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India : असली आजादी 2014 में मिली तो अटल बिहारी वाजपेयी का दौर क्या था?

 


असली आजादी 2014 में मिली तो अटल बिहारी वाजपेयी का दौर क्या था?

 आजादी की तारीख इतिहास तय करता है, राजनीति नहीं। अगर 2014 से पहले का भारत “असली आजाद” नहीं था, तो अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 1998 से 2004 तक चली भाजपा सरकार को किस रूप में देखा जाएगा?

भारत को 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता मिली। यह स्वतंत्रता किसी एक राजनीतिक दल, नेता या सरकार की देन नहीं थी, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के लंबे संघर्ष, असंख्य बलिदानों और करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं का परिणाम थी। इसके बाद देश ने लोकतांत्रिक संविधान अपनाया, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव कराए और सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण की लोकतांत्रिक परंपरा विकसित की।

ऐसे में जब यह कहा जाता है कि भारत को “असली आजादी” 2014 के बाद मिली, तो यह इतिहास का तथ्य कम और राजनीतिक व्याख्या अधिक बन जाता है।

भाजपा सांसद कंगना रनौत के 2014 के बाद “असली आजादी” मिलने संबंधी पुराने बयान को लेकर भी इसी कारण बहस होती रही है। 2014 के बाद भारत में क्या बदला, इस पर खुलकर चर्चा हो सकती है। सरकार की उपलब्धियों, नीतियों, आर्थिक फैसलों, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक बदलावों का मूल्यांकन भी लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या 1947 से 2014 तक की भारत की पूरी लोकतांत्रिक यात्रा को ही कमतर करके 2014 को एक निर्णायक शुरुआत के रूप में पेश किया जाना चाहिए?

यहीं भाजपा के अपने इतिहास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—अटल बिहारी वाजपेयी का दौर।

अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के सबसे बड़े और सम्मानित नेताओं में रहे। वे 1996 में थोड़े समय के लिए प्रधानमंत्री बने और फिर 1998 से 2004 तक प्रधानमंत्री के रूप में देश का नेतृत्व किया। उस समय भी भारत वही लोकतांत्रिक गणराज्य था, जिसकी नींव 1947 की स्वतंत्रता और 1950 के संविधान के बाद मजबूत हुई थी।

तो यदि 2014 से पहले का भारत “असली आजाद” भारत नहीं था, तो 1998 से 2004 के बीच का भारत क्या था?

क्या उस समय भारतीय नागरिकों को मतदान का अधिकार नहीं था?

क्या देश में लोकतांत्रिक चुनाव नहीं होते थे?

क्या संसद अस्तित्व में नहीं थी?

क्या सरकार जनता के जनादेश से नहीं बनी थी?

और क्या भाजपा स्वयं उस लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं थी?

इन सवालों का उत्तर स्वाभाविक रूप से हाँ है—भारत तब भी एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य था। जनता सरकार चुनती थी, सरकारें बदलती थीं और संविधान देश के शासन का आधार था।

वाजपेयी का दौर भाजपा की राजनीतिक विरासत का महत्वपूर्ण अध्याय है। उनके नेतृत्व में भारत ने कई महत्वपूर्ण घटनाओं और चुनौतियों का सामना किया। पोखरण-II परमाणु परीक्षणों के बाद भारत की रणनीतिक स्थिति पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा हुई। 1999 का कारगिल युद्ध भी उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल की बड़ी घटनाओं में शामिल रहा। उसी दौर में राष्ट्रीय राजमार्ग विकास, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और संचार क्षेत्र में विस्तार जैसे मुद्दे भी राजनीतिक चर्चा के केंद्र में रहे।

इसलिए 2014 को भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण सत्ता परिवर्तन मानना बिल्कुल उचित है, लेकिन उसे भारत की आजादी का दूसरा जन्म बताना ऐतिहासिक दृष्टि से अलग तरह का दावा है।

2014 एक राजनीतिक परिवर्तन का वर्ष है; 1947 एक राष्ट्रीय स्वतंत्रता का वर्ष।

दोनों घटनाओं का महत्व अलग है।

यही अंतर लोकतांत्रिक विमर्श को स्वस्थ बनाता है। किसी सरकार की उपलब्धियों को रेखांकित करने के लिए देश के पिछले 67 वर्षों को असफल या अधूरा बताना आवश्यक नहीं है। इसी तरह 2014 से पहले की सरकारों की उपलब्धियों को स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं है कि 2014 के बाद हुए बदलावों से असहमति नहीं हो सकती।

भारत की कहानी किसी एक सरकार से शुरू नहीं होती और किसी एक सरकार पर खत्म भी नहीं होती।

कांग्रेस के शासन में देश ने कई संस्थाएं और नीतियां विकसित कीं। जनता पार्टी के दौर में सत्ता परिवर्तन की लोकतांत्रिक क्षमता सामने आई। भाजपा के नेतृत्व वाली वाजपेयी सरकार ने अपनी अलग राजनीतिक और आर्थिक पहचान बनाई। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकारों ने आर्थिक नीति, अधिकार आधारित कानूनों और विभिन्न सामाजिक योजनाओं के माध्यम से अपनी छाप छोड़ी। 2014 के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भी अनेक नीतिगत और राजनीतिक बदलाव हुए।

इन सभी चरणों को जोड़कर ही आधुनिक भारत की तस्वीर बनती है।

देश की आजादी किसी एक पार्टी की संपत्ति नहीं है।

15 अगस्त 1947 का महत्व इसलिए नहीं है कि उस दिन कोई एक सरकार सत्ता में आई थी। उसका महत्व इसलिए है कि सदियों की गुलामी और औपनिवेशिक शासन के बाद भारत ने अपने भविष्य का फैसला स्वयं करने का अधिकार हासिल किया था।

इसी तरह 2014 का महत्व इसलिए है कि उस वर्ष केंद्र में सत्ता का एक बड़ा राजनीतिक परिवर्तन हुआ। लेकिन सत्ता परिवर्तन और स्वतंत्रता प्राप्ति को समान अर्थ देना इतिहास और राजनीति के बीच की सीमा को धुंधला कर सकता है।

भाजपा यदि 2014 के बाद की उपलब्धियों पर गर्व करती है, तो उसे पूरा अधिकार है। लेकिन उसी राजनीतिक विरासत का हिस्सा होने के कारण उसे अटल बिहारी वाजपेयी के दौर पर भी गर्व होना चाहिए।

क्योंकि यदि वाजपेयी का शासन भाजपा की लोकतांत्रिक विरासत का गौरवपूर्ण अध्याय है, तो यह स्वीकार करना भी जरूरी है कि 2014 से पहले का भारत गुलाम भारत नहीं था।

वह वही भारत था जिसने संविधान को स्वीकार किया, चुनावों की लंबी परंपरा बनाई, सत्ता परिवर्तन देखे, युद्ध झेले, आर्थिक संकटों से निकला, विज्ञान और तकनीक में आगे बढ़ा और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अपनी पहचान कायम की।

इसलिए बहस यह नहीं होनी चाहिए कि “असली आजादी” किस सरकार के समय मिली।

बहस यह होनी चाहिए कि आजादी मिलने के बाद भारत को और अधिक स्वतंत्र, समान, सुरक्षित, समृद्ध और लोकतांत्रिक बनाने के लिए किस सरकार ने क्या किया।

क्योंकि किसी पुराने दौर को छोटा करके किसी नए दौर की उपलब्धि बड़ी नहीं होती।

लोकतंत्र की असली ताकत यही है कि हर सरकार अपने काम से इतिहास में जगह बनाए—इतिहास को अपनी सुविधा के अनुसार दोबारा परिभाषित करके नहीं।


आलोक कुमार


India : संसद की गरिमा और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी

 

"संसद शब्दों का रणक्षेत्र नहीं, लोकतंत्र का मंदिर है। यहां विचारों की गरिमा जितनी ऊंची होगी, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा।"संसद में बढ़ती व्यक्तिगत बयानबाजी, ऐतिहासिक नेताओं पर टिप्पणियां और जनहित के मुद्दों से भटकती राजनीति पर आधारित यह संपादकीय लोकतांत्रिक मर्यादा और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी का विश्लेषण करता है।

लोकतंत्र में संसद केवल कानून बनाने की संस्था नहीं है, बल्कि यह देश की लोकतांत्रिक चेतना, संवाद और जवाबदेही का सर्वोच्च मंच भी है। यहां होने वाली हर बहस, हर टिप्पणी और हर निर्णय देश के करोड़ों नागरिकों के विश्वास से जुड़ा होता है। इसलिए संसद में प्रयुक्त भाषा, व्यवहार और तर्क केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे लोकतांत्रिक संस्कृति की दिशा भी तय करते हैं। संसद शब्दों का रणक्षेत्र नहीं, बल्कि विचारों का ऐसा मंच है जहां मतभेदों के बीच भी मर्यादा और सम्मान बनाए रखना आवश्यक है।

हाल के वर्षों में संसद के भीतर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप पहले की तुलना में अधिक तीखे हुए हैं। कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि बहस का केंद्र जनहित के मुद्दों से हटकर व्यक्तिगत टिप्पणियों और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों पर विवादित बयानबाजी बन जाता है। जब कोई जनप्रतिनिधि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करता है और दूसरी ओर वर्तमान नेतृत्व को बिना किसी आलोचनात्मक दृष्टि के संत या देवता जैसी उपमाएं देता है, तब यह स्वस्थ लोकतांत्रिक विमर्श नहीं माना जा सकता। ऐसी भाषा न केवल राजनीतिक संवाद का स्तर गिराती है, बल्कि संसद की गरिमा पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।

इतिहास किसी एक व्यक्ति या एक विचारधारा की संपत्ति नहीं होता। देश के निर्माण में विभिन्न नेताओं का अलग-अलग समय पर महत्वपूर्ण योगदान रहा है। किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व का मूल्यांकन तथ्यों, नीतियों, उपलब्धियों और कमियों के आधार पर होना चाहिए। लोकतंत्र आलोचना का स्वागत करता है, लेकिन आलोचना और अपमान में स्पष्ट अंतर होता है। यदि राजनीतिक बहस तथ्यों के बजाय कटाक्ष और चरित्र-हनन पर आधारित हो जाए, तो उसका लाभ लोकतंत्र को नहीं, बल्कि राजनीतिक ध्रुवीकरण को मिलता है।

भारत की संसदीय परंपरा हमेशा से समृद्ध रही है। अतीत में सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी वैचारिक असहमति के बावजूद भाषा की मर्यादा बनाए रखने के अनेक उदाहरण मिलते हैं। नेताओं ने एक-दूसरे की नीतियों का कठोर विरोध किया, लेकिन व्यक्तिगत सम्मान को बनाए रखा। यही लोकतांत्रिक परिपक्वता की पहचान है। आज आवश्यकता इस बात की है कि संसद उसी स्वस्थ परंपरा को फिर से मजबूत करे, जहां तर्क का उत्तर तर्क से दिया जाए, न कि व्यक्तिगत टिप्पणियों से।

जनता सांसदों को संसद में इसलिए नहीं भेजती कि वे विरोधियों के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करें या किसी नेता का गुणगान करें। मतदाता उनसे अपेक्षा करता है कि वे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि, महंगाई, महिलाओं की सुरक्षा, युवाओं के भविष्य, पर्यावरण, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय विकास जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा करें। संसद का प्रत्येक मिनट जनता के कर से संचालित होता है। इसलिए वहां होने वाली हर बहस का केंद्र जनहित होना चाहिए, न कि राजनीतिक प्रचार।

लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों की समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सत्ता पक्ष का दायित्व नीतियां बनाना और उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करना है, जबकि विपक्ष का दायित्व सरकार से सवाल पूछना, कमियों की ओर ध्यान दिलाना और वैकल्पिक सुझाव देना है। यदि कोई सांसद विरोधियों की आलोचना तो करता है, लेकिन सत्ता पक्ष के प्रति अपनी आलोचनात्मक दृष्टि पूरी तरह खो देता है, तो वह लोकतांत्रिक जवाबदेही की मूल भावना को कमजोर करता है। इसी प्रकार यदि विपक्ष केवल विरोध के लिए विरोध करे और रचनात्मक सुझाव न दे, तो वह भी लोकतंत्र के उद्देश्य को पूरा नहीं करता।

संसद में प्रयुक्त भाषा का प्रभाव केवल सदन तक सीमित नहीं रहता। आज टेलीविजन, इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से संसद की कार्यवाही देश के हर नागरिक तक पहुंचती है। युवा पीढ़ी अपने जनप्रतिनिधियों को देखकर राजनीतिक संस्कृति सीखती है। यदि संसद में अपमानजनक भाषा सामान्य बन जाएगी, तो समाज में भी संवाद की गुणवत्ता प्रभावित होगी। इसके विपरीत यदि सांसद संयम, तथ्य और शालीनता के साथ अपनी बात रखेंगे, तो लोकतांत्रिक मूल्यों को नई मजबूती मिलेगी।

व्यक्तिपूजा भी लोकतंत्र के लिए उतनी ही चुनौती है जितनी व्यक्तिगत अपमान की राजनीति। लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई भी नेता आलोचना से ऊपर नहीं होता और न ही कोई ऐसा व्यक्ति होता है जिसके योगदान को अपमानजनक भाषा में खारिज कर दिया जाए। हर सरकार की उपलब्धियों का स्वागत होना चाहिए और उसकी कमियों पर सवाल भी उठने चाहिए। यही लोकतंत्र की आत्मा है। किसी भी नेता को देवत्व प्रदान करना या किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को केवल राजनीतिक लाभ के लिए अपमानित करना लोकतांत्रिक संतुलन को कमजोर करता है।

आज देश अनेक महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना कर रहा है। रोजगार के अवसर बढ़ाना, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना, स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाना, किसानों की आय बढ़ाना, तकनीकी विकास, जलवायु परिवर्तन, सामाजिक समानता और आर्थिक प्रगति जैसे विषय संसद की प्राथमिकता होने चाहिए। यदि बहुमूल्य संसदीय समय व्यक्तिगत आरोपों और राजनीतिक कटाक्ष में व्यतीत होगा, तो सबसे बड़ा नुकसान देश की जनता का होगा, जिसने अपने प्रतिनिधियों पर भरोसा करके उन्हें संसद तक पहुंचाया है।

लोकतंत्र की शक्ति बहस में होती है, लेकिन बहस तभी सार्थक होती है जब उसमें सम्मान, तथ्य और जिम्मेदारी शामिल हो। संसद का दायित्व किसी व्यक्ति-विशेष का महिमामंडन करना नहीं, बल्कि संविधान की भावना के अनुरूप जनता के हितों की रक्षा करना है। जनप्रतिनिधियों की वास्तविक पहचान उनके भाषणों की तीखी भाषा से नहीं, बल्कि जनता के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने वाले कार्यों से होती है।

संसद की गरिमा तभी बनी रहेगी, जब वहां व्यक्तिगत आरोपों, अपमानजनक शब्दों और व्यक्तिपूजा के स्थान पर नीति, विकास, संवैधानिक मूल्यों और जनहित पर गंभीर, तथ्यपरक और जिम्मेदार चर्चा होगी। यही लोकतंत्र की असली पहचान है और यही वह अपेक्षा है जो देश की जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों से करती है।

आलोक कुमार

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