🔴 ताजा खबर
खबरें लोड हो रही हैं...

India : राजीव गांधी की जयंती: सद्भावना दिवस और बदलते भारत की याद

 


राजीव गांधी की जयंती: सद्भावना दिवस और बदलते भारत की याद

 जिस उम्र में आज के नेता राजनीति की सीढ़ियां चढ़ने की तैयारी करते हैं, उसी उम्र में राजीव गांधी ने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की बागडोर संभाल ली थी। सवाल यह नहीं कि राजीव गांधी की राजनीति से हर कोई सहमत था या नहीं; सवाल यह है कि क्या आज का भारत उस युवा प्रधानमंत्री के उस सपने को याद करता है, जिसमें तकनीक, आधुनिकता और सद्भावना के सहारे देश को 21वीं सदी में ले जाने की कोशिश थी?

20 अगस्त भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की जयंती का दिन है। देश में यह दिन ‘सद्भावना दिवस’ के रूप में भी याद किया जाता है। यह अवसर केवल एक पूर्व प्रधानमंत्री को श्रद्धांजलि देने का नहीं, बल्कि उन विचारों और नीतिगत प्रयासों को समझने का भी है, जिनके केंद्र में राष्ट्रीय एकता, सामाजिक सौहार्द, तकनीकी आधुनिकीकरण और बदलते भारत की कल्पना थी।

राजीव गांधी का जन्म 20 अगस्त 1944 को मुंबई में हुआ था। वे केवल 40 वर्ष की उम्र में भारत के प्रधानमंत्री बने। भारतीय राजनीति के इतिहास में इतनी कम उम्र में प्रधानमंत्री बनने की घटना अपने आप में उल्लेखनीय है। 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश गंभीर राजनीतिक और सामाजिक संकट से गुजर रहा था। ऐसे असाधारण समय में राजीव गांधी ने कांग्रेस का नेतृत्व संभाला और देश के प्रधानमंत्री बने।

उनका प्रधानमंत्री पद का कार्यकाल 1984 से 1989 तक रहा। यह वह समय था जब भारत एक ओर पारंपरिक प्रशासनिक व्यवस्था और धीमी प्रक्रियाओं से जूझ रहा था, वहीं दूसरी ओर दुनिया कंप्यूटर, दूरसंचार और सूचना तकनीक की नई क्रांति की ओर बढ़ रही थी।

तकनीक को भविष्य से जोड़ने की कोशिश

राजीव गांधी के कार्यकाल की एक प्रमुख पहचान भारत के तकनीकी आधुनिकीकरण की दिशा में उठाए गए कदमों को माना जाता है। कंप्यूटरीकरण और दूरसंचार के विस्तार पर जोर दिया गया। उस समय कंप्यूटर आज की तरह सामान्य जीवन का हिस्सा नहीं थे। नई तकनीक को लेकर रोजगार खत्म होने जैसी आशंकाएं भी व्यक्त की जाती थीं।

ऐसे माहौल में तकनीक को विकास का साधन मानना एक महत्वपूर्ण राजनीतिक दृष्टिकोण था।

दूरसंचार और कंप्यूटर के क्षेत्र में उस दौर में किए गए प्रयासों ने आगे चलकर भारत की सूचना प्रौद्योगिकी यात्रा के लिए आधार तैयार करने में भूमिका निभाई। आज मोबाइल फोन, इंटरनेट, डिजिटल भुगतान, ऑनलाइन शिक्षा और डिजिटल शासन भारतीय जीवन का हिस्सा हैं। लेकिन इस परिवर्तन की कहानी अचानक शुरू नहीं हुई। इसके पीछे कई दशकों की नीतियां, प्रयोग और संस्थागत प्रयास हैं। राजीव गांधी का दौर उसी लंबी यात्रा का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।

उनकी सरकार ने शिक्षा, विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में आधुनिक सोच को आगे बढ़ाने की कोशिश भी की। युवा भारत को नई तकनीकी दुनिया से जोड़ने की उनकी सोच आज के डिजिटल भारत के संदर्भ में फिर चर्चा में आती है।

उपलब्धियों के साथ विवाद भी

हालांकि किसी भी राजनीतिक नेता का मूल्यांकन केवल उपलब्धियों के आधार पर नहीं किया जा सकता। राजीव गांधी का कार्यकाल विवादों से भी घिरा रहा।

बोफोर्स प्रकरण ने उनकी सरकार की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया और 1989 के आम चुनावों में यह बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना। शाहबानो मामले से जुड़े फैसले और उसके बाद की राजनीतिक परिस्थितियों ने भी उनकी सरकार की नीति और राजनीतिक प्राथमिकताओं पर बहस को जन्म दिया।

अयोध्या से संबंधित घटनाक्रम और श्रीलंका में भारतीय शांति सेना भेजने का निर्णय भी उनके कार्यकाल के महत्वपूर्ण और विवादित अध्यायों में शामिल हैं। श्रीलंका नीति ने भारत को जटिल राजनीतिक और सैन्य परिस्थितियों में उलझाया और बाद के वर्षों में इसके गंभीर परिणाम सामने आए।

इसलिए राजीव गांधी को समझने का सही तरीका न तो केवल उनका महिमामंडन है और न ही उनकी पूरी राजनीतिक विरासत को खारिज कर देना। इतिहास को उपलब्धियों और गलतियों दोनों के साथ पढ़ना चाहिए।

सद्भावना दिवस का अर्थ

राजीव गांधी की जयंती को सद्भावना दिवस के रूप में मनाने का विचार आज के सामाजिक और राजनीतिक वातावरण में विशेष महत्व रखता है।

लेकिन सद्भावना का अर्थ केवल सरकारी कार्यक्रमों में शपथ लेना, पुष्पांजलि अर्पित करना या नेताओं के संदेश जारी करना नहीं हो सकता। इसका वास्तविक अर्थ समाज में आपसी सम्मान, संवाद और सहयोग की संस्कृति को मजबूत करना है।

लोकतंत्र में राजनीतिक असहमति स्वाभाविक है। हर नागरिक किसी एक दल या विचारधारा से सहमत हो, यह जरूरी नहीं। लेकिन असहमति को व्यक्तिगत दुश्मनी, सामाजिक नफरत या हिंसक भाषा में बदल देना लोकतांत्रिक संस्कृति को कमजोर करता है।

आज सोशल मीडिया के दौर में राजनीतिक बहस कई बार तर्क से ज्यादा आक्रोश पर आधारित दिखाई देती है। विचारों के जवाब विचारों से देने के बजाय व्यक्ति पर हमला करना आसान हो गया है। धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र को लेकर तनाव भी सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित करता है।

ऐसे समय में सद्भावना दिवस केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए एक संदेश बन सकता है।

21वीं सदी का सपना और आज का भारत

राजीव गांधी ने भारत को 21वीं सदी में ले जाने की बात की थी। आज भारत 21वीं सदी के तीसरे दशक में खड़ा है। देश ने अंतरिक्ष, डिजिटल तकनीक, दूरसंचार, स्टार्टअप और सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है।

लेकिन विकास की तस्वीर का दूसरा पक्ष भी है। बेरोजगारी, आर्थिक असमानता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, ग्रामीण-शहरी अंतर और सामाजिक तनाव जैसी चुनौतियां आज भी मौजूद हैं।

इसलिए राजीव गांधी की जयंती पर केवल यह पूछना पर्याप्त नहीं कि भारत तकनीकी रूप से कितना आगे बढ़ा। बड़ा सवाल यह है कि क्या तकनीकी और आर्थिक विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंच रहा है?

आधुनिक भारत केवल तेज इंटरनेट, डिजिटल भुगतान और अत्याधुनिक तकनीक से नहीं बनेगा। आधुनिकता का अर्थ बेहतर शिक्षा, गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं, रोजगार के अवसर, सामाजिक न्याय और नागरिकों के बीच विश्वास भी है।

राजनीति में सद्भावना की जरूरत

आज राजनीतिक दलों के बीच प्रतिस्पर्धा पहले से अधिक तीखी दिखाई देती है। चुनाव लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा हैं, लेकिन चुनावी प्रतिस्पर्धा को समाज में स्थायी विभाजन का कारण नहीं बनना चाहिए।

सद्भावना का अर्थ यह नहीं कि राजनीतिक मतभेद खत्म कर दिए जाएं। इसका अर्थ है कि मतभेदों के बावजूद संवाद बना रहे। सत्ता पक्ष विपक्ष की बात सुने और विपक्ष सरकार से सवाल पूछे, लेकिन दोनों पक्ष लोकतांत्रिक मर्यादाओं का सम्मान करें।

राजीव गांधी की राजनीतिक विरासत पर मतभेद हो सकते हैं और होने भी चाहिए। किसी भी नेता को आलोचना से ऊपर रखना लोकतांत्रिक दृष्टि से उचित नहीं है। लेकिन आलोचना के साथ इतिहास से सीखना भी जरूरी है।

उनके कार्यकाल की तकनीकी और प्रशासनिक पहलों से आधुनिक भारत की विकास यात्रा को समझा जा सकता है, जबकि बोफोर्स, शाहबानो, अयोध्या और श्रीलंका जैसे विवादित अध्याय सत्ता के निर्णयों की जटिलता और राजनीतिक जोखिमों को समझने का अवसर देते हैं।

श्रद्धांजलि का अर्थ क्या हो?

राजीव गांधी की जयंती पर तस्वीर पर फूल चढ़ाना एक परंपरा हो सकती है, लेकिन सच्ची श्रद्धांजलि उससे आगे जाती है।

यदि हम तकनीक को मानव विकास का माध्यम बनाएं, सामाजिक विभाजन को कम करने की कोशिश करें, असहमति के अधिकार का सम्मान करें और देश के कमजोर वर्गों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास करें, तो सद्भावना दिवस का संदेश अधिक सार्थक होगा।

आज भारत के सामने एक साथ दो चुनौतियां हैं—तेजी से आधुनिक बनना और मानवीय बने रहना।

सवाल यही है कि क्या भारत तकनीकी रूप से आधुनिक होने के साथ-साथ सामाजिक रूप से अधिक सहिष्णु, लोकतांत्रिक और एकजुट भी बन रहा है?

राजीव गांधी इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय हैं। उनकी उपलब्धियों और गलतियों दोनों से सीखना भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का संकेत होगा। 20 अगस्त को उन्हें याद करने का सबसे सार्थक तरीका यही हो सकता है कि हम उस भारत पर विचार करें, जो आधुनिक भी हो, तकनीकी रूप से सक्षम भी हो और सबसे बढ़कर अपने नागरिकों के बीच सद्भावना बनाए रखने में सक्षम भी हो।

आलोक कुमार

India : वादे और हकीकत के बीच महंगाई की कहानी

 वादे और हकीकत के बीच महंगाई की कहानी

2014 के दावों से 2026 की हकीकत तक—अब जनता हिसाब मांग रही है


राजनीति में वादे करना आसान होता है, लेकिन वर्षों बाद उन्हीं वादों की कसौटी पर खुद को खड़ा करना कठिन। 2014 में महंगाई, खासकर पेट्रोल, चीनी और रोजमर्रा की जरूरतों की कीमतों को लेकर जिस तरह राजनीतिक बहस हुई थी, उसकी गूंज आज 2026 में भी सुनाई देती है। सवाल यह है कि क्या सत्ता में आने के बाद किसी सरकार को अपने पुराने बयानों, दावों और वादों का हिसाब जनता को नहीं देना चाहिए?

लोकतंत्र में जनता केवल चुनाव के दिन मतदाता नहीं होती। वह पूरे कार्यकाल में सरकार के कामकाज पर सवाल पूछने का अधिकार रखती है। यदि किसी राजनीतिक दल ने महंगाई को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था, तो वर्षों बाद उससे यह पूछना भी स्वाभाविक है कि आम आदमी की रसोई और घरेलू बजट की स्थिति कितनी बदली?

महंगाई का सवाल केवल किसी एक वस्तु की कीमत तक सीमित नहीं है। चीनी, खाद्य तेल, दाल, सब्जियां, दूध, रसोई गैस और पेट्रोल-डीजल जैसी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों का सीधा असर परिवार के मासिक बजट पर पड़ता है। गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग के लिए तो छोटी कीमत वृद्धि भी अतिरिक्त आर्थिक दबाव पैदा कर सकती है।

पुराने दावों की आज के दौर में परीक्षा

2014 के आसपास महंगाई को लेकर जिस राजनीतिक भाषा का इस्तेमाल हुआ, वह भारतीय राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गई। उस समय आम लोगों के बीच बढ़ती कीमतों को लेकर असंतोष था और राजनीतिक दलों ने इसे सत्ता परिवर्तन के लिए प्रभावी मुद्दे के रूप में इस्तेमाल किया।

लेकिन लोकतंत्र की असली परीक्षा सत्ता हासिल करने के बाद होती है। विपक्ष में रहते हुए जो सवाल किसी सरकार से पूछे जाते हैं, वही सवाल सत्ता में आने के बाद भी पूछे जाने चाहिए। सत्ता बदलने के साथ जवाबदेही का सिद्धांत नहीं बदल सकता।

आज सवाल यह नहीं होना चाहिए कि 2014 में किसने क्या कहा था और 2026 में कौन किससे सवाल पूछ रहा है। असली प्रश्न यह है कि क्या सरकार अपने कार्यकाल के दौरान महंगाई को नियंत्रित करने, लोगों की आय बढ़ाने और घरेलू खर्च का दबाव कम करने में सफल रही?

जनता को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा ठोस आंकड़ों की जरूरत है।

एथनॉल नीति और पेट्रोल का सवाल

पेट्रोल की कीमतों के साथ एथनॉल मिश्रण भी चर्चा का विषय है। सरकार एथनॉल को ऊर्जा सुरक्षा, किसानों की आय बढ़ाने और आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम करने की रणनीति के रूप में प्रस्तुत करती रही है।

यह नीति कई स्तरों पर महत्वपूर्ण है। यदि देश पेट्रोल में घरेलू रूप से उत्पादित एथनॉल का मिश्रण बढ़ाता है, तो तेल आयात पर निर्भरता कम करने की संभावना बनती है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत और कृषि क्षेत्र को बाजार उपलब्ध कराने जैसे लाभ भी हो सकते हैं।

लेकिन उपभोक्ता का सवाल अलग है—इस नीति का प्रत्यक्ष लाभ उसकी जेब तक कितना पहुंचा?

यदि एथनॉल मिश्रण बढ़ रहा है, तो सरकार को पारदर्शी तरीके से बताना चाहिए कि इससे तेल आयात में कितनी बचत हुई, किसानों को कितना आर्थिक लाभ मिला, चीनी उद्योग को कितना फायदा हुआ और उपभोक्ताओं को इससे क्या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष राहत मिली।

यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि यह कहना कि एथनॉल की जरूरत ही नहीं है या हर परिस्थिति में एथनॉल पेट्रोल से महंगा है, बिना ठोस आंकड़ों के उचित निष्कर्ष नहीं होगा। ऊर्जा नीति का मूल्यांकन केवल एक कीमत से नहीं बल्कि उत्पादन लागत, आयात बचत, कृषि आय, पर्यावरणीय प्रभाव और उपभोक्ता मूल्य सहित कई मानकों पर होना चाहिए।

पेट्रोल की कीमत का पूरा सच क्या है?

पेट्रोल की खुदरा कीमत कई घटकों से मिलकर बनती है। अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत, रुपये और डॉलर की विनिमय दर, केंद्र और राज्य सरकारों के कर, डीलर कमीशन तथा अन्य लागत मिलकर अंतिम कीमत निर्धारित करते हैं।

इसलिए अलग-अलग देशों में पेट्रोल की कीमतों की सीधी तुलना करना हमेशा पर्याप्त नहीं होता। अलग देशों की कर व्यवस्था, आय का स्तर, मुद्रा विनिमय दर और ऊर्जा बाजार अलग होते हैं।

फिर भी एक सवाल जनता का बना रहता है—जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आती है, तब घरेलू उपभोक्ता को उसका अनुपातिक लाभ कितना मिलता है?

इस सवाल का जवाब राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि आंकड़ों से दिया जाना चाहिए।

सरकार को समय-समय पर यह बताना चाहिए कि पेट्रोल की कीमत में केंद्र और राज्य करों की हिस्सेदारी कितनी है, कच्चे तेल की लागत कितनी है, तेल विपणन कंपनियों की लागत और मार्जिन क्या है तथा कीमतों में बदलाव का उपभोक्ता पर कितना प्रभाव पड़ा।

महंगाई सिर्फ आंकड़ा नहीं, घरेलू अनुभव है

सरकारें अक्सर महंगाई को थोक मूल्य सूचकांक, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और अन्य आर्थिक आंकड़ों के माध्यम से समझाती हैं। ये आंकड़े जरूरी हैं, लेकिन आम नागरिक की जिंदगी केवल सांख्यिकीय तालिकाओं से नहीं चलती।

एक परिवार के लिए महंगाई का अर्थ है महीने के अंत में बची रकम। इसका अर्थ है कि पहले जितने पैसों में घर का राशन आता था, अब उतने में कितना सामान आता है। इसका अर्थ है बच्चों की पढ़ाई, इलाज, यात्रा, बिजली, किराया और भोजन के बीच संतुलन बनाना।

इसीलिए महंगाई का वास्तविक मूल्यांकन केवल प्रतिशत वृद्धि से नहीं बल्कि लोगों की आय और खर्च के बीच संबंध से भी होना चाहिए।

यदि आय बढ़ती है लेकिन आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं का खर्च उससे तेज गति से बढ़ता है, तो परिवार को महंगाई का दबाव महसूस होता रहेगा।

जनता को नारे नहीं, हिसाब चाहिए

लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना सरकार विरोधी होना नहीं है। बल्कि सवाल पूछना लोकतांत्रिक व्यवस्था की ताकत है।

यदि सरकार की नीतियां प्रभावी हैं तो उन्हें आंकड़ों के साथ जनता के सामने रखने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए। और यदि किसी नीति में कमी दिखाई देती है, तो उसे सुधारना ही सुशासन की पहचान है।

महंगाई पर बहस को राजनीतिक आरोपों से आगे ले जाने की जरूरत है। सरकार और विपक्ष दोनों को यह बताना चाहिए कि उन्होंने महंगाई कम करने के लिए क्या किया, कौन-सी नीतियां सफल रहीं और किन क्षेत्रों में अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।

जनता यह भी जानना चाहती है कि किसानों की आय, मजदूरों की मजदूरी, छोटे कारोबारियों की लागत और मध्यम वर्ग की बचत पर महंगाई का वास्तविक प्रभाव क्या रहा।

जवाबदेही का पैमाना एक होना चाहिए

राजनीतिक दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे अपने पुराने बयानों को केवल विपक्ष के हथियार के रूप में न देखें। यदि कोई दावा चुनाव के दौरान जनता के सामने किया गया था, तो सत्ता में आने के बाद उसकी प्रगति बताना भी राजनीतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।

जनता की स्मृति को कमजोर समझना राजनीति की बड़ी भूल हो सकती है। पुराने भाषण, पुराने वादे और पुराने दावे आज डिजिटल दौर में आसानी से उपलब्ध हैं। इसलिए राजनीतिक जवाबदेही अब केवल चुनावी घोषणा-पत्र तक सीमित नहीं रह सकती।

2026 का नागरिक यह पूछ सकता है कि 2014 में जो कहा गया था, उसका परिणाम क्या निकला? यह सवाल किसी एक दल या सरकार तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र में सत्ता में आने वाला हर राजनीतिक दल इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

आखिरकार महंगाई का सवाल केवल चीनी या पेट्रोल के दाम का सवाल नहीं है। यह विश्वास, पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही का सवाल है।

वादे चुनाव जीत सकते हैं, लेकिन भरोसा केवल काम से बनता है।

और जब जनता सवाल पूछती है तो लोकतंत्र की मांग बहुत सीधी है—उसे नारे नहीं, आंकड़े चाहिए; आरोप नहीं, जवाब चाहिए; और वादे नहीं, उनकी वास्तविकता का हिसाब चाहिए।

आलोक कुमार

Jharkhand : खूंटी में आखिर चल क्या रहा है?

खूंटी में आखिर चल क्या रहा है? अमन-चैन पर मंडराता खतरा खूंटी में एक के बाद एक सामने आ रही हिंसक घटनाएं और उनके विरोध में हो रहे प्रदर्शन कई ...