ITI और पॉलिटेक्निक के छात्रों को प्रशिक्षण के बाद भी रोजगार क्यों नहीं मिलता?
हुनर हाथ में है, प्रमाणपत्र जेब में है, फिर भी नौकरी की तलाश खत्म क्यों नहीं होती?
पटना। बिहार सहित देशभर में हर साल बड़ी संख्या में युवा ITI और पॉलिटेक्निक संस्थानों से तकनीकी प्रशिक्षण लेकर निकलते हैं। किसी के हाथ में इलेक्ट्रिशियन का हुनर है, कोई फिटर है, कोई मशीन चलाना जानता है, तो कोई ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स या कंप्यूटर से जुड़ा प्रशिक्षण लेकर रोजगार की उम्मीद करता है। परिवार भी मानता है कि अब बच्चे के लिए कमाई का रास्ता खुल जाएगा।
लेकिन संस्थान से बाहर निकलते ही कई युवाओं को पता चलता है कि प्रशिक्षण पूरा होना और रोजगार मिलना दो अलग-अलग बातें हैं।
यही बिहार के तकनीकी शिक्षा क्षेत्र का एक बड़ा सवाल है। अगर कंपनियों को कुशल कर्मचारियों की जरूरत है और ITI-पॉलिटेक्निक के युवाओं के पास तकनीकी प्रशिक्षण है, तो फिर दोनों के बीच दूरी क्यों बनी हुई है?
असल समस्या केवल नौकरियों की कमी नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या प्रशिक्षण बाजार और उद्योग की बदलती जरूरत के हिसाब से तैयार किया जा रहा है?
प्रमाणपत्र और नौकरी के बीच की दूरी
किसी युवा के पास ITI या पॉलिटेक्निक का प्रमाणपत्र होना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन आज के रोजगार बाजार में सिर्फ प्रमाणपत्र पर्याप्त नहीं है।
कंपनी को ऐसा कर्मचारी चाहिए जो मशीन को समझ सके, तकनीकी समस्या पहचान सके, सुरक्षा नियमों का पालन करे, कंप्यूटर आधारित सिस्टम पर काम कर सके और जरूरत पड़ने पर नई तकनीक सीख सके।
यहीं कई युवाओं को कठिनाई आती है।
अगर संस्थान में प्रशिक्षण के दौरान आधुनिक मशीनों और वास्तविक कार्यस्थल का पर्याप्त अनुभव नहीं मिला, तो नौकरी के इंटरव्यू में प्रमाणपत्र होने के बावजूद व्यावहारिक सवालों का सामना करना मुश्किल हो सकता है।
इसलिए अब प्रशिक्षण की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने छात्र पास हुए।
बड़ा सवाल होना चाहिए—कितने छात्र प्रशिक्षण के बाद काम करने के लिए वास्तव में तैयार हुए?
उद्योग की जरूरत और पाठ्यक्रम में कितना तालमेल?
तकनीक तेजी से बदल रही है। आज उद्योगों में ऑटोमेशन, CNC मशीन, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, सोलर तकनीक, इलेक्ट्रिक वाहन, डिजिटल कंट्रोल और कंप्यूटर आधारित डिजाइन जैसी तकनीकों का महत्व बढ़ रहा है।
ऐसे में तकनीकी शिक्षा भी लगातार बदलनी चाहिए।
अगर छात्र पुरानी तकनीक सीखकर निकलता है और नौकरी देने वाली कंपनी उससे नई मशीन और आधुनिक सिस्टम पर काम करने की उम्मीद करती है, तो दोनों के बीच स्वाभाविक रूप से अंतर पैदा होगा।
इसलिए ITI और पॉलिटेक्निक के पाठ्यक्रम को समय-समय पर उद्योग की वास्तविक जरूरत के अनुसार अपडेट करना जरूरी है।
बाजार बदल रहा है तो प्रशिक्षण भी बदलना होगा।
स्थानीय उद्योग से मजबूत रिश्ता क्यों जरूरी?
बिहार के लिए एक और बड़ी चुनौती है—तकनीकी संस्थानों और स्थानीय उद्योगों के बीच कमजोर जुड़ाव।
जिस जिले या इलाके में ऑटोमोबाइल, निर्माण, कृषि उपकरण, इलेक्ट्रिकल, फर्नीचर, मशीनरी, सोलर या दूसरे तकनीकी कारोबार मौजूद हैं, वहां के प्रशिक्षण संस्थानों को स्थानीय रोजगार बाजार की जरूरत समझनी चाहिए।
अगर किसी क्षेत्र में प्रशिक्षित युवाओं के लिए पर्याप्त स्थानीय अवसर नहीं हैं, तो उन्हें दूसरे राज्यों की ओर जाना पड़ता है।
यही कारण है कि तकनीकी शिक्षा को केवल संस्थान तक सीमित देखने के बजाय उसे स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ना जरूरी है।
बिहार में अगर छोटे उद्योग, MSME, सर्विस सेंटर और तकनीकी व्यवसाय बढ़ते हैं, तो ITI और पॉलिटेक्निक के युवाओं के लिए स्थानीय रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं।
अप्रेंटिसशिप सिर्फ औपचारिकता न बने
कक्षा में किसी मशीन के बारे में पढ़ना और वास्तविक उद्योग में उसी मशीन पर काम करना एक जैसा अनुभव नहीं है।
यहीं अप्रेंटिसशिप महत्वपूर्ण हो जाती है।
अगर प्रशिक्षण के बाद युवा को कंपनी, वर्कशॉप, उद्योग या तकनीकी सेवा केंद्र में वास्तविक काम सीखने का अवसर मिलता है, तो उसके अंदर आत्मविश्वास और व्यावहारिक क्षमता दोनों बढ़ते हैं।
लेकिन अप्रेंटिसशिप को सिर्फ कुछ महीनों का औपचारिक अनुभव बनाकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा।
जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें छात्र को पता हो कि उसे किस क्षेत्र में प्रशिक्षण मिलेगा, किस प्रकार का काम करना होगा और प्रशिक्षण पूरा होने के बाद रोजगार की संभावना क्या है।
अच्छी अप्रेंटिसशिप वह है जो युवा को नौकरी के लिए तैयार करे, सिर्फ अनुभव प्रमाणपत्र न दे।
निजी कंपनियों को भी आगे आना होगा
सरकार हर प्रशिक्षित युवा को सरकारी नौकरी नहीं दे सकती। रोजगार का बड़ा हिस्सा निजी उद्योगों, MSME, निर्माण कंपनियों, सर्विस सेंटर और स्थानीय व्यवसायों से आता है।
इसलिए निजी कंपनियों और तकनीकी संस्थानों के बीच मजबूत साझेदारी जरूरी है।
कंपनियां यह बता सकती हैं कि उन्हें किस प्रकार के कर्मचारियों की जरूरत है। संस्थान उसी अनुसार प्रशिक्षण विकसित कर सकते हैं। कंपनियां छात्रों को इंटर्नशिप और अप्रेंटिसशिप दे सकती हैं और योग्य छात्रों की भर्ती भी कर सकती हैं।
इससे प्रशिक्षण → अनुभव → रोजगार की एक सीधी श्रृंखला बन सकती है।
हर छात्र नौकरी करेगा, यह जरूरी नहीं
तकनीकी शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी तलाशना नहीं होना चाहिए।
एक प्रशिक्षित इलेक्ट्रिशियन अपना सर्विस कारोबार शुरू कर सकता है। ऑटोमोबाइल तकनीशियन वर्कशॉप खोल सकता है। सोलर तकनीक सीखने वाला युवक इंस्टॉलेशन और मरम्मत का काम कर सकता है। वेल्डिंग, मशीन रिपेयरिंग, प्लंबिंग और दूसरे तकनीकी क्षेत्रों में भी छोटे व्यवसाय की संभावना है।
लेकिन इसके लिए तकनीकी कौशल के साथ व्यवसाय चलाने की जानकारी और शुरुआती पूंजी भी चाहिए।
इसलिए ITI और पॉलिटेक्निक में तकनीकी प्रशिक्षण के साथ उद्यमिता, डिजिटल भुगतान, ग्राहक प्रबंधन, हिसाब-किताब और छोटे व्यवसाय की बुनियादी जानकारी भी दी जानी चाहिए।
प्रशिक्षण की गुणवत्ता सबसे बड़ा सवाल
सिर्फ संस्थानों की संख्या बढ़ाने से रोजगार की समस्या हल नहीं होगी।
जरूरी है कि प्रशिक्षण केंद्रों में पर्याप्त प्रशिक्षक, आधुनिक उपकरण, प्रयोगशालाएं और व्यावहारिक प्रशिक्षण की सुविधा हो।
युवा ने जिस मशीन पर पढ़ाई की है, अगर उसने उसे कभी वास्तविक रूप से चलाया ही नहीं, तो उसके प्रमाणपत्र का रोजगार बाजार में प्रभाव सीमित हो सकता है।
इसीलिए तकनीकी शिक्षा में Theory से ज्यादा Practical और Practical से ज्यादा Industry Exposure पर जोर देना होगा।
सफलता का पैमाना रोजगार होना चाहिए
किसी ITI या पॉलिटेक्निक की सफलता का मूल्यांकन केवल प्रवेश लेने वाले छात्रों और परीक्षा पास करने वाले छात्रों की संख्या से नहीं होना चाहिए।
यह भी देखा जाना चाहिए—
प्रशिक्षण के बाद कितने युवाओं को नौकरी मिली?
कितनों को अप्रेंटिसशिप मिली?
कितनों को स्थानीय रोजगार मिला?
कितनों ने अपना व्यवसाय शुरू किया?
प्रशिक्षण के बाद उनकी आय में कितना बदलाव आया?
अगर इन आंकड़ों को पारदर्शी तरीके से सामने लाया जाए तो छात्रों और अभिभावकों को भी बेहतर निर्णय लेने में मदद मिलेगी।
बिहार के लिए चुनौती के साथ अवसर भी
बिहार की बड़ी युवा आबादी को अगर सही तकनीकी प्रशिक्षण, उद्योग से जुड़ा अनुभव और रोजगार का अवसर मिले तो यही युवा राज्य की आर्थिक ताकत बन सकते हैं।
इसके लिए प्रशिक्षण संस्थानों को स्थानीय बाजार से जोड़ना होगा। उद्योगों को प्रशिक्षण व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा और युवाओं को सिर्फ प्रमाणपत्र देने के बजाय काम करने की क्षमता विकसित करनी होगी।
ITI और पॉलिटेक्निक से निकलने वाले युवाओं की बेरोजगारी को केवल उनकी व्यक्तिगत समस्या मानना सही नहीं होगा। यह शिक्षा व्यवस्था, उद्योग, रोजगार बाजार और स्थानीय अर्थव्यवस्था के बीच तालमेल का सवाल है।
युवा के हाथ में प्रमाणपत्र है, लेकिन अगर उस प्रमाणपत्र के साथ काम का अवसर नहीं है तो पूरी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
अब समय आ गया है कि तकनीकी शिक्षा की सफलता को प्रशिक्षित युवाओं की संख्या से नहीं, बल्कि रोजगार और आय के वास्तविक परिणाम से मापा जाए।
क्योंकि आखिरकार युवा को सिर्फ यह नहीं चाहिए कि वह कह सके—“मैंने ITI या पॉलिटेक्निक किया है।”
उसे यह कहने का अवसर चाहिए—
“मेरे पास हुनर है और इसी हुनर से मैं अपने परिवार का भविष्य बना सकता हूं।”
आलोक कुमार