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India : भारत में डिजिटल क्रांति की चर्चा अब केवल महानगरों तक


डिजिटल इंडिया गांव तक पहुंचा, लेकिन डिजिटल साक्षरता कितनी बढ़ी?

 गांव में स्मार्टफोन और इंटरनेट पहुंच गए हैं, लेकिन असली सवाल यह है कि क्या ग्रामीण नागरिक डिजिटल सुविधाओं का सुरक्षित, समझदारी और आत्मनिर्भरता के साथ इस्तेमाल करना भी सीख पाया है?

भारत में डिजिटल क्रांति की चर्चा अब केवल महानगरों, आईटी कंपनियों और स्मार्टफोन तक सीमित नहीं रह गई है। डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन बैंकिंग, आधार, यूपीआई, सरकारी पोर्टल, टेलीमेडिसिन, ऑनलाइन शिक्षा और सोशल मीडिया ने गांवों की रोजमर्रा की जिंदगी को भी बदलना शुरू कर दिया है। आज गांव का किसान मोबाइल से मौसम की जानकारी देख सकता है, मजदूर अपने खाते में आई राशि की जानकारी ले सकता है, विद्यार्थी ऑनलाइन पढ़ाई कर सकता है और ग्रामीण परिवार घर बैठे कई सरकारी सेवाओं के लिए आवेदन कर सकता है।

लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। डिजिटल सुविधा का गांव तक पहुंच जाना और डिजिटल साक्षरता का गांव में मजबूत होना—दो अलग-अलग बातें हैं।

सवाल यही है कि क्या गांव का व्यक्ति केवल मोबाइल चला रहा है, या वह डिजिटल दुनिया को समझकर, सुरक्षित तरीके से और अपने अधिकारों के लिए उसका इस्तेमाल भी कर पा रहा है?

डिजिटल इंडिया का असली उद्देश्य केवल इंटरनेट कनेक्शन और स्मार्टफोन की संख्या बढ़ाना नहीं हो सकता। तकनीक तभी सार्थक है, जब वह आम नागरिक की जिंदगी को आसान, पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के साथ उसे आत्मनिर्भर भी बनाए।

अगर किसी ग्रामीण के हाथ में स्मार्टफोन है, लेकिन वह फर्जी लिंक और असली सरकारी वेबसाइट में अंतर नहीं कर सकता, किसी अनजान व्यक्ति को ओटीपी बता देता है या ऑनलाइन ठगी का शिकार हो जाता है, तो केवल मोबाइल और इंटरनेट की उपलब्धता को पूर्ण डिजिटल सशक्तिकरण नहीं कहा जा सकता।

गांवों में डिजिटल बदलाव का सबसे बड़ा चेहरा यूपीआई और डिजिटल भुगतान है। छोटी दुकानों से लेकर सब्जी विक्रेताओं तक क्यूआर कोड दिखाई देने लगे हैं। कई मामलों में बैंक जाने की जरूरत भी कम हुई है। लेकिन डिजिटल भुगतान की सुविधा के साथ साइबर अपराध का खतरा भी बढ़ा है।

फर्जी कॉल, केवाईसी अपडेट के नाम पर ठगी, नकली कस्टमर केयर नंबर, फर्जी सरकारी योजनाओं के संदेश, स्क्रीन शेयरिंग और संदिग्ध लिंक के जरिए ग्रामीण नागरिकों को निशाना बनाया जाता है। कई बार ठगी का शिकार होने के बाद व्यक्ति को यह भी पता नहीं होता कि शिकायत कहां और कैसे करनी है।

यहीं डिजिटल साक्षरता की असली परीक्षा शुरू होती है।

मोबाइल चलाना डिजिटल साक्षरता नहीं है। डिजिटल साक्षरता का मतलब है ऑनलाइन जानकारी को समझना, सही और गलत सूचना में अंतर करना, पासवर्ड और ओटीपी की सुरक्षा करना, डिजिटल भुगतान का सुरक्षित इस्तेमाल करना, सरकारी सेवाओं की आधिकारिक वेबसाइट पहचानना और साइबर धोखाधड़ी की स्थिति में सही जगह शिकायत करना।

गांवों में एक दूसरी बड़ी चुनौती भाषा की है। इंटरनेट की दुनिया में अंग्रेजी का प्रभाव अभी भी काफी है। भारतीय भाषाओं में डिजिटल सामग्री जरूर बढ़ रही है, लेकिन ग्रामीण नागरिकों के लिए जानकारी उनकी अपनी भाषा और समझ के अनुसार उपलब्ध होना भी जरूरी है।

केवल वेबसाइट बना देना पर्याप्त नहीं है। यदि किसी किसान या ग्रामीण महिला को ऑनलाइन आवेदन करने के लिए हर बार किसी दूसरे व्यक्ति पर निर्भर रहना पड़े, तो डिजिटल सुविधा की आत्मनिर्भरता अधूरी रह जाती है।

डिजिटल विभाजन केवल गांव और शहर के बीच नहीं है। एक ही गांव में भी डिजिटल असमानता मौजूद है। युवा वर्ग अपेक्षाकृत तेजी से नई तकनीक सीख रहा है, जबकि बुजुर्ग, कम पढ़े-लिखे लोग, महिलाएं और आर्थिक रूप से कमजोर परिवार कई बार डिजिटल सेवाओं से पीछे रह जाते हैं।

कई ग्रामीण परिवारों में स्मार्टफोन एक ही होता है और उसका इस्तेमाल भी परिवार के किसी एक सदस्य तक सीमित रहता है। ऐसी स्थिति में परिवार के दूसरे सदस्यों के लिए डिजिटल सेवाओं तक स्वतंत्र पहुंच मुश्किल हो सकती है।

महिलाओं की डिजिटल भागीदारी इस अभियान का बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि महिला के पास अपना मोबाइल, इंटरनेट और डिजिटल ज्ञान नहीं है, तो डिजिटल भारत का लाभ उसके घर के दूसरे सदस्यों तक तो पहुंच सकता है, लेकिन उसके व्यक्तिगत सशक्तिकरण तक नहीं।

स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी महिलाओं, ग्रामीण उद्यमियों और अन्य सामुदायिक कार्यकर्ताओं को डिजिटल प्रशिक्षण दिया जाए तो इसका असर केवल एक व्यक्ति तक नहीं रहेगा। प्रशिक्षित महिला अपने परिवार और समूह की दूसरी महिलाओं को भी डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल सिखा सकती है।

शिक्षा के क्षेत्र में भी डिजिटल तकनीक ने नई संभावनाएं पैदा की हैं। गांव का विद्यार्थी वीडियो लेक्चर, डिजिटल पुस्तकालय और ऑनलाइन पाठ्यक्रम तक पहुंच सकता है। लेकिन इसके लिए अच्छी इंटरनेट कनेक्टिविटी, पर्याप्त डेटा, उपयुक्त उपकरण और डिजिटल समझ—चारों की जरूरत है।

सिर्फ ऑनलाइन सामग्री उपलब्ध करा देना इस बात की गारंटी नहीं है कि हर ग्रामीण बच्चा उसका लाभ उठा पाएगा।

स्वास्थ्य सेवाओं में भी डिजिटल तकनीक ग्रामीण भारत के लिए उपयोगी साबित हो सकती है। टेलीमेडिसिन, ऑनलाइन रिपोर्ट और दूरस्थ चिकित्सकीय परामर्श जैसी सुविधाएं गांव और विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाओं के बीच की दूरी कम कर सकती हैं। लेकिन यहां भी नागरिक को यह समझना जरूरी है कि कौन-सा डिजिटल प्लेटफॉर्म विश्वसनीय है और अपनी निजी जानकारी कहां साझा करनी चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न डिजिटल भरोसे का है। ग्रामीण नागरिक को विश्वास होना चाहिए कि ऑनलाइन किया गया आवेदन संबंधित विभाग तक पहुंचेगा, डिजिटल भुगतान सुरक्षित है और शिकायत करने पर उचित कार्रवाई होगी। डिजिटल व्यवस्था जितनी सरल और पारदर्शी होगी, लोगों का भरोसा उतना ही मजबूत होगा।

अब जरूरत डिजिटल ढांचे के साथ-साथ डिजिटल समझ को भी मजबूत करने की है। पंचायत स्तर पर नियमित डिजिटल प्रशिक्षण, स्कूलों में साइबर सुरक्षा की जानकारी, स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं का प्रशिक्षण और किसानों के लिए स्थानीय भाषा में डिजिटल जागरूकता कार्यक्रम चलाए जा सकते हैं।

हर पंचायत में केवल इंटरनेट की सुविधा नहीं, बल्कि ‘डिजिटल मदद केंद्र’ की व्यवस्था होनी चाहिए। यहां ग्रामीणों को सरकारी पोर्टल, ऑनलाइन आवेदन, डिजिटल भुगतान, साइबर सुरक्षा और शिकायत प्रक्रिया की सही जानकारी मिल सके। ग्रामीण युवाओं को डिजिटल स्वयंसेवक के रूप में प्रशिक्षित किया जाए तो वे अपने गांव में इस बदलाव के महत्वपूर्ण साथी बन सकते हैं।

क्योंकि डिजिटल इंडिया की सफलता का पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि कितने लोगों के पास स्मार्टफोन है या कितने डिजिटल लेन-देन हुए। असली सवाल यह है कि कितने लोग बिना किसी बिचौलिए के डिजिटल व्यवस्था का सुरक्षित और आत्मविश्वास के साथ इस्तेमाल कर पा रहे हैं।

भारत के गांवों में डिजिटल क्रांति दस्तक दे चुकी है। अब जरूरत है कि यह क्रांति केवल मोबाइल स्क्रीन तक सीमित न रहे, बल्कि ज्ञान, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, सरकारी अधिकार और सामाजिक सशक्तिकरण तक पहुंचे।

डिजिटल इंडिया तब सचमुच गांव का भारत बनेगा, जब गांव का नागरिक तकनीक का उपभोक्ता भर नहीं, बल्कि उसका समझदार, जागरूक और सुरक्षित उपयोगकर्ता बनेगा। तभी डिजिटल पहुंच को डिजिटल साक्षरता और डिजिटल साक्षरता को वास्तविक नागरिक सशक्तिकरण में बदला जा सकेगा।


आलोक कुमार

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