✦ Latest News Loading...
नरेंद्र मोदी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
नरेंद्र मोदी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 16 अगस्त 2026

India : अब देश में ‘दिमागी नक्सल’ का नारा

 


अब देश में ‘दिमागी नक्सल’ का नारा: असहमति और लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा

क्या अब बंदूक से नहीं, विचारों से लड़ी जाएगी नक्सलवाद की लड़ाई? और अगर विचारों की लड़ाई होगी, तो लोकतांत्रिक असहमति और हिंसक विचारधारा के बीच सीमा कौन तय करेगा?

15 अगस्त 2026 को लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के इस्तेमाल ने स्वतंत्रता दिवस के राजनीतिक विमर्श को एक नई दिशा दे दी। प्रधानमंत्री ने माओवादी और नक्सली हिंसा के खिलाफ सरकार की कार्रवाई का उल्लेख करते हुए कहा कि बंदूक उठाने वाले नक्सलवाद के साथ-साथ ऐसी मानसिकता रखने वालों को भी पहचानना और अलग-थलग करना जरूरी है। इस बयान के बाद राजनीतिक दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के बीच बहस तेज हो गई है।

यह विवाद केवल एक राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं है। इसके पीछे लोकतंत्र का एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल खड़ा है—क्या किसी हिंसक विचारधारा के वैचारिक समर्थन और सरकार की लोकतांत्रिक आलोचना के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सकेगा?

प्रधानमंत्री के बयान को सरकार के नजरिए से देखें तो उसका तर्क समझ में आता है। भारत लंबे समय से माओवादी हिंसा और सशस्त्र उग्रवाद की चुनौती का सामना करता रहा है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए हिंसा, हथियारबंद विद्रोह और संवैधानिक व्यवस्था को बलपूर्वक कमजोर करने का प्रयास गंभीर सुरक्षा चुनौती है। ऐसे मामलों में राज्य का कानून लागू करना और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना उसका दायित्व है।

लेकिन समस्या उस समय शुरू होती है जब हिंसक नक्सलवाद और शांतिपूर्ण असहमति के बीच की रेखा अस्पष्ट हो जाए।

लोकतंत्र की खूबसूरती ही यही है कि नागरिक सरकार से सवाल कर सकता है। कोई बेरोजगारी पर सवाल उठा सकता है, महंगाई का विरोध कर सकता है, किसी कानून को गलत बता सकता है, सरकारी योजना की कमियां गिना सकता है या संसद और सरकार की नीतियों की आलोचना कर सकता है। पत्रकार सत्ता से कठिन प्रश्न पूछ सकता है। विद्यार्थी विश्वविद्यालय परिसर में बहस कर सकते हैं। लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता किसी नीति के खिलाफ अपनी राय रख सकते हैं।

इन गतिविधियों को अपने आप में नक्सली या राष्ट्रविरोधी मान लेना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक होगा।

यही वजह है कि ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के बाद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इसकी परिभाषा क्या है?

प्रधानमंत्री के बयान पर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि इस तरह के राजनीतिक विशेषण सरकार के आलोचकों को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं। कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने तो व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है। इससे विवाद और राजनीतिक हो गया।

वहीं सत्ता पक्ष का तर्क अलग है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रधानमंत्री के बयान की व्याख्या करते हुए कहा कि इसका संकेत उन लोगों की ओर है जो लोकतंत्र और देश की संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ नक्सली या ‘अर्बन नक्सल’ जैसी विचारधारा फैलाने का प्रयास करते हैं। यानी सरकार का पक्ष यह है कि निशाना सामान्य आलोचना नहीं, बल्कि ऐसी विचारधारा है जो हिंसा और संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने का समर्थन करती है।

यहीं से लोकतांत्रिक बहस की असली कसौटी सामने आती है।

किसी विचार से असहमति को उस विचार के हिंसक होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

अगर कोई नागरिक सरकार की आलोचना करता है तो पहले यह देखा जाना चाहिए कि वह क्या कह रहा है, किस तरीके से कह रहा है और क्या वह हिंसा का समर्थन करता है। केवल सरकार विरोधी होना किसी व्यक्ति को नक्सली नहीं बना देता। इसी तरह किसी नीति का विरोध करना संविधान-विरोधी गतिविधि नहीं है।

भारत का लोकतंत्र इसी विविधता पर खड़ा है। यहां सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका है। सरकार को निर्णय लेने का अधिकार है और विपक्ष को सवाल पूछने का। मीडिया को सरकार की उपलब्धियां बताने के साथ उसकी कमियां उजागर करने का भी अधिकार है। विश्वविद्यालयों में विचारों का टकराव होना लोकतांत्रिक समाज की स्वाभाविक प्रक्रिया है।

इसलिए रास्ता बेहद स्पष्ट होना चाहिए—विचार का जवाब विचार से और अपराध का जवाब कानून से।

यदि कोई व्यक्ति वास्तव में हिंसा को बढ़ावा देता है, हथियारबंद विद्रोह का समर्थन करता है या संवैधानिक व्यवस्था को हिंसक तरीके से समाप्त करने की कोशिश करता है, तो उसके खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि कोई व्यक्ति शांतिपूर्ण तरीके से सरकार की आलोचना कर रहा है, तो उसे केवल राजनीतिक लेबल देकर अलग-थलग करना लोकतंत्र की भावना के विपरीत होगा।

‘दिमागी नक्सल’ शब्द की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि कहीं यह धीरे-धीरे राजनीतिक असहमति का पर्याय न बन जाए।

आज यदि सत्ता पक्ष के आलोचक को ‘दिमागी नक्सल’ कहा जाएगा और कल किसी दूसरी सरकार के विरोधी को कोई दूसरा राजनीतिक लेबल दिया जाएगा, तो सार्वजनिक बहस मुद्दों से हटकर आरोपों और पहचान की राजनीति में बदल सकती है।

स्वतंत्रता दिवस का महत्व यहां और बढ़ जाता है। 15 अगस्त केवल ब्रिटिश शासन से मिली स्वतंत्रता की स्मृति नहीं है। यह उस लोकतांत्रिक यात्रा की याद भी है जिसमें भारतीय नागरिक ने अपनी आवाज, अधिकार और राजनीतिक भागीदारी के लिए संघर्ष किया।

स्वतंत्रता का अर्थ केवल देश की सीमाओं की सुरक्षा नहीं, बल्कि विचार रखने की स्वतंत्रता, सवाल पूछने की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण असहमति की जगह भी है।

इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि लोकतंत्र हिंसा को स्वीकार करे। लोकतंत्र हिंसा और शांतिपूर्ण असहमति के बीच स्पष्ट अंतर करता है। हिंसा कानून का विषय है, जबकि विचार लोकतांत्रिक बहस का।

इसलिए प्रधानमंत्री के बयान को सबसे सुरक्षित लोकतांत्रिक अर्थ में तभी देखा जा सकता है जब ‘दिमागी नक्सल’ से आशय केवल उन लोगों से हो जो वास्तव में हिंसक माओवादी विचारधारा या सशस्त्र विद्रोह का समर्थन करते हैं। लेकिन यदि यह शब्द पत्रकारों, विद्यार्थियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, विपक्षी नेताओं या आम नागरिकों की शांतिपूर्ण आलोचना के लिए इस्तेमाल होने लगे, तो यह गंभीर लोकतांत्रिक चिंता पैदा करेगा।

आज जरूरत किसी नए राजनीतिक लेबल की नहीं, बल्कि स्पष्ट परिभाषा और संवैधानिक मर्यादा की है।

क्योंकि किसी भी सरकार की शक्ति केवल उसके बहुमत में नहीं होती। उसकी वास्तविक लोकतांत्रिक ताकत इस बात में भी दिखाई देती है कि वह अपने आलोचकों को कितना स्थान देती है।

नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई सुरक्षा बलों, विकास और कानून के माध्यम से लड़ी जा सकती है। लेकिन लोकतंत्र की रक्षा केवल सहमति से नहीं होती। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब सत्ता के सामने सवाल पूछने की जगह बनी रहे।

इसलिए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द से शुरू हुई बहस का असली प्रश्न यही है—क्या यह हिंसक विचारधारा के खिलाफ चेतावनी बनेगा या असहमति पर नया राजनीतिक लेबल?

इसका उत्तर केवल सरकार या विपक्ष को नहीं देना है। इसका उत्तर पूरे लोकतांत्रिक समाज को देना होगा।

क्योंकि बंदूक का मुकाबला कानून कर सकता है, लेकिन विचारों का मुकाबला केवल विचारों से ही किया जा सकता है। और लोकतंत्र में असहमति दुश्मनी नहीं—लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा है।

शनिवार, 15 अगस्त 2026

India : असली आजादी 2014 में मिली तो अटल बिहारी वाजपेयी का दौर क्या था?

 


असली आजादी 2014 में मिली तो अटल बिहारी वाजपेयी का दौर क्या था?

 आजादी की तारीख इतिहास तय करता है, राजनीति नहीं। अगर 2014 से पहले का भारत “असली आजाद” नहीं था, तो अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 1998 से 2004 तक चली भाजपा सरकार को किस रूप में देखा जाएगा?

भारत को 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता मिली। यह स्वतंत्रता किसी एक राजनीतिक दल, नेता या सरकार की देन नहीं थी, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के लंबे संघर्ष, असंख्य बलिदानों और करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं का परिणाम थी। इसके बाद देश ने लोकतांत्रिक संविधान अपनाया, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव कराए और सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण की लोकतांत्रिक परंपरा विकसित की।

ऐसे में जब यह कहा जाता है कि भारत को “असली आजादी” 2014 के बाद मिली, तो यह इतिहास का तथ्य कम और राजनीतिक व्याख्या अधिक बन जाता है।

भाजपा सांसद कंगना रनौत के 2014 के बाद “असली आजादी” मिलने संबंधी पुराने बयान को लेकर भी इसी कारण बहस होती रही है। 2014 के बाद भारत में क्या बदला, इस पर खुलकर चर्चा हो सकती है। सरकार की उपलब्धियों, नीतियों, आर्थिक फैसलों, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक बदलावों का मूल्यांकन भी लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या 1947 से 2014 तक की भारत की पूरी लोकतांत्रिक यात्रा को ही कमतर करके 2014 को एक निर्णायक शुरुआत के रूप में पेश किया जाना चाहिए?

यहीं भाजपा के अपने इतिहास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—अटल बिहारी वाजपेयी का दौर।

अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के सबसे बड़े और सम्मानित नेताओं में रहे। वे 1996 में थोड़े समय के लिए प्रधानमंत्री बने और फिर 1998 से 2004 तक प्रधानमंत्री के रूप में देश का नेतृत्व किया। उस समय भी भारत वही लोकतांत्रिक गणराज्य था, जिसकी नींव 1947 की स्वतंत्रता और 1950 के संविधान के बाद मजबूत हुई थी।

तो यदि 2014 से पहले का भारत “असली आजाद” भारत नहीं था, तो 1998 से 2004 के बीच का भारत क्या था?

क्या उस समय भारतीय नागरिकों को मतदान का अधिकार नहीं था?

क्या देश में लोकतांत्रिक चुनाव नहीं होते थे?

क्या संसद अस्तित्व में नहीं थी?

क्या सरकार जनता के जनादेश से नहीं बनी थी?

और क्या भाजपा स्वयं उस लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं थी?

इन सवालों का उत्तर स्वाभाविक रूप से हाँ है—भारत तब भी एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य था। जनता सरकार चुनती थी, सरकारें बदलती थीं और संविधान देश के शासन का आधार था।

वाजपेयी का दौर भाजपा की राजनीतिक विरासत का महत्वपूर्ण अध्याय है। उनके नेतृत्व में भारत ने कई महत्वपूर्ण घटनाओं और चुनौतियों का सामना किया। पोखरण-II परमाणु परीक्षणों के बाद भारत की रणनीतिक स्थिति पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा हुई। 1999 का कारगिल युद्ध भी उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल की बड़ी घटनाओं में शामिल रहा। उसी दौर में राष्ट्रीय राजमार्ग विकास, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और संचार क्षेत्र में विस्तार जैसे मुद्दे भी राजनीतिक चर्चा के केंद्र में रहे।

इसलिए 2014 को भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण सत्ता परिवर्तन मानना बिल्कुल उचित है, लेकिन उसे भारत की आजादी का दूसरा जन्म बताना ऐतिहासिक दृष्टि से अलग तरह का दावा है।

2014 एक राजनीतिक परिवर्तन का वर्ष है; 1947 एक राष्ट्रीय स्वतंत्रता का वर्ष।

दोनों घटनाओं का महत्व अलग है।

यही अंतर लोकतांत्रिक विमर्श को स्वस्थ बनाता है। किसी सरकार की उपलब्धियों को रेखांकित करने के लिए देश के पिछले 67 वर्षों को असफल या अधूरा बताना आवश्यक नहीं है। इसी तरह 2014 से पहले की सरकारों की उपलब्धियों को स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं है कि 2014 के बाद हुए बदलावों से असहमति नहीं हो सकती।

भारत की कहानी किसी एक सरकार से शुरू नहीं होती और किसी एक सरकार पर खत्म भी नहीं होती।

कांग्रेस के शासन में देश ने कई संस्थाएं और नीतियां विकसित कीं। जनता पार्टी के दौर में सत्ता परिवर्तन की लोकतांत्रिक क्षमता सामने आई। भाजपा के नेतृत्व वाली वाजपेयी सरकार ने अपनी अलग राजनीतिक और आर्थिक पहचान बनाई। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकारों ने आर्थिक नीति, अधिकार आधारित कानूनों और विभिन्न सामाजिक योजनाओं के माध्यम से अपनी छाप छोड़ी। 2014 के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भी अनेक नीतिगत और राजनीतिक बदलाव हुए।

इन सभी चरणों को जोड़कर ही आधुनिक भारत की तस्वीर बनती है।

देश की आजादी किसी एक पार्टी की संपत्ति नहीं है।

15 अगस्त 1947 का महत्व इसलिए नहीं है कि उस दिन कोई एक सरकार सत्ता में आई थी। उसका महत्व इसलिए है कि सदियों की गुलामी और औपनिवेशिक शासन के बाद भारत ने अपने भविष्य का फैसला स्वयं करने का अधिकार हासिल किया था।

इसी तरह 2014 का महत्व इसलिए है कि उस वर्ष केंद्र में सत्ता का एक बड़ा राजनीतिक परिवर्तन हुआ। लेकिन सत्ता परिवर्तन और स्वतंत्रता प्राप्ति को समान अर्थ देना इतिहास और राजनीति के बीच की सीमा को धुंधला कर सकता है।

भाजपा यदि 2014 के बाद की उपलब्धियों पर गर्व करती है, तो उसे पूरा अधिकार है। लेकिन उसी राजनीतिक विरासत का हिस्सा होने के कारण उसे अटल बिहारी वाजपेयी के दौर पर भी गर्व होना चाहिए।

क्योंकि यदि वाजपेयी का शासन भाजपा की लोकतांत्रिक विरासत का गौरवपूर्ण अध्याय है, तो यह स्वीकार करना भी जरूरी है कि 2014 से पहले का भारत गुलाम भारत नहीं था।

वह वही भारत था जिसने संविधान को स्वीकार किया, चुनावों की लंबी परंपरा बनाई, सत्ता परिवर्तन देखे, युद्ध झेले, आर्थिक संकटों से निकला, विज्ञान और तकनीक में आगे बढ़ा और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अपनी पहचान कायम की।

इसलिए बहस यह नहीं होनी चाहिए कि “असली आजादी” किस सरकार के समय मिली।

बहस यह होनी चाहिए कि आजादी मिलने के बाद भारत को और अधिक स्वतंत्र, समान, सुरक्षित, समृद्ध और लोकतांत्रिक बनाने के लिए किस सरकार ने क्या किया।

क्योंकि किसी पुराने दौर को छोटा करके किसी नए दौर की उपलब्धि बड़ी नहीं होती।

लोकतंत्र की असली ताकत यही है कि हर सरकार अपने काम से इतिहास में जगह बनाए—इतिहास को अपनी सुविधा के अनुसार दोबारा परिभाषित करके नहीं।


आलोक कुमार