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सोमवार, 17 अगस्त 2026

India : धर्मनिरपेक्ष भारत में ‘चर्च-मुक्त ओडिशा’ का नारा कितना संवैधानिक?

 धर्मनिरपेक्ष भारत में ‘चर्च-मुक्त ओडिशा’ का नारा कितना संवैधानिक?


क्या किसी राज्य को ‘चर्च-मुक्त’ बनाने की मांग धार्मिक स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार से टकराती है?

ओडिशा।भारत एक धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य है। इसका अर्थ यह नहीं है कि देश में धर्म का कोई स्थान नहीं होगा, बल्कि यह है कि राज्य किसी एक धर्म को अपना आधिकारिक धर्म नहीं मानता और नागरिकों को अपनी आस्था के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता देता है। ऐसे में जब किसी राज्य में ‘चर्च-मुक्त ओडिशा’ जैसा नारा सामने आता है, तो यह केवल राजनीतिक बयान नहीं रह जाता। इसके साथ संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और अभिव्यक्ति की आजादी से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल भी जुड़ जाते हैं।

भारत की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था की नींव संविधान लागू होने के समय से ही मौजूद थी। संविधान की प्रस्तावना में 1976 के 42वें संविधान संशोधन के बाद ‘पंथनिरपेक्ष’ शब्द स्पष्ट रूप से जोड़ा गया। हालांकि धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और सभी नागरिकों के अधिकारों की संवैधानिक गारंटी पहले से ही संविधान का हिस्सा थी।

भारत में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और अनेक अन्य धार्मिक समुदाय अपनी-अपनी आस्था और परंपराओं के साथ रहते हैं। यही विविधता भारतीय लोकतंत्र की विशेष पहचान है। इसलिए किसी धार्मिक समुदाय या उसकी संस्थाओं को राज्य से पूरी तरह बाहर करने की मांग को संविधान की कसौटी पर परखना आवश्यक हो जाता है।

अनुच्छेद 25 क्या कहता है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंत:करण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। हालांकि यह अधिकार पूर्ण या निरंकुश नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के साथ-साथ संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन इस अधिकार पर कानून द्वारा उचित सीमाएं लगाई जा सकती हैं।

इसका मतलब यह है कि किसी व्यक्ति को धर्म मानने की स्वतंत्रता है, लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता कानून से ऊपर नहीं है। यदि किसी धार्मिक संस्था की गतिविधि कानून का उल्लंघन करती है, तो सरकार जांच और कानूनी कार्रवाई कर सकती है।

इसी तरह अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक मामलों का प्रबंधन करने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, जबकि अनुच्छेद 15 धर्म के आधार पर भेदभाव से सुरक्षा प्रदान करता है।

यहीं से ‘चर्च-मुक्त ओडिशा’ जैसे नारे का संवैधानिक परीक्षण शुरू होता है।

चर्च की आलोचना और ईसाई समुदाय की स्वतंत्रता अलग विषय

किसी चर्च की संस्था, उसकी प्रशासनिक व्यवस्था, किसी व्यक्ति के आचरण या किसी कथित अवैध गतिविधि की आलोचना लोकतांत्रिक व्यवस्था में की जा सकती है। कोई भी धार्मिक संस्था कानून से ऊपर नहीं है। यदि किसी संस्था पर कानून तोड़ने, जबरन धर्मांतरण या किसी अन्य अपराध का आरोप है, तो उसके खिलाफ निष्पक्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया होनी चाहिए।

लेकिन किसी संस्था की आलोचना और पूरे धार्मिक समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रश्न उठाना एक ही बात नहीं है।

यदि ‘चर्च-मुक्त’ का अर्थ यह है कि किसी राज्य में चर्च भवन, ईसाई उपासना या ईसाई समुदाय की धार्मिक गतिविधियां ही समाप्त कर दी जाएं, तो यह प्रश्न सीधे धार्मिक स्वतंत्रता और समानता के संवैधानिक सिद्धांतों से जुड़ जाएगा।

दूसरी ओर, यदि नारे का आशय केवल उन गतिविधियों पर रोक लगाने से है जिन्हें कानून अवैध मानता है, तो उसका संवैधानिक मूल्यांकन अलग होगा। इसलिए किसी भी नारे को केवल उसके शब्दों से नहीं, बल्कि उसके संदर्भ, उद्देश्य और वास्तविक कार्रवाई के प्रस्ताव से समझना जरूरी है।

क्या धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म-विरोध है?

भारतीय धर्मनिरपेक्षता को धर्म-विरोध के रूप में समझना सही नहीं होगा। भारतीय मॉडल में नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता मिलती है और राज्य सभी नागरिकों के साथ समान व्यवहार करने का संवैधानिक दायित्व निभाता है।

साथ ही, राज्य सामाजिक सुधार, सार्वजनिक व्यवस्था और कानून के शासन को सुनिश्चित करने के लिए धार्मिक संस्थाओं से संबंधित कुछ गतिविधियों को नियंत्रित कर सकता है। इसलिए धर्मनिरपेक्षता का अर्थ यह नहीं है कि धार्मिक संस्थाओं की आलोचना नहीं की जा सकती।

लेकिन यही सिद्धांत सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होना चाहिए।

यदि किसी राज्य में ‘चर्च-मुक्त’ की मांग को केवल इसलिए स्वीकार्य मान लिया जाए क्योंकि वह एक खास धार्मिक संस्था के खिलाफ है, तो यही कसौटी अन्य धर्मों के मामलों में भी लागू करनी पड़ेगी। कल्पना कीजिए कि कोई ‘मंदिर-मुक्त राज्य’, ‘मस्जिद-मुक्त राज्य’ या ‘गुरुद्वारा-मुक्त राज्य’ बनाने का नारा लगाए। क्या ऐसी मांग को केवल राजनीतिक नारा कहकर छोड़ दिया जाएगा?

धर्मनिरपेक्षता की वास्तविक परीक्षा यही है कि पसंद और नापसंद के आधार पर संवैधानिक सिद्धांत न बदलें।

कानून का शासन सबसे ऊपर

किसी भी धार्मिक संस्था के खिलाफ शिकायत है तो उसका समाधान कानून के माध्यम से होना चाहिए। जांच हो, प्रमाण जुटाए जाएं, दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई हो और निर्दोष लोगों के अधिकारों की रक्षा की जाए।

यही लोकतांत्रिक व्यवस्था का रास्ता है।

किसी समुदाय की सामूहिक धार्मिक पहचान को निशाना बनाना और किसी विशिष्ट अपराध या अवैध गतिविधि के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करना दो अलग-अलग बातें हैं। संविधान व्यक्ति को अधिकार देता है, लेकिन राज्य पर यह जिम्मेदारी भी डालता है कि वह कानून का समान रूप से पालन कराए।

इसलिए ‘चर्च-मुक्त’ जैसे नारों पर बहस करते समय यह पूछा जाना चाहिए कि वास्तव में मांग किस चीज की है—किसी अवैध गतिविधि पर कार्रवाई की, किसी संस्था की जांच की, या किसी धार्मिक समुदाय की सार्वजनिक और धार्मिक उपस्थिति को समाप्त करने की?

इन सवालों के जवाब के बिना किसी नारे को पूरी तरह संवैधानिक या असंवैधानिक घोषित करना जल्दबाजी होगी।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की भी सीमा है

लोकतंत्र में राजनीतिक नारे और तीखी आलोचना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा हैं। किसी विचार से असहमति व्यक्त करना भी लोकतांत्रिक अधिकार है। लेकिन संविधान में एक अधिकार का अस्तित्व दूसरे नागरिकों के अधिकारों को स्वतः समाप्त नहीं करता।

इसीलिए सार्वजनिक बहस में शब्दों की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है। किसी धार्मिक संस्था की आलोचना तथ्य और प्रमाण के आधार पर होनी चाहिए। पूरे समुदाय को अपराधी या राष्ट्रविरोधी बताना न केवल सामाजिक तनाव बढ़ा सकता है, बल्कि संवैधानिक समानता और गरिमा के सिद्धांतों के सामने भी गंभीर प्रश्न खड़े कर सकता है।

ओडिशा के संदर्भ में असली सवाल

‘चर्च-मुक्त ओडिशा’ जैसे नारे का संवैधानिक मूल्यांकन करते समय सबसे महत्वपूर्ण बात इसका वास्तविक आशय है। यदि उद्देश्य किसी विशेष गैरकानूनी गतिविधि को रोकना है, तो सरकार कानून के तहत कार्रवाई कर सकती है। यदि उद्देश्य धार्मिक संस्थाओं की जवाबदेही सुनिश्चित करना है, तो पारदर्शिता और कानूनी जांच की मांग लोकतांत्रिक बहस का हिस्सा हो सकती है।

लेकिन यदि लक्ष्य किसी धार्मिक समुदाय को उसकी आस्था, पूजा या धार्मिक पहचान के कारण राज्य के सार्वजनिक जीवन से बाहर करना है, तो यह संविधान के समानता और धार्मिक स्वतंत्रता संबंधी सिद्धांतों से गंभीर टकराव पैदा करेगा।

भारत की शक्ति इस बात में नहीं है कि यहां केवल एक प्रकार की आस्था दिखाई दे। भारत की शक्ति इस बात में है कि अलग-अलग आस्थाओं वाले लोग एक ही संविधान के तहत नागरिक के रूप में समान अधिकारों के साथ रह सकें।

इसलिए ‘चर्च-मुक्त ओडिशा’ हो या किसी अन्य धार्मिक समुदाय को हटाने का नारा—उसकी संवैधानिकता का पैमाना एक ही होना चाहिए: क्या मांग कानून के शासन, समानता और नागरिक की धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करती है?

अंततः भारत का संविधान किसी धर्म के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने के बजाय नागरिकों के अधिकारों और कानून के शासन की रक्षा करता है। किसी धार्मिक संस्था की आलोचना हो सकती है, जांच हो सकती है और कानून तोड़ने पर कार्रवाई भी हो सकती है। लेकिन किसी समुदाय की धार्मिक स्वतंत्रता को केवल उसकी पहचान के आधार पर समाप्त करने का विचार भारतीय धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की मूल भावना से मेल नहीं खाता।

इसलिए बहस ‘चर्च-मुक्त’ या ‘चर्च-समर्थक’ होने की नहीं, बल्कि ‘संविधान-सम्मत’ होने की होनी चाहिए।

भारत का रास्ता किसी धर्म को मिटाने का नहीं, बल्कि कानून के सामने सभी को समान रखने का रास्ता है। यही धर्मनिरपेक्षता की असली कसौटी और भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।


आलोक कुमार

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार देता

 भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने का अधिकार देता

भारत में धर्म केवल निजी आस्था का विषय नहीं, बल्कि संविधान द्वारा संरक्षित स्वतंत्रता भी है। लेकिन क्या धर्म मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने की आजादी पूरी तरह असीमित है? भारतीय संविधान धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के साथ सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य की सीमाएं भी तय करता है।

भारत को दुनिया के सबसे विविध धार्मिक समाजों में गिना जाता है। यहां हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और अन्य धार्मिक समुदायों के लोग लंबे समय से साथ रहते आए हैं। इस विविधता को संवैधानिक आधार देने में भारतीय संविधान की महत्वपूर्ण भूमिका है।

भारतीय संविधान नागरिकों को अपनी धार्मिक आस्था रखने और उसका पालन करने की स्वतंत्रता देता है। यह अधिकार केवल बहुसंख्यक समुदाय के लिए नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए है। यही भारतीय लोकतंत्र की धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था की मूल भावना है।

लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं है कि कोई भी व्यक्ति धर्म के नाम पर कानून तोड़ सकता है या दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता छीन सकता है। संविधान व्यक्तिगत आस्था की रक्षा करता है, साथ ही समाज में कानून और व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी भी राज्य को देता है।

अनुच्छेद 25 क्या कहता है?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक व्यक्ति को अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को स्वतंत्र रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार देता है।

यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता की शुरुआत ही “अंतःकरण की स्वतंत्रता” से होती है। इसका अर्थ है कि व्यक्ति को अपनी अंतरात्मा के अनुसार धार्मिक विश्वास रखने की स्वतंत्रता होनी चाहिए।

इसके बाद धर्म को मानने, उसका पालन करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता आती है।

लेकिन यह अधिकार पूर्ण या असीमित नहीं है। संविधान इसे सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य तथा अन्य मौलिक अधिकारों से संबंधित प्रावधानों के अधीन रखता है।

यानी धार्मिक स्वतंत्रता और कानून का शासन एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।

क्या धर्म बदलने का अधिकार भी इसमें शामिल है?

यह प्रश्न अक्सर बहस का विषय बनता है।

धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ व्यक्ति की अपनी आस्था चुनने की स्वतंत्रता से जुड़ा है। लेकिन किसी व्यक्ति को बल, धोखे, धमकी या दबाव से धर्म बदलने के लिए मजबूर करना धार्मिक स्वतंत्रता का हिस्सा नहीं माना जा सकता।

इसी कारण विभिन्न राज्यों में धर्मांतरण से संबंधित कानून बनाए गए हैं। इन कानूनों का उद्देश्य कथित जबरन, धोखे या अनुचित प्रभाव से होने वाले धर्मांतरण को रोकना बताया जाता है।

हालांकि ऐसे कानूनों की सीमा और उनका इस्तेमाल भी संवैधानिक कसौटी पर परखा जा सकता है। किसी व्यक्ति की स्वैच्छिक धार्मिक पसंद और जबरन धर्म परिवर्तन के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखना आवश्यक है।

अनुच्छेद 26 धार्मिक संस्थाओं को क्या अधिकार देता है?

संविधान का अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों को अपने धार्मिक और परोपकारी कार्यों के प्रबंधन से जुड़े कुछ अधिकार देता है।

इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि धार्मिक समुदाय अपनी धार्मिक संस्थाओं और गतिविधियों को निर्धारित संवैधानिक सीमाओं के भीतर संचालित कर सकें।

लेकिन यहां भी अधिकार पूर्ण नहीं हैं। सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य जैसे संवैधानिक आधार महत्वपूर्ण बने रहते हैं।

इससे स्पष्ट होता है कि संविधान व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता के साथ-साथ धार्मिक समुदायों की संस्थागत स्वतंत्रता को भी महत्व देता है।

धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब भेदभाव की अनुमति नहीं

भारत की संवैधानिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण आधार समानता है।

यदि कोई नागरिक किसी विशेष धर्म को मानता है तो उसके साथ केवल धार्मिक पहचान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। संविधान के समानता संबंधी प्रावधान सभी नागरिकों को कानून के सामने समानता का आधार देते हैं।

धार्मिक स्वतंत्रता तभी वास्तविक बन सकती है जब नागरिकों को समान नागरिक अधिकार भी प्राप्त हों।

यही कारण है कि धर्म की स्वतंत्रता को संविधान के अन्य मौलिक अधिकारों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

अनुच्छेद 27 और धार्मिक कर का सवाल

संविधान का अनुच्छेद 27 भी धार्मिक स्वतंत्रता के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। इसके अनुसार किसी व्यक्ति को किसी विशेष धर्म या धार्मिक संप्रदाय के प्रचार या रखरखाव के लिए विशेष रूप से कर देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।

इसका उद्देश्य राज्य और नागरिक के बीच धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े वित्तीय संबंधों को संवैधानिक सीमा में रखना है।

यह व्यवस्था भारतीय धर्मनिरपेक्षता की एक महत्वपूर्ण विशेषता को सामने लाती है—राज्य किसी एक धर्म को नागरिकों पर थोपने का अधिकार नहीं रखता।

धार्मिक शिक्षा का प्रश्न

संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता के साथ शिक्षा से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान भी हैं।

अनुच्छेद 28 के तहत पूरी तरह राज्य निधि से संचालित शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक शिक्षा से संबंधित विशेष सीमाएं हैं। वहीं कुछ अन्य प्रकार के संस्थानों में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना से संबंधित अलग संवैधानिक व्यवस्थाएं लागू होती हैं।

इसका उद्देश्य शिक्षा के क्षेत्र में व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता और संस्थागत अधिकारों के बीच संतुलन बनाना है।

क्या धार्मिक स्वतंत्रता असीमित है?

नहीं।

यही बात समझना सबसे जरूरी है।

यदि धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर हिंसा, अपराध, जबरदस्ती या दूसरे नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन किया जाए, तो राज्य हस्तक्षेप कर सकता है।

उदाहरण के लिए सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना सरकार की जिम्मेदारी है। इसी तरह स्वास्थ्य और नैतिकता से जुड़े मामलों में भी कानून लागू हो सकता है।

इसलिए संविधान धार्मिक स्वतंत्रता को मजबूत अधिकार बनाता है, लेकिन इसे कानून से ऊपर का अधिकार नहीं बनाता।

धर्म और सार्वजनिक जीवन

भारत जैसे विविध देश में धार्मिक स्वतंत्रता का सवाल केवल मंदिर, मस्जिद, चर्च या गुरुद्वारे तक सीमित नहीं है। इसका संबंध सार्वजनिक जीवन, राजनीति, शिक्षा, सामाजिक संबंधों और व्यक्तिगत पहचान से भी है।

धर्म व्यक्ति के जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में सभी नागरिकों के अधिकार समान होते हैं।

यही कारण है कि किसी व्यक्ति की धार्मिक पहचान के आधार पर उसकी नागरिकता या संवैधानिक अधिकार कम नहीं किए जा सकते।

बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक—दोनों की सुरक्षा

धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र की असली परीक्षा तब होती है जब वह कमजोर या अल्पसंख्यक समूह के अधिकारों की रक्षा करता है।

लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ केवल अल्पसंख्यक समुदायों की सुरक्षा नहीं है। यह अधिकार हर व्यक्ति के लिए है।

बहुसंख्यक समुदाय का व्यक्ति भी अपनी आस्था का पालन करने के लिए उतना ही स्वतंत्र है जितना अल्पसंख्यक समुदाय का नागरिक।

इसलिए संवैधानिक दृष्टि से सही सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन-सा धर्म बहुसंख्यक है और कौन-सा अल्पसंख्यक। सही सवाल यह है कि क्या हर नागरिक को कानून के समान संरक्षण के साथ अपनी आस्था जीने की स्वतंत्रता मिल रही है?

धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सद्भाव

कानून अधिकार देता है, लेकिन समाज में सद्भाव केवल कानून से नहीं बनता।

धार्मिक स्वतंत्रता के साथ दूसरे व्यक्ति की आस्था का सम्मान भी जरूरी है। अपने धर्म का पालन करने का अधिकार तभी मजबूत होगा जब समाज दूसरे की धार्मिक स्वतंत्रता को भी स्वीकार करे।

इसलिए धार्मिक बहस को नफरत और टकराव का माध्यम बनाने के बजाय संवाद का माध्यम बनाना लोकतांत्रिक समाज के लिए अधिक उपयोगी है।

मीडिया, राजनीतिक दलों, धार्मिक संस्थाओं और नागरिक समाज की इसमें बड़ी भूमिका है।

आज के समय में संवैधानिक समझ क्यों जरूरी?

सोशल मीडिया के दौर में धार्मिक विषयों पर अधूरी जानकारी बहुत तेजी से फैलती है। किसी कानून, अदालत के फैसले या संवैधानिक अधिकार की अधूरी व्याख्या सामाजिक तनाव पैदा कर सकती है।

इसलिए नागरिकों को यह समझना जरूरी है कि संविधान क्या अधिकार देता है और उन अधिकारों की संवैधानिक सीमाएं क्या हैं।

धर्म की स्वतंत्रता का अर्थ किसी धर्म का अपमान करने की स्वतंत्रता नहीं है। उसी तरह धार्मिक भावनाओं की रक्षा के नाम पर किसी नागरिक की वैध व्यक्तिगत स्वतंत्रता को समाप्त करना भी उचित नहीं माना जा सकता।

हर मामले में कानून, तथ्य और संविधान को आधार बनाना जरूरी है।

निष्कर्ष

भारतीय संविधान प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अंतरात्मा के अनुसार धर्म मानने, उसका पालन करने और संवैधानिक सीमाओं के भीतर उसका प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है। यह अधिकार भारत की लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था की महत्वपूर्ण नींव है।

लेकिन धार्मिक स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और दूसरे नागरिकों के मौलिक अधिकारों का सम्मान करना आवश्यक है।

भारत की विविधता की असली ताकत इसी संतुलन में है—हर व्यक्ति को अपनी आस्था के साथ जीने की आजादी मिले और किसी दूसरे व्यक्ति की आस्था, गरिमा या अधिकारों को नुकसान न पहुंचे।

इसलिए संविधान का संदेश केवल इतना नहीं है कि “मेरा धर्म मुझे स्वतंत्रता देता है”, बल्कि यह भी है कि मेरी स्वतंत्रता के साथ दूसरे नागरिक की स्वतंत्रता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।


                                                                                                                                        आलोक कुमार