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बुधवार, 2 सितंबर 2026

Bihar : बिहार में छात्र क्रेडिट कार्ड योजना

 

छात्र क्रेडिट कार्ड: योजना और जमीन की हकीकत, गरीब विद्यार्थियों के सामने अब भी कौन-सी बाधाएं?

बिहार में छात्र क्रेडिट कार्ड योजना गरीब और निम्न-मध्यमवर्गीय विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा का रास्ता खोलने की कोशिश है, लेकिन बैंक प्रक्रिया, दस्तावेज, जागरूकता और समय पर ऋण मिलने जैसी चुनौतियां इसकी वास्तविक पहुंच पर सवाल खड़े करती हैं। योजना की सफलता केवल कार्ड जारी करने में नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को समय पर शिक्षा पूरी करने और रोजगार तक पहुंचाने में है।

पटना। बिहार में उच्च शिक्षा का सपना देखने वाले विद्यार्थियों के लिए स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना एक महत्वपूर्ण सरकारी पहल है। इसका मूल उद्देश्य यही है कि आर्थिक तंगी किसी विद्यार्थी की पढ़ाई के रास्ते में दीवार न बने। परिवार की आय कम हो, माता-पिता महंगी फीस देने में सक्षम न हों या छात्र के पास अपनी पढ़ाई जारी रखने के पर्याप्त संसाधन न हों, ऐसी स्थिति में शिक्षा ऋण सहारा बन सकता है।

लेकिन किसी भी सरकारी योजना की असली सफलता उसके प्रचार या आंकड़ों से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि उसका लाभ जरूरतमंद व्यक्ति तक कितनी आसानी से पहुंच रहा है। बिहार में छात्र क्रेडिट कार्ड को लेकर भी यही सवाल महत्वपूर्ण है—क्या योजना की जानकारी, आवेदन, बैंक प्रक्रिया और ऋण वितरण वास्तव में विद्यार्थी के लिए उतने आसान हैं, जितने कागज पर दिखाई देते हैं?

योजना की जरूरत क्यों पड़ी?

बिहार के ग्रामीण और छोटे शहरों से बड़ी संख्या में विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए आगे बढ़ना चाहते हैं। इंजीनियरिंग, मेडिकल, प्रबंधन, कानून, कृषि, तकनीकी शिक्षा और दूसरे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की फीस कई परिवारों के लिए बड़ी चुनौती है।

फीस के अलावा हॉस्टल, किताबें, लैपटॉप, परीक्षा शुल्क, यात्रा और रोजमर्रा के खर्च भी विद्यार्थी के सामने होते हैं। जिन परिवारों की आमदनी सीमित है, उनके लिए बच्चे की उच्च शिक्षा कई बार वर्षों की बचत पर भारी पड़ती है।

यही वह परिस्थिति है जहां शिक्षा ऋण जैसी व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाती है। छात्र क्रेडिट कार्ड योजना का उद्देश्य केवल पैसा उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा का रास्ता खोलना है।

बैंक प्रक्रिया क्यों बन जाती है चुनौती?

योजना का लाभ लेने के लिए विद्यार्थी को आवेदन से लेकर दस्तावेज और ऋण स्वीकृति तक कई चरणों से गुजरना पड़ सकता है। शहरों में रहने वाले विद्यार्थियों के लिए यह प्रक्रिया अपेक्षाकृत आसान हो सकती है, लेकिन ग्रामीण परिवारों के सामने अलग तरह की परेशानियां होती हैं।

दस्तावेज तैयार कराने, प्रमाणपत्र जुटाने, बैंक या संबंधित कार्यालय तक पहुंचने और आवेदन की स्थिति जानने के लिए बार-बार आने-जाने में समय और पैसा खर्च होता है।

गरीब विद्यार्थी की समस्या केवल यह नहीं है कि उसके पास कॉलेज की फीस नहीं है। उसके पास सरकारी प्रक्रिया पूरी करने के लिए भी अतिरिक्त संसाधन सीमित हो सकते हैं।

यदि आवेदन में छोटी-सी कमी रह जाए और उसे ठीक कराने के लिए कई बार कार्यालय जाना पड़े, तो आर्थिक रूप से कमजोर परिवार के लिए यह भी एक बड़ी बाधा बन जाती है।

जानकारी की कमी भी बड़ी समस्या

किसी योजना का लाभ लेने के लिए पहले उसके बारे में जानकारी होना जरूरी है। बिहार के कई ग्रामीण इलाकों में विद्यार्थियों को सरकारी शिक्षा ऋण योजनाओं की पूरी जानकारी समय पर नहीं मिल पाती।

कई छात्रों को यह स्पष्ट नहीं होता कि योजना के लिए पात्रता क्या है, कौन-कौन से पाठ्यक्रम शामिल हैं, आवेदन की प्रक्रिया क्या है, किन दस्तावेजों की जरूरत होगी और ऋण स्वीकृत होने में कितना समय लग सकता है।

इसका सीधा असर गरीब विद्यार्थियों पर पड़ता है। जिस विद्यार्थी को समय पर जानकारी नहीं मिली, वह आवेदन ही नहीं कर पाता या देर से प्रक्रिया शुरू करता है।

इसलिए स्कूल और कॉलेज स्तर पर करियर एवं वित्तीय सहायता काउंसिलिंग को मजबूत करना जरूरी है। इंटरमीडिएट के बाद उच्च शिक्षा में जाने वाले विद्यार्थियों को सरकारी योजनाओं की जानकारी एक व्यवस्थित तरीके से दी जानी चाहिए।

सिर्फ कार्ड जारी होना सफलता नहीं

सरकारी योजनाओं की समीक्षा में अक्सर आवेदन, स्वीकृति और वितरण जैसे आंकड़ों को महत्व दिया जाता है। लेकिन छात्र क्रेडिट कार्ड जैसी शिक्षा योजना के लिए इससे आगे देखना जरूरी है।

सवाल होना चाहिए—

कितने विद्यार्थियों ने ऋण मिलने के बाद अपनी पढ़ाई पूरी की?

कितने विद्यार्थियों ने आर्थिक परेशानी के कारण पढ़ाई बीच में छोड़ दी?

कितने विद्यार्थियों को ऋण मिलने में इतना समय लगा कि उन्हें फीस जमा करने में परेशानी हुई?

और कितने विद्यार्थी योजना की जानकारी या प्रक्रिया की कठिनाई के कारण आवेदन ही नहीं कर पाए?

यही आंकड़े योजना की वास्तविक प्रभावशीलता की तस्वीर सामने ला सकते हैं।

प्रतियोगी परीक्षा से कॉलेज तक का सफर

बिहार के गरीब विद्यार्थियों की आर्थिक परेशानी कॉलेज में दाखिले के बाद ही शुरू नहीं होती। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी भी महंगी होती जा रही है।

कोचिंग फीस, किताबें, टेस्ट सीरीज, इंटरनेट, ऑनलाइन क्लास, रहने और खाने का खर्च—इन सबका बोझ परिवार पर पड़ता है। ऐसे में कई प्रतिभाशाली विद्यार्थी अपनी पसंद का पाठ्यक्रम या संस्थान चुनने के बजाय आर्थिक स्थिति के हिसाब से विकल्प तलाशते हैं।

यह शिक्षा में अवसर की असमानता का गंभीर सवाल है।

प्रतिभा केवल बड़े शहरों में पैदा नहीं होती। गांव और छोटे कस्बों के विद्यार्थियों में भी डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, वकील और अन्य पेशेवर बनने की क्षमता है। समस्या अक्सर प्रतिभा की नहीं, अवसर की होती है।

पारदर्शी और समयबद्ध व्यवस्था जरूरी

छात्र क्रेडिट कार्ड योजना को अधिक प्रभावी बनाने के लिए पूरी प्रक्रिया को विद्यार्थी-केंद्रित बनाना होगा।

आवेदन के हर चरण की जानकारी विद्यार्थी को ऑनलाइन और मोबाइल संदेश के माध्यम से मिलनी चाहिए। यदि कोई दस्तावेज अधूरा है तो केवल “आवेदन लंबित” बताने के बजाय स्पष्ट किया जाना चाहिए कि कमी क्या है।

बैंक और संबंधित अधिकारियों के स्तर पर भी स्पष्ट समयसीमा होनी चाहिए। विद्यार्थी को यह पता होना चाहिए कि उसका आवेदन किस स्तर पर है और अगले चरण में क्या होगा।

साथ ही शिकायत निवारण व्यवस्था सरल होनी चाहिए। गरीब परिवार का विद्यार्थी अपनी समस्या लेकर कई कार्यालयों के चक्कर लगाने को मजबूर न हो, इसके लिए प्रभावी हेल्पलाइन और स्थानीय सहायता केंद्र उपयोगी हो सकते हैं।

शिक्षा ऋण को सामाजिक निवेश की तरह देखना होगा

छात्र क्रेडिट कार्ड को केवल बैंक से मिलने वाले ऋण के रूप में देखना इसके व्यापक उद्देश्य को छोटा कर देना होगा। उच्च शिक्षा पर किया गया खर्च लंबे समय में व्यक्ति, परिवार और समाज—तीनों के लिए निवेश हो सकता है।

यदि आर्थिक रूप से कमजोर परिवार का विद्यार्थी उच्च शिक्षा प्राप्त करके रोजगार हासिल करता है तो उसका पूरा परिवार आर्थिक रूप से मजबूत हो सकता है। इसके साथ समाज को एक शिक्षित और कुशल युवा भी मिलता है।

इसलिए सरकार को योजना के मूल्यांकन में केवल कितना ऋण दिया गया यह नहीं देखना चाहिए, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि उस ऋण ने कितने सपनों को डिग्री और रोजगार में बदला।

असली परीक्षा जमीन पर है

छात्र क्रेडिट कार्ड योजना की जरूरत पर शायद ही कोई सवाल उठाएगा। असली सवाल इसके क्रियान्वयन का है।

योजना बनाना पहला कदम है। उसे सरल, पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से जरूरतमंद विद्यार्थी तक पहुंचाना अगला और अधिक महत्वपूर्ण कदम है।

बिहार में यदि उच्च शिक्षा को सामाजिक और आर्थिक बदलाव का माध्यम बनाना है तो गरीब विद्यार्थियों को केवल योजना की घोषणा नहीं, बल्कि समय पर वास्तविक आर्थिक सहायता चाहिए।

छात्र क्रेडिट कार्ड की असली सफलता तब होगी, जब गरीब परिवार का बच्चा बैंक और कार्यालय के चक्कर में अपना समय गंवाने के बजाय कॉलेज की कक्षा में बैठा दिखाई दे।

योजना की सफलता कार्ड जारी करने की संख्या से नहीं, बल्कि उस कार्ड के सहारे कितने गरीब विद्यार्थियों ने अपनी पढ़ाई पूरी की और अपने पैरों पर खड़े हुए—इससे तय होनी चाहिए।

आलोक कुमार

मंगलवार, 1 सितंबर 2026

Bihar : प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में गरीब छात्रों की मुश्किलें

 


प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में गरीब छात्रों की मुश्किलें

पटना। बिहार में प्रतियोगी परीक्षाएं लाखों युवाओं के लिए सरकारी नौकरी तक पहुंचने का सबसे बड़ा रास्ता मानी जाती हैं। गांव से लेकर शहर तक बड़ी संख्या में विद्यार्थी रेलवे, बैंकिंग, शिक्षक भर्ती, पुलिस, एसएससी, लोक सेवा आयोग और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। लेकिन इस तैयारी की दौड़ में सभी अभ्यर्थियों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं होतीं।

किसी विद्यार्थी के पास महंगी कोचिंग, बेहतर इंटरनेट, अलग कमरा, लैपटॉप और पर्याप्त किताबें हैं तो किसी दूसरे विद्यार्थी के सामने पढ़ाई के साथ-साथ परिवार का खर्च संभालने की जिम्मेदारी भी हो सकती है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आने वाले युवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी केवल पढ़ाई का सवाल नहीं रह जाती। यह रोजमर्रा की जरूरतों और बेहतर भविष्य की उम्मीद के बीच संघर्ष बन जाती है।

तैयारी शुरू करने से पहले ही खर्च की चुनौती

प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में सबसे पहली बाधा आर्थिक होती है। किताबें, नोट्स, ऑनलाइन कोर्स, टेस्ट सीरीज, इंटरनेट, आवेदन शुल्क, यात्रा और परीक्षा केंद्र तक पहुंचने का खर्च लगातार जुड़ता जाता है।

एक गरीब परिवार के लिए इनमें से हर खर्च महत्वपूर्ण होता है। जहां संपन्न परिवार का विद्यार्थी जरूरत पड़ने पर नया मोबाइल, लैपटॉप, किताब या कोर्स खरीद सकता है, वहीं आर्थिक रूप से कमजोर छात्र कई बार यह तय करने को मजबूर होता है कि इस महीने कौन-सी किताब खरीदी जाए और कौन-सा खर्च टाला जाए।

कई विद्यार्थियों के लिए समस्या परीक्षा शुल्क तक सीमित नहीं रहती। अलग-अलग परीक्षाओं के लिए बार-बार आवेदन करने, परीक्षा देने दूसरे शहर जाने और रहने-खाने का खर्च भी जुड़ जाता है।

पटना जैसे शहरों में रहने का खर्च

बिहार के ग्रामीण इलाकों से बड़ी संख्या में विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पटना जैसे शहरों का रुख करते हैं। उन्हें लगता है कि यहां पुस्तकालय, कोचिंग संस्थान, शिक्षकों और दूसरे अभ्यर्थियों का बेहतर वातावरण मिलेगा।

लेकिन शहर में रहना अपने आप में महंगा है।

कमरे का किराया, बिजली, भोजन, इंटरनेट और आने-जाने का खर्च मिलाकर हर महीने एक निश्चित राशि की जरूरत होती है। कई विद्यार्थी किराया बचाने के लिए दो-तीन या उससे अधिक साथियों के साथ एक कमरा साझा करते हैं।

कुछ विद्यार्थी पुस्तकालय की फीस बचाने के लिए घर, किराये के कमरे या दूसरे सीमित संसाधनों में पढ़ाई करते हैं। गर्मी, बिजली की समस्या, इंटरनेट की दिक्कत और रहने की असुविधा भी उनकी तैयारी को प्रभावित कर सकती है।

यहां सवाल यह नहीं है कि गरीब विद्यार्थी मेहनत कर रहे हैं या नहीं। सवाल यह है कि क्या उन्हें मेहनत करने के लिए जरूरी वातावरण भी मिल रहा है?

कोचिंग और संसाधनों की असमानता

आज प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का बड़ा हिस्सा डिजिटल माध्यमों पर भी निर्भर करता है। ऑनलाइन क्लास, टेस्ट सीरीज, मोबाइल एप, डिजिटल नोट्स और वीडियो लेक्चर ने पढ़ाई के अवसर जरूर बढ़ाए हैं, लेकिन इसके बावजूद डिजिटल संसाधनों तक समान पहुंच अभी चुनौती बनी हुई है।

जिस विद्यार्थी के पास अच्छा स्मार्टफोन, तेज इंटरनेट और ऑनलाइन कोर्स खरीदने की क्षमता है, वह घर बैठे कई शिक्षकों और अध्ययन सामग्री तक पहुंच सकता है।

दूसरी तरफ गरीब विद्यार्थी अक्सर मुफ्त वीडियो, पुराने नोट्स, साझा किए गए पीडीएफ और उधार की किताबों पर निर्भर रहते हैं।

इससे यह जरूरी नहीं कि उसकी प्रतिभा कम हो। लेकिन तैयारी के संसाधनों में अंतर उसके प्रदर्शन को प्रभावित कर सकता है।

पढ़ाई के साथ काम करने की मजबूरी

गरीब परिवार के सामने सबसे कठिन स्थिति तब आती है जब विद्यार्थी को पढ़ाई के साथ कमाई भी करनी पड़ती है।

कई युवा पार्ट टाइम काम, ट्यूशन, दुकान, डिलीवरी, डेटा एंट्री या दूसरे छोटे काम करके अपनी पढ़ाई का खर्च निकालते हैं। कुछ विद्यार्थियों को परिवार की आर्थिक मदद के लिए भी काम करना पड़ता है।

ऐसे विद्यार्थी के पास प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए उतना समय नहीं बचता जितना पूर्णकालिक तैयारी करने वाले विद्यार्थी के पास होता है।

सुबह काम, दिन में पढ़ाई और रात में दोबारा तैयारी—यह दिनचर्या लंबे समय तक जारी रखना आसान नहीं है।

इसके बावजूद अनेक गरीब विद्यार्थी वर्षों तक प्रयास करते रहते हैं। उनकी कहानी केवल परीक्षा में सफलता या असफलता से नहीं समझी जा सकती।

असफलता का आर्थिक बोझ

प्रतियोगी परीक्षा में असफल होना किसी भी विद्यार्थी के लिए निराशाजनक होता है। लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थी के लिए इसका असर और गंभीर हो सकता है।

एक परीक्षा के बाद दूसरी परीक्षा की तैयारी के लिए फिर किताबें, फॉर्म, यात्रा, टेस्ट और रहने का खर्च जुटाना पड़ता है।

संपन्न परिवार का विद्यार्थी असफल होने के बाद एक या दो वर्ष और तैयारी कर सकता है। गरीब परिवार के विद्यार्थी के सामने कई बार सवाल होता है कि अगले साल तक घर का खर्च कौन चलाएगा?

यही कारण है कि आर्थिक मजबूरी कई प्रतिभाशाली युवाओं को उनकी मंजिल तक पहुंचने से पहले ही तैयारी छोड़ने पर मजबूर कर देती है।

क्या समान परीक्षा का मतलब समान अवसर है?

यहां एक महत्वपूर्ण सामाजिक सवाल खड़ा होता है।

सभी विद्यार्थियों के लिए एक जैसी परीक्षा आयोजित कर देना जरूरी है, लेकिन केवल परीक्षा समान होने से अवसर समान नहीं हो जाते।

यदि एक विद्यार्थी के पास महंगी कोचिंग, बेहतर तकनीकी संसाधन और शांत अध्ययन वातावरण है और दूसरे विद्यार्थी के पास किताब खरीदने तक के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है, तो दोनों की शुरुआती परिस्थितियां अलग हैं।

इसलिए समान अवसर का अर्थ केवल समान परीक्षा नहीं, बल्कि तैयारी के लिए न्यूनतम आवश्यक संसाधनों तक समान पहुंच भी होना चाहिए।

सरकारी पुस्तकालय बन सकते हैं बड़ा सहारा

आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए सरकारी और सार्वजनिक पुस्तकालय महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

हर जिले और अनुमंडल स्तर पर आधुनिक अध्ययन केंद्र विकसित किए जा सकते हैं, जहां विद्यार्थियों को शांत वातावरण, इंटरनेट, प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबें, समाचार पत्र और डिजिटल अध्ययन सामग्री उपलब्ध हो।

ग्रामीण क्षेत्रों में भी ऐसे अध्ययन केंद्र विकसित किए जाएं तो छात्रों को तैयारी के लिए बड़े शहरों की ओर जाने की मजबूरी कुछ हद तक कम हो सकती है।

छात्रावास और छात्रवृत्ति की जरूरत

गरीब और ग्रामीण विद्यार्थियों के लिए सस्ती या निःशुल्क छात्रावास व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है।

यदि किसी विद्यार्थी को रहने और भोजन की न्यूनतम सुविधा मिल जाए तो वह अपनी ऊर्जा पढ़ाई पर लगा सकता है। इसी तरह आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति, परीक्षा शुल्क में राहत और अध्ययन सामग्री की सहायता उपयोगी साबित हो सकती है।

लेकिन सहायता केवल कागजों पर नहीं होनी चाहिए। आवेदन की प्रक्रिया सरल, पारदर्शी और समयबद्ध होनी चाहिए ताकि वास्तविक जरूरतमंद विद्यार्थी उसका लाभ उठा सकें।

मुफ्त मार्गदर्शन भी जरूरी

हर गरीब विद्यार्थी को महंगी कोचिंग उपलब्ध नहीं हो सकती। ऐसे में सरकारी संस्थानों, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण निःशुल्क मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा सकता है।

विशेषज्ञ शिक्षक ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम, रणनीति, समय प्रबंधन, टेस्ट प्रैक्टिस और परीक्षा की तैयारी के बारे में मार्गदर्शन दे सकते हैं।

इससे कोचिंग और गैर-कोचिंग विद्यार्थियों के बीच मौजूद अंतर कुछ कम किया जा सकता है।

प्रतिभा पैसे की मोहताज क्यों हो?

बिहार में गरीब परिवारों से आने वाले विद्यार्थियों में प्रतिभा और मेहनत की कमी नहीं है। समस्या अक्सर संसाधनों की होती है।

एक ऐसा विद्यार्थी जो दिन में कई घंटे काम करने के बाद रात में पढ़ता है, उसकी मेहनत को केवल परीक्षा के अंक से नहीं मापा जा सकता। उसके सामने आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक चुनौतियां भी होती हैं।

इसलिए प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यवस्था पर चर्चा करते समय केवल परीक्षा की कठिनाई या परिणाम की बात पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि किस विद्यार्थी को तैयारी के लिए कितने संसाधन उपलब्ध थे।

सरकार और समाज की साझा जिम्मेदारी

गरीब विद्यार्थियों को मजबूत करना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। समाज, शिक्षण संस्थान, पुस्तकालय, सामाजिक संगठन और निजी संस्थाएं भी इसमें भूमिका निभा सकती हैं।

जरूरत इस बात की है कि आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं के लिए ऐसा वातावरण बनाया जाए जहां उनकी प्रतिभा संसाधनों की कमी के कारण दब न जाए।

गरीबी किसी विद्यार्थी की प्रतिभा का प्रमाण नहीं है और महंगी कोचिंग किसी की सफलता की गारंटी नहीं।

प्रतियोगी परीक्षा की असली भावना तभी मजबूत होगी जब गांव के गरीब परिवार का विद्यार्थी भी यह विश्वास कर सके कि उसके पास तैयारी करने का वास्तविक अवसर है।

आखिर सवाल केवल यह नहीं है कि परीक्षा में कौन सफल हुआ। बड़ा सवाल यह है कि कितने प्रतिभाशाली विद्यार्थी पैसे, संसाधनों और परिस्थितियों की कमी के कारण परीक्षा की दौड़ से बाहर हो गए?

बिहार के भविष्य के लिए जरूरी है कि आर्थिक स्थिति किसी युवा की मंजिल तय न करे। जिस विद्यार्थी में प्रतिभा, मेहनत और आगे बढ़ने की इच्छा है, उसके लिए संसाधनों की कमी दीवार नहीं, बल्कि व्यवस्था द्वारा दूर की जाने वाली बाधा होनी चाहिए।




आलोक कुमार