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Bihar : बिहार में वृद्ध लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा कितनी पर्याप्त है?

 


बिहार में वृद्ध लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा कितनी पर्याप्त है?

पेंशन बढ़ी, लाभार्थियों की संख्या बढ़ी और DBT से भुगतान की व्यवस्था मजबूत हुई। लेकिन महंगाई, दवा और रोजमर्रा की जरूरतों के बीच सवाल अब भी यही है—क्या ₹1,100 प्रतिमाह की पेंशन वृद्ध व्यक्ति को पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा दे सकती है?

पटना। बिहार में बुजुर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा का सवाल केवल पेंशन मिलने या नहीं मिलने तक सीमित नहीं है। यह सम्मानजनक जीवन, भोजन, दवा, इलाज, आवागमन, अकेलेपन और आर्थिक निर्भरता से भी जुड़ा हुआ है। राज्य सरकार ने सामाजिक सुरक्षा पेंशन की राशि बढ़ाने और भुगतान को सीधे बैंक खाते तक पहुंचाने पर जोर दिया है। लेकिन वृद्धावस्था की वास्तविक जरूरतों को देखते हुए इस व्यवस्था की पर्याप्तता पर चर्चा जरूरी है।

बिहार सरकार के सामाजिक सुरक्षा पेंशन प्रबंधन सूचना तंत्र (SSPMIS) के अनुसार मुख्यमंत्री वृद्धजन पेंशन योजना में न्यूनतम आयु 60 वर्ष है और इसके तहत ₹1,100 प्रतिमाह पेंशन दी जा रही है। योजना के लिए आधार, मतदाता पहचान पत्र और बैंक खाते से संबंधित प्रक्रियाएं भी जुड़ी हैं।

₹400 से ₹1,100 तक पहुंची पेंशन

बिहार में सामाजिक सुरक्षा पेंशन की राशि पहले ₹400 प्रतिमाह थी। राज्य सरकार ने इसे बढ़ाकर ₹1,100 प्रतिमाह किया। सरकारी बयानों में इस बढ़ोतरी को वृद्धजनों, दिव्यांगजनों और विधवा महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव के रूप में बताया गया है।

राशि बढ़ने से निश्चित रूप से वृद्ध लाभार्थियों को पहले की तुलना में अधिक आर्थिक सहायता मिलती है। लेकिन किसी योजना की उपयोगिता केवल यह देखकर तय नहीं की जा सकती कि राशि कितनी बढ़ी है। यह भी देखना होगा कि उस राशि से आज की परिस्थितियों में वृद्ध व्यक्ति की कितनी जरूरतें पूरी हो पाती हैं।

₹1,100 प्रतिमाह यानी औसतन लगभग ₹36 प्रतिदिन। यदि किसी बुजुर्ग को नियमित दवा खरीदनी हो, अस्पताल जाना हो या वह परिवार से आर्थिक सहायता पाने की स्थिति में न हो, तो यह राशि सीमित पड़ सकती है।

DBT से भुगतान में आया बदलाव

सितंबर 2026 में बिहार सरकार ने बताया कि अगस्त माह की सामाजिक सुरक्षा पेंशन के रूप में 105.68 लाख लाभार्थियों के बैंक खातों में ₹1,100 की दर से कुल ₹1,233.87 करोड़ DBT के माध्यम से भेजे गए। सरकार ने हर महीने की 10 तारीख को पेंशन भुगतान का लक्ष्य निर्धारित करने की भी जानकारी दी। उसी भुगतान में 98,896 नए लाभार्थियों को जोड़े जाने की बात कही गई।

सीधे बैंक खाते में भुगतान होने से नकद वितरण पर निर्भरता कम होती है और भुगतान की निगरानी आसान हो सकती है। लेकिन बैंक खाते में पैसा पहुंचना और वृद्ध व्यक्ति का उस पैसे तक आसानी से पहुंच पाना दो अलग-अलग बातें हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसे बुजुर्ग भी हैं जिन्हें बैंकिंग प्रक्रिया, आधार प्रमाणीकरण, मोबाइल या डिजिटल सेवाओं की जानकारी सीमित हो सकती है। इसलिए DBT के साथ स्थानीय स्तर पर सहायता व्यवस्था भी जरूरी है।

योजना की पहुंच और वास्तविक पहुंच

SSPMIS में लाभार्थियों के आवेदन और उनकी स्थिति ऑनलाइन देखने की सुविधा उपलब्ध है। लाभार्थी आईडी, स्वीकृति संख्या, बैंक खाता, आधार या मोबाइल नंबर के माध्यम से आवेदन की स्थिति खोजी जा सकती है।

लेकिन आवेदन प्रक्रिया में दस्तावेज, सत्यापन और त्रुटि सुधार जैसी अवस्थाएं भी होती हैं। 22 सितंबर 2026 के SSPMIS जिला-वार आंकड़ों में मुख्यमंत्री वृद्धजन पेंशन योजना के आवेदन से संबंधित दस्तावेज अपलोड, सत्यापन और त्रुटि सुधार जैसी श्रेणियों में लंबित आवेदन दर्ज हैं।

यही वह बिंदु है जहां योजना की कागजी पहुंच और वास्तविक पहुंच के बीच अंतर दिखाई दे सकता है। जिस बुजुर्ग के पास स्मार्टफोन नहीं है या जो ऑनलाइन प्रक्रिया समझने में सक्षम नहीं है, उसके लिए पंचायत, प्रखंड कार्यालय या परिवार की सहायता महत्वपूर्ण हो जाती है।

सरकार ने भी सितंबर 2026 में यह निर्देश दिया कि पात्र वृद्धा पेंशन आवेदकों को शीघ्र लाभ मिले और तकनीकी कारणों से कोई पात्र व्यक्ति सरकारी योजना से वंचित न रहे।

क्या ₹1,100 पर्याप्त है?

यही इस पूरी व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कसौटी है।

वृद्धावस्था में खर्च का स्वरूप बदल जाता है। सामान्य परिवार की तुलना में बुजुर्गों को दवा, जांच, चश्मा, अस्पताल आने-जाने और विशेष भोजन जैसी जरूरतें अधिक हो सकती हैं। कई वृद्ध ऐसे भी होते हैं जो अकेले रहते हैं या परिवार की नियमित आर्थिक सहायता पर निर्भर रहते हैं।

इसलिए पेंशन को केवल नकद सहायता के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यदि वृद्ध व्यक्ति को सस्ती दवा, प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधा, खाद्य सुरक्षा और स्थानीय सहायता भी उपलब्ध हो, तो ₹1,100 की पेंशन का वास्तविक उपयोग अधिक प्रभावी हो सकता है।

दूसरी ओर, यदि पेंशन के साथ स्वास्थ्य खर्च भी वृद्ध व्यक्ति को स्वयं उठाना पड़े, तो बढ़ी हुई राशि के बावजूद आर्थिक असुरक्षा बनी रह सकती है।

अगला कदम क्या हो सकता है?

बिहार में वृद्धजन सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करने के लिए कुछ व्यावहारिक कदमों पर विचार किया जा सकता है।

पहला, पेंशन राशि की समय-समय पर महंगाई और जीवन-यापन की लागत के आधार पर समीक्षा हो।

दूसरा, अकेले रहने वाले, अत्यधिक वृद्ध और गंभीर स्वास्थ्य जरूरत वाले बुजुर्गों के लिए अतिरिक्त सहायता की व्यवस्था पर विचार किया जाए।

तीसरा, पंचायत स्तर पर वृद्धजन सहायता केंद्र विकसित किए जा सकते हैं, जहां पेंशन, बैंकिंग, स्वास्थ्य सेवाओं, राशन और अन्य सरकारी योजनाओं से जुड़ी जानकारी एक ही जगह मिले।

चौथा, यदि किसी लाभार्थी की पेंशन तकनीकी या दस्तावेजी कारण से रुकती है तो शिकायत के समाधान की समय-सीमा स्पष्ट होनी चाहिए।

पांचवां, वृद्धजन पेंशन को स्वास्थ्य सेवाओं से बेहतर तरीके से जोड़ना जरूरी है। वृद्ध व्यक्ति के लिए आर्थिक सहायता तभी अधिक उपयोगी होगी जब उसके आसपास दवा, जांच और प्राथमिक इलाज की सुविधाएं भी उपलब्ध हों।

असली सवाल सम्मानजनक जीवन का

बिहार ने वृद्धजन पेंशन को ₹400 से बढ़ाकर ₹1,100 किया है और लाखों लाभार्थियों को DBT के माध्यम से भुगतान किया जा रहा है। सितंबर 2026 में 105.68 लाख लाभार्थियों को भुगतान इसका ताजा उदाहरण है।

लेकिन सामाजिक सुरक्षा की पर्याप्तता का अंतिम पैमाना केवल लाभार्थियों की संख्या या बजट नहीं हो सकता।

एक वृद्ध व्यक्ति के लिए सामाजिक सुरक्षा का अर्थ है—समय पर पेंशन, पर्याप्त भोजन, जरूरत के समय इलाज, दवा की उपलब्धता, सुरक्षित आवागमन और परिवार पर पूरी तरह निर्भर न रहने की क्षमता।

इस दृष्टि से बिहार की पेंशन व्यवस्था ने एक महत्वपूर्ण आधार जरूर बनाया है, लेकिन सामाजिक सुरक्षा को और व्यापक बनाने की गुंजाइश बनी हुई है। आगे की चुनौती यह है कि पेंशन को केवल आर्थिक सहायता से आगे बढ़ाकर वृद्ध व्यक्ति के सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन की व्यापक व्यवस्था से जोड़ा जाए।

क्योंकि वृद्धावस्था केवल किसी परिवार की निजी जिम्मेदारी नहीं है। यह समाज और सरकार दोनों की साझा जिम्मेदारी है। जिस पीढ़ी ने अपने श्रम और अनुभव से परिवार और समाज को आगे बढ़ाया, उसके जीवन के अंतिम पड़ाव की सुरक्षा भी सामाजिक विकास का महत्वपूर्ण पैमाना होनी चाहिए।

 बिहार में वृद्धजन पेंशन ₹1,100 प्रतिमाह है। जानिए DBT भुगतान, योजना की पहुंच, आवेदन प्रक्रिया और बढ़ती उम्र की वास्तविक जरूरतों के बीच सामाजिक सुरक्षा कितनी पर्याप्त है।

आलोक कुमार

Bihar : बिहार में युवाओं के लिए कौशल विकास योजनाओं की असली जरूरत

 


बिहार में युवाओं के लिए कौशल विकास योजनाओं की असली जरूरत

पटना। बिहार में युवाओं की संख्या राज्य की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। लेकिन यही युवा वर्ग जब पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार की तलाश में निकलता है तो उसके सामने सबसे बड़ा सवाल होता है—डिग्री के बाद काम क्या मिलेगा? सरकारी नौकरी के अवसर सीमित हैं और निजी क्षेत्र में सिर्फ प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि काम करने की वास्तविक क्षमता मांगी जाती है। ऐसे में कौशल विकास योजनाओं की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।

बिहार सरकार ने युवाओं को रोजगार योग्य बनाने के लिए कई स्तर पर योजनाएं शुरू की हैं। बिहार स्किल डेवलपमेंट मिशन यानी BSDM का उद्देश्य युवाओं को जरूरी कौशल देकर उनकी रोजगार क्षमता बढ़ाना और उद्योगों की जरूरत के मुताबिक प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करना है। मिशन के पोर्टल पर प्रशिक्षण, मूल्यांकन, प्रमाणन और रोजगार के अवसरों को एक साथ जोड़ने की व्यवस्था बताई गई है।

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या कौशल प्रशिक्षण सिर्फ प्रमाणपत्र पाने तक सीमित रहना चाहिए, या प्रशिक्षण के बाद युवा को स्थायी रोजगार तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी व्यवस्था की होनी चाहिए?

प्रमाणपत्र से ज्यादा जरूरी है काम का हुनर

आज बिहार के हजारों युवा कंप्यूटर, भाषा, अकाउंटिंग, इलेक्ट्रिकल, तकनीकी और दूसरे क्षेत्रों में प्रशिक्षण लेते हैं। कुशल युवा कार्यक्रम में भाषा एवं संवाद कौशल, बेसिक कंप्यूटर और सॉफ्ट स्किल जैसे विषय शामिल हैं। BSDM के अनुसार KYP का उद्देश्य युवाओं की employability यानी रोजगार पाने की क्षमता को बढ़ाना है।

लेकिन नौकरी के बाजार में केवल प्रमाणपत्र काफी नहीं होता।

किसी कंपनी को ऐसा युवा चाहिए जो कंप्यूटर पर वास्तविक काम कर सके, ग्राहक से बात कर सके, मशीन चला सके, डेटा संभाल सके, बिक्री कर सके या किसी तकनीकी समस्या का समाधान कर सके। इसलिए प्रशिक्षण का अगला चरण प्रैक्टिकल अनुभव होना चाहिए।

युवा को प्रशिक्षण केंद्र में सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे वास्तविक कार्यस्थल जैसी परिस्थितियों में काम करने का मौका मिलना चाहिए।

बिहार में कौशल विकास की जरूरत इतनी बड़ी क्यों है?

बिहार में बड़ी संख्या में युवा उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी नौकरी की तैयारी करते हैं। लेकिन हर युवा को सरकारी नौकरी मिलना संभव नहीं है। ऐसे में रोजगार के दूसरे रास्तों को मजबूत करना जरूरी है।

राज्य के योजना विभाग के अनुसार बिहार की बड़ी युवा आबादी के कारण रोजगार योग्य कार्यबल तैयार करना राज्य के विकास के लिए महत्वपूर्ण है। कौशल विकास के क्षेत्र में KYP, डोमेन स्किलिंग, PMKVY, DDU-GKY, ITI, RSETI और अप्रेंटिसशिप जैसी विभिन्न पहलें चल रही हैं।

इसका अर्थ साफ है—बिहार में चुनौती सिर्फ युवाओं को प्रशिक्षण देने की नहीं है। चुनौती यह है कि जिस कौशल की ट्रेनिंग दी जा रही है, उस कौशल के लिए रोजगार भी मौजूद हो।

ITI और पॉलिटेक्निक छात्रों के लिए भी बड़ा सवाल

कौशल विकास की चर्चा अक्सर छोटे अवधि के प्रशिक्षण तक सीमित हो जाती है। लेकिन ITI और पॉलिटेक्निक से निकलने वाले युवाओं के लिए भी उद्योग से सीधा जुड़ाव जरूरी है।

अगर किसी छात्र ने इलेक्ट्रिशियन, मशीनरी, ऑटोमोबाइल, फिटर, वेल्डिंग या दूसरे तकनीकी ट्रेड में प्रशिक्षण लिया है तो उसे प्रशिक्षण के बाद वास्तविक उद्योग में काम करने का अवसर मिलना चाहिए।

यहीं पर अप्रेंटिसशिप और उद्योग आधारित प्रशिक्षण की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

सरकार की नई रोजगार व्यवस्था भी प्रशिक्षण और रोजगार को एक-दूसरे से जोड़ने पर जोर दे रही है। बिहार रोजगार सेतु को निबंधन, प्रशिक्षण, प्रमाणन, सत्यापन और नियोजन को जोड़ने वाले एकीकृत मंच के रूप में विकसित किया गया है।

अगर इस व्यवस्था का प्रभाव गांव के युवा तक पहुंचता है तो यह एक बड़ा बदलाव हो सकता है।

गांव के युवा के लिए प्रशिक्षण केंद्र कितना उपयोगी है?

बिहार में कौशल विकास का सबसे बड़ा परीक्षण गांवों में होना चाहिए।

पटना या बड़े शहर में रहने वाले युवा के पास इंटरनेट, कोचिंग, प्रशिक्षण संस्थान और नौकरी की जानकारी तक अपेक्षाकृत आसान पहुंच हो सकती है। लेकिन ग्रामीण युवा के लिए समस्या अलग है।

उसे प्रशिक्षण केंद्र तक पहुंचने में किराया लगता है। कई बार परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी होती है कि प्रशिक्षण के दौरान भी उसे काम करना पड़ता है। इंटरनेट और डिजिटल साधनों की कमी भी उसके सामने बाधा बन सकती है।

इसलिए कौशल विकास योजना की सफलता सिर्फ इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने युवाओं ने नामांकन कराया।

सवाल होना चाहिए—

कितने युवाओं ने प्रशिक्षण पूरा किया?
कितनों ने प्रमाणपत्र हासिल किया?
कितनों को नौकरी मिली?
कितनों की आय बढ़ी?
और प्रशिक्षण के एक साल बाद कितने युवा उसी क्षेत्र में काम कर रहे हैं?

यही आंकड़े किसी योजना की वास्तविक सफलता बताते हैं।

प्रशिक्षण बाजार की जरूरत के हिसाब से हो

कई बार युवा वही कोर्स चुनता है जिसके बारे में उसे जानकारी मिलती है। लेकिन हर कोर्स की स्थानीय बाजार में मांग समान नहीं होती।

अगर किसी जिले में सोलर उपकरण, मोबाइल रिपेयरिंग, इलेक्ट्रिकल काम, स्वास्थ्य देखभाल, निर्माण, लॉजिस्टिक्स, डिजिटल सेवाओं या कृषि आधारित कारोबार की मांग है तो प्रशिक्षण कार्यक्रमों को उसी के अनुसार तैयार करना चाहिए।

बिहार सरकार पहले भी मांग वाले क्षेत्रों में रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण और मेगा स्किल सेंटर जैसी व्यवस्था की बात कर चुकी है।

यानी आगे की दिशा स्पष्ट है—युवा की रुचि और बाजार की जरूरत के बीच तालमेल।

नौकरी नहीं तो उद्यमिता का रास्ता

हर प्रशिक्षित युवा को नौकरी मिले, यह जरूरी नहीं। लेकिन हर युवा के सामने आय का कोई रास्ता होना जरूरी है।

एक प्रशिक्षित युवक इलेक्ट्रिकल सर्विस शुरू कर सकता है। कोई मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान खोल सकता है। कोई डिजिटल सेवा केंद्र चला सकता है। कोई कृषि उपकरण की मरम्मत का काम कर सकता है। कोई स्थानीय स्तर पर सर्विस आधारित छोटा व्यवसाय शुरू कर सकता है।

इसलिए कौशल विकास के साथ उद्यमिता प्रशिक्षण, बैंक ऋण, बाजार और मार्गदर्शन को जोड़ना भी जरूरी है।

सरकार की रोजगार नीति में भी मांग आधारित प्रशिक्षण, उद्यमिता और निजी प्रतिष्ठानों के साथ साझेदारी को रोजगार बढ़ाने के महत्वपूर्ण माध्यमों के रूप में रखा गया है।

युवाओं को सिर्फ ट्रेनिंग नहीं, रास्ता चाहिए

बिहार के युवा को सबसे ज्यादा जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें उसे शुरुआत से अंत तक मार्गदर्शन मिले।

उसे पता हो कि उसकी योग्यता के अनुसार कौन-सा कौशल उपयोगी है। उसे यह जानकारी मिले कि प्रशिक्षण कहां होगा। प्रशिक्षण के बाद नौकरी कहां मिलेगी। नौकरी के लिए आवेदन कैसे करना है। इंटरव्यू कैसे देना है। और अगर नौकरी नहीं मिलती तो अपना छोटा व्यवसाय कैसे शुरू किया जा सकता है।

यानी कौशल विकास को प्रशिक्षण केंद्र की चारदीवारी से बाहर निकालकर रोजगार की पूरी यात्रा से जोड़ना होगा।

असली सफलता रोजगार में दिखाई देगी

बिहार में कौशल विकास के लिए ढांचा तैयार हो रहा है। BSDM के पोर्टल पर हजारों प्रशिक्षण केंद्रों और लाखों प्रशिक्षार्थियों से जुड़े आंकड़े भी उपलब्ध हैं।

लेकिन आने वाले समय में जनता का सवाल संख्या से ज्यादा परिणाम पर होगा।

कितने युवा प्रशिक्षण के बाद अपने पैरों पर खड़े हुए?

कितनों की आय बढ़ी?

कितनों को बिहार में ही रोजगार मिला?

और कितने युवाओं को मजबूरी में दूसरे राज्यों की ओर जाना पड़ा?

कौशल विकास की असली सफलता प्रमाणपत्रों की संख्या में नहीं, युवाओं की बदलती जिंदगी में दिखाई देगी।

बिहार के युवा को सिर्फ यह बताने की जरूरत नहीं कि उसके पास हुनर है। उसे ऐसा अवसर भी चाहिए जहां वह उस हुनर से अपनी आजीविका कमा सके।

आखिरकार सवाल सिर्फ रोजगार का नहीं है। सवाल उस युवा के आत्मविश्वास का है जो वर्षों की पढ़ाई और प्रशिक्षण के बाद अपने परिवार से यह कहना चाहता है—“अब मैं अपने पैरों पर खड़ा हो सकता हूं।”


आलोक कुमार

Bihar : बिहार में सरकारी योजनाओं का लाभ गरीबों तक क्यों नहीं पहुंचता

 


बिहार में सरकारी योजनाओं का लाभ गरीबों तक क्यों नहीं पहुंचता? जानिए जानकारी के अभाव, दस्तावेजी जटिलता, भ्रष्टाचार, लाभार्थी चयन, प्रशासनिक निगरानी और डीबीटी से जुड़ी प्रमुख चुनौतियां।

बिहार। गरीबों और वंचित परिवारों की जिंदगी में बदलाव लाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, रोजगार, राशन, पेंशन, छात्रवृत्ति, पेयजल, सड़क, बिजली और सामाजिक सुरक्षा जैसी कई योजनाएं चला रही हैं। इन योजनाओं पर हर वर्ष बड़ी राशि खर्च होती है। सरकारी रिपोर्टों में उपलब्धियों के आंकड़े भी सामने आते हैं, लेकिन सवाल तब खड़ा होता है जब किसी गांव का पात्र परिवार कहता है कि उसे योजना की जानकारी ही नहीं मिली, आवेदन के बावजूद लाभ नहीं मिला या महीनों कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़े।

आखिर ऐसी स्थिति क्यों बनती है? क्या समस्या योजनाओं की कमी में है या उन्हें जमीन तक पहुंचाने वाली व्यवस्था में?

जानकारी के अभाव में छूट जाते हैं पात्र लोग

सरकारी योजना का लाभ लेने की पहली शर्त है कि व्यक्ति को उसके बारे में जानकारी हो। बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी ऐसे परिवार मौजूद हैं जिन्हें यह पता नहीं होता कि वे किन योजनाओं के पात्र हैं और आवेदन की प्रक्रिया क्या है।

डिजिटल व्यवस्था ने सरकारी सेवाओं को तेज बनाने की कोशिश की है, लेकिन हर व्यक्ति डिजिटल रूप से सक्षम नहीं है। बुजुर्ग, अशिक्षित, दिव्यांग और अत्यंत गरीब परिवारों के लिए ऑनलाइन आवेदन, दस्तावेज अपलोड करना और आवेदन की स्थिति देखना आसान नहीं होता।

इसलिए केवल वेबसाइट या मोबाइल एप पर जानकारी डाल देना पर्याप्त नहीं है। पंचायत स्तर पर ऐसी व्यवस्था जरूरी है जहां नागरिक को सरल भाषा में बताया जाए कि उसके अधिकार क्या हैं और वह उनका लाभ कैसे ले सकता है।

दस्तावेजों की छोटी गलती बन जाती है बड़ी बाधा

गरीब परिवारों के लिए सरकारी योजनाओं की प्रक्रिया कई बार दस्तावेजों के कारण कठिन हो जाती है। आधार कार्ड, बैंक खाता, राशन कार्ड, आय प्रमाणपत्र, निवास प्रमाणपत्र या अन्य कागजात में किसी तरह की विसंगति होने पर आवेदन रुक सकता है।

नाम की स्पेलिंग में मामूली अंतर, जन्मतिथि की गलती या पते में बदलाव जैसी समस्या भी कई बार लाभार्थी को लंबे समय तक परेशान करती है। आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति के लिए बार-बार प्रखंड, अंचल या जिला कार्यालय जाना आसान नहीं होता। मजदूरी छोड़कर सरकारी दफ्तर जाना उसके परिवार की रोज की आय को प्रभावित कर सकता है।

ऐसे में व्यवस्था को नागरिक के लिए आसान बनाने की जरूरत है, न कि नागरिक को व्यवस्था के पीछे दौड़ाने की।

बिचौलियों की भूमिका से बढ़ती है परेशानी

हर सरकारी कर्मचारी या अधिकारी को भ्रष्ट मानना उचित नहीं है। लेकिन जहां लाभार्थी और सरकारी व्यवस्था के बीच अनावश्यक बिचौलियों की भूमिका बढ़ती है, वहां पारदर्शिता कमजोर होने का खतरा रहता है।

गरीब व्यक्ति यदि अपने अधिकार और योजना की वास्तविक प्रक्रिया से अनजान है तो उसकी मजबूरी का फायदा उठाया जा सकता है। यही कारण है कि आवेदन से लेकर स्वीकृति और भुगतान तक प्रत्येक चरण की जानकारी लाभार्थी को सीधे उपलब्ध होनी चाहिए।

सरकारी योजनाओं का उद्देश्य तभी पूरा होगा जब पात्र व्यक्ति को किसी मध्यस्थ पर निर्भर न रहना पड़े।

लाभार्थियों की सूची कितनी सही है?

कई योजनाओं में लाभार्थियों की पहचान और सूची सबसे महत्वपूर्ण चरण होती है। यदि सूची पुरानी है या उसमें सामाजिक-आर्थिक बदलाव दर्ज नहीं हुए हैं, तो वास्तविक जरूरतमंद परिवार बाहर रह सकते हैं।

किसी परिवार की आर्थिक स्थिति समय के साथ बदल सकती है। कोई परिवार गरीबी में जा सकता है, किसी परिवार का रोजगार छूट सकता है या किसी परिवार में ऐसी परिस्थिति पैदा हो सकती है जिसके कारण उसे सरकारी सहायता की जरूरत हो। इसलिए लाभार्थी सूची की नियमित समीक्षा जरूरी है।

साथ ही, पंचायत स्तर पर सूची को सार्वजनिक करना और आपत्ति दर्ज कराने की सरल व्यवस्था बनाना भी जरूरी है।

पटना से जारी आदेश गांव तक पहुंचना अलग चुनौती

बिहार जैसे बड़े और ग्रामीण आबादी वाले राज्य में प्रशासनिक व्यवस्था की अपनी चुनौतियां हैं। राजधानी से किसी योजना का आदेश जारी होना और उसका सही रूप में दूरदराज के गांव तक पहुंचना दो अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं।

कर्मचारियों की कमी, काम का दबाव, दूरदराज के इलाकों तक पहुंच, विभागों के बीच समन्वय और निगरानी की कमजोरी योजनाओं की गति को प्रभावित कर सकती है।

किसी योजना की सफलता का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि कितने आवेदन स्वीकृत हुए। यह भी देखना चाहिए कि कितने परिवारों को वास्तविक और समय पर लाभ मिला।

डीबीटी से सुधार, लेकिन तकनीकी अड़चनें भी

प्रत्यक्ष लाभ अंतरण यानी डीबीटी ने सरकारी सहायता को सीधे बैंक खाते तक पहुंचाने की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। इसका उद्देश्य बिचौलियों की भूमिका कम करना और भुगतान को अधिक पारदर्शी बनाना है।

लेकिन बैंक की दूरी, खाते से जुड़ी समस्या, तकनीकी त्रुटि, आधार संबंधी समस्या या भुगतान में देरी जैसी परेशानियां गरीब परिवार के लिए गंभीर हो सकती हैं।

जिस व्यक्ति के परिवार का खर्च पेंशन, छात्रवृत्ति या किसी सरकारी सहायता पर निर्भर है, उसके लिए भुगतान में देरी केवल तकनीकी समस्या नहीं बल्कि रोजमर्रा की जिंदगी की समस्या है।

पैसा खर्च होना ही सफलता नहीं

सरकारी योजनाओं की सफलता का पैमाना केवल बजट खर्च होना नहीं होना चाहिए। असली सवाल यह है कि उस खर्च से आम नागरिक के जीवन में कितना बदलाव आया।

यदि आवास योजना का घर अधूरा है, नल लगा है लेकिन पानी नहीं आता, शौचालय बना है लेकिन उपयोगी नहीं है, छात्रवृत्ति स्वीकृत है लेकिन समय पर नहीं मिली या रोजगार योजना में काम चाहने वाले व्यक्ति को पर्याप्त काम नहीं मिला, तो कागजी उपलब्धि को पूर्ण सफलता नहीं कहा जा सकता।

विकास का मतलब आंकड़ों से आगे जाकर जीवन में दिखाई देने वाला बदलाव है।

पंचायतों को बनाना होगा निगरानी का केंद्र

सरकारी योजनाओं की निगरानी में ग्राम सभा और पंचायतों की भूमिका मजबूत की जानी चाहिए। ग्रामीणों को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उनके क्षेत्र में किस योजना के तहत कितना धन आया, किन लोगों को लाभ मिला और काम की वास्तविक स्थिति क्या है।

सामाजिक अंकेक्षण को केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं बल्कि जनता की निगरानी का प्रभावी माध्यम बनाया जाना चाहिए। शिकायत दर्ज करने और उसके समाधान की समयसीमा भी स्पष्ट होनी चाहिए।

यदि किसी गरीब व्यक्ति की शिकायत महीनों तक लंबित रहती है तो शिकायत निवारण व्यवस्था का उद्देश्य ही कमजोर पड़ जाता है।

डिजिटल के साथ ऑफलाइन व्यवस्था भी जरूरी

सरकार डिजिटल सेवाओं का विस्तार कर रही है, जो जरूरी भी है। लेकिन डिजिटल व्यवस्था के साथ सहायता केंद्रों और ऑफलाइन सहयोग को मजबूत करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

पंचायत भवन, स्कूल, आंगनबाड़ी केंद्र, स्वास्थ्य केंद्र और जनसेवा केंद्रों के माध्यम से योजनाओं की जानकारी सरल भाषा में दी जा सकती है। स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षित कर्मी लोगों को आवेदन और दस्तावेज संबंधी प्रक्रिया समझा सकते हैं।

तकनीक गरीब व्यक्ति के लिए सुविधा बने, नई बाधा नहीं—नीतियों का लक्ष्य यही होना चाहिए।

गरीब को एहसान नहीं, अधिकार चाहिए

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सरकारी योजनाओं को केवल प्रशासनिक लक्ष्य की तरह नहीं देखा जाना चाहिए। पात्र गरीब नागरिक सार्वजनिक संसाधनों से मिलने वाली सहायता का हकदार है। उसे अपने अधिकार के लिए बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाने की स्थिति में नहीं होना चाहिए।

व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें पात्र व्यक्ति की पहचान हो, उसे योजना की जानकारी मिले, आवेदन सरल हो, दस्तावेज संबंधी समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर हो और भुगतान समय पर मिले।

बिहार में सरकारी योजनाओं की कमी नहीं है। असली चुनौती उनके प्रभावी, पारदर्शी और जवाबदेह क्रियान्वयन की है। विकास के बड़े आंकड़े तभी सार्थक होंगे जब उनका असर गांव के गरीब परिवार की रसोई, घर, बच्चों की पढ़ाई, इलाज और रोजगार में दिखाई देगा।

बिहार की प्रगति का वास्तविक पैमाना यही होना चाहिए कि अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति भी महसूस करे कि सरकार की योजना उसके जीवन तक पहुंची है। जब सरकारी योजना कागज से निकलकर जरूरतमंद के घर तक पहुंचेगी, तभी विकास वास्तव में समावेशी और सार्थक कहलाएगा।

आलोक कुमार



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