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रविवार, 23 अगस्त 2026

MP: तड़का लगाते-लगाते नर्सिंग की पढ़ाई भी खत्म हो जाए, आरती का रिजल्ट कब आएगा?

तड़का लगाते-लगाते नर्सिंग की पढ़ाई भी खत्म हो जाए, आरती का रिजल्ट कब आएगा?


“दाल में तड़का न लगे तो स्वाद अधूरा लगता है, लेकिन नर्सिंग की पढ़ाई में अगर सालों तक रिजल्ट का तड़का ही न लगे तो भविष्य अधूरा रह जाता है।” मध्यप्रदेश के छोटे से जिले निवाड़ी की नर्सिंग छात्रा आरती कुशवाहा की कहानी आज इसी सवाल के सामने खड़ी है। फर्क इतना है कि रसोई में तड़का कुछ सेकंड में लग जाता है, लेकिन आरती की नर्सिंग पढ़ाई में छह साल से इंतजार का तड़का पड़ रहा है—और वह भी ऐसा, जिसमें स्वाद की जगह सिर्फ बेचैनी, निराशा और सवाल हैं।

आरती ने वर्ष 2020 में बीएससी नर्सिंग में दाखिला लिया था। तब शायद उसके मन में यही सपना रहा होगा कि कुछ वर्षों की मेहनत के बाद डिग्री हाथ में होगी, नौकरी का रास्ता खुलेगा और वह अपने पैरों पर खड़ी होगी। लेकिन वर्ष 2020 से 2026 आ गया। छह साल गुजर गए। पढ़ाई तीसरे वर्ष तक पहुंची और तीसरे वर्ष की परीक्षा का परिणाम भी अब तक सामने नहीं आया।

आरती के मुताबिक, तीसरे वर्ष की परीक्षा इसी वर्ष जनवरी में हुई थी। जनवरी से अगस्त आ गया, लेकिन रिजल्ट का कहीं अता-पता नहीं है। यानी जिस परीक्षा का परिणाम कुछ समय बाद छात्र-छात्राओं के भविष्य का रास्ता खोलना चाहिए था, वही परिणाम अब उनके भविष्य पर ताला लगाए बैठा है।

और आरती की पीड़ा सिर्फ परीक्षा परिणाम तक सीमित नहीं है। इस बीच उसकी शादी हो गई। शादी के बाद बच्चा भी हो गया। जिम्मेदारियां बढ़ गईं, लेकिन बीएससी नर्सिंग की पढ़ाई वहीं की वहीं खड़ी है। इसलिए आरती का यह सवाल व्यवस्था के सामने आईना बनकर खड़ा होता है—“नर्सिंग करते-करते शादी हो गई, बच्चा भी हो गया। अब क्या बूढ़े हो जाएंगे, तब आएगा रिजल्ट?”

यह सिर्फ एक छात्रा की नाराजगी नहीं है। यह उस शिक्षा व्यवस्था पर सवाल है, जिसमें विद्यार्थी परीक्षा देता है, फीस देता है, वर्षों तक पढ़ाई करता है, लेकिन परिणाम के लिए उसे महीनों तक इंतजार करना पड़ता है। छात्र के लिए परीक्षा का परिणाम सिर्फ एक कागज नहीं होता। वह अगली कक्षा में प्रवेश, डिग्री, नौकरी और प्रतियोगी परीक्षाओं में आगे बढ़ने की चाबी होता है।

आरती ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से वीडियो के माध्यम से गुहार लगाई है कि उनका रिजल्ट जल्द अपलोड कराया जाए। उन्होंने केंद्र और मध्यप्रदेश सरकार से भी हस्तक्षेप की अपील की है। आरती दतिया के एसआरआई नर्सिंग कॉलेज से बीएससी नर्सिंग कर रही हैं, जो उनके अनुसार जबलपुर विश्वविद्यालय से संबद्ध है।

आरती की बातों में गुस्सा भी है और बेबसी भी। वह पूछती हैं कि आखिर वह पूरी जिंदगी बीएससी नर्सिंग करते हुए ही निकाल दें क्या? छह-सात साल में अगर पढ़ाई तीसरे वर्ष तक पहुंची है और उसका भी रिजल्ट नहीं आया, तो चौथा वर्ष पूरा होने में कितना समय लगेगा—इसका जवाब कौन देगा?

यह सवाल सिर्फ आरती का नहीं होना चाहिए। अगर किसी विश्वविद्यालय या संबंधित व्यवस्था में परीक्षा परिणाम जारी करने में असामान्य देरी हो रही है तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। छात्र को यह बताना जरूरी है कि रिजल्ट कब आएगा, अगली परीक्षा कब होगी और पूरी डिग्री कब तक पूरी होगी। “जल्द आएगा” जैसी सरकारी भाषा से छात्र का भविष्य नहीं चलता।

आरती ने अपनी स्थिति बताते हुए कहा कि वह अब गृहिणी हैं। घर और बच्चे की जिम्मेदारी संभालने के साथ उन्हें अपनी पढ़ाई के लिए समय निकालना पड़ता है। ऐसे में वर्षों तक परीक्षा और रिजल्ट का इंतजार करना किसी मानसिक परीक्षा से कम नहीं है।

सबसे चुभने वाली बात तब सामने आती है जब आरती नीट छात्रों के आंदोलन का उदाहरण देती हैं। उनका कहना है कि नीट के छात्रों के लिए जंतर-मंतर तक लोग खड़े हो गए, लेकिन वह अकेले वहां जाकर प्रदर्शन कैसे करें? उनकी बात में एक बड़ा सामाजिक सवाल छिपा है—क्या छोटे पाठ्यक्रम, छोटे शहरों और कम सुर्खियों वाले विद्यार्थियों की समस्याएं कम महत्वपूर्ण हैं?

नर्सिंग कोई मामूली शिक्षा नहीं है। अस्पतालों में डॉक्टरों के साथ मरीजों की देखभाल की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी नर्सिंग स्टाफ निभाता है। कोरोना महामारी से लेकर सामान्य स्वास्थ्य सेवाओं तक नर्सिंग कर्मियों की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। जब देश को प्रशिक्षित नर्सिंग कर्मियों की जरूरत है, तब नर्सिंग छात्रों की पढ़ाई और परीक्षा परिणाम में अनावश्यक देरी आखिर किसके हित में है?

आरती की आवाज में इसलिए सिर्फ एक छात्रा की शिकायत नहीं, बल्कि हजारों नर्सिंग विद्यार्थियों की संभावित पीड़ा सुनाई देती है। उन्होंने खुद कहा है कि नर्सिंग में बहुत से छात्र-छात्राएं रिजल्ट के लिए परेशान हैं। डिग्री नहीं होने के कारण वह दूसरी परीक्षाओं में भी शामिल नहीं हो पा रही हैं।

यही सबसे गंभीर समस्या है। एक रिजल्ट की देरी कई दूसरे अवसरों को रोक देती है। सरकारी नौकरी की परीक्षा छूट सकती है, निजी नौकरी का अवसर हाथ से जा सकता है, आगे की पढ़ाई रुक सकती है और उम्र बढ़ने के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की संभावनाएं भी सीमित होती जाती हैं।

अब जरूरत किसी राजनीतिक बयान की नहीं, नतीजे की है। सरकार, विश्वविद्यालय और संबंधित नर्सिंग संस्थान को यह स्पष्ट करना चाहिए कि जनवरी में हुई परीक्षा का परिणाम अगस्त तक क्यों लंबित है। अगर तकनीकी, प्रशासनिक या विश्वविद्यालय स्तर पर कोई समस्या है तो उसे तत्काल दूर किया जाए।

आरती ने प्रधानमंत्री से अपील की है—“मोदीजी कुछ ऐसा करें कि मेरा रिजल्ट जल्दी आ जाए और जल्द एग्जाम हो।” यह अपील भले ही एक छात्रा की हो, लेकिन इसका जवाब व्यवस्था को देना चाहिए।

आखिर तड़का सिर्फ दाल में ही क्यों लगे? कभी-कभी व्यवस्था में भी जवाबदेही का तड़का जरूरी होता है। आरती को आश्वासन नहीं, परिणाम चाहिए। उन्हें भाषण नहीं, डिग्री की ओर बढ़ने का रास्ता चाहिए। और नर्सिंग के उन तमाम विद्यार्थियों को भी यही भरोसा चाहिए कि उनकी मेहनत सरकारी फाइलों में कहीं अटककर उम्र भर का इंतजार नहीं बन जाएगी।

आरती का सवाल सीधा है—“रिजल्ट कब आएगा?” अब जिम्मेदारों का जवाब भी उतना ही सीधा होना चाहिए।


आलोक कुमार