शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

हर दम ठगे गए हैं, इस बार भी ठगे गए

 हर दम ठगे गए हैं, इस बार भी ठगे गए

देश के लाखों पेंशनभोगियों के मन में आज यही पीड़ा गूंज रही है—“हर दम ठगे गए हैं, इस बार भी ठगे गए।” विशेषकर Employees' Pension Scheme 1995 (EPS-95) से जुड़े बुजुर्गों की यह भावना केवल शब्द नहीं, बल्कि वर्षों की उपेक्षा, अधूरी उम्मीदों और टूटे वादों की कहानी है।

पिछले कई सालों से EPS-95 पेंशनधारक एक ही मांग को लेकर संघर्ष कर रहे हैं—न्यूनतम पेंशन ₹7500 हो और महंगाई के अनुसार बढ़ोतरी (DA) भी मिले। यह मांग कोई विलासिता नहीं, बल्कि गरिमामय जीवन जीने का न्यूनतम आधार है। लेकिन हर बार जब उम्मीदें जागती हैं, तब कोई न कोई नया भ्रम, नया वादा या अधूरा आश्वासन सामने आ जाता है।

सोशल मीडिया और यूट्यूब पर अक्सर ऐसे वीडियो वायरल होते हैं जिनमें “पेंशन बढ़ गई”, “सरकार ने मंजूरी दे दी”, “अब मिलेगा ₹7500+” जैसे दावे किए जाते हैं। ये दावे देखकर बुजुर्गों के दिल में एक बार फिर उम्मीद जगती है। वे सोचते हैं कि अब शायद उनकी जिंदगी में कुछ राहत आएगी। लेकिन जब सच्चाई सामने आती है, तो वही पुराना दर्द फिर उभर आता है—उम्मीद टूट जाती है, विश्वास कमजोर हो जाता है।

यह केवल सूचना की कमी नहीं, बल्कि एक तरह का भावनात्मक शोषण भी है। जिन लोगों ने अपनी पूरी जिंदगी नौकरी और सेवा में गुजार दी, आज वही लोग बुढ़ापे में सम्मानजनक जीवन के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ₹1000 या ₹1500 की पेंशन में आज के समय में जीवन यापन करना लगभग असंभव है। महंगाई लगातार बढ़ रही है, दवाइयों का खर्च बढ़ता जा रहा है, लेकिन पेंशन वहीं की वहीं है।

सरकार और संबंधित संस्थाओं को यह समझना होगा कि यह मुद्दा केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मानवीय भी है। जब देश के वरिष्ठ नागरिक अपने हक के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर हो जाते हैं, तो यह किसी भी लोकतंत्र के लिए चिंताजनक संकेत है। कई बार प्रतिनिधिमंडल मिला, ज्ञापन दिए गए, आश्वासन भी मिले—लेकिन ठोस निर्णय अब तक नहीं आया।

इस पूरे घटनाक्रम में एक और चिंताजनक पहलू है—सूचना का भ्रम। डिजिटल युग में जानकारी जितनी तेजी से फैलती है, उतनी ही तेजी से गलत जानकारी भी फैलती है। ऐसे में पेंशनभोगियों को बार-बार भ्रमित होना पड़ता है। हर नई खबर उन्हें उम्मीद देती है, और हर अधूरी सच्चाई उन्हें फिर से निराश कर देती है।

अब सवाल यह है कि आखिर कब तक? कब तक ये लोग सिर्फ वादों और अफवाहों के सहारे जिएंगे? कब उनकी वास्तविक समस्याओं का समाधान होगा? क्या उनकी उम्र और उनकी जरूरतें किसी ठोस निर्णय की हकदार नहीं हैं?

आज जरूरत है पारदर्शिता की, स्पष्ट नीति की और संवेदनशील निर्णय की। पेंशनभोगियों को भ्रम नहीं, भरोसा चाहिए। उन्हें वायरल वीडियो नहीं, वास्तविक आदेश चाहिए। उन्हें आश्वासन नहीं, अधिकार चाहिए।

अंततः यही कहा जा सकता है कि यदि इस बार भी कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो यह केवल एक और निराशा नहीं होगी, बल्कि उन लाखों लोगों के विश्वास पर गहरा आघात होगा जिन्होंने अपने जीवन के स्वर्णिम वर्ष देश की सेवा में समर्पित कर दिए।

“हर दम ठगे गए हैं, इस बार भी ठगे गए”—यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि अब समय आ गया है जब शब्दों से आगे बढ़कर कर्म दिखाना होगा।

आलोक कुमार

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