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परिवारवाद सिर्फ किसी एक दल की समस्या नहीं है, यह भारतीय राजनीति की संरचनात्मक बीमारी है

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पटना, (आलोक कुमार).बिहार की राजनीति में “परिवारवाद” पर उठती बहस कोई नई नहीं है, लेकिन ताज़ा घटनाक्रम ने इस पुराने विवाद को एक बार फिर से केंद्र में ला दिया है.विशेष रूप से इसलिए कि जिस एनडीए ने वर्षों तक कांग्रेस और राजद पर परिवारवाद का आरोप लगाकर राजनीतिक बढ़त लेने की कोशिश की, आज उसी गठबंधन के भीतर सत्ता और संगठन—दोनों जगह—विरासत की राजनीति का प्रभाव तेजी से उभर कर सामने आ रहा है.      टीवी बहसों में एनडीए के प्रवक्ता लंबे समय तक कांग्रेस–राजद पर परिवारवादी राजनीति को लेकर तंज कसते रहे। न्यूज़ स्टूडियो में बैठे एंकर भी विज्ञापन-चालित TRP की दौड़ में इसी एजेंडे को हवा देते रहे. लेकिन आज जब परिदृश्य पलटा है, तो वही प्रश्न अब एनडीए के दरवाज़े पर दस्तक दे रहा है—और उतनी ही तीव्रता से, जितनी तीव्रता से कभी विपक्ष पर उठाया गया था.       मीडिया बहस का केंद्र बिंदु अब एनडीए के भीतर मौजूद उन्हीं नेताओं के आसपास घूम रहा है जिनकी राजनीतिक पहचान पारिवारिक विरासत से ही उपजी है: एनडीए के ‘परिवारवाद’ का जीवंत दस्तावेज़ संतोष सुमन मांझी – पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मं...