Bihar : प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में गरीब छात्रों की मुश्किलें

 


प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में गरीब छात्रों की मुश्किलें

पटना। बिहार में प्रतियोगी परीक्षाएं लाखों युवाओं के लिए सरकारी नौकरी तक पहुंचने का सबसे बड़ा रास्ता मानी जाती हैं। गांव से लेकर शहर तक बड़ी संख्या में विद्यार्थी रेलवे, बैंकिंग, शिक्षक भर्ती, पुलिस, एसएससी, लोक सेवा आयोग और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं। लेकिन इस तैयारी की दौड़ में सभी अभ्यर्थियों की परिस्थितियां एक जैसी नहीं होतीं।

किसी विद्यार्थी के पास महंगी कोचिंग, बेहतर इंटरनेट, अलग कमरा, लैपटॉप और पर्याप्त किताबें हैं तो किसी दूसरे विद्यार्थी के सामने पढ़ाई के साथ-साथ परिवार का खर्च संभालने की जिम्मेदारी भी हो सकती है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आने वाले युवाओं के लिए प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी केवल पढ़ाई का सवाल नहीं रह जाती। यह रोजमर्रा की जरूरतों और बेहतर भविष्य की उम्मीद के बीच संघर्ष बन जाती है।

तैयारी शुरू करने से पहले ही खर्च की चुनौती

प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी में सबसे पहली बाधा आर्थिक होती है। किताबें, नोट्स, ऑनलाइन कोर्स, टेस्ट सीरीज, इंटरनेट, आवेदन शुल्क, यात्रा और परीक्षा केंद्र तक पहुंचने का खर्च लगातार जुड़ता जाता है।

एक गरीब परिवार के लिए इनमें से हर खर्च महत्वपूर्ण होता है। जहां संपन्न परिवार का विद्यार्थी जरूरत पड़ने पर नया मोबाइल, लैपटॉप, किताब या कोर्स खरीद सकता है, वहीं आर्थिक रूप से कमजोर छात्र कई बार यह तय करने को मजबूर होता है कि इस महीने कौन-सी किताब खरीदी जाए और कौन-सा खर्च टाला जाए।

कई विद्यार्थियों के लिए समस्या परीक्षा शुल्क तक सीमित नहीं रहती। अलग-अलग परीक्षाओं के लिए बार-बार आवेदन करने, परीक्षा देने दूसरे शहर जाने और रहने-खाने का खर्च भी जुड़ जाता है।

पटना जैसे शहरों में रहने का खर्च

बिहार के ग्रामीण इलाकों से बड़ी संख्या में विद्यार्थी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पटना जैसे शहरों का रुख करते हैं। उन्हें लगता है कि यहां पुस्तकालय, कोचिंग संस्थान, शिक्षकों और दूसरे अभ्यर्थियों का बेहतर वातावरण मिलेगा।

लेकिन शहर में रहना अपने आप में महंगा है।

कमरे का किराया, बिजली, भोजन, इंटरनेट और आने-जाने का खर्च मिलाकर हर महीने एक निश्चित राशि की जरूरत होती है। कई विद्यार्थी किराया बचाने के लिए दो-तीन या उससे अधिक साथियों के साथ एक कमरा साझा करते हैं।

कुछ विद्यार्थी पुस्तकालय की फीस बचाने के लिए घर, किराये के कमरे या दूसरे सीमित संसाधनों में पढ़ाई करते हैं। गर्मी, बिजली की समस्या, इंटरनेट की दिक्कत और रहने की असुविधा भी उनकी तैयारी को प्रभावित कर सकती है।

यहां सवाल यह नहीं है कि गरीब विद्यार्थी मेहनत कर रहे हैं या नहीं। सवाल यह है कि क्या उन्हें मेहनत करने के लिए जरूरी वातावरण भी मिल रहा है?

कोचिंग और संसाधनों की असमानता

आज प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का बड़ा हिस्सा डिजिटल माध्यमों पर भी निर्भर करता है। ऑनलाइन क्लास, टेस्ट सीरीज, मोबाइल एप, डिजिटल नोट्स और वीडियो लेक्चर ने पढ़ाई के अवसर जरूर बढ़ाए हैं, लेकिन इसके बावजूद डिजिटल संसाधनों तक समान पहुंच अभी चुनौती बनी हुई है।

जिस विद्यार्थी के पास अच्छा स्मार्टफोन, तेज इंटरनेट और ऑनलाइन कोर्स खरीदने की क्षमता है, वह घर बैठे कई शिक्षकों और अध्ययन सामग्री तक पहुंच सकता है।

दूसरी तरफ गरीब विद्यार्थी अक्सर मुफ्त वीडियो, पुराने नोट्स, साझा किए गए पीडीएफ और उधार की किताबों पर निर्भर रहते हैं।

इससे यह जरूरी नहीं कि उसकी प्रतिभा कम हो। लेकिन तैयारी के संसाधनों में अंतर उसके प्रदर्शन को प्रभावित कर सकता है।

पढ़ाई के साथ काम करने की मजबूरी

गरीब परिवार के सामने सबसे कठिन स्थिति तब आती है जब विद्यार्थी को पढ़ाई के साथ कमाई भी करनी पड़ती है।

कई युवा पार्ट टाइम काम, ट्यूशन, दुकान, डिलीवरी, डेटा एंट्री या दूसरे छोटे काम करके अपनी पढ़ाई का खर्च निकालते हैं। कुछ विद्यार्थियों को परिवार की आर्थिक मदद के लिए भी काम करना पड़ता है।

ऐसे विद्यार्थी के पास प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए उतना समय नहीं बचता जितना पूर्णकालिक तैयारी करने वाले विद्यार्थी के पास होता है।

सुबह काम, दिन में पढ़ाई और रात में दोबारा तैयारी—यह दिनचर्या लंबे समय तक जारी रखना आसान नहीं है।

इसके बावजूद अनेक गरीब विद्यार्थी वर्षों तक प्रयास करते रहते हैं। उनकी कहानी केवल परीक्षा में सफलता या असफलता से नहीं समझी जा सकती।

असफलता का आर्थिक बोझ

प्रतियोगी परीक्षा में असफल होना किसी भी विद्यार्थी के लिए निराशाजनक होता है। लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थी के लिए इसका असर और गंभीर हो सकता है।

एक परीक्षा के बाद दूसरी परीक्षा की तैयारी के लिए फिर किताबें, फॉर्म, यात्रा, टेस्ट और रहने का खर्च जुटाना पड़ता है।

संपन्न परिवार का विद्यार्थी असफल होने के बाद एक या दो वर्ष और तैयारी कर सकता है। गरीब परिवार के विद्यार्थी के सामने कई बार सवाल होता है कि अगले साल तक घर का खर्च कौन चलाएगा?

यही कारण है कि आर्थिक मजबूरी कई प्रतिभाशाली युवाओं को उनकी मंजिल तक पहुंचने से पहले ही तैयारी छोड़ने पर मजबूर कर देती है।

क्या समान परीक्षा का मतलब समान अवसर है?

यहां एक महत्वपूर्ण सामाजिक सवाल खड़ा होता है।

सभी विद्यार्थियों के लिए एक जैसी परीक्षा आयोजित कर देना जरूरी है, लेकिन केवल परीक्षा समान होने से अवसर समान नहीं हो जाते।

यदि एक विद्यार्थी के पास महंगी कोचिंग, बेहतर तकनीकी संसाधन और शांत अध्ययन वातावरण है और दूसरे विद्यार्थी के पास किताब खरीदने तक के लिए पर्याप्त पैसा नहीं है, तो दोनों की शुरुआती परिस्थितियां अलग हैं।

इसलिए समान अवसर का अर्थ केवल समान परीक्षा नहीं, बल्कि तैयारी के लिए न्यूनतम आवश्यक संसाधनों तक समान पहुंच भी होना चाहिए।

सरकारी पुस्तकालय बन सकते हैं बड़ा सहारा

आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए सरकारी और सार्वजनिक पुस्तकालय महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

हर जिले और अनुमंडल स्तर पर आधुनिक अध्ययन केंद्र विकसित किए जा सकते हैं, जहां विद्यार्थियों को शांत वातावरण, इंटरनेट, प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबें, समाचार पत्र और डिजिटल अध्ययन सामग्री उपलब्ध हो।

ग्रामीण क्षेत्रों में भी ऐसे अध्ययन केंद्र विकसित किए जाएं तो छात्रों को तैयारी के लिए बड़े शहरों की ओर जाने की मजबूरी कुछ हद तक कम हो सकती है।

छात्रावास और छात्रवृत्ति की जरूरत

गरीब और ग्रामीण विद्यार्थियों के लिए सस्ती या निःशुल्क छात्रावास व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है।

यदि किसी विद्यार्थी को रहने और भोजन की न्यूनतम सुविधा मिल जाए तो वह अपनी ऊर्जा पढ़ाई पर लगा सकता है। इसी तरह आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों के लिए छात्रवृत्ति, परीक्षा शुल्क में राहत और अध्ययन सामग्री की सहायता उपयोगी साबित हो सकती है।

लेकिन सहायता केवल कागजों पर नहीं होनी चाहिए। आवेदन की प्रक्रिया सरल, पारदर्शी और समयबद्ध होनी चाहिए ताकि वास्तविक जरूरतमंद विद्यार्थी उसका लाभ उठा सकें।

मुफ्त मार्गदर्शन भी जरूरी

हर गरीब विद्यार्थी को महंगी कोचिंग उपलब्ध नहीं हो सकती। ऐसे में सरकारी संस्थानों, विश्वविद्यालयों और सामाजिक संगठनों के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण निःशुल्क मार्गदर्शन उपलब्ध कराया जा सकता है।

विशेषज्ञ शिक्षक ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम, रणनीति, समय प्रबंधन, टेस्ट प्रैक्टिस और परीक्षा की तैयारी के बारे में मार्गदर्शन दे सकते हैं।

इससे कोचिंग और गैर-कोचिंग विद्यार्थियों के बीच मौजूद अंतर कुछ कम किया जा सकता है।

प्रतिभा पैसे की मोहताज क्यों हो?

बिहार में गरीब परिवारों से आने वाले विद्यार्थियों में प्रतिभा और मेहनत की कमी नहीं है। समस्या अक्सर संसाधनों की होती है।

एक ऐसा विद्यार्थी जो दिन में कई घंटे काम करने के बाद रात में पढ़ता है, उसकी मेहनत को केवल परीक्षा के अंक से नहीं मापा जा सकता। उसके सामने आर्थिक, सामाजिक और पारिवारिक चुनौतियां भी होती हैं।

इसलिए प्रतियोगी परीक्षाओं की व्यवस्था पर चर्चा करते समय केवल परीक्षा की कठिनाई या परिणाम की बात पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना होगा कि किस विद्यार्थी को तैयारी के लिए कितने संसाधन उपलब्ध थे।

सरकार और समाज की साझा जिम्मेदारी

गरीब विद्यार्थियों को मजबूत करना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। समाज, शिक्षण संस्थान, पुस्तकालय, सामाजिक संगठन और निजी संस्थाएं भी इसमें भूमिका निभा सकती हैं।

जरूरत इस बात की है कि आर्थिक रूप से कमजोर युवाओं के लिए ऐसा वातावरण बनाया जाए जहां उनकी प्रतिभा संसाधनों की कमी के कारण दब न जाए।

गरीबी किसी विद्यार्थी की प्रतिभा का प्रमाण नहीं है और महंगी कोचिंग किसी की सफलता की गारंटी नहीं।

प्रतियोगी परीक्षा की असली भावना तभी मजबूत होगी जब गांव के गरीब परिवार का विद्यार्थी भी यह विश्वास कर सके कि उसके पास तैयारी करने का वास्तविक अवसर है।

आखिर सवाल केवल यह नहीं है कि परीक्षा में कौन सफल हुआ। बड़ा सवाल यह है कि कितने प्रतिभाशाली विद्यार्थी पैसे, संसाधनों और परिस्थितियों की कमी के कारण परीक्षा की दौड़ से बाहर हो गए?

बिहार के भविष्य के लिए जरूरी है कि आर्थिक स्थिति किसी युवा की मंजिल तय न करे। जिस विद्यार्थी में प्रतिभा, मेहनत और आगे बढ़ने की इच्छा है, उसके लिए संसाधनों की कमी दीवार नहीं, बल्कि व्यवस्था द्वारा दूर की जाने वाली बाधा होनी चाहिए।




आलोक कुमार

Bihar : बिहार में शिक्षा बनाम रोजगार: डिग्री के बाद युवा कहां जाए?

 


बिहार में शिक्षा बनाम रोजगार: डिग्री के बाद युवा कहां जाए?

पटना। बिहार में शिक्षा का विस्तार हुआ है। गांव-कस्बों तक कॉलेज पहुंचे हैं, हर साल बड़ी संख्या में विद्यार्थी स्नातक और स्नातकोत्तर की डिग्री लेकर निकल रहे हैं। लेकिन शिक्षा के इस विस्तार के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा है जिसका जवाब अभी भी स्पष्ट नहीं है—डिग्री मिलने के बाद युवा जाएं तो जाएं कहां?

यह सवाल केवल नौकरी पाने की व्यक्तिगत चिंता नहीं है। यह बिहार की अर्थव्यवस्था, परिवारों की स्थिति, युवाओं के पलायन और राज्य के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है। एक ओर माता-पिता अपने बच्चों की पढ़ाई पर वर्षों तक खर्च करते हैं, दूसरी ओर डिग्री पूरी करने के बाद युवा सरकारी नौकरी की तैयारी, सीमित निजी रोजगार और दूसरे राज्यों में पलायन के बीच अपना रास्ता तलाशते हैं।

डिग्री और नौकरी के बीच बढ़ती दूरी

बीए, बीएससी, बीकॉम, एमए, एमएससी, एमकॉम, बीसीए और बीबीए जैसी डिग्रियां हासिल करने वाले युवाओं की संख्या बढ़ रही है। लेकिन हर डिग्री के बाद रोजगार का स्पष्ट रास्ता दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है।

समस्या केवल रोजगार के अवसरों की संख्या की नहीं है। शिक्षा और रोजगार बाजार की जरूरतों के बीच तालमेल का अभाव भी बड़ी चुनौती है।

कई संस्थानों में पढ़ाई अभी भी परीक्षा और डिग्री हासिल करने के आसपास केंद्रित रहती है। दूसरी ओर निजी क्षेत्र को ऐसे युवाओं की जरूरत होती है जो संचार, कंप्यूटर, डेटा, डिजिटल तकनीक, अकाउंटिंग, ग्राहक सेवा, तकनीकी संचालन और अन्य व्यावहारिक काम कर सकें।

यही कारण है कि डिग्री होने के बावजूद युवा कई बार नौकरी के लिए तैयार महसूस नहीं करते।

सरकारी नौकरी ही पहली पसंद क्यों?

बिहार में सरकारी नौकरी के प्रति आकर्षण को केवल मानसिकता कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। नियमित आय, नौकरी की सुरक्षा, सामाजिक प्रतिष्ठा और परिवार की आर्थिक स्थिरता इसके महत्वपूर्ण कारण हैं।

इसी वजह से हजारों-लाखों युवा रेलवे, बैंकिंग, शिक्षक भर्ती, पुलिस, एसएससी, लोक सेवा आयोग और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं।

मेहनत करने वाले युवाओं की इस आकांक्षा का सम्मान होना चाहिए, लेकिन एक बड़ा सवाल भी सामने है—क्या बिहार की पूरी युवा पीढ़ी का भविष्य सीमित संख्या वाली सरकारी नौकरियों पर निर्भर रह सकता है?

यदि कोई युवा कई वर्षों तक केवल प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करता रहता है और चयन नहीं हो पाता, तो कई बार उसके पास वैकल्पिक रोजगार के लिए आवश्यक अनुभव और कौशल भी नहीं बचता।

इसलिए प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के साथ-साथ युवाओं को दूसरे करियर विकल्पों के बारे में भी समय रहते जानकारी मिलनी चाहिए।

पलायन क्यों बन रहा है मजबूरी?

शिक्षा और रोजगार के बीच मौजूद अंतर का सबसे दिखाई देने वाला परिणाम युवाओं का पलायन है।

बिहार के गांवों और छोटे शहरों से पढ़े-लिखे युवा दिल्ली, मुंबई, पुणे, बेंगलुरु, हैदराबाद, सूरत और दूसरे औद्योगिक शहरों की ओर जाते हैं।

विडंबना यह है कि बिहार का युवा बाहर जाकर निर्माण, परिवहन, होटल, सुरक्षा, डिलीवरी, तकनीकी सेवाओं, निजी कंपनियों और छोटे कारोबारों में काम करता है। इसका अर्थ यह नहीं कि हर युवा अपने राज्य में ही काम करना चाहता है, लेकिन यह जरूर सवाल उठाता है कि जिस श्रम और प्रतिभा की दूसरे राज्यों को जरूरत है, उसके लिए बिहार में पर्याप्त अवसर क्यों नहीं बन पा रहे हैं?

पलायन केवल व्यक्ति के शहर बदलने का मामला नहीं है। इसका असर परिवारों, गांवों की सामाजिक संरचना और स्थानीय बाजार पर भी पड़ता है।

शिक्षित युवतियों के सामने अलग चुनौती

शिक्षित युवतियों के लिए रोजगार की समस्या कई जगह और जटिल हो जाती है।

ग्रामीण और छोटे शहरों में सुरक्षित तथा सम्मानजनक स्थानीय रोजगार के विकल्प सीमित होने पर परिवार बेटियों को दूसरे शहर भेजने में संकोच कर सकते हैं। परिणामस्वरूप उच्च शिक्षा हासिल करने के बावजूद अनेक युवतियां रोजगार बाजार से बाहर रह जाती हैं।

इसलिए रोजगार की चर्चा में केवल नौकरी की संख्या गिनना पर्याप्त नहीं है। महिलाओं के लिए सुरक्षित, स्थानीय और आवश्यकता के अनुसार लचीले रोजगार अवसर भी विकसित करने होंगे।

घर से डिजिटल काम, स्थानीय सेवा क्षेत्र, शिक्षा, स्वास्थ्य, वित्तीय सेवाएं, स्वयं सहायता समूहों से जुड़े कारोबार और छोटे उद्यम ऐसे क्षेत्र हो सकते हैं जिनमें महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जा सकती है।

बिहार में उद्योग और स्थानीय रोजगार का सवाल

बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि की बड़ी भूमिका है। लेकिन बढ़ती युवा आबादी को रोजगार देने के लिए कृषि के साथ अन्य क्षेत्रों का विस्तार भी जरूरी है।

खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, टेक्सटाइल, पर्यटन, लॉजिस्टिक्स, छोटे विनिर्माण, आईटी सेवाएं और कृषि आधारित उद्यम जिलों में रोजगार के नए अवसर पैदा कर सकते हैं।

जरूरत इस बात की है कि रोजगार को केवल राजधानी या बड़े शहरों तक सीमित न रखा जाए। जिलों के स्तर पर रोजगार पैदा करने वाली अर्थव्यवस्था विकसित होने पर युवाओं को अपने घर से दूर जाने की मजबूरी कुछ हद तक कम हो सकती है।

डिग्री के साथ कौशल भी जरूरी

आज के रोजगार बाजार में डिग्री महत्वपूर्ण है, लेकिन अकेली डिग्री पर्याप्त नहीं है।

कॉलेजों में पढ़ाई के साथ इंटर्नशिप, अप्रेंटिसशिप, व्यावसायिक प्रशिक्षण और रोजगारपरक कौशल को अधिक महत्व मिलना चाहिए।

उदाहरण के लिए वाणिज्य के विद्यार्थी को केवल किताबों में अकाउंटिंग पढ़ाने के बजाय अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर, जीएसटी से जुड़े व्यावहारिक काम और वित्तीय प्रबंधन का अनुभव दिया जा सकता है। विज्ञान के विद्यार्थियों को प्रयोगशाला और उद्योग आधारित प्रशिक्षण से जोड़ा जा सकता है। कला के विद्यार्थियों के लिए संचार, डिजिटल मीडिया, शोध, प्रशासन और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े कौशल विकसित किए जा सकते हैं।

विश्वविद्यालयों की जवाबदेही भी तय हो

उच्च शिक्षा संस्थानों की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने विद्यार्थियों ने परीक्षा पास की।

यह भी महत्वपूर्ण है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद विद्यार्थी रोजगार, स्वरोजगार, उच्च शिक्षा या किसी व्यावसायिक क्षेत्र में कितनी प्रगति कर रहे हैं।

कॉलेजों में करियर काउंसिलिंग और प्लेसमेंट सेल केवल नाम के लिए नहीं, बल्कि सक्रिय रूप से काम करने चाहिए। विद्यार्थियों को अंतिम वर्ष तक इंतजार कराने के बजाय पहले से रोजगार बाजार, प्रतियोगी परीक्षाओं, कौशल प्रशिक्षण और उद्यमिता के विकल्प समझाए जाने चाहिए।

स्वरोजगार को भी सम्मान मिले

हर युवा को सरकारी या निजी नौकरी मिलना संभव नहीं है। इसलिए स्वरोजगार और उद्यमिता को भी रोजगार नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाना होगा।

खाद्य प्रसंस्करण, डेयरी, कृषि आधारित कारोबार, डिजिटल सेवाएं, मरम्मत सेवाएं, पर्यटन, हस्तशिल्प और ऑनलाइन कारोबार जैसे क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

लेकिन केवल ऋण उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। युवा उद्यमियों को प्रशिक्षण, बाजार, तकनीक, मार्गदर्शन और शुरुआती दौर में संस्थागत सहयोग भी चाहिए।

सवाल सिर्फ डिग्री का नहीं, भविष्य का है

बिहार में शिक्षा की पहुंच बढ़ना निश्चित रूप से सकारात्मक बदलाव है। लेकिन यदि शिक्षा पूरी करने के बाद रोजगार का रास्ता स्पष्ट नहीं है तो डिग्री युवाओं के लिए अवसर का प्रमाणपत्र बनने के बजाय निराशा का कारण बन सकती है।

अब चुनौती केवल अधिक कॉलेज और पाठ्यक्रम उपलब्ध कराने की नहीं है। असली चुनौती शिक्षा को रोजगार, कौशल और स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ने की है।

बिहार के युवाओं को केवल प्रतियोगी परीक्षाओं की कतार में खड़े होने के लिए तैयार करने के बजाय उन्हें इस तरह शिक्षित और प्रशिक्षित करना होगा कि वे नौकरी पाने के साथ-साथ रोजगार पैदा करने की क्षमता भी विकसित कर सकें।

डिग्री हाथ में हो और रोजगार का रास्ता बंद हो तो इसे केवल युवा की असफलता नहीं कहा जा सकता। यह शिक्षा व्यवस्था, रोजगार बाजार और अर्थव्यवस्था के बीच मौजूद उस खाई का संकेत है जिसे भरना सरकार, विश्वविद्यालय, उद्योग और समाज—सभी की साझा जिम्मेदारी है।

आखिर सवाल यह नहीं है कि बिहार का युवा कितना पढ़ रहा है। असली सवाल यह है कि पढ़ाई पूरी करने के बाद उसके लिए बिहार में कितना भविष्य बचा है?


आलोक कुमार

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