बुधवार, 8 अप्रैल 2026

इतिहास की विरासत और वर्तमान की राजनीति

                              जन-अपेक्षाओं के निरंतर विकास की यात्रा

भारतीय लोकतंत्र का इतिहास केवल सत्ता परिवर्तन की कहानी नहीं, बल्कि विचारों, नीतियों और जन-अपेक्षाओं के निरंतर विकास की यात्रा भी है। 1947 से लेकर 2013 तक का लंबा कालखंड, जिसमें मुख्य रूप से Indian National Congress का प्रभाव रहा, देश के संस्थागत निर्माण का दौर माना जाता है। इसी अवधि में संविधान की जड़ें मजबूत हुईं, सार्वजनिक संस्थानों का विस्तार हुआ और भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बनानी शुरू की। लेकिन इस दौर पर समय-समय पर भ्रष्टाचार, नीतिगत सुस्ती और प्रशासनिक अक्षमता के आरोप भी लगते रहे, जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

वर्ष 2014 के बाद जब Bharatiya Janata Party सत्ता में आई, तो उसने स्वयं को परिवर्तन और निर्णायक नेतृत्व के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया। सरकार ने तेज़ फैसलों, बुनियादी ढांचे के विस्तार, डिजिटल क्रांति और वैश्विक कूटनीति में सक्रियता को अपनी उपलब्धियों के रूप में रेखांकित किया। यह भी स्पष्ट है कि शासन की शैली में बदलाव आया—जहां पहले विमर्श और संस्थागत प्रक्रिया पर जोर था, वहीं अब परिणाम और गति को प्राथमिकता दी गई।

हालांकि, यह तुलना जितनी आकर्षक लगती है, उतनी ही जटिल भी है। पूर्ववर्ती सरकारों को केवल असफलताओं के चश्मे से देखना न तो ऐतिहासिक न्याय है और न ही वर्तमान की उपलब्धियों का वास्तविक मूल्यांकन। उसी प्रकार, वर्तमान शासन को पूर्णतः आदर्श बताना भी लोकतांत्रिक विवेक के अनुरूप नहीं कहा जा सकता।

राजनीतिक विमर्श में अक्सर आरोप-प्रत्यारोप हावी हो जाते हैं—जैसे नेताओं के बयान, जिनमें अतीत को पूरी तरह नकारने और वर्तमान को सर्वश्रेष्ठ सिद्ध करने की प्रवृत्ति दिखती है। लेकिन लोकतंत्र में सच्चाई इन दोनों के बीच कहीं संतुलन में होती है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि देश का नागरिक न तो अतीत के प्रति अंध विरोध रखे और न ही वर्तमान के प्रति अंध समर्थन। बल्कि वह तथ्यों, नीतियों और उनके वास्तविक प्रभाव के आधार पर अपनी राय बनाए।

अंततः, भारत की ताकत किसी एक दल या एक कालखंड में नहीं, बल्कि उसकी निरंतरता और विविधता में निहित है। इतिहास और वर्तमान के बीच संतुलन बनाकर ही भविष्य की मजबूत नींव रखी जा सकती है।

आलोक कुमार

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