Bihar : पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस

 


बेतिया पल्ली में मरियम के जन्मोत्सव पर आस्था का उत्सव

प्रार्थना, पवित्र मिस्सा और आठ बच्चों के प्रथम परमप्रसाद के साथ मनाया गया पल्ली दिवस

बेतिया। 8 सितंबर का दिन कैथोलिक कलीसिया के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखता है। इस दिन कुवांरी मां मरियम के जन्मोत्सव का पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। पश्चिमी चंपारण के बेतिया पल्ली में भी मरियम के जन्मोत्सव को पल्ली दिवस के रूप में धार्मिक उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने सामूहिक प्रार्थना, पवित्र मिस्सा और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लिया।

बेतिया शहर की पहचान केवल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत से नहीं है, बल्कि यहां की ईसाई धार्मिक परंपरा भी लंबे समय से लोगों के जीवन का हिस्सा रही है। क्रिश्चियन क्वार्टर स्थित नेटिविटी ऑफ द ब्लेस्ड वर्जिन मैरी कैथेड्रल, जिसे आम तौर पर बेतिया कैथेड्रल के नाम से जाना जाता है, स्थानीय कैथोलिक समुदाय के लिए आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र है।

मरियम के जन्मोत्सव के अवसर पर कैथेड्रल परिसर में श्रद्धालुओं की उपस्थिति और धार्मिक वातावरण ने पूरे आयोजन को विशेष बना दिया।

धर्माध्यक्ष के नेतृत्व में हुआ पवित्र मिस्सा

पल्ली दिवस के अवसर पर बेतिया धर्मप्रांत के धर्माध्यक्ष पीटर सेबेस्टियन गोबियस के नेतृत्व में पवित्र मिस्सा अर्पित की गई। इस दौरान उनके साथ फादर एडिशन आर्मस्ट्रॉग, फादर माइकल, फादर पास्कल आनंद, फादर संदीप, फादर विपिन और फादर हेंद्री फर्नांडो सहित अन्य धर्मगुरु उपस्थित रहे।

पवित्र मिस्सा के दौरान कैथेड्रल में श्रद्धा और भक्ति का वातावरण बना रहा। श्रद्धालुओं ने सामूहिक रूप से प्रार्थना की और धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सा लिया। मरियम के जन्मोत्सव को लेकर लोगों में विशेष उत्साह दिखाई दिया।

धार्मिक पर्व का यह अवसर केवल एक परंपरा निभाने तक सीमित नहीं रहा। श्रद्धालुओं के लिए यह दिन अपने विश्वास को और मजबूत करने, प्रार्थना के माध्यम से ईश्वर के करीब आने तथा परिवार और समुदाय के साथ आध्यात्मिक जुड़ाव को महसूस करने का अवसर भी रहा।

आठ बच्चों के लिए यादगार बना दिन

इस समारोह का सबसे भावुक और महत्वपूर्ण क्षण उस समय आया, जब आठ बच्चों ने पहली बार पवित्र परमप्रसाद ग्रहण किया।

धर्माध्यक्ष पीटर सेबेस्टियन गोबियस के करकमलों से बच्चों ने प्रथम परमप्रसाद ग्रहण किया। परमप्रसाद प्रदान करते समय धर्माध्यक्ष ने बच्चों से कहा—“ख्रीस्त का शरीर और रक्त।” बच्चों ने श्रद्धापूर्वक “आमेन” कहा और पवित्र परमप्रसाद ग्रहण किया।

कैथोलिक कलीसिया में प्रथम परमप्रसाद बच्चे के आध्यात्मिक जीवन का महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है। यह बच्चों के लिए केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं होता, बल्कि विश्वास और कलीसियाई जीवन में उनकी भागीदारी के एक महत्वपूर्ण चरण के रूप में देखा जाता है।

इन आठ बच्चों और उनके परिवारों के लिए यह दिन लंबे समय तक याद रहने वाला अवसर बन गया। बच्चों की तैयारी, धार्मिक शिक्षा और प्रथम परमप्रसाद के लिए परिवारों की भूमिका भी इस पूरे आयोजन में महत्वपूर्ण रही।

बाइबल, रोजरी और प्रमाण पत्र देकर किया सम्मानित

पवित्र मिस्सा के समापन के बाद प्रथम परमप्रसाद ग्रहण करने वाले बच्चों को पल्ली की ओर से पवित्र बाइबल, रोजरी और प्रमाण पत्र प्रदान किए गए।

बच्चों के लिए नाश्ते की भी व्यवस्था की गई। उपहार प्राप्त करते समय बच्चों में उत्साह दिखाई दिया। उनके परिजन भी इस विशेष अवसर के साक्षी बने।

किसी भी परिवार के लिए बच्चे का धार्मिक जीवन में एक नए चरण में प्रवेश करना भावनात्मक क्षण होता है। इसलिए प्रथम परमप्रसाद का यह अवसर बच्चों के साथ-साथ उनके माता-पिता और परिजनों के लिए भी विशेष महत्व रखता है।

चर्च के बाद घरों में भी दिखा उत्सव

बेतिया पल्ली दिवस का उत्साह केवल कैथेड्रल परिसर तक सीमित नहीं रहा। धार्मिक कार्यक्रम के बाद कई परिवारों ने अपने घरों में भी सामाजिक आयोजन किए।

रिश्तेदारों, मित्रों और समुदाय के लोगों को आमंत्रित कर साथ में भोजन किया गया। इससे धार्मिक आयोजन में पारिवारिक और सामाजिक जुड़ाव का रंग भी जुड़ गया।

एक ओर चर्च में प्रार्थना और धार्मिक अनुष्ठान हुआ, वहीं दूसरी ओर घरों में परिवार और परिचितों के साथ खुशियां साझा की गईं। इस तरह मरियम के जन्मोत्सव ने आस्था और पारिवारिक एकता को एक साथ जोड़ने का अवसर दिया।

नई पीढ़ी को परंपरा से जोड़ने का अवसर

धार्मिक पर्वों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक विश्वास और परंपरा को पहुंचाने का माध्यम बनते हैं।

बेतिया पल्ली में मरियम के जन्मोत्सव का आयोजन भी इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा। विशेषकर आठ बच्चों का प्रथम परमप्रसाद ग्रहण करना यह दिखाता है कि नई पीढ़ी को धार्मिक शिक्षा और संस्कारों से जोड़ने की प्रक्रिया समुदाय के जीवन का हिस्सा है।

बच्चों के लिए ऐसे आयोजन केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं होते। इनके माध्यम से उन्हें प्रार्थना, धार्मिक मूल्यों, सामुदायिक जीवन और जिम्मेदारी की समझ विकसित करने का अवसर मिलता है।

बेतिया की धार्मिक विरासत से जुड़ा आयोजन

बेतिया की पहचान उसके ऐतिहासिक महत्व के साथ-साथ ईसाई धार्मिक विरासत से भी जुड़ी है। यहां का कैथेड्रल लंबे समय से स्थानीय कैथोलिक समुदाय के धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण केंद्र रहा है।

ऐसे धार्मिक अवसरों पर श्रद्धालुओं का एक साथ जुटना इस विरासत को जीवंत बनाए रखने में भी भूमिका निभाता है। पुरानी पीढ़ी जहां अपनी परंपराओं को आगे बढ़ाती है, वहीं युवा और बच्चे उसमें अपनी भागीदारी के माध्यम से जुड़ते हैं।

यही कारण है कि पल्ली दिवस जैसे आयोजन को केवल धार्मिक अनुष्ठान के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। यह समुदाय के सामाजिक और पारिवारिक जीवन को भी जोड़ने वाला अवसर बन जाता है।

आस्था के साथ समुदाय का संदेश

मरियम के जन्मोत्सव के अवसर पर बेतिया पल्ली में आयोजित कार्यक्रम ने धार्मिक विश्वास के साथ सामुदायिक एकता की तस्वीर भी प्रस्तुत की।

पवित्र मिस्सा में भाग लेने वाले श्रद्धालु, धर्मगुरु, बच्चे और उनके परिवार एक ही धार्मिक आयोजन का हिस्सा बने। प्रथम परमप्रसाद ग्रहण करने वाले बच्चों के लिए पूरे समुदाय की शुभकामनाएं और प्रार्थनाएं इस अवसर को और खास बनाती हैं।

धार्मिक आयोजन की सार्थकता केवल अनुष्ठान पूरा होने में नहीं, बल्कि उससे मिलने वाले संदेश में भी होती है। प्रार्थना, विश्वास, परिवार और समुदाय के बीच संबंध मजबूत करना ऐसे पर्वों की महत्वपूर्ण विशेषता है।

बेतिया पल्ली में मरियम के जन्मोत्सव का पर्व श्रद्धा, प्रार्थना और उल्लास के साथ मनाया गया। धर्माध्यक्ष पीटर सेबेस्टियन गोबियस के नेतृत्व में पवित्र मिस्सा, आठ बच्चों का प्रथम परमप्रसाद और उसके बाद परिवारों में साझा की गई खुशियों ने इस दिन को विशेष बना दिया।

चर्च से लेकर घरों तक उत्सव का माहौल दिखाई दिया। बच्चों को पवित्र बाइबल, रोजरी और प्रमाण पत्र प्रदान करना उनके धार्मिक जीवन के नए चरण का स्वागत भी रहा।

बेतिया का यह पल्ली दिवस इस बात की सुंदर तस्वीर पेश करता है कि धार्मिक पर्व केवल पूजा और अनुष्ठान तक सीमित नहीं होते। वे परिवारों को जोड़ते हैं, नई पीढ़ी को परंपरा से जोड़ते हैं और समुदाय को साथ खड़े होने का अवसर देते हैं।

मरियम के जन्मोत्सव पर बेतिया में यही आस्था, खुशी और सामुदायिक एकता देखने को मिली।

आलोक कुमार

Bihar : ITI और पॉलिटेक्निक के छात्रों को प्रशिक्षण के बाद भी रोजगार क्यों नहीं मिलता?

 


ITI और पॉलिटेक्निक के छात्रों को प्रशिक्षण के बाद भी रोजगार क्यों नहीं मिलता?

हुनर हाथ में है, प्रमाणपत्र जेब में है, फिर भी नौकरी की तलाश खत्म क्यों नहीं होती?

पटना। बिहार सहित देशभर में हर साल बड़ी संख्या में युवा ITI और पॉलिटेक्निक संस्थानों से तकनीकी प्रशिक्षण लेकर निकलते हैं। किसी के हाथ में इलेक्ट्रिशियन का हुनर है, कोई फिटर है, कोई मशीन चलाना जानता है, तो कोई ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स या कंप्यूटर से जुड़ा प्रशिक्षण लेकर रोजगार की उम्मीद करता है। परिवार भी मानता है कि अब बच्चे के लिए कमाई का रास्ता खुल जाएगा।

लेकिन संस्थान से बाहर निकलते ही कई युवाओं को पता चलता है कि प्रशिक्षण पूरा होना और रोजगार मिलना दो अलग-अलग बातें हैं।

यही बिहार के तकनीकी शिक्षा क्षेत्र का एक बड़ा सवाल है। अगर कंपनियों को कुशल कर्मचारियों की जरूरत है और ITI-पॉलिटेक्निक के युवाओं के पास तकनीकी प्रशिक्षण है, तो फिर दोनों के बीच दूरी क्यों बनी हुई है?

असल समस्या केवल नौकरियों की कमी नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या प्रशिक्षण बाजार और उद्योग की बदलती जरूरत के हिसाब से तैयार किया जा रहा है?

प्रमाणपत्र और नौकरी के बीच की दूरी

किसी युवा के पास ITI या पॉलिटेक्निक का प्रमाणपत्र होना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन आज के रोजगार बाजार में सिर्फ प्रमाणपत्र पर्याप्त नहीं है।

कंपनी को ऐसा कर्मचारी चाहिए जो मशीन को समझ सके, तकनीकी समस्या पहचान सके, सुरक्षा नियमों का पालन करे, कंप्यूटर आधारित सिस्टम पर काम कर सके और जरूरत पड़ने पर नई तकनीक सीख सके।

यहीं कई युवाओं को कठिनाई आती है।

अगर संस्थान में प्रशिक्षण के दौरान आधुनिक मशीनों और वास्तविक कार्यस्थल का पर्याप्त अनुभव नहीं मिला, तो नौकरी के इंटरव्यू में प्रमाणपत्र होने के बावजूद व्यावहारिक सवालों का सामना करना मुश्किल हो सकता है।

इसलिए अब प्रशिक्षण की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने छात्र पास हुए।

बड़ा सवाल होना चाहिए—कितने छात्र प्रशिक्षण के बाद काम करने के लिए वास्तव में तैयार हुए?

उद्योग की जरूरत और पाठ्यक्रम में कितना तालमेल?

तकनीक तेजी से बदल रही है। आज उद्योगों में ऑटोमेशन, CNC मशीन, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, सोलर तकनीक, इलेक्ट्रिक वाहन, डिजिटल कंट्रोल और कंप्यूटर आधारित डिजाइन जैसी तकनीकों का महत्व बढ़ रहा है।

ऐसे में तकनीकी शिक्षा भी लगातार बदलनी चाहिए।

अगर छात्र पुरानी तकनीक सीखकर निकलता है और नौकरी देने वाली कंपनी उससे नई मशीन और आधुनिक सिस्टम पर काम करने की उम्मीद करती है, तो दोनों के बीच स्वाभाविक रूप से अंतर पैदा होगा।

इसलिए ITI और पॉलिटेक्निक के पाठ्यक्रम को समय-समय पर उद्योग की वास्तविक जरूरत के अनुसार अपडेट करना जरूरी है।

बाजार बदल रहा है तो प्रशिक्षण भी बदलना होगा।

स्थानीय उद्योग से मजबूत रिश्ता क्यों जरूरी?

बिहार के लिए एक और बड़ी चुनौती है—तकनीकी संस्थानों और स्थानीय उद्योगों के बीच कमजोर जुड़ाव।

जिस जिले या इलाके में ऑटोमोबाइल, निर्माण, कृषि उपकरण, इलेक्ट्रिकल, फर्नीचर, मशीनरी, सोलर या दूसरे तकनीकी कारोबार मौजूद हैं, वहां के प्रशिक्षण संस्थानों को स्थानीय रोजगार बाजार की जरूरत समझनी चाहिए।

अगर किसी क्षेत्र में प्रशिक्षित युवाओं के लिए पर्याप्त स्थानीय अवसर नहीं हैं, तो उन्हें दूसरे राज्यों की ओर जाना पड़ता है।

यही कारण है कि तकनीकी शिक्षा को केवल संस्थान तक सीमित देखने के बजाय उसे स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ना जरूरी है।

बिहार में अगर छोटे उद्योग, MSME, सर्विस सेंटर और तकनीकी व्यवसाय बढ़ते हैं, तो ITI और पॉलिटेक्निक के युवाओं के लिए स्थानीय रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं।

अप्रेंटिसशिप सिर्फ औपचारिकता न बने

कक्षा में किसी मशीन के बारे में पढ़ना और वास्तविक उद्योग में उसी मशीन पर काम करना एक जैसा अनुभव नहीं है।

यहीं अप्रेंटिसशिप महत्वपूर्ण हो जाती है।

अगर प्रशिक्षण के बाद युवा को कंपनी, वर्कशॉप, उद्योग या तकनीकी सेवा केंद्र में वास्तविक काम सीखने का अवसर मिलता है, तो उसके अंदर आत्मविश्वास और व्यावहारिक क्षमता दोनों बढ़ते हैं।

लेकिन अप्रेंटिसशिप को सिर्फ कुछ महीनों का औपचारिक अनुभव बनाकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा।

जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें छात्र को पता हो कि उसे किस क्षेत्र में प्रशिक्षण मिलेगा, किस प्रकार का काम करना होगा और प्रशिक्षण पूरा होने के बाद रोजगार की संभावना क्या है।

अच्छी अप्रेंटिसशिप वह है जो युवा को नौकरी के लिए तैयार करे, सिर्फ अनुभव प्रमाणपत्र न दे।

निजी कंपनियों को भी आगे आना होगा

सरकार हर प्रशिक्षित युवा को सरकारी नौकरी नहीं दे सकती। रोजगार का बड़ा हिस्सा निजी उद्योगों, MSME, निर्माण कंपनियों, सर्विस सेंटर और स्थानीय व्यवसायों से आता है।

इसलिए निजी कंपनियों और तकनीकी संस्थानों के बीच मजबूत साझेदारी जरूरी है।

कंपनियां यह बता सकती हैं कि उन्हें किस प्रकार के कर्मचारियों की जरूरत है। संस्थान उसी अनुसार प्रशिक्षण विकसित कर सकते हैं। कंपनियां छात्रों को इंटर्नशिप और अप्रेंटिसशिप दे सकती हैं और योग्य छात्रों की भर्ती भी कर सकती हैं।

इससे प्रशिक्षण → अनुभव → रोजगार की एक सीधी श्रृंखला बन सकती है।

हर छात्र नौकरी करेगा, यह जरूरी नहीं

तकनीकी शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी तलाशना नहीं होना चाहिए।

एक प्रशिक्षित इलेक्ट्रिशियन अपना सर्विस कारोबार शुरू कर सकता है। ऑटोमोबाइल तकनीशियन वर्कशॉप खोल सकता है। सोलर तकनीक सीखने वाला युवक इंस्टॉलेशन और मरम्मत का काम कर सकता है। वेल्डिंग, मशीन रिपेयरिंग, प्लंबिंग और दूसरे तकनीकी क्षेत्रों में भी छोटे व्यवसाय की संभावना है।

लेकिन इसके लिए तकनीकी कौशल के साथ व्यवसाय चलाने की जानकारी और शुरुआती पूंजी भी चाहिए।

इसलिए ITI और पॉलिटेक्निक में तकनीकी प्रशिक्षण के साथ उद्यमिता, डिजिटल भुगतान, ग्राहक प्रबंधन, हिसाब-किताब और छोटे व्यवसाय की बुनियादी जानकारी भी दी जानी चाहिए।

प्रशिक्षण की गुणवत्ता सबसे बड़ा सवाल

सिर्फ संस्थानों की संख्या बढ़ाने से रोजगार की समस्या हल नहीं होगी।

जरूरी है कि प्रशिक्षण केंद्रों में पर्याप्त प्रशिक्षक, आधुनिक उपकरण, प्रयोगशालाएं और व्यावहारिक प्रशिक्षण की सुविधा हो।

युवा ने जिस मशीन पर पढ़ाई की है, अगर उसने उसे कभी वास्तविक रूप से चलाया ही नहीं, तो उसके प्रमाणपत्र का रोजगार बाजार में प्रभाव सीमित हो सकता है।

इसीलिए तकनीकी शिक्षा में Theory से ज्यादा Practical और Practical से ज्यादा Industry Exposure पर जोर देना होगा।

सफलता का पैमाना रोजगार होना चाहिए

किसी ITI या पॉलिटेक्निक की सफलता का मूल्यांकन केवल प्रवेश लेने वाले छात्रों और परीक्षा पास करने वाले छात्रों की संख्या से नहीं होना चाहिए।

यह भी देखा जाना चाहिए—

  • प्रशिक्षण के बाद कितने युवाओं को नौकरी मिली?

  • कितनों को अप्रेंटिसशिप मिली?

  • कितनों को स्थानीय रोजगार मिला?

  • कितनों ने अपना व्यवसाय शुरू किया?

  • प्रशिक्षण के बाद उनकी आय में कितना बदलाव आया?

अगर इन आंकड़ों को पारदर्शी तरीके से सामने लाया जाए तो छात्रों और अभिभावकों को भी बेहतर निर्णय लेने में मदद मिलेगी।

बिहार के लिए चुनौती के साथ अवसर भी

बिहार की बड़ी युवा आबादी को अगर सही तकनीकी प्रशिक्षण, उद्योग से जुड़ा अनुभव और रोजगार का अवसर मिले तो यही युवा राज्य की आर्थिक ताकत बन सकते हैं।

इसके लिए प्रशिक्षण संस्थानों को स्थानीय बाजार से जोड़ना होगा। उद्योगों को प्रशिक्षण व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा और युवाओं को सिर्फ प्रमाणपत्र देने के बजाय काम करने की क्षमता विकसित करनी होगी।

ITI और पॉलिटेक्निक से निकलने वाले युवाओं की बेरोजगारी को केवल उनकी व्यक्तिगत समस्या मानना सही नहीं होगा। यह शिक्षा व्यवस्था, उद्योग, रोजगार बाजार और स्थानीय अर्थव्यवस्था के बीच तालमेल का सवाल है।

युवा के हाथ में प्रमाणपत्र है, लेकिन अगर उस प्रमाणपत्र के साथ काम का अवसर नहीं है तो पूरी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अब समय आ गया है कि तकनीकी शिक्षा की सफलता को प्रशिक्षित युवाओं की संख्या से नहीं, बल्कि रोजगार और आय के वास्तविक परिणाम से मापा जाए।

क्योंकि आखिरकार युवा को सिर्फ यह नहीं चाहिए कि वह कह सके—“मैंने ITI या पॉलिटेक्निक किया है।”

उसे यह कहने का अवसर चाहिए—

“मेरे पास हुनर है और इसी हुनर से मैं अपने परिवार का भविष्य बना सकता हूं।”

आलोक कुमार

Bihar : बिहार में युवाओं के लिए कौशल विकास योजनाओं की असली जरूरत

 


बिहार में युवाओं के लिए कौशल विकास योजनाओं की असली जरूरत

पटना। बिहार में युवाओं की संख्या राज्य की सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। लेकिन यही युवा वर्ग जब पढ़ाई पूरी करने के बाद रोजगार की तलाश में निकलता है तो उसके सामने सबसे बड़ा सवाल होता है—डिग्री के बाद काम क्या मिलेगा? सरकारी नौकरी के अवसर सीमित हैं और निजी क्षेत्र में सिर्फ प्रमाणपत्र नहीं, बल्कि काम करने की वास्तविक क्षमता मांगी जाती है। ऐसे में कौशल विकास योजनाओं की जरूरत पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई है।

बिहार सरकार ने युवाओं को रोजगार योग्य बनाने के लिए कई स्तर पर योजनाएं शुरू की हैं। बिहार स्किल डेवलपमेंट मिशन यानी BSDM का उद्देश्य युवाओं को जरूरी कौशल देकर उनकी रोजगार क्षमता बढ़ाना और उद्योगों की जरूरत के मुताबिक प्रशिक्षित मानव संसाधन तैयार करना है। मिशन के पोर्टल पर प्रशिक्षण, मूल्यांकन, प्रमाणन और रोजगार के अवसरों को एक साथ जोड़ने की व्यवस्था बताई गई है।

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या कौशल प्रशिक्षण सिर्फ प्रमाणपत्र पाने तक सीमित रहना चाहिए, या प्रशिक्षण के बाद युवा को स्थायी रोजगार तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी व्यवस्था की होनी चाहिए?

प्रमाणपत्र से ज्यादा जरूरी है काम का हुनर

आज बिहार के हजारों युवा कंप्यूटर, भाषा, अकाउंटिंग, इलेक्ट्रिकल, तकनीकी और दूसरे क्षेत्रों में प्रशिक्षण लेते हैं। कुशल युवा कार्यक्रम में भाषा एवं संवाद कौशल, बेसिक कंप्यूटर और सॉफ्ट स्किल जैसे विषय शामिल हैं। BSDM के अनुसार KYP का उद्देश्य युवाओं की employability यानी रोजगार पाने की क्षमता को बढ़ाना है।

लेकिन नौकरी के बाजार में केवल प्रमाणपत्र काफी नहीं होता।

किसी कंपनी को ऐसा युवा चाहिए जो कंप्यूटर पर वास्तविक काम कर सके, ग्राहक से बात कर सके, मशीन चला सके, डेटा संभाल सके, बिक्री कर सके या किसी तकनीकी समस्या का समाधान कर सके। इसलिए प्रशिक्षण का अगला चरण प्रैक्टिकल अनुभव होना चाहिए।

युवा को प्रशिक्षण केंद्र में सिर्फ पाठ्यक्रम पूरा नहीं करना चाहिए, बल्कि उसे वास्तविक कार्यस्थल जैसी परिस्थितियों में काम करने का मौका मिलना चाहिए।

बिहार में कौशल विकास की जरूरत इतनी बड़ी क्यों है?

बिहार में बड़ी संख्या में युवा उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी नौकरी की तैयारी करते हैं। लेकिन हर युवा को सरकारी नौकरी मिलना संभव नहीं है। ऐसे में रोजगार के दूसरे रास्तों को मजबूत करना जरूरी है।

राज्य के योजना विभाग के अनुसार बिहार की बड़ी युवा आबादी के कारण रोजगार योग्य कार्यबल तैयार करना राज्य के विकास के लिए महत्वपूर्ण है। कौशल विकास के क्षेत्र में KYP, डोमेन स्किलिंग, PMKVY, DDU-GKY, ITI, RSETI और अप्रेंटिसशिप जैसी विभिन्न पहलें चल रही हैं।

इसका अर्थ साफ है—बिहार में चुनौती सिर्फ युवाओं को प्रशिक्षण देने की नहीं है। चुनौती यह है कि जिस कौशल की ट्रेनिंग दी जा रही है, उस कौशल के लिए रोजगार भी मौजूद हो।

ITI और पॉलिटेक्निक छात्रों के लिए भी बड़ा सवाल

कौशल विकास की चर्चा अक्सर छोटे अवधि के प्रशिक्षण तक सीमित हो जाती है। लेकिन ITI और पॉलिटेक्निक से निकलने वाले युवाओं के लिए भी उद्योग से सीधा जुड़ाव जरूरी है।

अगर किसी छात्र ने इलेक्ट्रिशियन, मशीनरी, ऑटोमोबाइल, फिटर, वेल्डिंग या दूसरे तकनीकी ट्रेड में प्रशिक्षण लिया है तो उसे प्रशिक्षण के बाद वास्तविक उद्योग में काम करने का अवसर मिलना चाहिए।

यहीं पर अप्रेंटिसशिप और उद्योग आधारित प्रशिक्षण की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

सरकार की नई रोजगार व्यवस्था भी प्रशिक्षण और रोजगार को एक-दूसरे से जोड़ने पर जोर दे रही है। बिहार रोजगार सेतु को निबंधन, प्रशिक्षण, प्रमाणन, सत्यापन और नियोजन को जोड़ने वाले एकीकृत मंच के रूप में विकसित किया गया है।

अगर इस व्यवस्था का प्रभाव गांव के युवा तक पहुंचता है तो यह एक बड़ा बदलाव हो सकता है।

गांव के युवा के लिए प्रशिक्षण केंद्र कितना उपयोगी है?

बिहार में कौशल विकास का सबसे बड़ा परीक्षण गांवों में होना चाहिए।

पटना या बड़े शहर में रहने वाले युवा के पास इंटरनेट, कोचिंग, प्रशिक्षण संस्थान और नौकरी की जानकारी तक अपेक्षाकृत आसान पहुंच हो सकती है। लेकिन ग्रामीण युवा के लिए समस्या अलग है।

उसे प्रशिक्षण केंद्र तक पहुंचने में किराया लगता है। कई बार परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी होती है कि प्रशिक्षण के दौरान भी उसे काम करना पड़ता है। इंटरनेट और डिजिटल साधनों की कमी भी उसके सामने बाधा बन सकती है।

इसलिए कौशल विकास योजना की सफलता सिर्फ इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने युवाओं ने नामांकन कराया।

सवाल होना चाहिए—

कितने युवाओं ने प्रशिक्षण पूरा किया?
कितनों ने प्रमाणपत्र हासिल किया?
कितनों को नौकरी मिली?
कितनों की आय बढ़ी?
और प्रशिक्षण के एक साल बाद कितने युवा उसी क्षेत्र में काम कर रहे हैं?

यही आंकड़े किसी योजना की वास्तविक सफलता बताते हैं।

प्रशिक्षण बाजार की जरूरत के हिसाब से हो

कई बार युवा वही कोर्स चुनता है जिसके बारे में उसे जानकारी मिलती है। लेकिन हर कोर्स की स्थानीय बाजार में मांग समान नहीं होती।

अगर किसी जिले में सोलर उपकरण, मोबाइल रिपेयरिंग, इलेक्ट्रिकल काम, स्वास्थ्य देखभाल, निर्माण, लॉजिस्टिक्स, डिजिटल सेवाओं या कृषि आधारित कारोबार की मांग है तो प्रशिक्षण कार्यक्रमों को उसी के अनुसार तैयार करना चाहिए।

बिहार सरकार पहले भी मांग वाले क्षेत्रों में रोजगारोन्मुखी प्रशिक्षण और मेगा स्किल सेंटर जैसी व्यवस्था की बात कर चुकी है।

यानी आगे की दिशा स्पष्ट है—युवा की रुचि और बाजार की जरूरत के बीच तालमेल।

नौकरी नहीं तो उद्यमिता का रास्ता

हर प्रशिक्षित युवा को नौकरी मिले, यह जरूरी नहीं। लेकिन हर युवा के सामने आय का कोई रास्ता होना जरूरी है।

एक प्रशिक्षित युवक इलेक्ट्रिकल सर्विस शुरू कर सकता है। कोई मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान खोल सकता है। कोई डिजिटल सेवा केंद्र चला सकता है। कोई कृषि उपकरण की मरम्मत का काम कर सकता है। कोई स्थानीय स्तर पर सर्विस आधारित छोटा व्यवसाय शुरू कर सकता है।

इसलिए कौशल विकास के साथ उद्यमिता प्रशिक्षण, बैंक ऋण, बाजार और मार्गदर्शन को जोड़ना भी जरूरी है।

सरकार की रोजगार नीति में भी मांग आधारित प्रशिक्षण, उद्यमिता और निजी प्रतिष्ठानों के साथ साझेदारी को रोजगार बढ़ाने के महत्वपूर्ण माध्यमों के रूप में रखा गया है।

युवाओं को सिर्फ ट्रेनिंग नहीं, रास्ता चाहिए

बिहार के युवा को सबसे ज्यादा जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें उसे शुरुआत से अंत तक मार्गदर्शन मिले।

उसे पता हो कि उसकी योग्यता के अनुसार कौन-सा कौशल उपयोगी है। उसे यह जानकारी मिले कि प्रशिक्षण कहां होगा। प्रशिक्षण के बाद नौकरी कहां मिलेगी। नौकरी के लिए आवेदन कैसे करना है। इंटरव्यू कैसे देना है। और अगर नौकरी नहीं मिलती तो अपना छोटा व्यवसाय कैसे शुरू किया जा सकता है।

यानी कौशल विकास को प्रशिक्षण केंद्र की चारदीवारी से बाहर निकालकर रोजगार की पूरी यात्रा से जोड़ना होगा।

असली सफलता रोजगार में दिखाई देगी

बिहार में कौशल विकास के लिए ढांचा तैयार हो रहा है। BSDM के पोर्टल पर हजारों प्रशिक्षण केंद्रों और लाखों प्रशिक्षार्थियों से जुड़े आंकड़े भी उपलब्ध हैं।

लेकिन आने वाले समय में जनता का सवाल संख्या से ज्यादा परिणाम पर होगा।

कितने युवा प्रशिक्षण के बाद अपने पैरों पर खड़े हुए?

कितनों की आय बढ़ी?

कितनों को बिहार में ही रोजगार मिला?

और कितने युवाओं को मजबूरी में दूसरे राज्यों की ओर जाना पड़ा?

कौशल विकास की असली सफलता प्रमाणपत्रों की संख्या में नहीं, युवाओं की बदलती जिंदगी में दिखाई देगी।

बिहार के युवा को सिर्फ यह बताने की जरूरत नहीं कि उसके पास हुनर है। उसे ऐसा अवसर भी चाहिए जहां वह उस हुनर से अपनी आजीविका कमा सके।

आखिरकार सवाल सिर्फ रोजगार का नहीं है। सवाल उस युवा के आत्मविश्वास का है जो वर्षों की पढ़ाई और प्रशिक्षण के बाद अपने परिवार से यह कहना चाहता है—“अब मैं अपने पैरों पर खड़ा हो सकता हूं।”


आलोक कुमार

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