Bihar : पुराना भोजपुर कैथोलिक चर्च में माता मरियम का जन्मोत्सव श्रद्धा के साथ मनाया गया

 


पुराना भोजपुर कैथोलिक चर्च में माता मरियम का जन्मोत्सव श्रद्धा के साथ मनाया गया

 प्रार्थना, पवित्र मिस्सा और बच्चों के प्रथम परमप्रसाद व दृढ़करण संस्कार के बीच पुराना भोजपुर कैथोलिक चर्च में माता मरियम का जन्मोत्सव श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया गया।

पुराना भोजपुर। बक्सर धर्मप्रांत के डुमरांव पल्ली अंतर्गत पुराना भोजपुर स्थित कैथोलिक चर्च में रविवार को माता मरियम का जन्मोत्सव श्रद्धा, आस्था और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर चर्च परिसर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटे। लोगों ने विशेष प्रार्थना सभा में भाग लिया और माता मरियम के जीवन से प्रेरणा लेते हुए प्रेम, सेवा, करुणा तथा भाईचारे के संदेश को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लिया।

माता मरियम का जन्मोत्सव कैथोलिक समुदाय के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखता है। इस अवसर पर आयोजित धार्मिक कार्यक्रम केवल पूजा और प्रार्थना तक सीमित नहीं रहते, बल्कि श्रद्धालुओं को विश्वास, विनम्रता और मानव सेवा के रास्ते पर आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देते हैं।

समारोह की अगुवाई बक्सर धर्मप्रांत के धर्माध्यक्ष विशप डॉ. जेम्स शेखर ने की। उनके साथ फादर चार्ल्स सहित अन्य पुरोहित उपस्थित रहे। धार्मिक आयोजन के दौरान चर्च परिसर में भक्तिमय वातावरण बना रहा। श्रद्धालुओं ने सामूहिक प्रार्थना में हिस्सा लिया और परिवार, समाज तथा मानव कल्याण के लिए विशेष प्रार्थना की।

जन्मोत्सव के अवसर पर विशेष पवित्र मिस्सा का आयोजन किया गया। मिस्सा के दौरान धार्मिक विधि-विधान के साथ बच्चों को प्रथम परमप्रसाद (First Holy Communion) और दृढ़करण संस्कार (Confirmation) प्रदान किया गया। इन दोनों संस्कारों को ग्रहण करने वाले बच्चों और उनके परिवारों के लिए यह दिन विशेष आध्यात्मिक महत्व वाला रहा।

प्रथम परमप्रसाद ग्रहण करना बच्चों के धार्मिक जीवन में एक महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है। इस अवसर पर बच्चे पहली बार पवित्र परमप्रसाद ग्रहण करते हैं और अपने विश्वास के साथ एक विशेष आध्यात्मिक जुड़ाव महसूस करते हैं। वहीं दृढ़करण संस्कार के माध्यम से बच्चों को अपने ईसाई विश्वास में आगे बढ़ने और धार्मिक जीवन की जिम्मेदारियों को समझने के लिए प्रेरित किया जाता है।

संस्कार ग्रहण करने वाले बच्चों में इस अवसर को लेकर खास उत्साह दिखाई दिया। उनके अभिभावक भी धार्मिक कार्यक्रम में शामिल हुए और बच्चों के इस महत्वपूर्ण आध्यात्मिक अवसर के साक्षी बने। परिवारों के लिए यह केवल धार्मिक समारोह नहीं, बल्कि बच्चों के जीवन में विश्वास और नैतिक मूल्यों को मजबूत करने का अवसर भी रहा।

अपने संदेश में विशप डॉ. जेम्स शेखर ने माता मरियम के जीवन को प्रेम, करुणा, विश्वास और समर्पण की प्रेरणा बताया। उन्होंने कहा कि माता मरियम का जीवन ईश्वर के प्रति पूर्ण विश्वास, विनम्रता और समर्पण का उदाहरण है। उनके जीवन से प्रेरणा लेकर प्रत्येक व्यक्ति को जरूरतमंदों की सहायता, दूसरों के प्रति प्रेम और समाज में शांति तथा भाईचारे को बढ़ावा देने का प्रयास करना चाहिए।

धर्माध्यक्ष ने संस्कार ग्रहण करने वाले बच्चों को उनके नए आध्यात्मिक दायित्वों के प्रति सजग रहने का संदेश दिया। उन्होंने बच्चों को विश्वास के साथ अच्छे आचरण, सेवा और मानवीय मूल्यों को अपने जीवन में स्थान देने के लिए प्रेरित किया। साथ ही अभिभावकों से भी बच्चों के धार्मिक और नैतिक विकास में सहयोग करने की अपील की।

उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बच्चों की शिक्षा केवल किताबों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। परिवार और धार्मिक समुदाय की भूमिका बच्चों के चरित्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण होती है। प्रेम, क्षमा, सेवा, अनुशासन और जरूरतमंदों की सहायता जैसे मूल्यों को व्यवहार में उतारना बच्चों को बेहतर इंसान बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

कार्यक्रम का आयोजन डुमरांव पल्ली के पुरोहित फादर विजय भास्कर के नेतृत्व में किया गया। उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं का स्वागत किया और जन्मोत्सव के धार्मिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि माता मरियम का जन्मोत्सव विश्वास और आध्यात्मिक जीवन को मजबूत करने का अवसर है। ऐसे धार्मिक आयोजन लोगों को प्रार्थना के साथ-साथ प्रेम, सेवा और भाईचारे के रास्ते पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं।

चर्च परिसर को जन्मोत्सव के अवसर पर आकर्षक ढंग से सजाया गया था। धार्मिक गीतों, सामूहिक प्रार्थना और पवित्र मिस्सा के बीच पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा। श्रद्धालुओं ने पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ धार्मिक कार्यक्रम में हिस्सा लिया।

इस दौरान बच्चों के संस्कार ग्रहण करने का दृश्य भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। परिवार के सदस्यों ने बच्चों के इस आध्यात्मिक अवसर को खुशी के साथ मनाया। चर्च में मौजूद लोगों ने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य, अच्छे स्वास्थ्य और विश्वासपूर्ण जीवन के लिए भी प्रार्थना की।

माता मरियम के जन्मोत्सव का संदेश केवल धार्मिक समुदाय तक सीमित नहीं है। उनके जीवन से जुड़े प्रेम, करुणा, विनम्रता, सेवा और विश्वास जैसे मूल्य समाज के हर व्यक्ति के लिए प्रेरणा का स्रोत हो सकते हैं। ऐसे आयोजन सामाजिक जीवन में आपसी सहयोग और भाईचारे की भावना को भी मजबूत करते हैं।

पुराना भोजपुर कैथोलिक चर्च में आयोजित यह समारोह इसी भावना का परिचायक रहा। धार्मिक अनुष्ठान के साथ बच्चों को प्रथम परमप्रसाद और दृढ़करण संस्कार प्रदान किए जाने से कार्यक्रम का महत्व और बढ़ गया।

माता मरियम के जन्मोत्सव ने श्रद्धालुओं को यह संदेश दिया कि सच्चा विश्वास केवल प्रार्थना तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि वह प्रेम, सेवा, करुणा और मानवता के रूप में हमारे व्यवहार में भी दिखाई देना चाहिए। पुराना भोजपुर में आयोजित इस धार्मिक समारोह ने श्रद्धालुओं को अपने विश्वास को मजबूत करने और समाज में शांति तथा भाईचारे के लिए योगदान देने की प्रेरणा दी।


आलोक कुमार

India : साइबर ठगी से ग्रामीण परिवारों को कैसे बचाया जाए?

 


साइबर ठगी से ग्रामीण परिवारों को कैसे बचाया जाए?

 मोबाइल और इंटरनेट ने गांव की जिंदगी आसान जरूर की है, लेकिन डिजिटल जानकारी की कमी ग्रामीण परिवारों को साइबर ठगों के लिए आसान निशाना भी बना रही है। इसलिए अब डिजिटल सुविधा के साथ साइबर सुरक्षा की समझ भी जरूरी है।

आज के डिजिटल युग में मोबाइल फोन और इंटरनेट ने ग्रामीण जीवन को काफी आसान बना दिया है। बैंकिंग, ऑनलाइन भुगतान, सरकारी योजनाओं की जानकारी, खरीदारी, शिक्षा और संचार जैसी अनेक सुविधाएं अब गांवों तक पहुंच चुकी हैं। किसान मोबाइल से मौसम की जानकारी ले रहा है, मजदूर अपने खाते में आई राशि की जानकारी देख रहा है और विद्यार्थी ऑनलाइन पढ़ाई कर रहे हैं।

लेकिन डिजिटल सुविधाओं के बढ़ते इस्तेमाल के साथ साइबर ठगी का खतरा भी बढ़ रहा है। ग्रामीण परिवारों में डिजिटल जानकारी और साइबर सुरक्षा के प्रति जागरूकता अभी भी हर जगह पर्याप्त नहीं है। इसी वजह से कई लोग ठगों के झांसे में आ जाते हैं।

साइबर ठगी से बचाव के लिए केवल मोबाइल चलाना सीखना पर्याप्त नहीं है। डिजिटल सुविधा के साथ डिजिटल सावधानी भी जरूरी है।

डर और लालच के जरिए ठगी

साइबर ठगी का सबसे सामान्य तरीका लोगों को फोन करके डराना या लालच देना है। ठग खुद को बैंक अधिकारी, पुलिसकर्मी, सरकारी कर्मचारी, बिजली विभाग का कर्मचारी या किसी कंपनी का प्रतिनिधि बताकर फोन करते हैं।

वे कहते हैं कि बैंक खाता बंद होने वाला है, केवाईसी अपडेट करना जरूरी है, बिजली का कनेक्शन काट दिया जाएगा या किसी सरकारी योजना का लाभ लेने के लिए तुरंत जानकारी देनी होगी।

घबराया हुआ व्यक्ति कई बार अपना ओटीपी, एटीएम पिन, यूपीआई पिन या बैंक से जुड़ी जानकारी बता देता है। इसके बाद उसके खाते से पैसा निकाला जा सकता है।

ग्रामीण परिवारों को सबसे पहले यह समझना चाहिए कि OTP, ATM PIN, UPI PIN, CVV और इंटरनेट बैंकिंग का पासवर्ड किसी अनजान व्यक्ति को कभी नहीं बताना चाहिए। किसी फोन कॉल पर ऐसी जानकारी मांगी जाए तो बातचीत आगे बढ़ाने के बजाय फोन काट देना ही सुरक्षित है।

अनजान लिंक से रहें सावधान

साइबर ठग मोबाइल पर संदेश भेजकर लोगों को किसी लिंक पर क्लिक करने के लिए कहते हैं। कई बार संदेश में बैंक खाता, बिजली बिल, केवाईसी, नौकरी, छात्रवृत्ति या सरकारी योजना का नाम लिखा होता है।

लिंक खोलने पर नकली वेबसाइट सामने आ सकती है, जहां बैंक या व्यक्तिगत जानकारी भरने के लिए कहा जाता है। इसलिए किसी अनजान लिंक पर जल्दबाजी में क्लिक नहीं करना चाहिए।

यदि किसी सरकारी योजना या बैंक से संबंधित जानकारी का संदेश मिले तो उसकी पुष्टि संबंधित विभाग, बैंक शाखा या आधिकारिक माध्यम से करनी चाहिए।

UPI इस्तेमाल करते समय सबसे बड़ी सावधानी

गांवों में यूपीआई और डिजिटल भुगतान तेजी से बढ़ा है। दुकानदार से लेकर छोटे व्यापारी तक क्यूआर कोड का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे भुगतान आसान हुआ है, लेकिन ठगी के नए तरीके भी सामने आए हैं।

एक महत्वपूर्ण बात याद रखना जरूरी है—पैसे प्राप्त करने के लिए सामान्यतः UPI PIN डालने की जरूरत नहीं होती। यदि कोई व्यक्ति कहता है कि वह आपको पैसा भेज रहा है और इसके लिए यूपीआई पिन डालने या कोई भुगतान प्रक्रिया पूरी करने को कहता है, तो सावधान हो जाएं।

किसी भुगतान से पहले स्क्रीन पर दिखाई दे रही राशि और प्राप्तकर्ता का नाम जरूर जांचना चाहिए।

फर्जी नौकरी और सरकारी योजना का जाल

साइबर ठग फर्जी सरकारी योजना, नौकरी, छात्रवृत्ति, लॉटरी या पुरस्कार के नाम पर भी लोगों को निशाना बनाते हैं।

वे कहते हैं कि सरकार की किसी योजना में आपका चयन हुआ है, लेकिन पैसा पाने के लिए पहले पंजीकरण शुल्क या प्रोसेसिंग फीस जमा करनी होगी। इसी तरह नौकरी के नाम पर आवेदन शुल्क या दस्तावेज सत्यापन के नाम पर पैसे मांगे जा सकते हैं।

ग्रामीण परिवारों को ऐसी जानकारी की पुष्टि पंचायत, संबंधित सरकारी कार्यालय, बैंक या आधिकारिक वेबसाइट से करनी चाहिए। केवल व्हाट्सऐप संदेश या फोन कॉल के आधार पर पैसा भेजना उचित नहीं है।

रिश्तेदार बनकर भी हो सकती है ठगी

सोशल मीडिया और व्हाट्सऐप पर भी सावधानी जरूरी है। ठग किसी रिश्तेदार या परिचित की फोटो लगाकर नया नंबर इस्तेमाल कर सकते हैं और अचानक पैसे की मांग कर सकते हैं।

ऐसी स्थिति में तुरंत पैसा भेजने के बजाय पुराने नंबर पर फोन करके पुष्टि करनी चाहिए। केवल फोटो, प्रोफाइल या आवाज के आधार पर विश्वास करना सुरक्षित नहीं है।

तकनीक के विकास के साथ आवाज की नकल और नकली वीडियो जैसी तकनीकों का इस्तेमाल भी बढ़ सकता है। इसलिए हर असामान्य आर्थिक मांग की पुष्टि जरूरी है।

बुजुर्गों और महिलाओं को भी डिजिटल प्रशिक्षण

परिवार में बुजुर्गों और कम डिजिटल जानकारी रखने वाले सदस्यों को विशेष रूप से साइबर सुरक्षा के बारे में समझाना चाहिए। महिलाओं को भी मोबाइल बैंकिंग, डिजिटल भुगतान और सरकारी ऑनलाइन सेवाओं के सुरक्षित इस्तेमाल की जानकारी मिलनी चाहिए।

परिवार के युवा सदस्य इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्हें अपने माता-पिता और बुजुर्गों को यह बताना चाहिए कि कौन-सी जानकारी कभी साझा नहीं करनी है और संदिग्ध संदेश आने पर क्या करना है।

पंचायत से शुरू हो सकता है साइबर जागरूकता अभियान

साइबर सुरक्षा केवल व्यक्ति की जिम्मेदारी नहीं है। पंचायत, स्वयं सहायता समूह, स्कूल, बैंक मित्र, डाकघर और स्थानीय प्रशासन मिलकर गांव में साइबर जागरूकता अभियान चला सकते हैं।

पंचायत भवन में समय-समय पर छोटी बैठकें आयोजित की जा सकती हैं। पोस्टर और पर्चों पर सरल संदेश दिए जा सकते हैं—“OTP किसी को न दें”, “अनजान लिंक पर क्लिक न करें”, “UPI PIN गुप्त रखें” और “संदिग्ध कॉल पर तुरंत विश्वास न करें।”

स्थानीय भाषा में ऑडियो संदेश, छोटे नाटक और वास्तविक उदाहरणों के माध्यम से जागरूकता फैलाना भी अधिक प्रभावी हो सकता है।

ठगी होने पर चुप न रहें

अगर किसी व्यक्ति के साथ साइबर ठगी हो जाती है तो उसे शर्म या डर के कारण चुप नहीं रहना चाहिए। जितनी जल्दी शिकायत की जाए, उतना बेहतर है।

वित्तीय साइबर धोखाधड़ी की स्थिति में भारत में 1930 हेल्पलाइन पर तुरंत संपर्क किया जा सकता है और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग व्यवस्था के माध्यम से शिकायत दर्ज की जा सकती है। संबंधित बैंक को भी तुरंत सूचना देनी चाहिए।

ठगी से जुड़े फोन नंबर, संदेश, स्क्रीनशॉट, बैंक लेन-देन और अन्य उपलब्ध प्रमाण सुरक्षित रखना चाहिए। देर करने से नुकसान बढ़ सकता है।

जागरूकता ही सबसे मजबूत सुरक्षा

अंततः साइबर ठगी से बचाव का सबसे प्रभावी हथियार केवल तकनीक नहीं, बल्कि सतर्कता और जानकारी है। ठग अक्सर लोगों की भावनाओं—डर, लालच, जल्दबाजी और भरोसे—का फायदा उठाते हैं।

इसलिए किसी भी फोन कॉल, संदेश या ऑनलाइन प्रस्ताव पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के बजाय पहले उसकी सत्यता जांचनी चाहिए।

ग्रामीण परिवारों के लिए एक सरल नियम हमेशा याद रखने योग्य है—“रुको, सोचो, जांचो और फिर कार्रवाई करो।”

डिजिटल भारत का लाभ गांव के हर परिवार तक पहुंचना जरूरी है, लेकिन उसके साथ डिजिटल सुरक्षा की समझ भी पहुंचनी चाहिए। यदि परिवार, पंचायत, बैंक, विद्यालय और प्रशासन मिलकर लगातार साइबर जागरूकता फैलाएं, तो ग्रामीण समाज डिजिटल सुविधाओं का लाभ ज्यादा सुरक्षित तरीके से उठा सकता है।

मोबाइल हाथ में होना डिजिटल सशक्तिकरण की शुरुआत है, लेकिन साइबर ठगी से बचने की समझ ही उसकी असली सुरक्षा है।


आलोक कुमार

India : भारत में डिजिटल क्रांति की चर्चा अब केवल महानगरों तक


डिजिटल इंडिया गांव तक पहुंचा, लेकिन डिजिटल साक्षरता कितनी बढ़ी?

 गांव में स्मार्टफोन और इंटरनेट पहुंच गए हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या ग्रामीण नागरिक डिजिटल सुविधाओं का सुरक्षित, समझदारी और आत्मनिर्भरता के साथ इस्तेमाल करना भी सीख पाया है?

भारत में डिजिटल क्रांति की चर्चा अब केवल महानगरों, आईटी कंपनियों और स्मार्टफोन तक सीमित नहीं रह गई है। डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन बैंकिंग, आधार, यूपीआई, सरकारी पोर्टल, टेलीमेडिसिन, ऑनलाइन शिक्षा और सोशल मीडिया ने गांवों की रोजमर्रा की जिंदगी को भी बदलना शुरू कर दिया है। आज गांव का किसान मोबाइल से मौसम की जानकारी देख सकता है, मजदूर अपने खाते में आई राशि की जानकारी ले सकता है, विद्यार्थी ऑनलाइन पढ़ाई कर सकता है और ग्रामीण परिवार घर बैठे कई सरकारी सेवाओं के लिए आवेदन कर सकता है।

लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। डिजिटल सुविधा का गांव तक पहुंच जाना और डिजिटल साक्षरता का गांव में मजबूत होना—दो अलग-अलग बातें हैं।

सवाल यही है कि क्या गांव का व्यक्ति केवल मोबाइल चला रहा है, या वह डिजिटल दुनिया को समझकर, सुरक्षित तरीके से और अपने अधिकारों के लिए उसका इस्तेमाल भी कर पा रहा है?

डिजिटल इंडिया का असली उद्देश्य केवल इंटरनेट कनेक्शन और स्मार्टफोन की संख्या बढ़ाना नहीं हो सकता। तकनीक तभी सार्थक है, जब वह आम नागरिक की जिंदगी को आसान, पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के साथ उसे आत्मनिर्भर भी बनाए।

अगर किसी ग्रामीण के हाथ में स्मार्टफोन है, लेकिन वह फर्जी लिंक और असली सरकारी वेबसाइट में अंतर नहीं कर सकता, किसी अनजान व्यक्ति को ओटीपी बता देता है या ऑनलाइन ठगी का शिकार हो जाता है, तो केवल मोबाइल और इंटरनेट की उपलब्धता को पूर्ण डिजिटल सशक्तिकरण नहीं कहा जा सकता।

गांवों में डिजिटल बदलाव का सबसे बड़ा चेहरा यूपीआई और डिजिटल भुगतान है। छोटी दुकानों से लेकर सब्जी विक्रेताओं तक क्यूआर कोड दिखाई देने लगे हैं। कई मामलों में बैंक जाने की जरूरत भी कम हुई है। लेकिन डिजिटल भुगतान की सुविधा के साथ साइबर अपराध का खतरा भी बढ़ा है।

फर्जी कॉल, केवाईसी अपडेट के नाम पर ठगी, नकली कस्टमर केयर नंबर, फर्जी सरकारी योजनाओं के संदेश, स्क्रीन शेयरिंग और संदिग्ध लिंक के जरिए ग्रामीण नागरिकों को निशाना बनाया जाता है। कई बार ठगी का शिकार होने के बाद व्यक्ति को यह भी पता नहीं होता कि शिकायत कहां और कैसे करनी है।

यहीं डिजिटल साक्षरता की असली परीक्षा शुरू होती है।

मोबाइल चलाना डिजिटल साक्षरता नहीं है। डिजिटल साक्षरता का मतलब है ऑनलाइन जानकारी को समझना, सही और गलत सूचना में अंतर करना, पासवर्ड और ओटीपी की सुरक्षा करना, डिजिटल भुगतान का सुरक्षित इस्तेमाल करना, सरकारी सेवाओं की आधिकारिक वेबसाइट पहचानना और साइबर धोखाधड़ी की स्थिति में सही जगह शिकायत करना।

गांवों में एक दूसरी बड़ी चुनौती भाषा की है। इंटरनेट की दुनिया में अंग्रेजी का प्रभाव अभी भी काफी है। भारतीय भाषाओं में डिजिटल सामग्री जरूर बढ़ रही है, लेकिन ग्रामीण नागरिकों के लिए जानकारी उनकी अपनी भाषा और समझ के अनुसार उपलब्ध होना भी जरूरी है।

केवल वेबसाइट बना देना पर्याप्त नहीं है। यदि किसी किसान या ग्रामीण महिला को ऑनलाइन आवेदन करने के लिए हर बार किसी दूसरे व्यक्ति पर निर्भर रहना पड़े, तो डिजिटल सुविधा की आत्मनिर्भरता अधूरी रह जाती है।

डिजिटल विभाजन केवल गांव और शहर के बीच नहीं है। एक ही गांव में भी डिजिटल असमानता मौजूद है। युवा वर्ग अपेक्षाकृत तेजी से नई तकनीक सीख रहा है, जबकि बुजुर्ग, कम पढ़े-लिखे लोग, महिलाएं और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार कई बार डिजिटल सेवाओं से पीछे रह जाते हैं।

कई ग्रामीण परिवारों में स्मार्टफोन एक ही होता है और उसका इस्तेमाल भी परिवार के किसी एक सदस्य तक सीमित रहता है। ऐसी स्थिति में परिवार के दूसरे सदस्यों के लिए डिजिटल सेवाओं तक स्वतंत्र पहुंच मुश्किल हो सकती है।

महिलाओं की डिजिटल भागीदारी इस अभियान का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि महिला के पास अपना मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल ज्ञान नहीं है, तो डिजिटल भारत का लाभ उसके घर के दूसरे सदस्यों तक तो पहुंच सकता है, लेकिन उसके व्यक्तिगत सशक्तिकरण तक नहीं।

स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं, ग्रामीण उद्यमियों और अन्य सामुदायिक कार्यकर्ताओं को डिजिटल प्रशिक्षण दिया जाए तो इसका असर केवल एक व्यक्ति तक नहीं रहेगा। प्रशिक्षित महिला अपने परिवार और समूह की दूसरी महिलाओं को भी डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल सिखा सकती है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी डिजिटल तकनीक ने नई संभावनाएं पैदा की हैं। गांव का विद्यार्थी वीडियो लेक्चर, डिजिटल पुस्तकालय और ऑनलाइन पाठ्यक्रम तक पहुंच सकता है। लेकिन इसके लिए अच्छी इंटरनेट कनेक्टिविटी, पर्याप्त डेटा, उपयुक्त उपकरण और डिजिटल समझ—चारों की जरूरत है।

सिर्फ ऑनलाइन सामग्री उपलब्ध करा देना इस बात की गारंटी नहीं है कि हर ग्रामीण बच्चा उसका लाभ उठा पाएगा।

स्वास्थ्य सेवाओं में भी डिजिटल तकनीक ग्रामीण भारत के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। टेलीमेडिसिन, ऑनलाइन रिपोर्ट और दूरस्थ चिकित्सकीय परामर्श जैसी सुविधाएं गांव और विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाओं के बीच की दूरी कम कर सकती हैं। लेकिन यहां भी नागरिक को यह समझना जरूरी है कि कौन-सा डिजिटल प्लेटफॉर्म विश्वसनीय है और अपनी निजी जानकारी कहां साझा करनी चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न डिजिटल भरोसे का है। ग्रामीण नागरिक को विश्वास होना चाहिए कि ऑनलाइन किया गया आवेदन संबंधित विभाग तक पहुंचेगा, डिजिटल भुगतान सुरक्षित है और शिकायत करने पर उचित कार्रवाई होगी। डिजिटल व्यवस्था जितनी सरल और पारदर्शी होगी, लोगों का भरोसा उतना ही मजबूत होगा।

अब जरूरत डिजिटल ढांचे के साथ-साथ डिजिटल समझ को भी मजबूत करने की है। पंचायत स्तर पर नियमित डिजिटल प्रशिक्षण, स्कूलों में साइबर सुरक्षा की जानकारी, स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं का प्रशिक्षण और किसानों के लिए स्थानीय भाषा में डिजिटल जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं।

हर पंचायत में केवल इंटरनेट की सुविधा नहीं, बल्कि ‘डिजिटल मदद केंद्र’ की व्यवस्था होनी चाहिए। यहां ग्रामीणों को सरकारी पोर्टल, ऑनलाइन आवेदन, डिजिटल भुगतान, साइबर सुरक्षा और शिकायत प्रक्रिया की सही जानकारी मिल सके। ग्रामीण युवाओं को डिजिटल स्वयंसेवक के रूप में प्रशिक्षित किया जाए तो वे अपने गांव में इस बदलाव के महत्वपूर्ण साथी बन सकते हैं।

क्योंकि डिजिटल इंडिया की सफलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि कितने लोगों के पास स्मार्टफोन है या कितने डिजिटल लेन-देन हुए। असली सवाल यह है कि कितने लोग बिना किसी बिचौलिए के डिजिटल व्यवस्था का सुरक्षित और आत्मविश्वास के साथ इस्तेमाल कर पा रहे हैं।

भारत के गांवों में डिजिटल क्रांति दस्तक दे चुकी है। अब जरूरत है कि यह क्रांति केवल मोबाइल स्क्रीन तक सीमित न रहे, बल्कि ज्ञान, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सरकारी अधिकार और सामाजिक सशक्तिकरण तक पहुंचे।

डिजिटल इंडिया तब सचमुच गांव का भारत बनेगा, जब गांव का नागरिक तकनीक का उपभोक्ता भर नहीं, बल्कि उसका समझदार, जागरूक और सुरक्षित उपयोगकर्ता बनेगा। तभी डिजिटल पहुंच को डिजिटल साक्षरता और डिजिटल साक्षरता को वास्तविक नागरिक सशक्तिकरण में बदला जा सकेगा।


आलोक कुमार

Bihar : पुराना भोजपुर कैथोलिक चर्च में माता मरियम का जन्मोत्सव श्रद्धा के साथ मनाया गया

  पुराना भोजपुर कैथोलिक चर्च में माता मरियम का जन्मोत्सव श्रद्धा के साथ मनाया गया  प्रार्थना, पवित्र मिस्सा और बच्चों के प्रथम परमप्रसाद व द...