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Bihar : बिहार में ITI और Polytechnic करने वाले युवाओं को नौकरी

 


बिहार में ITI और Polytechnic करने वाले युवाओं को नौकरी तक पहुंचने में सबसे बड़ी रुकावट क्या है?

बिहार में हर साल बड़ी संख्या में युवा ITI और Polytechnic जैसे तकनीकी पाठ्यक्रमों में दाखिला लेते हैं। उनका उद्देश्य केवल प्रमाणपत्र हासिल करना नहीं होता, बल्कि प्रशिक्षण पूरा करने के बाद किसी कंपनी, कारखाने, निर्माण क्षेत्र, सरकारी विभाग या निजी संस्थान में रोजगार पाना होता है। लेकिन पढ़ाई पूरी करने के बाद भी कई युवाओं के सामने नौकरी तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं होता।

समस्या यह नहीं है कि तकनीकी शिक्षा लेने वाले युवाओं में काम करने की इच्छा नहीं है। बड़ी चुनौती यह है कि प्रशिक्षण, उद्योग की जरूरत और रोजगार के अवसरों के बीच पर्याप्त तालमेल नहीं बन पाता। यही अंतर कई युवाओं को प्रमाणपत्र मिलने के बाद भी लंबे समय तक नौकरी की तलाश में रखता है।

प्रशिक्षण के बाद नौकरी की जानकारी तक पहुंच भी एक चुनौती

कई युवाओं को यह स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पाती कि उनके ट्रेड या डिप्लोमा से संबंधित नौकरियां कहां उपलब्ध हैं। सरकारी भर्ती की जानकारी के लिए अलग-अलग विभागों की वेबसाइट देखनी पड़ती है, जबकि निजी कंपनियों की भर्ती की सूचना अक्सर रोजगार पोर्टल, कंपनी की वेबसाइट या स्थानीय स्तर के माध्यम से मिलती है।

ग्रामीण और छोटे शहरों के युवाओं के लिए यह समस्या और बढ़ जाती है। इंटरनेट उपलब्ध होने के बावजूद सही भर्ती सूचना खोजने, आवेदन करने और समय पर प्रक्रिया पूरी करने में कठिनाई हो सकती है।

इसलिए तकनीकी शिक्षा के साथ रोजगार सूचना तक आसान पहुंच भी जरूरी है।

केवल प्रमाणपत्र से नौकरी मिलना आसान नहीं

ITI या Polytechnic की पढ़ाई पूरी करने के बाद युवाओं को यह महसूस हो सकता है कि प्रमाणपत्र मिलने के साथ नौकरी का रास्ता खुल जाएगा। वास्तविकता में कई नियोक्ता तकनीकी ज्ञान के साथ व्यावहारिक अनुभव, मशीनों पर काम करने की क्षमता, सुरक्षा नियमों की जानकारी और कार्यस्थल के व्यवहार को भी महत्व देते हैं।

यही कारण है कि प्रशिक्षण संस्थानों और उद्योगों के बीच बेहतर संपर्क जरूरी है। यदि विद्यार्थियों को पढ़ाई के दौरान ही वास्तविक कार्यस्थल का अनुभव, इंडस्ट्री विजिट, अप्रेंटिसशिप और प्रैक्टिकल प्रशिक्षण मिले तो उन्हें नौकरी के लिए तैयार होने में मदद मिल सकती है।

अप्रेंटिसशिप और शुरुआती अनुभव की कमी

किसी तकनीकी नौकरी में पहली नौकरी हासिल करना कई बार सबसे कठिन चरण होता है। कंपनी अनुभव मांगती है और युवा पूछता है कि अनुभव मिलेगा कैसे, जब पहली नौकरी ही नहीं मिल रही।

इस स्थिति को अप्रेंटिसशिप और ऑन-द-जॉब प्रशिक्षण के माध्यम से काफी हद तक दूर किया जा सकता है। प्रशिक्षण के दौरान वास्तविक उद्योग से जुड़ने का अवसर युवाओं को यह समझने में मदद करता है कि कक्षा में सीखी तकनीक का इस्तेमाल काम की जगह पर कैसे होता है।

लेकिन हर विद्यार्थी को अपनी पसंद और योग्यता के अनुरूप पर्याप्त अवसर मिलना अभी भी एक महत्वपूर्ण चुनौती है।

स्थानीय स्तर पर रोजगार और उद्योग की कमी

बिहार के कई जिलों में तकनीकी शिक्षा लेने वाले युवाओं की संख्या बढ़ रही है, लेकिन उनके आसपास पर्याप्त औद्योगिक रोजगार उपलब्ध नहीं है। परिणामस्वरूप नौकरी के लिए उन्हें पटना, दूसरे राज्यों या बड़े औद्योगिक शहरों की ओर जाना पड़ता है।

दूसरे शहर में जाने के साथ किराया, भोजन, यात्रा और रहने का खर्च जुड़ जाता है। कम शुरुआती वेतन वाले रोजगार में यह खर्च कई युवाओं के लिए बड़ी समस्या बन जाता है। कुछ युवा इसी कारण अपनी योग्यता से कम स्तर की नौकरी स्वीकार कर लेते हैं या रोजगार की तलाश छोड़कर किसी दूसरे काम में चले जाते हैं।

इसलिए केवल प्रशिक्षण संस्थानों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। स्थानीय उद्योग, उत्पादन इकाइयां और तकनीकी रोजगार के अवसर भी बढ़ाने होंगे।

भर्ती प्रक्रिया की जानकारी और तैयारी का अभाव

तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाले युवाओं का एक वर्ग सरकारी नौकरी को प्राथमिकता देता है। लेकिन सरकारी तकनीकी पदों की भर्ती नियमित अंतराल पर ही आती है और उनमें पदों की संख्या भी सीमित हो सकती है।

इसके अलावा आवेदन प्रक्रिया, दस्तावेज, परीक्षा पैटर्न, कौशल परीक्षा और प्रमाणपत्र सत्यापन जैसी प्रक्रियाओं को समझना भी जरूरी होता है। यदि विद्यार्थी को इन प्रक्रियाओं की जानकारी समय पर नहीं मिले तो योग्य होने के बावजूद वह अवसर से बाहर हो सकता है।

यहां ITI और Polytechnic संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। संस्थानों में केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने के बजाय करियर मार्गदर्शन और रोजगार सूचना केंद्र को मजबूत किया जाना चाहिए।

कंपनियों की जरूरत और पाठ्यक्रम में तालमेल

तकनीक लगातार बदल रही है। उद्योगों में नई मशीनें, ऑटोमेशन, डिजिटल उपकरण और नई कार्यप्रणालियां आ रही हैं। ऐसे में तकनीकी पाठ्यक्रमों को भी समय-समय पर रोजगार बाजार की जरूरतों के अनुसार अपडेट करना जरूरी है।

यदि विद्यार्थी ने ऐसा कौशल सीखा है जिसकी स्थानीय उद्योग में मांग कम है, जबकि किसी दूसरे कौशल की मांग अधिक है, तो प्रमाणपत्र होने के बावजूद रोजगार पाना कठिन हो सकता है।

इसलिए पाठ्यक्रम तैयार करने में उद्योगों, प्रशिक्षण संस्थानों और रोजगार विशेषज्ञों के बीच नियमित संवाद होना चाहिए।

युवाओं के लिए क्या किया जा सकता है?

इस समस्या का समाधान केवल सरकार या केवल प्रशिक्षण संस्थान से नहीं होगा। इसके लिए कई स्तरों पर प्रयास जरूरी हैं।

पहला, ITI और Polytechnic संस्थानों में नियमित रोजगार मेले और कैंपस प्लेसमेंट की व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए। दूसरा, विद्यार्थियों को अप्रेंटिसशिप और उद्योग आधारित प्रशिक्षण के अवसर अधिक मिलने चाहिए। तीसरा, प्रत्येक जिले में तकनीकी युवाओं के लिए रोजगार सूचना और करियर मार्गदर्शन की व्यवस्था उपयोगी हो सकती है।

इसके साथ कंपनियों को भी स्थानीय प्रशिक्षित युवाओं को शुरुआती अवसर देने चाहिए। शुरुआती नौकरी में उचित प्रशिक्षण और सीखने का अवसर मिलने से युवा आगे बेहतर रोजगार के लिए तैयार हो सकते हैं।

असली सवाल नौकरी की संख्या से आगे का है

बिहार के ITI और Polytechnic युवाओं की समस्या केवल यह नहीं है कि नौकरियां कम हैं। असली सवाल यह भी है कि जो रोजगार उपलब्ध हैं, उनकी जानकारी युवा तक कितनी आसानी से पहुंचती है, उसकी योग्यता उन नौकरियों से कितनी मेल खाती है और पहली नौकरी तक पहुंचने के लिए उसे कितना व्यावहारिक अनुभव मिलता है।

यदि तकनीकी शिक्षा को रोजगार से जोड़ना है तो प्रशिक्षण, अप्रेंटिसशिप, उद्योग और भर्ती सूचना के बीच मजबूत व्यवस्था बनानी होगी। तभी तकनीकी प्रमाणपत्र युवाओं के लिए केवल कागज का दस्तावेज नहीं, बल्कि सम्मानजनक रोजगार तक पहुंचने का वास्तविक माध्यम बन सकेगा।

Chingari Prime News के लिए यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तकनीकी शिक्षा लेने वाला युवा केवल नौकरी नहीं मांग रहा है; वह अपने प्रशिक्षण का उपयोग करके आत्मनिर्भर बनने का अवसर चाहता है।

आलोक कुमार

Bihar : तकनीकी शिक्षा को अक्सर रोजगार का सीधा रास्ता माना जाता है

 


ITI और Polytechnic के बाद नौकरी तक पहुंचने में युवाओं को किन बाधाओं का सामना करना पड़ता है?

तकनीकी शिक्षा को अक्सर रोजगार का सीधा रास्ता माना जाता है। ITI और Polytechnic में प्रवेश लेते समय युवा और उसका परिवार यही उम्मीद करता है कि कोर्स पूरा होते ही नौकरी या कमाई का रास्ता खुल जाएगा। लेकिन प्रमाणपत्र हाथ में आने के बाद कई युवाओं के सामने एक कठिन सवाल खड़ा हो जाता है—तकनीकी शिक्षा पूरी हो गई, अब नौकरी कहां और कैसे मिलेगी?

ITI और Polytechnic युवाओं को इलेक्ट्रिशियन, फिटर, वेल्डर, मशीनिस्ट, मोटर मैकेनिक, कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सिविल, मैकेनिकल और अन्य तकनीकी क्षेत्रों में प्रशिक्षण देते हैं। फिर भी शिक्षा पूरी करने के बाद नौकरी तक पहुंचना हमेशा आसान नहीं होता। इसके पीछे केवल रोजगार के अवसरों की कमी नहीं, बल्कि व्यावहारिक प्रशिक्षण, अनुभव, अप्रेंटिसशिप, भर्ती प्रक्रिया, नौकरी की जानकारी, शुरुआती वेतन और स्थानीय रोजगार जैसे कई कारण होते हैं।

प्रमाणपत्र और रोजगार के बीच दूरी

किसी तकनीकी संस्थान से प्रमाणपत्र हासिल करना महत्वपूर्ण उपलब्धि है, लेकिन नौकरी के लिए केवल प्रमाणपत्र पर्याप्त नहीं होता। नियोक्ता अक्सर यह देखना चाहते हैं कि उम्मीदवार मशीन, उपकरण या संबंधित तकनीक पर वास्तव में काम कर सकता है या नहीं।

यहीं से नए तकनीकी युवाओं की समस्या शुरू होती है। कई नौकरियों में अनुभव मांगा जाता है, जबकि नए विद्यार्थी के पास अनुभव हासिल करने का पर्याप्त अवसर नहीं होता।

इस स्थिति को दूर करने के लिए पढ़ाई के दौरान ही विद्यार्थियों को वास्तविक कार्यस्थल का अनुभव देने की व्यवस्था मजबूत करनी होगी।

प्रशिक्षण और उद्योग की जरूरत में अंतर

तकनीक तेजी से बदल रही है। उद्योगों में ऑटोमेशन, CNC मशीन, PLC, डिजिटल उपकरण, आधुनिक इलेक्ट्रिकल सिस्टम और कंप्यूटर आधारित तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है।

यदि किसी संस्थान में प्रशिक्षण के लिए उपलब्ध उपकरण और मशीनें उद्योगों में इस्तेमाल होने वाली तकनीक से बहुत पीछे हैं तो विद्यार्थी प्रमाणपत्र तो हासिल कर सकता है, लेकिन नौकरी के लिए आवश्यक व्यावहारिक क्षमता विकसित करने में कठिनाई हो सकती है।

इसलिए तकनीकी संस्थानों में पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण उपकरणों को समय के साथ अपडेट करना जरूरी है।

अप्रेंटिसशिप क्यों महत्वपूर्ण है?

ITI और Polytechnic के बाद अप्रेंटिसशिप युवाओं के लिए शिक्षा और रोजगार के बीच महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है। इससे विद्यार्थी को वास्तविक कार्यस्थल, मशीनों, कार्य अनुशासन और उद्योग की कार्यप्रणाली को समझने का अवसर मिलता है।

लेकिन हर विद्यार्थी तक अप्रेंटिसशिप के अवसर की जानकारी और पहुंच समान नहीं होती। कई युवाओं को यह पता ही नहीं होता कि उनके ट्रेड से संबंधित अप्रेंटिसशिप कहां उपलब्ध है और आवेदन कैसे करना है।

इसलिए संस्थानों को केवल प्रशिक्षण पूरा कराने के बजाय विद्यार्थियों को अप्रेंटिसशिप और रोजगार की अगली प्रक्रिया समझाने पर भी ध्यान देना चाहिए।

नौकरी की जानकारी तक पहुंच भी समस्या है

ग्रामीण और छोटे शहरों से आने वाले युवाओं के लिए एक बड़ी समस्या रोजगार की सही जानकारी प्राप्त करना भी हो सकती है।

किस कंपनी में भर्ती चल रही है, किस ट्रेड के लिए कितनी योग्यता चाहिए, आवेदन की अंतिम तारीख क्या है, अप्रेंटिसशिप कहां उपलब्ध है और कैंपस भर्ती कब होगी—इन सवालों की जानकारी समय पर नहीं मिलने से योग्य युवा अवसर से बाहर हो सकता है।

इसलिए प्रत्येक ITI और Polytechnic में मजबूत करियर सूचना और प्लेसमेंट सहायता व्यवस्था होना उपयोगी होगा।

विद्यार्थियों को सरकारी भर्ती, निजी कंपनियों, अप्रेंटिसशिप, कैंपस प्लेसमेंट और स्वरोजगार के विकल्पों की जानकारी नियमित रूप से मिलनी चाहिए।

नौकरी के लिए दूसरे शहर जाने की मजबूरी

ग्रामीण क्षेत्र के युवा के सामने एक दूसरी चुनौती स्थानीय रोजगार की कमी हो सकती है।

मान लीजिए किसी जिले के युवा ने वहीं ITI या Polytechnic किया, लेकिन उसके ट्रेड से संबंधित नौकरी किसी दूसरे शहर या औद्योगिक क्षेत्र में उपलब्ध है। तब नौकरी पाने के साथ-साथ उसे रहने, भोजन, यात्रा और परिवार से दूर रहने की समस्या का सामना करना पड़ सकता है।

कम शुरुआती वेतन वाली नौकरी के लिए दूसरे शहर में रहने का खर्च कई युवाओं के लिए महत्वपूर्ण सवाल बन जाता है।

इसलिए जिला स्तर पर छोटे उद्योग, तकनीकी सेवा केंद्र, मरम्मत और विनिर्माण इकाइयों तथा अन्य स्थानीय रोजगार अवसरों को बढ़ावा देना भी जरूरी है।

शुरुआती वेतन और नौकरी की गुणवत्ता

तकनीकी शिक्षा पूरी करने के बाद युवा स्वाभाविक रूप से बेहतर आय की उम्मीद करता है। लेकिन शुरुआती स्तर पर मिलने वाला वेतन कई बार उसकी अपेक्षा से कम हो सकता है।

यदि नौकरी की आय से किराया, भोजन, यात्रा और अन्य खर्च मुश्किल से पूरे हों तो युवा के सामने यह सवाल आ सकता है कि वह उसी क्षेत्र में आगे बढ़े या किसी दूसरे रोजगार की तलाश करे।

इसलिए केवल कितने युवाओं को नौकरी मिली, यह देखना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि उन्हें किस प्रकार का काम, कितनी स्थिरता और आगे बढ़ने की कितनी संभावना मिली।

तकनीकी ज्ञान के साथ संचार कौशल भी जरूरी

आज नौकरी के लिए केवल तकनीकी ज्ञान ही पर्याप्त नहीं माना जाता। इंटरव्यू, रिज्यूमे, कंप्यूटर का सामान्य ज्ञान, कार्यस्थल पर संवाद और बुनियादी अंग्रेजी या तकनीकी शब्दावली की समझ भी कई जगह उपयोगी होती है।

ग्रामीण पृष्ठभूमि का कोई युवा तकनीकी काम में अच्छा हो सकता है, लेकिन इंटरव्यू में अपनी क्षमता ठीक से प्रस्तुत न कर पाए तो उसके सामने अतिरिक्त कठिनाई आ सकती है।

इसलिए तकनीकी संस्थानों में तकनीकी प्रशिक्षण के साथ रिज्यूमे, इंटरव्यू, कंप्यूटर और कार्यस्थल व्यवहार की बुनियादी तैयारी भी कराई जानी चाहिए।

सरकारी नौकरी का इंतजार भी लंबा हो सकता है

तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाले अनेक युवा सरकारी विभागों में तकनीकी पदों को रोजगार का महत्वपूर्ण विकल्प मानते हैं। लेकिन सरकारी भर्तियों में रिक्तियों की संख्या, प्रतियोगिता और भर्ती प्रक्रिया की अवधि के कारण उम्मीदवारों को लंबे समय तक तैयारी करनी पड़ सकती है।

यदि युवा केवल एक ही रोजगार विकल्प पर निर्भर रहता है तो उसके सामने समय और आर्थिक दबाव बढ़ सकता है।

इसलिए ITI और Polytechnic के विद्यार्थियों को शुरुआत से ही सरकारी नौकरी के साथ निजी क्षेत्र, अप्रेंटिसशिप और स्वरोजगार के विकल्पों की जानकारी मिलनी चाहिए।

संस्थान की सफलता का पैमाना क्या होना चाहिए?

किसी ITI या Polytechnic की सफलता केवल परीक्षा पास करने वाले विद्यार्थियों की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए।

यह भी देखना महत्वपूर्ण है कि प्रशिक्षण पूरा करने के बाद कितने विद्यार्थी:

  • नौकरी तक पहुंचे,

  • अप्रेंटिसशिप में गए,

  • आगे का तकनीकी प्रशिक्षण लिया,

  • अपना काम शुरू कर पाए,

  • या अपनी तकनीकी योग्यता के अनुरूप रोजगार प्राप्त कर सके।

इसके लिए संस्थानों में नियमित प्लेसमेंट गतिविधियां, उद्योगों से संपर्क, कैंपस भर्ती और पूर्व विद्यार्थियों के रोजगार संबंधी रिकॉर्ड को मजबूत किया जा सकता है।

सरकार और उद्योग की भी जिम्मेदारी

तकनीकी शिक्षा को रोजगार से जोड़ने के लिए सरकार, प्रशिक्षण संस्थान और उद्योग—तीनों के बीच बेहतर तालमेल जरूरी है।

जिला स्तर पर यह समझने की कोशिश की जा सकती है कि स्थानीय उद्योगों को किस प्रकार के तकनीकी कर्मचारियों की जरूरत है। उसी आधार पर प्रशिक्षण और रोजगार के बीच बेहतर संबंध बनाया जा सकता है।

उद्योगों के लिए भी नए प्रशिक्षित युवाओं को शुरुआती अवसर देना महत्वपूर्ण है। अप्रेंटिसशिप को केवल प्रशिक्षण की प्रक्रिया न मानकर भविष्य के रोजगार से जोड़ने की व्यवस्था विकसित की जा सकती है।

वहीं जिन युवाओं के पास तकनीकी कौशल है, उन्हें छोटे स्तर पर सेवा या कारोबार शुरू करने के लिए उपलब्ध वित्तीय और संस्थागत सहायता की जानकारी भी दी जानी चाहिए।

तकनीकी शिक्षा तभी सफल होगी जब रोजगार तक रास्ता भी बने

ITI और Polytechnic युवाओं को तकनीकी कौशल देने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। लेकिन प्रमाणपत्र से रोजगार तक की यात्रा अपने आप पूरी नहीं होती।

इसके लिए गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरण, व्यावहारिक अनुभव, अप्रेंटिसशिप, उद्योग से संपर्क, समय पर रोजगार की जानकारी और स्थानीय स्तर पर अवसरों की जरूरत होती है।

किसी गरीब या मध्यमवर्गीय परिवार का युवा जब तकनीकी शिक्षा में प्रवेश लेता है तो उसके पीछे केवल एक प्रमाणपत्र हासिल करने की इच्छा नहीं होती। उसके पीछे आत्मनिर्भर बनने और परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारने की उम्मीद होती है।

इसलिए तकनीकी शिक्षा की सफलता का मूल्यांकन केवल इस बात से नहीं होना चाहिए कि कितने विद्यार्थियों ने परीक्षा पास की। असली सवाल यह होना चाहिए कि प्रशिक्षण पूरा करने के बाद कितने युवा अपने कौशल के आधार पर सम्मानजनक और टिकाऊ आजीविका तक पहुंच पाए।

ITI और Polytechnic के बाद नौकरी पाने में युवाओं को किन बाधाओं का सामना करना पड़ता है? जानिए अनुभव, अप्रेंटिसशिप, प्रशिक्षण, रोजगार की जानकारी, स्थानीय नौकरी और शुरुआती वेतन से जुड़ी प्रमुख चुनौतियां।

आलोक कुमार

India : किसान सिर्फ फसल बेचने वाला नहीं, उद्यमी भी बन सकता है

 


किसान सिर्फ फसल बेचने वाला नहीं, उद्यमी भी बन सकता है

भारत में किसान को अक्सर खेत, फसल, मौसम और मंडी के बीच सीमित करके देखा जाता है। किसान ने धान उगाया, गेहूं पैदा किया, सब्जियां उगाईं और मंडी में बेच दीं—मानो उसकी भूमिका यहीं खत्म हो गई। लेकिन बदलती अर्थव्यवस्था में किसान की भूमिका इससे कहीं बड़ी हो सकती है। किसान केवल उत्पादक नहीं, उद्यमी भी बन सकता है।

उसके पास जमीन है, उत्पादन का अनुभव है, स्थानीय संसाधनों की समझ है और खेती से जुड़ा व्यावहारिक ज्ञान है। यदि इन क्षमताओं को बाजार, तकनीक, प्रसंस्करण और बेहतर प्रबंधन से जोड़ा जाए तो किसान अपनी आय के साथ-साथ पूरे ग्रामीण क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ा सकता है।

फसल बेचने से आगे बढ़ने की जरूरत

किसान के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अक्सर अपनी उपज को कच्चे माल के रूप में बेच देता है। उदाहरण के लिए किसी किसान ने टमाटर पैदा किया। मंडी में टमाटर बेचने के बाद उसका काम खत्म हो गया। लेकिन इसी टमाटर से सॉस, प्यूरी, अचार और दूसरे खाद्य उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।

इसी तरह दूध बेचने के बजाय दही, पनीर और घी तैयार किया जा सकता है। गेहूं से पैक किया हुआ आटा, मक्का से विभिन्न खाद्य और पशु आहार उत्पाद, फलों से जैम और जूस तथा मखाना, हल्दी, मिर्च और मसालों की सफाई, पैकिंग और ब्रांडिंग की जा सकती है।

यानी किसान यदि उत्पादन से आगे बढ़कर मूल्य संवर्धन करे तो उसकी उपज से आर्थिक गतिविधियों की एक लंबी श्रृंखला तैयार हो सकती है।

खेती में बाजार की समझ जरूरी

किसान उद्यमी बनने का मतलब केवल नई फसल उगाना नहीं है। उसे बाजार की मांग को समझना भी होगा।

किस उत्पाद की मांग कब बढ़ती है? किस बाजार में उसकी अच्छी कीमत मिल सकती है? कौन-सी उपज लंबे समय तक सुरक्षित रखी जा सकती है? किस उत्पाद को पैक करके दूसरे शहरों में भेजा जा सकता है? कौन-सी वस्तु ऑनलाइन बेची जा सकती है?

ऐसे सवाल खेती की योजना का हिस्सा बनने चाहिए। खेती केवल यह तय करने का नाम नहीं है कि खेत में क्या उगाया जाए। यह भी देखना जरूरी है कि किसके लिए, किस बाजार में और किस तरीके से बेचा जाए।

छोटे किसानों के लिए सामूहिकता जरूरी

छोटे किसान के लिए अकेले बड़ा कारोबार शुरू करना कठिन हो सकता है। इसलिए किसान उत्पादक संगठन, स्वयं सहायता समूह, सहकारी समितियां और ग्रामीण उद्यम समूह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

कई किसान मिलकर उत्पादन, खरीद, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और बिक्री की व्यवस्था कर सकते हैं। सामूहिक रूप से काम करने पर उत्पाद की मात्रा बढ़ती है, कुछ लागत कम हो सकती है और बड़े खरीदारों तक पहुंच बनाना आसान हो सकता है।

छोटे किसान की बड़ी चुनौती उसका छोटा पैमाना है। सामूहिक संगठन इस समस्या को काफी हद तक अवसर में बदल सकता है।

डिजिटल तकनीक से बढ़ सकता है बाजार

आज मोबाइल फोन किसान उद्यमिता का महत्वपूर्ण साधन बन सकता है। किसान बाजार भाव, मौसम, खरीदारों और कृषि तकनीक से जुड़ी जानकारी प्राप्त कर सकता है।

सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए स्थानीय उत्पादों की पहचान भी बनाई जा सकती है। यदि किसी गांव में अच्छा शहद, अचार, मखाना, मसाला या अन्य स्थानीय खाद्य उत्पाद तैयार होता है तो उसकी अच्छी पैकेजिंग, सही जानकारी और डिजिटल प्रचार के माध्यम से उसे व्यापक बाजार तक पहुंचाने की कोशिश की जा सकती है।

हालांकि ऑनलाइन बिक्री में गुणवत्ता, सही उत्पाद विवरण, सुरक्षित भुगतान, समय पर डिलीवरी और ग्राहक सेवा का ध्यान रखना भी जरूरी है।

फसल के बाद होने वाले नुकसान को कम करना

किसान उद्यमिता का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र फसल के बाद होने वाले नुकसान को कम करना है। फल और सब्जियों जैसी जल्दी खराब होने वाली उपज के लिए भंडारण और प्रसंस्करण की सुविधा बेहद जरूरी है।

गांव या पंचायत स्तर पर छोटे कोल्ड स्टोरेज, सौर ऊर्जा आधारित सुखाने की व्यवस्था, ग्रेडिंग सेंटर, पैकिंग केंद्र और छोटी प्रसंस्करण इकाइयां विकसित की जा सकती हैं। इससे किसानों को मजबूरी में तुरंत कम कीमत पर अपनी उपज बेचने से राहत मिल सकती है।

इन इकाइयों से किसानों के साथ-साथ मशीन संचालन, पैकिंग, परिवहन और विपणन से जुड़े लोगों को भी रोजगार मिल सकता है।

एक खेत से कई आय के रास्ते

किसान उद्यमी बनने का अर्थ यह नहीं है कि हर किसान खेती छोड़कर फैक्टरी लगाए। उद्यमिता का अर्थ अपनी मौजूदा कृषि गतिविधि को बेहतर आर्थिक मॉडल में बदलना भी है।

कोई किसान मशरूम उत्पादन शुरू कर सकता है। कोई मधुमक्खी पालन को खेती के साथ जोड़ सकता है। कोई बकरी या मुर्गी पालन कर सकता है। कोई पौधों की नर्सरी तैयार कर सकता है। कोई कृषि उपकरण किराये पर उपलब्ध करा सकता है।

इस तरह एक खेत और एक परिवार से कई आय के स्रोत विकसित किए जा सकते हैं। इससे किसी एक फसल या एक बाजार पर निर्भरता भी कम हो सकती है।

बिहार के किसानों के लिए बड़ी संभावना

बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य में किसान उद्यमिता की सोच विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए केवल फसल की कीमत पर निर्भर रहना जोखिमपूर्ण हो सकता है।

खेती के साथ पशुपालन, बागवानी, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, मशरूम उत्पादन, खाद्य प्रसंस्करण और स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग को जोड़ा जा सकता है।

मखाना, लीची, शहद, सब्जियां, मसाले, मक्का और दुग्ध उत्पाद जैसे क्षेत्रों में उत्पादन के साथ-साथ सफाई, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, परिवहन और बिक्री के अवसर भी विकसित किए जा सकते हैं।

रास्ते में कई चुनौतियां भी हैं

किसान उद्यमिता का रास्ता आसान नहीं है। पूंजी की कमी, बाजार की जानकारी का अभाव, प्रशिक्षण की कमी, पैकेजिंग और ब्रांडिंग की समस्या, परिवहन, भंडारण और बाजार तक सीधी पहुंच जैसी चुनौतियां मौजूद हैं।

इसलिए केवल कर्ज या सब्सिडी देना पर्याप्त नहीं होगा। किसान को व्यवसाय चलाने का प्रशिक्षण, बाजार की जानकारी, तकनीकी सहायता और बिक्री का नेटवर्क भी उपलब्ध कराना जरूरी है।

बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को भी कृषि उद्यमों को केवल ऋण लेने वाले ग्राहक के रूप में नहीं, बल्कि संभावित ग्रामीण व्यवसाय के रूप में देखना होगा।

युवा बन सकते हैं बदलाव की कड़ी

किसान उद्यमिता में ग्रामीण युवाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है। गांव का पढ़ा-लिखा युवा यदि खेती को केवल पारंपरिक काम मानने के बजाय आधुनिक व्यवसाय के रूप में देखे तो बदलाव की गति बढ़ सकती है।

ड्रोन सेवा, डिजिटल रिकॉर्ड, ऑनलाइन बिक्री, आधुनिक पैकेजिंग, कृषि उपकरणों की सेवा, प्रसंस्करण और बाजार प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में युवा अपनी नई भूमिका बना सकते हैं।

वे अपने परिवार की खेती को अधिक व्यवस्थित करने के साथ दूसरे किसानों को भी सेवाएं देकर रोजगार का रास्ता बना सकते हैं।

किसान को उत्पाद की पूरी कीमत समझनी होगी

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसान को केवल उपज की कीमत नहीं, बल्कि उत्पाद की पूरी मूल्य श्रृंखला समझनी होगी।

खेत से मंडी और मंडी से ग्राहक तक पहुंचने के दौरान किसी उत्पाद का मूल्य कई चरणों में बढ़ता है। यदि किसान इनमें से कुछ गतिविधियां स्वयं संभाल सके—जैसे सफाई, ग्रेडिंग, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और सीधी बिक्री—तो उसके लिए अधिक मूल्य प्राप्त करने की संभावना बन सकती है।

किसान का भविष्य केवल अधिक फसल पैदा करने में नहीं, बल्कि बेहतर मूल्य पैदा करने में भी है।

खेत किसान की ताकत है, लेकिन बाजार की समझ, तकनीक, संगठन और उद्यमशीलता उस ताकत को आर्थिक अवसर में बदल सकती है। किसान को सम्मान केवल इसलिए नहीं मिलना चाहिए कि वह अन्नदाता है, बल्कि उसे ऐसा आर्थिक वातावरण भी मिलना चाहिए जिसमें उसके श्रम और उत्पाद का उचित मूल्य हासिल करने के अवसर बढ़ें।

अब किसान को केवल मंडी में बोरी लेकर खड़े व्यक्ति के रूप में देखने की जरूरत नहीं है। वह उत्पादक है, प्रबंधक है, संभावित ब्रांड निर्माता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का उद्यमी भी है।

जिस दिन किसान अपनी फसल के साथ उसका मूल्य भी पैदा करने की दिशा में आगे बढ़ेगा, उस दिन खेती केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि मजबूत और टिकाऊ ग्रामीण व्यवसाय का आधार बन सकती है।

आलोक कुमार

Bihar : उम्र निकलने से पहले नौकरी पाने की चिंता में बिहार का युव


पटना। बिहार के हजारों युवाओं के लिए सरकारी नौकरी सिर्फ रोजगार का साधन नहीं, बल्कि परिवार की आर्थिक स्थिरता, सामाजिक सम्मान और भविष्य को सुरक्षित करने का रास्ता है। यही वजह है कि बड़ी संख्या में युवा कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में जुट जाते हैं। लेकिन नौकरी पाने की इस दौड़ में एक चिंता लगातार बढ़ रही है—कहीं नौकरी की तैयारी करते-करते उम्र ही न निकल जाए।

एक युवा जब प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी शुरू करता है तो उसके सामने सिर्फ परीक्षा पास करने की चुनौती नहीं होती। उसे कई वर्षों तक लगातार पढ़ाई करनी पड़ती है। कोचिंग, किताबें, किराया, इंटरनेट, यात्रा और दूसरी जरूरतों पर पैसा खर्च होता है। कई परिवार आर्थिक रूप से मजबूत नहीं होते, फिर भी माता-पिता बेटे या बेटी की नौकरी की उम्मीद में अपनी बचत खर्च करते हैं। युवा भी यह सोचकर वर्षों तक तैयारी करता है कि एक बार सरकारी नौकरी मिल गई तो जिंदगी स्थिर हो जाएगी।

लेकिन समस्या तब गंभीर हो जाती है जब भर्ती प्रक्रिया खुद लंबी होती जाती है।

विज्ञापन से नियुक्ति तक लंबा इंतजार

किसी सरकारी पद का विज्ञापन जारी होने के बाद परीक्षा की तारीख आने में कई महीने लग सकते हैं। परीक्षा की तारीख घोषित होने के बाद किसी कारण से बदलाव या स्थगन हो जाए तो अभ्यर्थियों की तैयारी का पूरा कार्यक्रम प्रभावित होता है।

परीक्षा हो जाने के बाद उत्तर कुंजी, आपत्ति और परिणाम की प्रक्रिया आती है। इसके बाद यदि अगला चरण है तो मुख्य परीक्षा, कौशल परीक्षा, शारीरिक परीक्षा, दस्तावेज सत्यापन या मेडिकल जैसी प्रक्रियाएं पूरी करनी पड़ सकती हैं।

अंतिम चयन के बाद भी नियुक्ति पत्र और ज्वाइनिंग का इंतजार अलग हो सकता है।

इस पूरी प्रक्रिया में समय लगता है और इसका सीधा संबंध अभ्यर्थी की उम्र और अगले अवसरों से है।

उम्र सीमा बन जाती है सबसे बड़ी चिंता

सरकारी नौकरियों में अलग-अलग पदों के लिए निर्धारित आयु सीमा होती है। कई युवा 21-22 वर्ष की उम्र में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी शुरू करते हैं। अगर एक भर्ती की प्रक्रिया लंबी चलती है और उसमें सफलता नहीं मिलती तो अगली भर्ती तक उनकी उम्र तेजी से बढ़ती रहती है।

युवा के मन में सवाल उठता है—जिस परीक्षा के लिए दो-तीन साल लगाए, अगर उसमें चयन नहीं हुआ तो अगला मौका मिलेगा या नहीं?

यह डर उन उम्मीदवारों में ज्यादा होता है जो किसी भर्ती की अधिकतम आयु सीमा के करीब पहुंच चुके होते हैं। उनके लिए हर नई भर्ती सिर्फ एक अवसर नहीं बल्कि शायद आखिरी अवसर जैसी महसूस होने लगती है।

तैयारी का खर्च भी बढ़ता जाता है

प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी मुफ्त नहीं होती। शहर में रहकर तैयारी करने वाले छात्रों को कमरे का किराया, भोजन, किताबें, कोचिंग, टेस्ट सीरीज और इंटरनेट जैसी जरूरतों पर लगातार खर्च करना पड़ता है।

गांव और छोटे शहरों से आने वाले युवाओं के लिए यह आर्थिक बोझ और बड़ा हो जाता है। कई विद्यार्थी अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए ट्यूशन पढ़ाते हैं या पार्ट-टाइम काम करते हैं।

लेकिन नौकरी की तैयारी जितनी गंभीर होती है, उतना ही ज्यादा समय पढ़ाई को देना पड़ता है। ऐसे में कमाई और तैयारी के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो जाता है।

यदि भर्ती प्रक्रिया भी वर्षों तक चलती रहे तो परिवार पर आर्थिक दबाव बढ़ता जाता है।

नौकरी के इंतजार का मानसिक दबाव

लंबे समय तक किसी परीक्षा के परिणाम का इंतजार करना भी आसान नहीं है। युवा परीक्षा की तैयारी करता है, परीक्षा देता है और फिर परिणाम की तारीख का इंतजार करता रहता है।

अगर परीक्षा स्थगित हो जाए तो तैयारी का शेड्यूल बिगड़ जाता है। रिजल्ट देर से आए तो अगली रणनीति तय करना मुश्किल होता है। चयन के बाद नियुक्ति में देरी हो तो उम्मीदवार के सामने यह दुविधा होती है कि दूसरी नौकरी स्वीकार करे या सरकारी नियुक्ति का इंतजार करे।

इस अनिश्चितता का असर आत्मविश्वास और मानसिक स्थिति पर भी पड़ सकता है।

परिवार की उम्मीदें भी बढ़ती जाती हैं

बिहार में सरकारी नौकरी को लेकर परिवारों की उम्मीदें काफी मजबूत होती हैं। कई माता-पिता अपने बच्चों की पढ़ाई को भविष्य में बेहतर जीवन की नींव मानते हैं।

लेकिन जब युवा 25 से 30 वर्ष या उससे अधिक उम्र तक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता रहता है तो परिवार में सवाल उठने लगते हैं—नौकरी कब मिलेगी? अब आगे क्या करना है?

इस उम्र में कई युवाओं पर शादी और परिवार की जिम्मेदारी का दबाव भी बढ़ने लगता है। आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने की जरूरत भी सामने आती है।

इसलिए सरकारी भर्ती में देरी सिर्फ परीक्षा से जुड़ा विषय नहीं है। इसका संबंध पूरे परिवार की आर्थिक और सामाजिक स्थिति से है।

सरकारी नौकरी के अवसर और आवेदकों की संख्या

सरकारी पदों की संख्या सीमित होती है, जबकि प्रतियोगी परीक्षाओं में आवेदन करने वाले युवाओं की संख्या बहुत अधिक हो सकती है। इसलिए हर उम्मीदवार का चयन संभव नहीं है।

यह प्रतियोगिता व्यवस्था का स्वाभाविक हिस्सा है। लेकिन उम्मीदवारों की मांग यह है कि कम से कम भर्ती की प्रक्रिया समयबद्ध, पारदर्शी और पूर्वानुमानित हो।

अगर परीक्षा समय पर होगी, परिणाम समय पर आएगा और नियुक्ति भी तय समय में होगी तो उम्मीदवार अपने करियर की अगली योजना बना सकेगा।

भर्ती कैलेंडर का पालन क्यों जरूरी?

सरकारी भर्ती प्रक्रिया में एक स्पष्ट कैलेंडर युवाओं के लिए बड़ी राहत हो सकता है। विज्ञापन से लेकर परीक्षा, परिणाम, दस्तावेज सत्यापन और नियुक्ति तक संभावित समयसीमा सार्वजनिक होनी चाहिए।

यदि किसी कारण से देरी होती है तो अभ्यर्थियों को इसकी जानकारी और संशोधित समयसीमा भी स्पष्ट रूप से दी जानी चाहिए।

डिजिटल व्यवस्था के माध्यम से उम्मीदवार अपने आवेदन की स्थिति और भर्ती के प्रत्येक चरण की जानकारी आसानी से देख सकें, तो अनिश्चितता काफी कम हो सकती है।

सरकारी देरी का बोझ उम्मीदवार पर क्यों?

एक महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि अगर भर्ती प्रक्रिया में प्रशासनिक देरी होती है और उम्मीदवार की उम्र इस दौरान बढ़ती रहती है, तो इसका पूरा नुकसान अभ्यर्थी ही क्यों उठाए?

यदि किसी भर्ती में आवेदन की पात्रता एक निश्चित तारीख को तय हुई थी और बाद में प्रक्रिया लंबे समय तक चली, तो ऐसी परिस्थितियों में उम्र सीमा को लेकर स्पष्ट और न्यायसंगत नीति पर विचार किया जाना चाहिए।

इससे उन उम्मीदवारों को राहत मिल सकती है जिन्होंने समय पर आवेदन किया था, लेकिन प्रक्रिया में हुई देरी के कारण बाद की भर्तियों में उम्र सीमा के करीब पहुंच गए।

युवा मेहनत कर रहा है, व्यवस्था को भी समय की कीमत समझनी होगी

बिहार का युवा मेहनत से पीछे नहीं हट रहा है। गांवों, कस्बों और शहरों में हजारों विद्यार्थी सुबह से रात तक पढ़ाई कर रहे हैं। सीमित संसाधनों में भी वे प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं।

उनकी मांग कोई असंभव मांग नहीं है। वे सिर्फ ऐसी व्यवस्था चाहते हैं जिसमें परीक्षा देने के बाद उन्हें वर्षों तक अनिश्चितता में न रहना पड़े।

नौकरी की तैयारी में किसी युवा के जीवन के तीन-चार साल निकल जाना केवल कैलेंडर के पन्ने बदलना नहीं है। यह उसकी उम्र, आर्थिक स्थिति, परिवार की जिम्मेदारियों और भविष्य की योजनाओं से जुड़ा समय है।

इसलिए भर्ती प्रक्रिया में होने वाली हर देरी का असर कागज पर दर्ज तारीख से कहीं बड़ा होता है।

बिहार के युवाओं की सबसे बड़ी चिंता यही है—मेहनत करते-करते कहीं अवसर की उम्र न निकल जाए।

इस चिंता का समाधान केवल नई भर्तियां निकालने से नहीं होगा। जरूरत ऐसी भर्ती व्यवस्था की है जिसमें विज्ञापन से नियुक्ति तक प्रत्येक चरण के लिए स्पष्ट समयसीमा हो और उम्मीदवार को वर्षों तक इंतजार न करना पड़े।

क्योंकि युवा के पास सपने बहुत हैं, मेहनत करने का हौसला भी है, लेकिन इंतजार करने के लिए उसके पास अनंत समय नहीं है। 


आलोक कुमार

Bihar : बिहार में युवाओं के लिए कौशल विकास योजनाओं की असली जरूरत

 


बिहार में युवाओं के लिए कौशल विकास योजनाओं की असली जरूरत

पटना। बिहार में युवाओं की संख्या राज्य की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। लेकिन यही युवा वर्ग जब पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार की तलाश में निकलता है तो उसके सामने सबसे बड़ा सवाल होता है—डिग्री के बाद काम क्या मिलेगा? सरकारी नौकरी के अवसर सीमित हैं और निजी क्षेत्र में सिर्फ प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि काम करने की वास्तविक क्षमता मांगी जाती है। ऐसे में कौशल विकास योजनाओं की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।

बिहार सरकार ने युवाओं को रोजगार योग्य बनाने के लिए कई स्तर पर योजनाएं शुरू की हैं। बिहार स्किल डेवलपमेंट मिशन यानी BSDM का उद्देश्य युवाओं को जरूरी कौशल देकर उनकी रोजगार क्षमता बढ़ाना और उद्योगों की जरूरत के मुताबिक प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करना है। मिशन के पोर्टल पर प्रशिक्षण, मूल्यांकन, प्रमाणन और रोजगार के अवसरों को एक साथ जोड़ने की व्यवस्था बताई गई है।

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या कौशल प्रशिक्षण सिर्फ प्रमाणपत्र पाने तक सीमित रहना चाहिए, या प्रशिक्षण के बाद युवा को स्थायी रोजगार तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी व्यवस्था की होनी चाहिए?

प्रमाणपत्र से ज्यादा जरूरी है काम का हुनर

आज बिहार के हजारों युवा कंप्यूटर, भाषा, अकाउंटिंग, इलेक्ट्रिकल, तकनीकी और दूसरे क्षेत्रों में प्रशिक्षण लेते हैं। कुशल युवा कार्यक्रम में भाषा एवं संवाद कौशल, बेसिक कंप्यूटर और सॉफ्ट स्किल जैसे विषय शामिल हैं। BSDM के अनुसार KYP का उद्देश्य युवाओं की employability यानी रोजगार पाने की क्षमता को बढ़ाना है।

लेकिन नौकरी के बाजार में केवल प्रमाणपत्र काफी नहीं होता।

किसी कंपनी को ऐसा युवा चाहिए जो कंप्यूटर पर वास्तविक काम कर सके, ग्राहक से बात कर सके, मशीन चला सके, डेटा संभाल सके, बिक्री कर सके या किसी तकनीकी समस्या का समाधान कर सके। इसलिए प्रशिक्षण का अगला चरण प्रैक्टिकल अनुभव होना चाहिए।

युवा को प्रशिक्षण केंद्र में सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे वास्तविक कार्यस्थल जैसी परिस्थितियों में काम करने का मौका मिलना चाहिए।

बिहार में कौशल विकास की जरूरत इतनी बड़ी क्यों है?

बिहार में बड़ी संख्या में युवा उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी नौकरी की तैयारी करते हैं। लेकिन हर युवा को सरकारी नौकरी मिलना संभव नहीं है। ऐसे में रोजगार के दूसरे रास्तों को मजबूत करना जरूरी है।

राज्य के योजना विभाग के अनुसार बिहार की बड़ी युवा आबादी के कारण रोजगार योग्य कार्यबल तैयार करना राज्य के विकास के लिए महत्वपूर्ण है। कौशल विकास के क्षेत्र में KYP, डोमेन स्किलिंग, PMKVY, DDU-GKY, ITI, RSETI और अप्रेंटिसशिप जैसी विभिन्न पहलें चल रही हैं।

इसका अर्थ साफ है—बिहार में चुनौती सिर्फ युवाओं को प्रशिक्षण देने की नहीं है। चुनौती यह है कि जिस कौशल की ट्रेनिंग दी जा रही है, उस कौशल के लिए रोजगार भी मौजूद हो।

ITI और पॉलिटेक्निक छात्रों के लिए भी बड़ा सवाल

कौशल विकास की चर्चा अक्सर छोटे अवधि के प्रशिक्षण तक सीमित हो जाती है। लेकिन ITI और पॉलिटेक्निक से निकलने वाले युवाओं के लिए भी उद्योग से सीधा जुड़ाव जरूरी है।

अगर किसी छात्र ने इलेक्ट्रिशियन, मशीनरी, ऑटोमोबाइल, फिटर, वेल्डिंग या दूसरे तकनीकी ट्रेड में प्रशिक्षण लिया है तो उसे प्रशिक्षण के बाद वास्तविक उद्योग में काम करने का अवसर मिलना चाहिए।

यहीं पर अप्रेंटिसशिप और उद्योग आधारित प्रशिक्षण की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

सरकार की नई रोजगार व्यवस्था भी प्रशिक्षण और रोजगार को एक-दूसरे से जोड़ने पर जोर दे रही है। बिहार रोजगार सेतु को निबंधन, प्रशिक्षण, प्रमाणन, सत्यापन और नियोजन को जोड़ने वाले एकीकृत मंच के रूप में विकसित किया गया है।

अगर इस व्यवस्था का प्रभाव गांव के युवा तक पहुंचता है तो यह एक बड़ा बदलाव हो सकता है।

गांव के युवा के लिए प्रशिक्षण केंद्र कितना उपयोगी है?

बिहार में कौशल विकास का सबसे बड़ा परीक्षण गांवों में होना चाहिए।

पटना या बड़े शहर में रहने वाले युवा के पास इंटरनेट, कोचिंग, प्रशिक्षण संस्थान और नौकरी की जानकारी तक अपेक्षाकृत आसान पहुंच हो सकती है। लेकिन ग्रामीण युवा के लिए समस्या अलग है।

उसे प्रशिक्षण केंद्र तक पहुंचने में किराया लगता है। कई बार परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी होती है कि प्रशिक्षण के दौरान भी उसे काम करना पड़ता है। इंटरनेट और डिजिटल साधनों की कमी भी उसके सामने बाधा बन सकती है।

इसलिए कौशल विकास योजना की सफलता सिर्फ इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने युवाओं ने नामांकन कराया।

सवाल होना चाहिए—

कितने युवाओं ने प्रशिक्षण पूरा किया?
कितनों ने प्रमाणपत्र हासिल किया?
कितनों को नौकरी मिली?
कितनों की आय बढ़ी?
और प्रशिक्षण के एक साल बाद कितने युवा उसी क्षेत्र में काम कर रहे हैं?

यही आंकड़े किसी योजना की वास्तविक सफलता बताते हैं।

प्रशिक्षण बाजार की जरूरत के हिसाब से हो

कई बार युवा वही कोर्स चुनता है जिसके बारे में उसे जानकारी मिलती है। लेकिन हर कोर्स की स्थानीय बाजार में मांग समान नहीं होती।

अगर किसी जिले में सोलर उपकरण, मोबाइल रिपेयरिंग, इलेक्ट्रिकल काम, स्वास्थ्य देखभाल, निर्माण, लॉजिस्टिक्स, डिजिटल सेवाओं या कृषि आधारित कारोबार की मांग है तो प्रशिक्षण कार्यक्रमों को उसी के अनुसार तैयार करना चाहिए।

बिहार सरकार पहले भी मांग वाले क्षेत्रों में रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण और मेगा स्किल सेंटर जैसी व्यवस्था की बात कर चुकी है।

यानी आगे की दिशा स्पष्ट है—युवा की रुचि और बाजार की जरूरत के बीच तालमेल।

नौकरी नहीं तो उद्यमिता का रास्ता

हर प्रशिक्षित युवा को नौकरी मिले, यह जरूरी नहीं। लेकिन हर युवा के सामने आय का कोई रास्ता होना जरूरी है।

एक प्रशिक्षित युवक इलेक्ट्रिकल सर्विस शुरू कर सकता है। कोई मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान खोल सकता है। कोई डिजिटल सेवा केंद्र चला सकता है। कोई कृषि उपकरण की मरम्मत का काम कर सकता है। कोई स्थानीय स्तर पर सर्विस आधारित छोटा व्यवसाय शुरू कर सकता है।

इसलिए कौशल विकास के साथ उद्यमिता प्रशिक्षण, बैंक ऋण, बाजार और मार्गदर्शन को जोड़ना भी जरूरी है।

सरकार की रोजगार नीति में भी मांग आधारित प्रशिक्षण, उद्यमिता और निजी प्रतिष्ठानों के साथ साझेदारी को रोजगार बढ़ाने के महत्वपूर्ण माध्यमों के रूप में रखा गया है।

युवाओं को सिर्फ ट्रेनिंग नहीं, रास्ता चाहिए

बिहार के युवा को सबसे ज्यादा जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें उसे शुरुआत से अंत तक मार्गदर्शन मिले।

उसे पता हो कि उसकी योग्यता के अनुसार कौन-सा कौशल उपयोगी है। उसे यह जानकारी मिले कि प्रशिक्षण कहां होगा। प्रशिक्षण के बाद नौकरी कहां मिलेगी। नौकरी के लिए आवेदन कैसे करना है। इंटरव्यू कैसे देना है। और अगर नौकरी नहीं मिलती तो अपना छोटा व्यवसाय कैसे शुरू किया जा सकता है।

यानी कौशल विकास को प्रशिक्षण केंद्र की चारदीवारी से बाहर निकालकर रोजगार की पूरी यात्रा से जोड़ना होगा।

असली सफलता रोजगार में दिखाई देगी

बिहार में कौशल विकास के लिए ढांचा तैयार हो रहा है। BSDM के पोर्टल पर हजारों प्रशिक्षण केंद्रों और लाखों प्रशिक्षार्थियों से जुड़े आंकड़े भी उपलब्ध हैं।

लेकिन आने वाले समय में जनता का सवाल संख्या से ज्यादा परिणाम पर होगा।

कितने युवा प्रशिक्षण के बाद अपने पैरों पर खड़े हुए?

कितनों की आय बढ़ी?

कितनों को बिहार में ही रोजगार मिला?

और कितने युवाओं को मजबूरी में दूसरे राज्यों की ओर जाना पड़ा?

कौशल विकास की असली सफलता प्रमाणपत्रों की संख्या में नहीं, युवाओं की बदलती जिंदगी में दिखाई देगी।

बिहार के युवा को सिर्फ यह बताने की जरूरत नहीं कि उसके पास हुनर है। उसे ऐसा अवसर भी चाहिए जहां वह उस हुनर से अपनी आजीविका कमा सके।

आखिरकार सवाल सिर्फ रोजगार का नहीं है। सवाल उस युवा के आत्मविश्वास का है जो वर्षों की पढ़ाई और प्रशिक्षण के बाद अपने परिवार से यह कहना चाहता है—“अब मैं अपने पैरों पर खड़ा हो सकता हूं।”


आलोक कुमार

Bihar : बेरोजगार युवाओं के लिए सरकारी नौकरी ही एकमात्र रास्ता क्यों नहीं?

 बेरोजगार युवाओं के लिए सरकारी नौकरी ही एकमात्र रास्ता क्यों नहीं?


भारत, खासकर बिहार जैसे राज्यों में सरकारी नौकरी आज भी युवाओं के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक भविष्य का सबसे बड़ा प्रतीक मानी जाती है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लाखों युवा वर्षों लगा देते हैं। सुबह से रात तक किताबों के बीच समय बिताना, कोचिंग करना, परीक्षा की तारीख का इंतजार करना और फिर परिणाम के लिए महीनों बेचैनी में रहना—यह आज बड़ी संख्या में युवाओं की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है।

सरकारी नौकरी की चाहत गलत नहीं है। सवाल यह है कि क्या बेरोजगार युवाओं के भविष्य का एकमात्र रास्ता सरकारी नौकरी ही हो सकता है?

सरकारी नौकरी की अपनी अहमियत है। नियमित आय, नौकरी की स्थिरता, सामाजिक सुरक्षा और कई तरह की सुविधाएं इसे आकर्षक बनाती हैं। खासकर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए सरकारी नौकरी केवल रोजगार नहीं, बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक स्थिति बदलने का माध्यम बन सकती है। यही कारण है कि बिहार में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं की संख्या लगातार बड़ी बनी हुई है।

लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब एक पूरी युवा पीढ़ी अपने भविष्य को सीमित संख्या में सरकारी पदों से जोड़ देती है।

कुछ हजार पद, लाखों दावेदार

हर साल विभिन्न सरकारी विभागों में रिक्तियां निकलती हैं और लाखों युवा उनके लिए आवेदन करते हैं। एक पद के लिए सैकड़ों या हजारों उम्मीदवारों के बीच मुकाबला होता है। परीक्षा की तैयारी में वर्षों लगाने के बावजूद चयन की गारंटी किसी के पास नहीं होती।

इसका सबसे बड़ा असर युवाओं के समय पर पड़ता है। 22 से 25 वर्ष की उम्र ऐसी होती है, जब किसी युवा के पास ऊर्जा, सीखने की क्षमता, रचनात्मकता और जोखिम उठाने का साहस होता है। यदि यही पूरा समय केवल एक या दो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में निकल जाए और सफलता न मिले तो युवा के सामने अचानक रोजगार और भविष्य का बड़ा सवाल खड़ा हो सकता है।

यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं है। जब बड़ी संख्या में युवा अपनी क्षमता का उपयोग रोजगार या उत्पादन में करने के बजाय वर्षों तक परीक्षा की तैयारी में लगाए रखते हैं, तो इसका असर अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है।

बिहार में सामाजिक दबाव भी बड़ी वजह

बिहार में सरकारी नौकरी को लेकर सामाजिक मानसिकता काफी मजबूत है। कई परिवारों में बेटे या बेटी के लिए सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण सरकारी नौकरी को माना जाता है। परिवार आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद वर्षों तक कोचिंग, किराया, किताब और रहने-खाने का खर्च उठाते हैं।

पटना समेत कई शहरों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं की बड़ी संख्या इसी उम्मीद के साथ रहती है कि एक दिन सरकारी नौकरी मिलेगी और परिवार की स्थिति बदल जाएगी।

लेकिन वास्तविकता यह है कि हर उम्मीदवार का चयन संभव नहीं है।

ऐसे में जरूरत सरकारी नौकरी की इच्छा खत्म करने की नहीं, बल्कि करियर के विकल्पों का विस्तार करने की है।

रोजगार का मतलब केवल सरकारी नौकरी नहीं

आज रोजगार के अनेक क्षेत्र मौजूद हैं। निजी कंपनियां, बैंकिंग, बीमा, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, तकनीकी क्षेत्र, पर्यटन, लॉजिस्टिक्स, निर्माण, कृषि आधारित उद्योग और डिजिटल सेवाएं युवाओं के लिए अवसर पैदा कर रहे हैं।

डिजिटल अर्थव्यवस्था ने तो रोजगार के कई ऐसे रास्ते खोले हैं, जो कुछ वर्ष पहले युवाओं के लिए बहुत सीमित थे। ग्राफिक डिजाइन, वीडियो एडिटिंग, डिजिटल मार्केटिंग, वेब डेवलपमेंट, सोशल मीडिया प्रबंधन, ऑनलाइन शिक्षा और तकनीकी सेवाओं जैसे क्षेत्रों में कौशल रखने वाला युवा नौकरी के साथ-साथ स्वतंत्र रूप से काम भी कर सकता है।

हालांकि इसके लिए डिग्री से आगे बढ़कर कौशल की जरूरत है।

डिग्री के साथ कौशल जरूरी

आज सिर्फ स्नातक या स्नातकोत्तर की डिग्री रोजगार की गारंटी नहीं देती। कंपनियां और संस्थान ऐसे युवाओं की तलाश करते हैं, जिनके पास व्यावहारिक ज्ञान और काम करने की क्षमता हो।

इसलिए कॉलेज और विश्वविद्यालयों में पढ़ाई को रोजगार की वास्तविक जरूरतों से जोड़ना होगा। विद्यार्थियों को इंटर्नशिप, कंप्यूटर ज्ञान, संचार कौशल, डिजिटल दक्षता, वित्तीय समझ और व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।

शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा पास करना और डिग्री हासिल करना नहीं होना चाहिए। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जो युवा को रोजगार खोजने के साथ-साथ अवसर पैदा करने की क्षमता भी दे।

स्वरोजगार को छोटा समझना बंद करना होगा

सरकारी नौकरी के प्रति सम्मान होना ठीक है, लेकिन छोटे कारोबार या स्वरोजगार को कमतर समझना उचित नहीं है।

मोबाइल रिपेयरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, डेयरी, खाद्य प्रसंस्करण, मछली पालन, मुर्गी पालन, कृषि आधारित व्यवसाय, कपड़ा कारोबार, परिवहन, सर्विस सेंटर और स्थानीय डिजिटल सेवाएं जैसे काम रोजगार के मजबूत माध्यम बन सकते हैं।

कई छोटे व्यवसाय समय के साथ बड़े उद्यम में बदलते हैं। फर्क केवल इतना है कि नौकरी में युवा किसी संस्था के लिए काम करता है, जबकि उद्यमिता में वह स्वयं रोजगार पैदा करने की क्षमता विकसित करता है।

सरकार की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी

युवाओं से केवल यह कहना कि सरकारी नौकरी के पीछे मत भागिए और व्यवसाय कीजिए, पर्याप्त नहीं है।

यदि सरकार युवाओं को उद्यमिता की ओर बढ़ाना चाहती है तो उसे आसान ऋण, प्रशिक्षण, बाजार, तकनीकी सहायता और आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी। बिजली, सड़क, इंटरनेट और सरल प्रशासनिक प्रक्रियाएं छोटे व्यवसायों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल कौशल और बाजार के बीच तालमेल का है। यदि किसी युवा को ऐसा प्रशिक्षण दिया जाए जिसकी बाजार में मांग ही नहीं है, तो प्रशिक्षण पूरा करने के बाद भी बेरोजगारी बनी रहेगी।

इसलिए प्रशिक्षण संस्थानों और उद्योगों के बीच बेहतर समन्वय जरूरी है। युवाओं को यह जानकारी मिलनी चाहिए कि वर्तमान ही नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों में किन क्षेत्रों में रोजगार की मांग बढ़ सकती है।

सरकारी नौकरी की जरूरत फिर भी बनी रहेगी

इसका मतलब यह नहीं है कि सरकारी नौकरी की आवश्यकता समाप्त हो गई है। सरकारी क्षेत्र में पर्याप्त और समयबद्ध भर्ती जरूरी है। वर्षों तक रिक्त पद पड़े रहना, परीक्षा में देरी होना या परिणाम के लिए लंबा इंतजार युवाओं की उम्र और ऊर्जा दोनों को प्रभावित करता है।

सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता, समयबद्ध परीक्षा और परिणाम तथा रिक्तियों की नियमित जानकारी युवाओं को अनिश्चितता से बचा सकती है।

लेकिन सरकारी भर्ती को मजबूत करने के साथ-साथ रोजगार के निजी और स्वरोजगार वाले क्षेत्रों को भी मजबूत करना होगा।

सफलता की परिभाषा बदलनी होगी

समाज की सोच बदलना भी जरूरी है। सरकारी अधिकारी बनना निश्चित रूप से सफलता का एक रास्ता है, लेकिन सफल शिक्षक, डॉक्टर, इंजीनियर, किसान, तकनीशियन, कारोबारी, कलाकार या उद्यमी बनना भी उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है।

एक युवा यदि दस लोगों को रोजगार देता है तो उसका योगदान किसी नौकरी पाने वाले व्यक्ति से कम नहीं है। इसी तरह एक कुशल तकनीशियन, अच्छा शिक्षक या आधुनिक तरीके से खेती करने वाला किसान भी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

युवाओं को एक ही दरवाजे पर क्यों खड़ा करें?

असल समस्या सरकारी नौकरी की चाहत नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब सरकारी नौकरी को सफलता का एकमात्र पैमाना बना दिया जाता है।

बिहार के युवाओं में प्रतिभा और मेहनत की कमी नहीं है। जरूरत है कि उनकी मेहनत को एक ही परीक्षा के कमरे तक सीमित न रखा जाए। उन्हें रोजगार, कौशल, उद्यमिता और नई अर्थव्यवस्था के अवसरों से जोड़ना होगा।

सरकारी नौकरी एक सम्मानजनक और जरूरी विकल्प है, लेकिन भविष्य का दरवाजा केवल सरकारी दफ्तर से नहीं खुलता।

युवाओं को एक नौकरी का इंतजार करने वाला नहीं, बल्कि अनेक अवसरों को पहचानने और जरूरत पड़ने पर अवसर पैदा करने वाला बनाना होगा। यही वास्तविक आत्मनिर्भरता है और यही बेरोजगारी की चुनौती से बाहर निकलने का अधिक व्यापक रास्ता हो सकता है।


आलोक कुुमार

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