मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

विश्व स्वास्थ्य दिवस 2026

               एनजीओ की घटती भूमिका और बदलता परिदृश्य

र साल 7 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। यह दिन केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि समाज को यह याद दिलाने का अवसर है कि स्वास्थ्य सबसे बड़ा धन है। गांव हो या शहर, गरीब हो या अमीर, हर व्यक्ति के जीवन में स्वास्थ्य की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है।

पहले के समय में जब विश्व स्वास्थ्य दिवस आता था, तो गांव-गांव में, शहरों में, चौक-चौराहों पर स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम देखने को मिलते थे। खासकर एनजीओ (गैर-सरकारी संगठन) इस दिन को बड़े उत्साह के साथ मनाते थे। मुफ्त स्वास्थ्य जांच शिविर, दवा वितरण, स्वच्छता अभियान, टीकाकरण जागरूकता—ये सब आम बात थी।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों में एक बदलाव साफ तौर पर महसूस किया जा रहा है। 2014 के बाद जब केंद्र में नई सरकार आई, तब से एनजीओ सेक्टर पर नियंत्रण और निगरानी बढ़ाई गई। इसका असर धीरे-धीरे जमीनी स्तर पर दिखाई देने लगा।

आज स्थिति यह है कि पहले की तरह बड़े पैमाने पर कार्यक्रम कम हो गए हैं या फिर औपचारिकता भर रह गए हैं। गांवों में जहां पहले स्वास्थ्य शिविर लगते थे, वहां अब सन्नाटा सा नजर आता है। लोगों को भी लगता है कि पहले जैसी सक्रियता अब नहीं रही।

इस बदलाव के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण है फंडिंग पर सख्ती। पहले कई एनजीओ को देश-विदेश से फंड मिलता था, जिससे वे बड़े स्तर पर कार्यक्रम आयोजित कर पाते थे। लेकिन अब नियम कड़े होने के कारण छोटे और मध्यम स्तर के संगठनों के लिए काम करना मुश्किल हो गया है।

दूसरी तरफ, सरकार का भी अपना एक नजरिया है। सरकार का मानना है कि पारदर्शिता जरूरी है और जो भी संगठन काम करें, वे नियमों के तहत और साफ तरीके से करें। यह बात अपने आप में गलत नहीं है। लेकिन जब नियम बहुत ज्यादा सख्त हो जाते हैं, तो उसका असर उन छोटे संगठनों पर भी पड़ता है जो ईमानदारी से काम कर रहे होते हैं।

जमीनी स्तर पर काम करने वाले कई कार्यकर्ता बताते हैं कि पहले जहां एक कॉल पर गांव में कैंप लग जाता था, अब उसके लिए कई स्तर की अनुमति लेनी पड़ती है। इससे काम की गति धीमी हो जाती है और कई बार लोग हतोत्साहित भी हो जाते हैं।

इसका असर सीधे आम जनता पर पड़ता है। खासकर गरीब और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग, जो सरकारी अस्पतालों तक आसानी से नहीं पहुंच पाते, वे पहले एनजीओ के कार्यक्रमों पर निर्भर रहते थे। अब उनके पास विकल्प कम हो गए हैं।

हालांकि यह भी सच है कि सरकार ने अपनी तरफ से कई स्वास्थ्य योजनाएं शुरू की हैं। आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं ने लाखों लोगों को लाभ पहुंचाया है। सरकारी अस्पतालों में सुविधाएं भी पहले से बेहतर हुई हैं। लेकिन हर जगह सरकारी व्यवस्था पूरी तरह से नहीं पहुंच पाती, वहां एनजीओ की भूमिका अभी भी जरूरी है।

आज के समय में एनजीओ का काम पूरी तरह बंद नहीं हुआ है, बल्कि उसका रूप बदल गया है। कई संगठन अब छोटे स्तर पर, सीमित संसाधनों के साथ काम कर रहे हैं। कुछ ने डिजिटल माध्यम अपनाया है, जहां वे सोशल मीडिया के जरिए जागरूकता फैला रहे हैं।

लेकिन सच्चाई यह है कि जो असर पहले जमीनी कार्यक्रमों से होता था, वह डिजिटल माध्यम से पूरी तरह नहीं हो पाता। गांव में जाकर लोगों से सीधे बात करना, उनकी समस्याएं समझना और तुरंत समाधान देना—यह काम अभी भी सबसे प्रभावी तरीका है।

विश्व स्वास्थ्य दिवस जैसे मौके पर यह सवाल उठना जरूरी है कि क्या हम उस दिशा में जा रहे हैं, जहां समाज के सबसे कमजोर वर्ग तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंच रही हैं? या फिर हम केवल कागजों और रिपोर्टों तक सीमित हो रहे हैं?

जरूरत इस बात की है कि सरकार और एनजीओ के बीच एक संतुलन बनाया जाए। नियम जरूरी हैं, लेकिन वे इतने जटिल न हों कि काम करना ही मुश्किल हो जाए। जो संगठन सही तरीके से काम कर रहे हैं, उन्हें प्रोत्साहन मिलना चाहिए।

इसके साथ ही समाज की भी जिम्मेदारी है। हमें यह समझना होगा कि स्वास्थ्य केवल सरकार या किसी एक संस्था की जिम्मेदारी नहीं है। यह हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है।

अगर हम सच में चाहते हैं कि विश्व स्वास्थ्य दिवस का महत्व बना रहे, तो हमें जमीनी स्तर पर फिर से सक्रियता लानी होगी। छोटे-छोटे प्रयास भी बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

अंत में यही कहा जा सकता है कि समय बदल रहा है, व्यवस्था बदल रही है, लेकिन स्वास्थ्य की जरूरत कभी कम नहीं होगी। इसलिए जरूरी है कि हर स्तर पर मिलकर काम किया जाए, ताकि कोई भी व्यक्ति स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित न रहे।

विश्व स्वास्थ्य दिवस केवल एक दिन नहीं, बल्कि एक सोच है—एक जिम्मेदारी है, जिसे हमें हर दिन निभाना चाहिए।

आलोक कुमार

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