।

बिहार के युवाओं में प्रतिभा और मेहनत की कमी नहीं है। जरूरत है कि उनकी मेहनत को एक ही परीक्षा के कमरे तक सीमित न रखा जाए। उन्हें रोजगार, कौशल, उद्यमिता और नई अर्थव्यवस्था के अवसरों से जोड़ना होगा।

सरकारी नौकरी एक सम्मानजनक और जरूरी विकल्प है, लेकिन भविष्य का दरवाजा केवल सरकारी दफ्तर से नहीं खुलता।

युवाओं को एक नौकरी का इंतजार करने वाला नहीं, बल्कि अनेक अवसरों को पहचानने और जरूरत पड़ने पर अवसर पैदा करने वाला बनाना होगा। यही वास्तविक आत्मनिर्भरता है और यही बेरोजगारी की चुनौती से बाहर निकलने का अधिक व्यापक रास्ता हो सकता है।


आलोक कुुमार