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Bihar : Apprenticeship क्यों जरूरी है? प्रशिक्षण के बाद रोजगार में अनुभव की भूमिका

 


प्रशिक्षण के बाद Apprenticeship और अनुभव रोजगार में कितने महत्वपूर्ण हैं?

कौशल प्रमाणपत्र से नौकरी तक पहुंचने में अप्रेंटिसशिप की अहम भूमिका; बिहार के ग्रामीण युवाओं के लिए व्यावहारिक अनुभव, उचित वजीफा और रोजगार के अवसर बढ़ाना क्यों जरूरी है?

 किसी युवा ने कंप्यूटर, इलेक्ट्रिशियन, मोबाइल रिपेयरिंग या मशीन संचालन का प्रशिक्षण पूरा कर लिया है। उसके पास प्रमाणपत्र भी है, लेकिन नौकरी के लिए आवेदन करते ही उससे अनुभव मांगा जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि पहली नौकरी मिलेगी तभी अनुभव आएगा, तो अनुभव के बिना पहली नौकरी कैसे मिलेगी? अप्रेंटिसशिप इसी चुनौती को कम करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। खासकर बिहार के ग्रामीण युवाओं के लिए यह प्रशिक्षण और वास्तविक रोजगार के बीच की दूरी घटाने में मदद कर सकती है।

1. अप्रेंटिसशिप क्या है और यह क्यों जरूरी है?

अप्रेंटिसशिप ऐसी व्यवस्थित प्रशिक्षण व्यवस्था है, जिसमें युवा किसी प्रतिष्ठान या उद्योग में काम सीखते हुए व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करता है। इसमें वास्तविक कार्यस्थल पर अनुभवी कर्मचारियों के मार्गदर्शन में काम करने का अवसर मिलता है।

उदाहरण के लिए, इलेक्ट्रिशियन का प्रशिक्षण लेने वाला युवा कक्षा में वायरिंग, उपकरणों और सुरक्षा के नियम सीख सकता है। लेकिन कार्यस्थल पर उसे वास्तविक उपकरणों की जांच, खराबी पहचानने और निर्धारित सुरक्षा प्रक्रियाओं का पालन करने का अनुभव मिलता है।

इसी तरह, कंप्यूटर प्रशिक्षण प्राप्त युवा किसी कार्यालय में डिजिटल रिकॉर्ड संभालना, स्प्रेडशीट बनाना और व्यावसायिक सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करना सीख सकता है।

इस प्रकार अप्रेंटिसशिप युवाओं को सीखी हुई जानकारी को वास्तविक परिस्थितियों में लागू करने का अवसर देती है।

2. प्रशिक्षण और वास्तविक काम के बीच की दूरी कैसे घटती है?

प्रशिक्षण केंद्र में कौशल सीखना और किसी प्रतिष्ठान में जिम्मेदारी के साथ काम करना अलग-अलग अनुभव हैं। वास्तविक कार्यस्थल पर समय-सीमा, गुणवत्ता, सुरक्षा, टीमवर्क और ग्राहकों की जरूरतों का ध्यान रखना पड़ता है।

अप्रेंटिसशिप के दौरान युवा समझता है कि किसी काम को सही तरीके से करने के साथ उसे निर्धारित समय में पूरा करना भी जरूरी है। उसे उपकरणों का जिम्मेदारी से उपयोग करने, समस्याओं की पहचान करने और वरिष्ठ कर्मचारियों से मार्गदर्शन लेने की आदत विकसित करने का अवसर मिलता है।

इससे युवा अपनी कमजोरियों को पहचानकर उन्हें सुधार सकता है। नियोक्ता को भी यह समझने में मदद मिलती है कि प्रशिक्षु कितना सक्रिय है, नई चीजें कितनी जल्दी सीखता है और जिम्मेदारियों को किस तरह निभाता है।

3. पहली नौकरी पाने में अनुभव की भूमिका

नए प्रशिक्षित युवाओं के लिए अनुभव की मांग रोजगार की राह में बड़ी बाधा बन सकती है। कई नियोक्ता ऐसे उम्मीदवार चाहते हैं, जिन्हें काम की बुनियादी जानकारी के साथ कार्यस्थल की परिस्थितियों का भी अनुभव हो।

अप्रेंटिसशिप युवाओं को इस कमी को दूर करने में मदद कर सकती है। वे अपने बायोडाटा में सीखे गए कौशल, पूरी की गई जिम्मेदारियों और व्यावहारिक कार्यों का उल्लेख कर सकते हैं।

हालांकि, अप्रेंटिसशिप पूरी करने से स्थायी नौकरी मिलने की गारंटी नहीं होती। इसकी उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि प्रशिक्षण कितना गुणवत्तापूर्ण था, युवा ने क्या सीखा और संबंधित क्षेत्र में रोजगार के कितने अवसर उपलब्ध हैं।

इसलिए युवाओं को केवल प्रमाणपत्र पाने के बजाय ऐसा कार्यक्रम चुनना चाहिए, जिसमें वास्तविक कौशल सीखने और अनुभवी व्यक्तियों से मार्गदर्शन मिलने की व्यवस्था हो।

4. बिहार के ग्रामीण युवाओं के लिए विशेष महत्व

बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में कई युवाओं के लिए अपने आसपास व्यावहारिक प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर तलाशना कठिन हो सकता है। स्थानीय उद्योगों की सीमित उपलब्धता के कारण उन्हें अनुभव प्राप्त करने के लिए दूसरे शहरों में जाना पड़ सकता है।

यदि स्थानीय कार्यशालाओं, छोटे उद्योगों, कृषि प्रसंस्करण इकाइयों, मरम्मत केंद्रों और सेवा प्रतिष्ठानों को अप्रेंटिसशिप कार्यक्रमों से जोड़ा जाए, तो युवाओं को अपने जिले या नजदीकी शहर में अनुभव प्राप्त करने का अवसर मिल सकता है।

उदाहरण के लिए, मोटर मरम्मत का प्रशिक्षण लेने वाला युवा किसी उपयुक्त कार्यशाला में अनुभवी मैकेनिक के मार्गदर्शन में काम सीख सकता है। कंप्यूटर प्रशिक्षित युवा किसी कार्यालय या डिजिटल सेवा केंद्र में व्यावहारिक दक्षता विकसित कर सकता है।

लेकिन ऐसे अवसरों में प्रशिक्षण की गुणवत्ता, काम की सुरक्षा और लागू नियमों का पालन सुनिश्चित करना जरूरी है। केवल कम लागत पर श्रम उपलब्ध कराने के लिए युवाओं को अप्रेंटिसशिप में शामिल करना इस व्यवस्था के उद्देश्य के विपरीत होगा।

5. वजीफा, सुरक्षा और प्रशिक्षुओं के अधिकार

आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के युवाओं के लिए प्रशिक्षण के दौरान वजीफा महत्वपूर्ण है। यदि प्रशिक्षण की अवधि में कोई आय नहीं होती, तो परिवार की जिम्मेदारियों के कारण युवा बीच में ही कार्यक्रम छोड़ सकता है।

भारत में अप्रेंटिसशिप की व्यवस्था के अंतर्गत संबंधित कानून, नियम और अनुबंध प्रशिक्षुओं तथा नियोक्ताओं की जिम्मेदारियां निर्धारित करते हैं। इसलिए आवेदन करने से पहले प्रशिक्षण की अवधि, वजीफे, कार्य की प्रकृति, सुरक्षा व्यवस्था और प्रमाणपत्र संबंधी शर्तों की जानकारी लेनी चाहिए।

युवाओं को यह भी समझना चाहिए कि अप्रेंटिसशिप और नियमित रोजगार एक ही चीज नहीं हैं। कार्यक्रम की शर्तें और आगे नियुक्ति की संभावनाएं अलग-अलग हो सकती हैं।

पारदर्शी व्यवस्था से प्रशिक्षुओं का भरोसा बढ़ेगा और उन्हें यह तय करने में मदद मिलेगी कि संबंधित अवसर उनके कौशल और आर्थिक परिस्थितियों के अनुकूल है या नहीं।

6. सरकार, प्रशिक्षण संस्थानों और कंपनियों की जिम्मेदारी

अप्रेंटिसशिप को प्रभावी बनाने के लिए युवाओं की मेहनत के साथ संस्थागत सहयोग भी जरूरी है।

प्रशिक्षण संस्थानों को स्थानीय उद्योगों और प्रतिष्ठानों से संपर्क बनाकर व्यावहारिक प्रशिक्षण के अवसर बढ़ाने चाहिए। कंपनियों को प्रशिक्षुओं के लिए स्पष्ट सीखने के लक्ष्य, अनुभवी मार्गदर्शक और नियमित मूल्यांकन की व्यवस्था करनी चाहिए।

सरकारी संस्थाओं को पात्रता, आवेदन प्रक्रिया, उपलब्ध सीटों और संबंधित नियमों की जानकारी सरल भाषा में ग्रामीण युवाओं तक पहुंचानी चाहिए। जिला और प्रखंड स्तर पर रोजगार परामर्श शिविर आयोजित करके आवेदन तथा साक्षात्कार की प्रक्रिया समझाई जा सकती है।

प्रशिक्षण पूरा होने के बाद भी युवाओं की स्थिति का आकलन जरूरी है। कितने प्रशिक्षुओं को नौकरी मिली, कितने स्वरोजगार से जुड़े और कितनों को अतिरिक्त कौशल प्रशिक्षण की जरूरत पड़ी—इन जानकारियों से योजनाओं की वास्तविक उपयोगिता समझी जा सकती है।

7. तकनीकी कौशल के साथ व्यवहारिक क्षमता भी जरूरी

रोजगार में केवल तकनीकी जानकारी पर्याप्त नहीं होती। समय की पाबंदी, संवाद क्षमता, टीम के साथ काम करना, समस्या का समाधान और नई परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना भी महत्वपूर्ण है।

अप्रेंटिसशिप युवाओं को इन गुणों को वास्तविक परिस्थितियों में सीखने का अवसर देती है। इससे वे नौकरी की जिम्मेदारियों के लिए बेहतर तरीके से तैयार हो सकते हैं।

हालांकि, अनुभव की गुणवत्ता उसकी अवधि से अधिक महत्वपूर्ण है। बिना उचित मार्गदर्शन के कई महीने काम करने की तुलना में ऐसा प्रशिक्षण अधिक उपयोगी हो सकता है, जिसमें वास्तविक कौशल सीखने, गलतियों को सुधारने और प्रगति का मूल्यांकन करने की व्यवस्था हो।

निष्कर्ष: प्रमाणपत्र से रोजगार तक की महत्वपूर्ण कड़ी

प्रशिक्षण के बाद अप्रेंटिसशिप और व्यावहारिक अनुभव युवाओं को रोजगार के लिए तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनके माध्यम से तकनीकी दक्षता, आत्मविश्वास और कार्यस्थल की समझ विकसित हो सकती है।

बिहार के ग्रामीण युवाओं के लिए ऐसे अवसर बढ़ाना विशेष रूप से जरूरी है, ताकि प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उन्हें अनुभव की कमी के कारण बार-बार निराश न होना पड़े। इसके लिए सरकार, प्रशिक्षण संस्थानों और निजी क्षेत्र को मिलकर गुणवत्तापूर्ण अप्रेंटिसशिप, उचित वजीफा और रोजगार से जुड़ी सहायता उपलब्ध करानी चाहिए।

अंततः, कौशल प्रशिक्षण युवाओं को किसी काम की जानकारी देता है, जबकि अच्छी अप्रेंटिसशिप उस कौशल को वास्तविक परिस्थितियों में इस्तेमाल करना सिखाती है। जब दोनों के बीच मजबूत तालमेल होगा, तभी अधिक युवा अपनी योग्यता के अनुरूप रोजगार पाने की दिशा में आगे बढ़ सकेंगे।

प्रशिक्षण के बाद अप्रेंटिसशिप युवाओं को नौकरी पाने में कैसे मदद करती है? जानिए बिहार के ग्रामीण युवाओं के लिए व्यावहारिक अनुभव, वजीफा, प्रशिक्षुओं के अधिकार और रोजगार के अवसरों का महत्व।

आलोक कुमार

Bihar : बिहार में ITI और Polytechnic करने वाले युवाओं को नौकरी

 


बिहार में ITI और Polytechnic करने वाले युवाओं को नौकरी तक पहुंचने में सबसे बड़ी रुकावट क्या है?

बिहार में हर साल बड़ी संख्या में युवा ITI और Polytechnic जैसे तकनीकी पाठ्यक्रमों में दाखिला लेते हैं। उनका उद्देश्य केवल प्रमाणपत्र हासिल करना नहीं होता, बल्कि प्रशिक्षण पूरा करने के बाद किसी कंपनी, कारखाने, निर्माण क्षेत्र, सरकारी विभाग या निजी संस्थान में रोजगार पाना होता है। लेकिन पढ़ाई पूरी करने के बाद भी कई युवाओं के सामने नौकरी तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं होता।

समस्या यह नहीं है कि तकनीकी शिक्षा लेने वाले युवाओं में काम करने की इच्छा नहीं है। बड़ी चुनौती यह है कि प्रशिक्षण, उद्योग की जरूरत और रोजगार के अवसरों के बीच पर्याप्त तालमेल नहीं बन पाता। यही अंतर कई युवाओं को प्रमाणपत्र मिलने के बाद भी लंबे समय तक नौकरी की तलाश में रखता है।

प्रशिक्षण के बाद नौकरी की जानकारी तक पहुंच भी एक चुनौती

कई युवाओं को यह स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पाती कि उनके ट्रेड या डिप्लोमा से संबंधित नौकरियां कहां उपलब्ध हैं। सरकारी भर्ती की जानकारी के लिए अलग-अलग विभागों की वेबसाइट देखनी पड़ती है, जबकि निजी कंपनियों की भर्ती की सूचना अक्सर रोजगार पोर्टल, कंपनी की वेबसाइट या स्थानीय स्तर के माध्यम से मिलती है।

ग्रामीण और छोटे शहरों के युवाओं के लिए यह समस्या और बढ़ जाती है। इंटरनेट उपलब्ध होने के बावजूद सही भर्ती सूचना खोजने, आवेदन करने और समय पर प्रक्रिया पूरी करने में कठिनाई हो सकती है।

इसलिए तकनीकी शिक्षा के साथ रोजगार सूचना तक आसान पहुंच भी जरूरी है।

केवल प्रमाणपत्र से नौकरी मिलना आसान नहीं

ITI या Polytechnic की पढ़ाई पूरी करने के बाद युवाओं को यह महसूस हो सकता है कि प्रमाणपत्र मिलने के साथ नौकरी का रास्ता खुल जाएगा। वास्तविकता में कई नियोक्ता तकनीकी ज्ञान के साथ व्यावहारिक अनुभव, मशीनों पर काम करने की क्षमता, सुरक्षा नियमों की जानकारी और कार्यस्थल के व्यवहार को भी महत्व देते हैं।

यही कारण है कि प्रशिक्षण संस्थानों और उद्योगों के बीच बेहतर संपर्क जरूरी है। यदि विद्यार्थियों को पढ़ाई के दौरान ही वास्तविक कार्यस्थल का अनुभव, इंडस्ट्री विजिट, अप्रेंटिसशिप और प्रैक्टिकल प्रशिक्षण मिले तो उन्हें नौकरी के लिए तैयार होने में मदद मिल सकती है।

अप्रेंटिसशिप और शुरुआती अनुभव की कमी

किसी तकनीकी नौकरी में पहली नौकरी हासिल करना कई बार सबसे कठिन चरण होता है। कंपनी अनुभव मांगती है और युवा पूछता है कि अनुभव मिलेगा कैसे, जब पहली नौकरी ही नहीं मिल रही।

इस स्थिति को अप्रेंटिसशिप और ऑन-द-जॉब प्रशिक्षण के माध्यम से काफी हद तक दूर किया जा सकता है। प्रशिक्षण के दौरान वास्तविक उद्योग से जुड़ने का अवसर युवाओं को यह समझने में मदद करता है कि कक्षा में सीखी तकनीक का इस्तेमाल काम की जगह पर कैसे होता है।

लेकिन हर विद्यार्थी को अपनी पसंद और योग्यता के अनुरूप पर्याप्त अवसर मिलना अभी भी एक महत्वपूर्ण चुनौती है।

स्थानीय स्तर पर रोजगार और उद्योग की कमी

बिहार के कई जिलों में तकनीकी शिक्षा लेने वाले युवाओं की संख्या बढ़ रही है, लेकिन उनके आसपास पर्याप्त औद्योगिक रोजगार उपलब्ध नहीं है। परिणामस्वरूप नौकरी के लिए उन्हें पटना, दूसरे राज्यों या बड़े औद्योगिक शहरों की ओर जाना पड़ता है।

दूसरे शहर में जाने के साथ किराया, भोजन, यात्रा और रहने का खर्च जुड़ जाता है। कम शुरुआती वेतन वाले रोजगार में यह खर्च कई युवाओं के लिए बड़ी समस्या बन जाता है। कुछ युवा इसी कारण अपनी योग्यता से कम स्तर की नौकरी स्वीकार कर लेते हैं या रोजगार की तलाश छोड़कर किसी दूसरे काम में चले जाते हैं।

इसलिए केवल प्रशिक्षण संस्थानों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। स्थानीय उद्योग, उत्पादन इकाइयां और तकनीकी रोजगार के अवसर भी बढ़ाने होंगे।

भर्ती प्रक्रिया की जानकारी और तैयारी का अभाव

तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाले युवाओं का एक वर्ग सरकारी नौकरी को प्राथमिकता देता है। लेकिन सरकारी तकनीकी पदों की भर्ती नियमित अंतराल पर ही आती है और उनमें पदों की संख्या भी सीमित हो सकती है।

इसके अलावा आवेदन प्रक्रिया, दस्तावेज, परीक्षा पैटर्न, कौशल परीक्षा और प्रमाणपत्र सत्यापन जैसी प्रक्रियाओं को समझना भी जरूरी होता है। यदि विद्यार्थी को इन प्रक्रियाओं की जानकारी समय पर नहीं मिले तो योग्य होने के बावजूद वह अवसर से बाहर हो सकता है।

यहां ITI और Polytechnic संस्थानों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। संस्थानों में केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने के बजाय करियर मार्गदर्शन और रोजगार सूचना केंद्र को मजबूत किया जाना चाहिए।

कंपनियों की जरूरत और पाठ्यक्रम में तालमेल

तकनीक लगातार बदल रही है। उद्योगों में नई मशीनें, ऑटोमेशन, डिजिटल उपकरण और नई कार्यप्रणालियां आ रही हैं। ऐसे में तकनीकी पाठ्यक्रमों को भी समय-समय पर रोजगार बाजार की जरूरतों के अनुसार अपडेट करना जरूरी है।

यदि विद्यार्थी ने ऐसा कौशल सीखा है जिसकी स्थानीय उद्योग में मांग कम है, जबकि किसी दूसरे कौशल की मांग अधिक है, तो प्रमाणपत्र होने के बावजूद रोजगार पाना कठिन हो सकता है।

इसलिए पाठ्यक्रम तैयार करने में उद्योगों, प्रशिक्षण संस्थानों और रोजगार विशेषज्ञों के बीच नियमित संवाद होना चाहिए।

युवाओं के लिए क्या किया जा सकता है?

इस समस्या का समाधान केवल सरकार या केवल प्रशिक्षण संस्थान से नहीं होगा। इसके लिए कई स्तरों पर प्रयास जरूरी हैं।

पहला, ITI और Polytechnic संस्थानों में नियमित रोजगार मेले और कैंपस प्लेसमेंट की व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए। दूसरा, विद्यार्थियों को अप्रेंटिसशिप और उद्योग आधारित प्रशिक्षण के अवसर अधिक मिलने चाहिए। तीसरा, प्रत्येक जिले में तकनीकी युवाओं के लिए रोजगार सूचना और करियर मार्गदर्शन की व्यवस्था उपयोगी हो सकती है।

इसके साथ कंपनियों को भी स्थानीय प्रशिक्षित युवाओं को शुरुआती अवसर देने चाहिए। शुरुआती नौकरी में उचित प्रशिक्षण और सीखने का अवसर मिलने से युवा आगे बेहतर रोजगार के लिए तैयार हो सकते हैं।

असली सवाल नौकरी की संख्या से आगे का है

बिहार के ITI और Polytechnic युवाओं की समस्या केवल यह नहीं है कि नौकरियां कम हैं। असली सवाल यह भी है कि जो रोजगार उपलब्ध हैं, उनकी जानकारी युवा तक कितनी आसानी से पहुंचती है, उसकी योग्यता उन नौकरियों से कितनी मेल खाती है और पहली नौकरी तक पहुंचने के लिए उसे कितना व्यावहारिक अनुभव मिलता है।

यदि तकनीकी शिक्षा को रोजगार से जोड़ना है तो प्रशिक्षण, अप्रेंटिसशिप, उद्योग और भर्ती सूचना के बीच मजबूत व्यवस्था बनानी होगी। तभी तकनीकी प्रमाणपत्र युवाओं के लिए केवल कागज का दस्तावेज नहीं, बल्कि सम्मानजनक रोजगार तक पहुंचने का वास्तविक माध्यम बन सकेगा।

Chingari Prime News के लिए यह मुद्दा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि तकनीकी शिक्षा लेने वाला युवा केवल नौकरी नहीं मांग रहा है; वह अपने प्रशिक्षण का उपयोग करके आत्मनिर्भर बनने का अवसर चाहता है।

आलोक कुमार

Bihar : ITI और पॉलिटेक्निक के छात्रों को प्रशिक्षण के बाद भी रोजगार क्यों नहीं मिलता?

 


ITI और पॉलिटेक्निक के छात्रों को प्रशिक्षण के बाद भी रोजगार क्यों नहीं मिलता?

हुनर हाथ में है, प्रमाणपत्र जेब में है, फिर भी नौकरी की तलाश खत्म क्यों नहीं होती?

पटना। बिहार सहित देशभर में हर साल बड़ी संख्या में युवा ITI और पॉलिटेक्निक संस्थानों से तकनीकी प्रशिक्षण लेकर निकलते हैं। किसी के हाथ में इलेक्ट्रिशियन का हुनर है, कोई फिटर है, कोई मशीन चलाना जानता है, तो कोई ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स या कंप्यूटर से जुड़ा प्रशिक्षण लेकर रोजगार की उम्मीद करता है। परिवार भी मानता है कि अब बच्चे के लिए कमाई का रास्ता खुल जाएगा।

लेकिन संस्थान से बाहर निकलते ही कई युवाओं को पता चलता है कि प्रशिक्षण पूरा होना और रोजगार मिलना दो अलग-अलग बातें हैं।

यही बिहार के तकनीकी शिक्षा क्षेत्र का एक बड़ा सवाल है। अगर कंपनियों को कुशल कर्मचारियों की जरूरत है और ITI-पॉलिटेक्निक के युवाओं के पास तकनीकी प्रशिक्षण है, तो फिर दोनों के बीच दूरी क्यों बनी हुई है?

असल समस्या केवल नौकरियों की कमी नहीं है। सवाल यह भी है कि क्या प्रशिक्षण बाजार और उद्योग की बदलती जरूरत के हिसाब से तैयार किया जा रहा है?

प्रमाणपत्र और नौकरी के बीच की दूरी

किसी युवा के पास ITI या पॉलिटेक्निक का प्रमाणपत्र होना निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है। लेकिन आज के रोजगार बाजार में सिर्फ प्रमाणपत्र पर्याप्त नहीं है।

कंपनी को ऐसा कर्मचारी चाहिए जो मशीन को समझ सके, तकनीकी समस्या पहचान सके, सुरक्षा नियमों का पालन करे, कंप्यूटर आधारित सिस्टम पर काम कर सके और जरूरत पड़ने पर नई तकनीक सीख सके।

यहीं कई युवाओं को कठिनाई आती है।

अगर संस्थान में प्रशिक्षण के दौरान आधुनिक मशीनों और वास्तविक कार्यस्थल का पर्याप्त अनुभव नहीं मिला, तो नौकरी के इंटरव्यू में प्रमाणपत्र होने के बावजूद व्यावहारिक सवालों का सामना करना मुश्किल हो सकता है।

इसलिए अब प्रशिक्षण की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितने छात्र पास हुए।

बड़ा सवाल होना चाहिए—कितने छात्र प्रशिक्षण के बाद काम करने के लिए वास्तव में तैयार हुए?

उद्योग की जरूरत और पाठ्यक्रम में कितना तालमेल?

तकनीक तेजी से बदल रही है। आज उद्योगों में ऑटोमेशन, CNC मशीन, इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम, सोलर तकनीक, इलेक्ट्रिक वाहन, डिजिटल कंट्रोल और कंप्यूटर आधारित डिजाइन जैसी तकनीकों का महत्व बढ़ रहा है।

ऐसे में तकनीकी शिक्षा भी लगातार बदलनी चाहिए।

अगर छात्र पुरानी तकनीक सीखकर निकलता है और नौकरी देने वाली कंपनी उससे नई मशीन और आधुनिक सिस्टम पर काम करने की उम्मीद करती है, तो दोनों के बीच स्वाभाविक रूप से अंतर पैदा होगा।

इसलिए ITI और पॉलिटेक्निक के पाठ्यक्रम को समय-समय पर उद्योग की वास्तविक जरूरत के अनुसार अपडेट करना जरूरी है।

बाजार बदल रहा है तो प्रशिक्षण भी बदलना होगा।

स्थानीय उद्योग से मजबूत रिश्ता क्यों जरूरी?

बिहार के लिए एक और बड़ी चुनौती है—तकनीकी संस्थानों और स्थानीय उद्योगों के बीच कमजोर जुड़ाव।

जिस जिले या इलाके में ऑटोमोबाइल, निर्माण, कृषि उपकरण, इलेक्ट्रिकल, फर्नीचर, मशीनरी, सोलर या दूसरे तकनीकी कारोबार मौजूद हैं, वहां के प्रशिक्षण संस्थानों को स्थानीय रोजगार बाजार की जरूरत समझनी चाहिए।

अगर किसी क्षेत्र में प्रशिक्षित युवाओं के लिए पर्याप्त स्थानीय अवसर नहीं हैं, तो उन्हें दूसरे राज्यों की ओर जाना पड़ता है।

यही कारण है कि तकनीकी शिक्षा को केवल संस्थान तक सीमित देखने के बजाय उसे स्थानीय अर्थव्यवस्था से जोड़ना जरूरी है।

बिहार में अगर छोटे उद्योग, MSME, सर्विस सेंटर और तकनीकी व्यवसाय बढ़ते हैं, तो ITI और पॉलिटेक्निक के युवाओं के लिए स्थानीय रोजगार के अवसर भी बढ़ सकते हैं।

अप्रेंटिसशिप सिर्फ औपचारिकता न बने

कक्षा में किसी मशीन के बारे में पढ़ना और वास्तविक उद्योग में उसी मशीन पर काम करना एक जैसा अनुभव नहीं है।

यहीं अप्रेंटिसशिप महत्वपूर्ण हो जाती है।

अगर प्रशिक्षण के बाद युवा को कंपनी, वर्कशॉप, उद्योग या तकनीकी सेवा केंद्र में वास्तविक काम सीखने का अवसर मिलता है, तो उसके अंदर आत्मविश्वास और व्यावहारिक क्षमता दोनों बढ़ते हैं।

लेकिन अप्रेंटिसशिप को सिर्फ कुछ महीनों का औपचारिक अनुभव बनाकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा।

जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें छात्र को पता हो कि उसे किस क्षेत्र में प्रशिक्षण मिलेगा, किस प्रकार का काम करना होगा और प्रशिक्षण पूरा होने के बाद रोजगार की संभावना क्या है।

अच्छी अप्रेंटिसशिप वह है जो युवा को नौकरी के लिए तैयार करे, सिर्फ अनुभव प्रमाणपत्र न दे।

निजी कंपनियों को भी आगे आना होगा

सरकार हर प्रशिक्षित युवा को सरकारी नौकरी नहीं दे सकती। रोजगार का बड़ा हिस्सा निजी उद्योगों, MSME, निर्माण कंपनियों, सर्विस सेंटर और स्थानीय व्यवसायों से आता है।

इसलिए निजी कंपनियों और तकनीकी संस्थानों के बीच मजबूत साझेदारी जरूरी है।

कंपनियां यह बता सकती हैं कि उन्हें किस प्रकार के कर्मचारियों की जरूरत है। संस्थान उसी अनुसार प्रशिक्षण विकसित कर सकते हैं। कंपनियां छात्रों को इंटर्नशिप और अप्रेंटिसशिप दे सकती हैं और योग्य छात्रों की भर्ती भी कर सकती हैं।

इससे प्रशिक्षण → अनुभव → रोजगार की एक सीधी श्रृंखला बन सकती है।

हर छात्र नौकरी करेगा, यह जरूरी नहीं

तकनीकी शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी तलाशना नहीं होना चाहिए।

एक प्रशिक्षित इलेक्ट्रिशियन अपना सर्विस कारोबार शुरू कर सकता है। ऑटोमोबाइल तकनीशियन वर्कशॉप खोल सकता है। सोलर तकनीक सीखने वाला युवक इंस्टॉलेशन और मरम्मत का काम कर सकता है। वेल्डिंग, मशीन रिपेयरिंग, प्लंबिंग और दूसरे तकनीकी क्षेत्रों में भी छोटे व्यवसाय की संभावना है।

लेकिन इसके लिए तकनीकी कौशल के साथ व्यवसाय चलाने की जानकारी और शुरुआती पूंजी भी चाहिए।

इसलिए ITI और पॉलिटेक्निक में तकनीकी प्रशिक्षण के साथ उद्यमिता, डिजिटल भुगतान, ग्राहक प्रबंधन, हिसाब-किताब और छोटे व्यवसाय की बुनियादी जानकारी भी दी जानी चाहिए।

प्रशिक्षण की गुणवत्ता सबसे बड़ा सवाल

सिर्फ संस्थानों की संख्या बढ़ाने से रोजगार की समस्या हल नहीं होगी।

जरूरी है कि प्रशिक्षण केंद्रों में पर्याप्त प्रशिक्षक, आधुनिक उपकरण, प्रयोगशालाएं और व्यावहारिक प्रशिक्षण की सुविधा हो।

युवा ने जिस मशीन पर पढ़ाई की है, अगर उसने उसे कभी वास्तविक रूप से चलाया ही नहीं, तो उसके प्रमाणपत्र का रोजगार बाजार में प्रभाव सीमित हो सकता है।

इसीलिए तकनीकी शिक्षा में Theory से ज्यादा Practical और Practical से ज्यादा Industry Exposure पर जोर देना होगा।

सफलता का पैमाना रोजगार होना चाहिए

किसी ITI या पॉलिटेक्निक की सफलता का मूल्यांकन केवल प्रवेश लेने वाले छात्रों और परीक्षा पास करने वाले छात्रों की संख्या से नहीं होना चाहिए।

यह भी देखा जाना चाहिए—

  • प्रशिक्षण के बाद कितने युवाओं को नौकरी मिली?

  • कितनों को अप्रेंटिसशिप मिली?

  • कितनों को स्थानीय रोजगार मिला?

  • कितनों ने अपना व्यवसाय शुरू किया?

  • प्रशिक्षण के बाद उनकी आय में कितना बदलाव आया?

अगर इन आंकड़ों को पारदर्शी तरीके से सामने लाया जाए तो छात्रों और अभिभावकों को भी बेहतर निर्णय लेने में मदद मिलेगी।

बिहार के लिए चुनौती के साथ अवसर भी

बिहार की बड़ी युवा आबादी को अगर सही तकनीकी प्रशिक्षण, उद्योग से जुड़ा अनुभव और रोजगार का अवसर मिले तो यही युवा राज्य की आर्थिक ताकत बन सकते हैं।

इसके लिए प्रशिक्षण संस्थानों को स्थानीय बाजार से जोड़ना होगा। उद्योगों को प्रशिक्षण व्यवस्था का हिस्सा बनाना होगा और युवाओं को सिर्फ प्रमाणपत्र देने के बजाय काम करने की क्षमता विकसित करनी होगी।

ITI और पॉलिटेक्निक से निकलने वाले युवाओं की बेरोजगारी को केवल उनकी व्यक्तिगत समस्या मानना सही नहीं होगा। यह शिक्षा व्यवस्था, उद्योग, रोजगार बाजार और स्थानीय अर्थव्यवस्था के बीच तालमेल का सवाल है।

युवा के हाथ में प्रमाणपत्र है, लेकिन अगर उस प्रमाणपत्र के साथ काम का अवसर नहीं है तो पूरी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अब समय आ गया है कि तकनीकी शिक्षा की सफलता को प्रशिक्षित युवाओं की संख्या से नहीं, बल्कि रोजगार और आय के वास्तविक परिणाम से मापा जाए।

क्योंकि आखिरकार युवा को सिर्फ यह नहीं चाहिए कि वह कह सके—“मैंने ITI या पॉलिटेक्निक किया है।”

उसे यह कहने का अवसर चाहिए—

“मेरे पास हुनर है और इसी हुनर से मैं अपने परिवार का भविष्य बना सकता हूं।”

आलोक कुमार

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