"संसद शब्दों का रणक्षेत्र नहीं, लोकतंत्र का मंदिर है। यहां विचारों की गरिमा जितनी ऊंची होगी, लोकतंत्र उतना ही मजबूत होगा।"संसद में बढ़ती व्यक्तिगत बयानबाजी, ऐतिहासिक नेताओं पर टिप्पणियां और जनहित के मुद्दों से भटकती राजनीति पर आधारित यह संपादकीय लोकतांत्रिक मर्यादा और जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी का विश्लेषण करता है।
लोकतंत्र में संसद केवल कानून बनाने की संस्था नहीं है, बल्कि यह देश की लोकतांत्रिक चेतना, संवाद और जवाबदेही का सर्वोच्च मंच भी है। यहां होने वाली हर बहस, हर टिप्पणी और हर निर्णय देश के करोड़ों नागरिकों के विश्वास से जुड़ा होता है। इसलिए संसद में प्रयुक्त भाषा, व्यवहार और तर्क केवल राजनीतिक दलों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वे लोकतांत्रिक संस्कृति की दिशा भी तय करते हैं। संसद शब्दों का रणक्षेत्र नहीं, बल्कि विचारों का ऐसा मंच है जहां मतभेदों के बीच भी मर्यादा और सम्मान बनाए रखना आवश्यक है।
हाल के वर्षों में संसद के भीतर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप पहले की तुलना में अधिक तीखे हुए हैं। कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि बहस का केंद्र जनहित के मुद्दों से हटकर व्यक्तिगत टिप्पणियों और ऐतिहासिक व्यक्तित्वों पर विवादित बयानबाजी बन जाता है। जब कोई जनप्रतिनिधि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करता है और दूसरी ओर वर्तमान नेतृत्व को बिना किसी आलोचनात्मक दृष्टि के संत या देवता जैसी उपमाएं देता है, तब यह स्वस्थ लोकतांत्रिक विमर्श नहीं माना जा सकता। ऐसी भाषा न केवल राजनीतिक संवाद का स्तर गिराती है, बल्कि संसद की गरिमा पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है।
इतिहास किसी एक व्यक्ति या एक विचारधारा की संपत्ति नहीं होता। देश के निर्माण में विभिन्न नेताओं का अलग-अलग समय पर महत्वपूर्ण योगदान रहा है। किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व का मूल्यांकन तथ्यों, नीतियों, उपलब्धियों और कमियों के आधार पर होना चाहिए। लोकतंत्र आलोचना का स्वागत करता है, लेकिन आलोचना और अपमान में स्पष्ट अंतर होता है। यदि राजनीतिक बहस तथ्यों के बजाय कटाक्ष और चरित्र-हनन पर आधारित हो जाए, तो उसका लाभ लोकतंत्र को नहीं, बल्कि राजनीतिक ध्रुवीकरण को मिलता है।
भारत की संसदीय परंपरा हमेशा से समृद्ध रही है। अतीत में सत्ता और विपक्ष के बीच तीखी वैचारिक असहमति के बावजूद भाषा की मर्यादा बनाए रखने के अनेक उदाहरण मिलते हैं। नेताओं ने एक-दूसरे की नीतियों का कठोर विरोध किया, लेकिन व्यक्तिगत सम्मान को बनाए रखा। यही लोकतांत्रिक परिपक्वता की पहचान है। आज आवश्यकता इस बात की है कि संसद उसी स्वस्थ परंपरा को फिर से मजबूत करे, जहां तर्क का उत्तर तर्क से दिया जाए, न कि व्यक्तिगत टिप्पणियों से।
जनता सांसदों को संसद में इसलिए नहीं भेजती कि वे विरोधियों के लिए अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करें या किसी नेता का गुणगान करें। मतदाता उनसे अपेक्षा करता है कि वे शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, कृषि, महंगाई, महिलाओं की सुरक्षा, युवाओं के भविष्य, पर्यावरण, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय विकास जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा करें। संसद का प्रत्येक मिनट जनता के कर से संचालित होता है। इसलिए वहां होने वाली हर बहस का केंद्र जनहित होना चाहिए, न कि राजनीतिक प्रचार।
लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों की समान रूप से महत्वपूर्ण भूमिका होती है। सत्ता पक्ष का दायित्व नीतियां बनाना और उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करना है, जबकि विपक्ष का दायित्व सरकार से सवाल पूछना, कमियों की ओर ध्यान दिलाना और वैकल्पिक सुझाव देना है। यदि कोई सांसद विरोधियों की आलोचना तो करता है, लेकिन सत्ता पक्ष के प्रति अपनी आलोचनात्मक दृष्टि पूरी तरह खो देता है, तो वह लोकतांत्रिक जवाबदेही की मूल भावना को कमजोर करता है। इसी प्रकार यदि विपक्ष केवल विरोध के लिए विरोध करे और रचनात्मक सुझाव न दे, तो वह भी लोकतंत्र के उद्देश्य को पूरा नहीं करता।
संसद में प्रयुक्त भाषा का प्रभाव केवल सदन तक सीमित नहीं रहता। आज टेलीविजन, इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से संसद की कार्यवाही देश के हर नागरिक तक पहुंचती है। युवा पीढ़ी अपने जनप्रतिनिधियों को देखकर राजनीतिक संस्कृति सीखती है। यदि संसद में अपमानजनक भाषा सामान्य बन जाएगी, तो समाज में भी संवाद की गुणवत्ता प्रभावित होगी। इसके विपरीत यदि सांसद संयम, तथ्य और शालीनता के साथ अपनी बात रखेंगे, तो लोकतांत्रिक मूल्यों को नई मजबूती मिलेगी।
व्यक्तिपूजा भी लोकतंत्र के लिए उतनी ही चुनौती है जितनी व्यक्तिगत अपमान की राजनीति। लोकतांत्रिक व्यवस्था में कोई भी नेता आलोचना से ऊपर नहीं होता और न ही कोई ऐसा व्यक्ति होता है जिसके योगदान को अपमानजनक भाषा में खारिज कर दिया जाए। हर सरकार की उपलब्धियों का स्वागत होना चाहिए और उसकी कमियों पर सवाल भी उठने चाहिए। यही लोकतंत्र की आत्मा है। किसी भी नेता को देवत्व प्रदान करना या किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व को केवल राजनीतिक लाभ के लिए अपमानित करना लोकतांत्रिक संतुलन को कमजोर करता है।
आज देश अनेक महत्वपूर्ण चुनौतियों का सामना कर रहा है। रोजगार के अवसर बढ़ाना, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारना, स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाना, किसानों की आय बढ़ाना, तकनीकी विकास, जलवायु परिवर्तन, सामाजिक समानता और आर्थिक प्रगति जैसे विषय संसद की प्राथमिकता होने चाहिए। यदि बहुमूल्य संसदीय समय व्यक्तिगत आरोपों और राजनीतिक कटाक्ष में व्यतीत होगा, तो सबसे बड़ा नुकसान देश की जनता का होगा, जिसने अपने प्रतिनिधियों पर भरोसा करके उन्हें संसद तक पहुंचाया है।
लोकतंत्र की शक्ति बहस में होती है, लेकिन बहस तभी सार्थक होती है जब उसमें सम्मान, तथ्य और जिम्मेदारी शामिल हो। संसद का दायित्व किसी व्यक्ति-विशेष का महिमामंडन करना नहीं, बल्कि संविधान की भावना के अनुरूप जनता के हितों की रक्षा करना है। जनप्रतिनिधियों की वास्तविक पहचान उनके भाषणों की तीखी भाषा से नहीं, बल्कि जनता के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने वाले कार्यों से होती है।
संसद की गरिमा तभी बनी रहेगी, जब वहां व्यक्तिगत आरोपों, अपमानजनक शब्दों और व्यक्तिपूजा के स्थान पर नीति, विकास, संवैधानिक मूल्यों और जनहित पर गंभीर, तथ्यपरक और जिम्मेदार चर्चा होगी। यही लोकतंत्र की असली पहचान है और यही वह अपेक्षा है जो देश की जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों से करती है।
आलोक कुमार
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