इस मामले की पृष्ठभूमि जांजगीर-चांपा जिले के गोधना गांव से जुड़ी है, जहां दो याचिकाकर्ता अपने निजी आवास में वर्ष 2016 से शांतिपूर्ण ढंग से प्रार्थना सभाओं का आयोजन कर रहे थे। इन सभाओं में किसी प्रकार की अव्यवस्था, शोर-शराबा या कानून-व्यवस्था को प्रभावित करने वाली गतिविधि की कोई शिकायत नहीं थी। इसके बावजूद स्थानीय पुलिस ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 94 के तहत तीन अलग-अलग तिथियों—18 अक्टूबर 2025, 22 नवंबर 2025 और 1 फरवरी 2026—को नोटिस जारी कर इन सभाओं को बंद करने का निर्देश दिया।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए कहा कि उन्होंने प्रारंभ में ग्राम पंचायत से अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) भी प्राप्त किया था, जिसे बाद में दबाव में वापस ले लिया गया। उनका तर्क था कि निजी आवास में आयोजित होने वाली प्रार्थना सभा के लिए किसी प्रकार की प्रशासनिक अनुमति की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए, विशेषकर तब जब वह पूरी तरह शांतिपूर्ण हो और किसी कानून का उल्लंघन न कर रही हो।
अदालत ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन, प्रचार और प्रसार करने का अधिकार देता है। यह अधिकार अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित है, जो धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। अदालत ने कहा कि जब कोई व्यक्ति अपने घर के भीतर सीमित दायरे में प्रार्थना या पूजा करता है, तो यह उसकी निजी स्वतंत्रता का हिस्सा है, और इसमें प्रशासनिक हस्तक्षेप का कोई औचित्य नहीं बनता।
जस्टिस चंद्रवंशी ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस द्वारा जारी किए गए नोटिस न केवल अनुचित थे, बल्कि वे नागरिकों के मौलिक अधिकारों में हस्तक्षेप भी थे। अदालत ने इन नोटिसों को रद्द करते हुए पुलिस को सख्त निर्देश दिया कि वह पूछताछ या अन्य किसी बहाने से याचिकाकर्ताओं को परेशान न करे। यह टिप्पणी प्रशासनिक तंत्र के लिए एक चेतावनी के रूप में देखी जा सकती है कि कानून के नाम पर अधिकारों का अतिक्रमण स्वीकार्य नहीं है।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह छूट केवल निजी आवास और शांतिपूर्ण सभाओं तक ही सीमित है। यदि कोई सभा सार्वजनिक स्थान पर आयोजित की जाती है या उसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल होकर कानून-व्यवस्था को प्रभावित करने की संभावना उत्पन्न करते हैं, तो ऐसे मामलों में प्रशासन को हस्तक्षेप करने का अधिकार रहेगा। इस प्रकार अदालत ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सार्वजनिक व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया है।
इस फैसले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह उस सामाजिक संदर्भ में आया है, जहां छत्तीसगढ़ में विशेष रूप से मसीही समाज की प्रार्थना सभाओं को लेकर विवाद और तनाव की स्थिति बनी हुई थी। कई स्थानों पर ऐसी शिकायतें सामने आई थीं कि निजी घरों में आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों को लेकर अनावश्यक हस्तक्षेप किया जा रहा है। ऐसे में हाईकोर्ट का यह निर्णय प्रभावित समुदायों के लिए राहत और भरोसे का संदेश लेकर आया है।
सरकार की ओर से पेश हुए उप शासकीय अधिवक्ता ने याचिकाकर्ताओं के आपराधिक इतिहास का हवाला देते हुए पुलिस कार्रवाई को उचित ठहराने की कोशिश की थी। हालांकि अदालत ने इस तर्क को महत्व नहीं दिया और स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का पूर्व रिकॉर्ड उसके वर्तमान संवैधानिक अधिकारों को स्वतः सीमित नहीं कर सकता, जब तक कि वह वर्तमान में कोई कानून का उल्लंघन न कर रहा हो। यह टिप्पणी न्यायिक निष्पक्षता और विधि के शासन (Rule of Law) की भावना को मजबूत करती है।
यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक नजीर (precedent) के रूप में काम कर सकता है, जहां प्रशासन और नागरिकों के बीच अधिकारों को लेकर विवाद उत्पन्न होते हैं। यह स्पष्ट करता है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों की निजी स्वतंत्रता सर्वोपरि है, और राज्य का कर्तव्य है कि वह इन अधिकारों की रक्षा करे, न कि उन्हें सीमित करने का प्रयास करे।
अंततः, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह निर्णय भारतीय संविधान की मूल भावना—स्वतंत्रता, समानता और धर्मनिरपेक्षता—को सुदृढ़ करता है। यह न केवल धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग न्यायसंगत और संतुलित तरीके से हो। ऐसे फैसले एक स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान होते हैं, जहां न्यायपालिका नागरिकों के अधिकारों की संरक्षक के रूप में अपनी भूमिका को प्रभावी ढंग से निभाती है।
आलोक कुमार
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
welcome your comment on https://chingariprimenews.blogspot.com/