India : अब देश में ‘दिमागी नक्सल’ का नारा

 


अब देश में ‘दिमागी नक्सल’ का नारा: असहमति और लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा

क्या अब बंदूक से नहीं, विचारों से लड़ी जाएगी नक्सलवाद की लड़ाई? और अगर विचारों की लड़ाई होगी, तो लोकतांत्रिक असहमति और हिंसक विचारधारा के बीच सीमा कौन तय करेगा?

15 अगस्त 2026 को लालकिले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के इस्तेमाल ने स्वतंत्रता दिवस के राजनीतिक विमर्श को एक नई दिशा दे दी। प्रधानमंत्री ने माओवादी और नक्सली हिंसा के खिलाफ सरकार की कार्रवाई का उल्लेख करते हुए कहा कि बंदूक उठाने वाले नक्सलवाद के साथ-साथ ऐसी मानसिकता रखने वालों को भी पहचानना और अलग-थलग करना जरूरी है। इस बयान के बाद राजनीतिक दलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के बीच बहस तेज हो गई है।

यह विवाद केवल एक राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं है। इसके पीछे लोकतंत्र का एक बेहद महत्वपूर्ण सवाल खड़ा है—क्या किसी हिंसक विचारधारा के वैचारिक समर्थन और सरकार की लोकतांत्रिक आलोचना के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सकेगा?

प्रधानमंत्री के बयान को सरकार के नजरिए से देखें तो उसका तर्क समझ में आता है। भारत लंबे समय से माओवादी हिंसा और सशस्त्र उग्रवाद की चुनौती का सामना करता रहा है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए हिंसा, हथियारबंद विद्रोह और संवैधानिक व्यवस्था को बलपूर्वक कमजोर करने का प्रयास गंभीर सुरक्षा चुनौती है। ऐसे मामलों में राज्य का कानून लागू करना और नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना उसका दायित्व है।

लेकिन समस्या उस समय शुरू होती है जब हिंसक नक्सलवाद और शांतिपूर्ण असहमति के बीच की रेखा अस्पष्ट हो जाए।

लोकतंत्र की खूबसूरती ही यही है कि नागरिक सरकार से सवाल कर सकता है। कोई बेरोजगारी पर सवाल उठा सकता है, महंगाई का विरोध कर सकता है, किसी कानून को गलत बता सकता है, सरकारी योजना की कमियां गिना सकता है या संसद और सरकार की नीतियों की आलोचना कर सकता है। पत्रकार सत्ता से कठिन प्रश्न पूछ सकता है। विद्यार्थी विश्वविद्यालय परिसर में बहस कर सकते हैं। लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता किसी नीति के खिलाफ अपनी राय रख सकते हैं।

इन गतिविधियों को अपने आप में नक्सली या राष्ट्रविरोधी मान लेना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरनाक होगा।

यही वजह है कि ‘दिमागी नक्सल’ शब्द के बाद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि इसकी परिभाषा क्या है?

प्रधानमंत्री के बयान पर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं ने आरोप लगाया कि इस तरह के राजनीतिक विशेषण सरकार के आलोचकों को निशाना बनाने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं। कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने तो व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि उन्हें ‘दिमागी नक्सल’ होने पर गर्व है। इससे विवाद और राजनीतिक हो गया।

वहीं सत्ता पक्ष का तर्क अलग है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने प्रधानमंत्री के बयान की व्याख्या करते हुए कहा कि इसका संकेत उन लोगों की ओर है जो लोकतंत्र और देश की संवैधानिक व्यवस्था के खिलाफ नक्सली या ‘अर्बन नक्सल’ जैसी विचारधारा फैलाने का प्रयास करते हैं। यानी सरकार का पक्ष यह है कि निशाना सामान्य आलोचना नहीं, बल्कि ऐसी विचारधारा है जो हिंसा और संवैधानिक व्यवस्था को कमजोर करने का समर्थन करती है।

यहीं से लोकतांत्रिक बहस की असली कसौटी सामने आती है।

किसी विचार से असहमति को उस विचार के हिंसक होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

अगर कोई नागरिक सरकार की आलोचना करता है तो पहले यह देखा जाना चाहिए कि वह क्या कह रहा है, किस तरीके से कह रहा है और क्या वह हिंसा का समर्थन करता है। केवल सरकार विरोधी होना किसी व्यक्ति को नक्सली नहीं बना देता। इसी तरह किसी नीति का विरोध करना संविधान-विरोधी गतिविधि नहीं है।

भारत का लोकतंत्र इसी विविधता पर खड़ा है। यहां सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की भूमिका है। सरकार को निर्णय लेने का अधिकार है और विपक्ष को सवाल पूछने का। मीडिया को सरकार की उपलब्धियां बताने के साथ उसकी कमियां उजागर करने का भी अधिकार है। विश्वविद्यालयों में विचारों का टकराव होना लोकतांत्रिक समाज की स्वाभाविक प्रक्रिया है।

इसलिए रास्ता बेहद स्पष्ट होना चाहिए—विचार का जवाब विचार से और अपराध का जवाब कानून से।

यदि कोई व्यक्ति वास्तव में हिंसा को बढ़ावा देता है, हथियारबंद विद्रोह का समर्थन करता है या संवैधानिक व्यवस्था को हिंसक तरीके से समाप्त करने की कोशिश करता है, तो उसके खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन यदि कोई व्यक्ति शांतिपूर्ण तरीके से सरकार की आलोचना कर रहा है, तो उसे केवल राजनीतिक लेबल देकर अलग-थलग करना लोकतंत्र की भावना के विपरीत होगा।

‘दिमागी नक्सल’ शब्द की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि कहीं यह धीरे-धीरे राजनीतिक असहमति का पर्याय न बन जाए।

आज यदि सत्ता पक्ष के आलोचक को ‘दिमागी नक्सल’ कहा जाएगा और कल किसी दूसरी सरकार के विरोधी को कोई दूसरा राजनीतिक लेबल दिया जाएगा, तो सार्वजनिक बहस मुद्दों से हटकर आरोपों और पहचान की राजनीति में बदल सकती है।

स्वतंत्रता दिवस का महत्व यहां और बढ़ जाता है। 15 अगस्त केवल ब्रिटिश शासन से मिली स्वतंत्रता की स्मृति नहीं है। यह उस लोकतांत्रिक यात्रा की याद भी है जिसमें भारतीय नागरिक ने अपनी आवाज, अधिकार और राजनीतिक भागीदारी के लिए संघर्ष किया।

स्वतंत्रता का अर्थ केवल देश की सीमाओं की सुरक्षा नहीं, बल्कि विचार रखने की स्वतंत्रता, सवाल पूछने की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण असहमति की जगह भी है।

इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं कि लोकतंत्र हिंसा को स्वीकार करे। लोकतंत्र हिंसा और शांतिपूर्ण असहमति के बीच स्पष्ट अंतर करता है। हिंसा कानून का विषय है, जबकि विचार लोकतांत्रिक बहस का।

इसलिए प्रधानमंत्री के बयान को सबसे सुरक्षित लोकतांत्रिक अर्थ में तभी देखा जा सकता है जब ‘दिमागी नक्सल’ से आशय केवल उन लोगों से हो जो वास्तव में हिंसक माओवादी विचारधारा या सशस्त्र विद्रोह का समर्थन करते हैं। लेकिन यदि यह शब्द पत्रकारों, विद्यार्थियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, विपक्षी नेताओं या आम नागरिकों की शांतिपूर्ण आलोचना के लिए इस्तेमाल होने लगे, तो यह गंभीर लोकतांत्रिक चिंता पैदा करेगा।

आज जरूरत किसी नए राजनीतिक लेबल की नहीं, बल्कि स्पष्ट परिभाषा और संवैधानिक मर्यादा की है।

क्योंकि किसी भी सरकार की शक्ति केवल उसके बहुमत में नहीं होती। उसकी वास्तविक लोकतांत्रिक ताकत इस बात में भी दिखाई देती है कि वह अपने आलोचकों को कितना स्थान देती है।

नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई सुरक्षा बलों, विकास और कानून के माध्यम से लड़ी जा सकती है। लेकिन लोकतंत्र की रक्षा केवल सहमति से नहीं होती। लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब सत्ता के सामने सवाल पूछने की जगह बनी रहे।

इसलिए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द से शुरू हुई बहस का असली प्रश्न यही है—क्या यह हिंसक विचारधारा के खिलाफ चेतावनी बनेगा या असहमति पर नया राजनीतिक लेबल?

इसका उत्तर केवल सरकार या विपक्ष को नहीं देना है। इसका उत्तर पूरे लोकतांत्रिक समाज को देना होगा।

क्योंकि बंदूक का मुकाबला कानून कर सकता है, लेकिन विचारों का मुकाबला केवल विचारों से ही किया जा सकता है। और लोकतंत्र में असहमति दुश्मनी नहीं—लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा है।

Keralam: राजा महाबली के स्वागत का पर्व

 

ओणम: राजा महाबली के स्वागत का पर्व, जहां फूलों की रंगोली से लेकर साद्या तक दिखती है केरल की संस्कृति

 क्या कोई त्योहार ऐसा भी हो सकता है, जिसमें राजा अपने राज्य में नहीं, बल्कि अपनी प्रजा के दिलों में लौटता हो? केरल का ओणम इसी भावनात्मक और सांस्कृतिक विश्वास का उत्सव है। फूलों से घर-आंगन सजते हैं, पारंपरिक व्यंजनों की खुशबू फैलती है, नौकाएं पानी पर दौड़ती हैं और लोकगीतों की धुनों के बीच राजा महाबली के स्वागत की तैयारी होती है।

केरल का प्रसिद्ध 10 दिवसीय फसल और सांस्कृतिक उत्सव ओणम 16 अगस्त 2026 को अथम से शुरू हो रहा है और इसका प्रमुख दिन तिरुवोनम 26 अगस्त 2026 को मनाया जाएगा। ओणम केवल फसल और समृद्धि की खुशी का पर्व नहीं है, बल्कि यह समानता, दान, वचन, सद्भाव और प्रजा के प्रति प्रेम की उस कल्पना को भी जीवित रखता है, जिसे राजा महाबली के आदर्श शासन से जोड़ा जाता है।

अथम से शुरू होती है दस दिनों की रंगीन यात्रा

ओणम के पहले दिन अथम से घरों के आंगन में फूलों की रंगोली यानी पूक्कलम बनाने की परंपरा शुरू होती है। जैसे-जैसे उत्सव के दिन आगे बढ़ते हैं, पूक्कलम में नए फूल और नए डिजाइन जुड़ते जाते हैं। तिरुवोनम के दिन यह रंग-बिरंगी सजावट अपने सबसे सुंदर रूप में दिखाई देती है।

इन दस दिनों में केरल का सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन उत्सव में बदल जाता है। पारंपरिक नृत्य, लोकगीत, खेल, सांस्कृतिक कार्यक्रम और विभिन्न लोककलाएं लोगों को अपनी परंपराओं से जोड़ती हैं। इसी दौरान होने वाली वल्लम कली यानी पारंपरिक नौका दौड़ ओणम की पहचान बन चुकी है।

ओणम का महत्व इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें परिवार और समाज को साथ आने का अवसर मिलता है। लोग एक-दूसरे को शुभकामनाएं देते हैं, घरों में अतिथियों का स्वागत करते हैं और सामूहिक भोजन के माध्यम से सामाजिक एकता का अनुभव करते हैं।

कौन हैं राजा महाबली?

ओणम की आत्मा को समझने के लिए राजा महाबली की कथा को समझना जरूरी है। महाबली को मावेली के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक परंपरा में उन्हें प्रह्लाद का पौत्र और विरोचन का पुत्र बताया गया है।

कथा के अनुसार महाबली अत्यंत शक्तिशाली, न्यायप्रिय, दानी और प्रजावत्सल राजा थे। उनके शासन में प्रजा सुखी और समृद्ध थी। लोककथाओं में उनके राज्य को ऐसे आदर्श समाज के रूप में याद किया जाता है, जहां लोगों के बीच भेदभाव कम था और राजा अपनी प्रजा के कल्याण को प्राथमिकता देता था।

महाबली की लोकप्रियता और शक्ति इतनी बढ़ी कि देवताओं को चिंता होने लगी। पौराणिक कथा के अनुसार तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण किया और महाबली की परीक्षा लेने उनके पास पहुंचे।

तीन पग भूमि और महाबली का महान वचन

कथा के अनुसार महाबली एक यज्ञ कर रहे थे और दान देने के लिए प्रसिद्ध थे। उसी समय वामन एक छोटे कद के ब्राह्मण बालक के रूप में उनके पास पहुंचे और केवल तीन पग भूमि मांग ली।

महाबली के गुरु शुक्राचार्य ने पहचान लिया कि यह कोई साधारण बालक नहीं, बल्कि भगवान विष्णु हैं। उन्होंने राजा को सावधान किया। लेकिन महाबली अपने वचन से पीछे नहीं हटे।

दान की अनुमति मिलते ही वामन ने विराट रूप धारण कर लिया। पहले पग में पृथ्वी और दूसरे पग में आकाश तथा स्वर्ग को नाप लिया। अब तीसरे पग के लिए कोई स्थान शेष नहीं था।

महाबली ने अपने वचन की मर्यादा बनाए रखने के लिए अपना सिर आगे कर दिया और कहा कि तीसरा कदम उनके सिर पर रखा जाए। भगवान विष्णु ने उनके सिर पर तीसरा पग रखा और महाबली पाताल लोक चले गए।

लेकिन कथा यहीं समाप्त नहीं होती। महाबली की दानशीलता, वचनबद्धता और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वे वर्ष में एक बार अपनी प्रिय प्रजा से मिलने पृथ्वी पर लौट सकेंगे।

लोकमान्यता है कि ओणम के दिनों में राजा महाबली अपनी प्रजा से मिलने केरल लौटते हैं। इसलिए लोग अपने घर सजाते हैं, पूक्कलम बनाते हैं और अपने प्रिय राजा के स्वागत की तैयारी करते हैं।

ओणम साद्या: केले के पत्ते पर सजी केरल की संस्कृति

ओणम का सबसे प्रसिद्ध आकर्षण ओणम साद्या है। यह पारंपरिक रूप से एक शाकाहारी भोज होता है, जिसे केले के पत्ते पर विशेष तरीके से परोसा जाता है। इसमें कई तरह के व्यंजन शामिल होते हैं और बड़े आयोजनों में व्यंजनों की संख्या काफी अधिक हो सकती है।

साद्या में चोरु यानी चावल मुख्य भोजन होता है। इसके साथ परिप्पु, घी, सांभर और रसम परोसे जाते हैं। सब्जियों और पारंपरिक तैयारियों में अवियल, थोरन, ओलन, कालन, एरिसेरी और कूटू करी जैसे व्यंजन शामिल होते हैं।

इसके अलावा पचड़ी और किचड़ी, इंजीपुली, विभिन्न प्रकार के अचार और पपाडम भी भोजन का हिस्सा होते हैं। मीठे व्यंजनों में प्रथमन या पायसम का विशेष स्थान है। केले से बने पारंपरिक व्यंजन भी साद्या के स्वाद को अलग पहचान देते हैं।

भोजन के अंत में मोरु यानी मसालेदार छाछ भी परोसी जाती है।

साद्या केवल स्वाद का अनुभव नहीं है। केले के पत्ते पर एक साथ सजाए गए अनेक व्यंजन केरल की कृषि, स्थानीय उत्पादों, पाक-कला और सामूहिक जीवन की झलक दिखाते हैं। एक ही पंक्ति में बैठकर भोजन करने की परंपरा सामाजिक समानता और सामूहिकता की भावना को भी मजबूत करती है।

नौका दौड़ और लोककला बनाती है ओणम को खास

ओणम के दौरान केरल के अलग-अलग हिस्सों में सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। इनमें पारंपरिक नृत्य और लोककलाओं की विशेष भूमिका रहती है।

वल्लम कली, जिसे स्नेक बोट रेस के रूप में भी जाना जाता है, ओणम उत्सव की सबसे आकर्षक परंपराओं में से एक है। लंबी पारंपरिक नावों में सवार नाविक सामूहिक ताल और गीतों के साथ पानी को चीरते हुए आगे बढ़ते हैं। यह केवल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि सामूहिक अनुशासन, सहयोग और स्थानीय परंपरा का प्रदर्शन भी है।

इस तरह ओणम खेत से लेकर नदी तक और घर के आंगन से लेकर सामुदायिक आयोजनों तक पूरे केरल को उत्सव के रंग में रंग देता है।

ओणम का संदेश आज भी प्रासंगिक

राजा महाबली की कथा को केवल पौराणिक प्रसंग मानकर छोड़ देना ओणम के व्यापक सामाजिक संदेश को सीमित कर देगा। इस कथा के केंद्र में दान, वचन, विनम्रता, भक्ति और प्रजा के प्रति प्रेम जैसे मूल्य दिखाई देते हैं।

महाबली के पास शक्ति और वैभव था, लेकिन निर्णायक क्षण में उन्होंने अपने वचन को सबसे ऊपर रखा। उन्होंने अपना राज्य खोया, लेकिन अपनी प्रतिज्ञा नहीं छोड़ी। यही कारण है कि लोकस्मृति में उनका स्थान ऐसे राजा के रूप में बना रहा, जिसकी प्रजा आज भी उसके लौटने की प्रतीक्षा करती है।

ओणम यह संदेश भी देता है कि किसी समाज की वास्तविक समृद्धि केवल धन से नहीं मापी जाती। जब परिवार एक साथ बैठते हैं, पड़ोसी एक-दूसरे के सुख में शामिल होते हैं, भोजन साझा किया जाता है और लोकपरंपराएं अगली पीढ़ी तक पहुंचती हैं, तभी संस्कृति वास्तव में जीवित रहती है।

16 अगस्त से शुरू होकर 26 अगस्त 2026 के तिरुवोनम तक चलने वाला यह उत्सव केवल केरल की पहचान नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता का सुंदर उदाहरण है। इसमें एक राजा की स्मृति फूलों की रंगोली, नौकाओं की गति, लोकनृत्यों, गीतों और केले के पत्ते पर सजे भोजन के माध्यम से आज भी जीवित दिखाई देती है।

और शायद ओणम का सबसे खूबसूरत संदेश यही है—राजा महाबली लौटते हैं या नहीं, लेकिन उनकी प्रजा के सुख, समानता और समृद्धि का सपना हर वर्ष ओणम के साथ जरूर लौटता है।


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