Tamil Nadu: सीधे ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल के उद्धरणों के साथ सदन में

संवैधानिक अध्यक्षीय आसन से सीधे ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल के उद्धरणों के साथ सदन की कार्यवाही की शुरुआत की

दक्षिण भारत की राजनीति में एक ऐतिहासिक और चर्चित घटना उस समय देखने को मिली जब ऐसा प्रतीत हुआ कि पहली बार Tamil Nadu Legislative Assembly के नवनिर्वाचित अध्यक्ष जॉन क्रिश्चियन देववरम प्रभाकर (जेसीडी प्रभाकर) ने संवैधानिक अध्यक्षीय आसन से सीधे ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल के उद्धरणों के साथ सदन की कार्यवाही की शुरुआत की। इस घटना ने राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक हलकों में व्यापक चर्चा को जन्म दिया है।

जॉन क्रिश्चियन देववरम प्रभाकर, जिनका पूरा नाम ही उनके ईसाई विश्वास की झलक देता है, 12 मई 2026 को सर्वसम्मति से तमिलनाडु विधानसभा के अध्यक्ष निर्वाचित किए गए। उनके नाम का प्रस्ताव स्वयं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री Joseph Vijay ने रखा था। यह चुनाव केवल एक राजनीतिक नियुक्ति नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे तमिलनाडु की बदलती राजनीतिक संस्कृति और सामाजिक समीकरणों के प्रतीक के रूप में भी देखा जा रहा है।

जेसीडी प्रभाकर लंबे समय से तमिलनाडु की राजनीति में सक्रिय रहे हैं। उन्होंने वर्ष 1980 में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की थी और दशकों तक राज्य की राजनीति में प्रभावशाली भूमिका निभाई। वे पहले All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam (एआईएडीएमके) से जुड़े रहे, लेकिन जनवरी 2026 में उन्होंने Tamilaga Vettri Kazhagam (टीवीके) का दामन थाम लिया। यह वही राजनीतिक दल है जिसका नेतृत्व अभिनेता से राजनेता बने विजय कर रहे हैं। टीवीके में शामिल होने के कुछ ही महीनों बाद उन्हें विधानसभा अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी सौंप दी गई।

प्रभाकर केवल राजनेता ही नहीं, बल्कि एक समर्पित ईसाई प्रचारक और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी पहचाने जाते हैं। उन्होंने स्वयं स्वीकार किया है कि वर्ष 2004 में उन्होंने तमिलनाडु भर में व्यक्तिगत रूप से बाइबिल वितरण अभियान शुरू किया था। प्रारंभ में वे चेन्नई की बसों और समुद्र तटों पर केवल 50 बाइबिल वितरित करते थे। धीरे-धीरे यह अभियान इतना बड़ा हो गया कि हर महीने लगभग 5,000 बाइबिल वितरित की जाने लगीं। यह उनके धार्मिक समर्पण और सामाजिक संपर्क का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है।

विधानसभा अध्यक्ष का पद ग्रहण करने के बाद प्रभाकर ने सदन को संबोधित किया और बाइबिल से तीन महत्वपूर्ण उद्धरण पढ़े। उन्होंने सबसे पहले ‘जॉब 9:10’ का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है – “ईश्वर ऐसे महान कार्य करता है जिन्हें पूरी तरह समझा नहीं जा सकता और ऐसे चमत्कार करता है जिनकी गिनती नहीं की जा सकती।” इसके बाद उन्होंने ‘प्रोवर्ब्स 3:27’ का हवाला देते हुए कहा – “जब आपके पास भलाई करने की क्षमता हो, तब योग्य लोगों के प्रति भलाई करने से पीछे नहीं हटना चाहिए।” अंत में उन्होंने ‘मार्क 12:31’ का प्रसिद्ध संदेश उद्धृत किया – “अपने पड़ोसी से वैसे ही प्रेम करो जैसे तुम स्वयं से करते हो।”

प्रभाकर ने कहा कि ये वचन उनके हृदय से कभी दूर नहीं हुए और जीवन के हर चरण में उन्होंने इन्हीं सिद्धांतों को अपनाने का प्रयास किया है। उनका यह भाषण धार्मिक आस्था, नैतिकता और सामाजिक सद्भाव का संदेश देने वाला माना गया। हालांकि, इस कदम ने संविधान और धर्मनिरपेक्षता को लेकर बहस भी छेड़ दी।

भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है और संविधान सभी धर्मों को समान सम्मान देने की बात करता है। ऐसे में विधानसभा अध्यक्ष जैसे संवैधानिक पद पर बैठकर किसी विशेष धर्मग्रंथ का उल्लेख करना कई लोगों के लिए चर्चा और विवाद का विषय बन गया। कुछ लोगों ने इसे व्यक्तिगत आस्था की अभिव्यक्ति बताया, जबकि अन्य ने कहा कि संवैधानिक पदों पर धार्मिक तटस्थता बनाए रखना आवश्यक है।                                     

प्रभाकर के समर्थकों का कहना है कि उन्होंने अपने भाषण में किसी राजनीतिक या धार्मिक विभाजन की बात नहीं की, बल्कि प्रेम, सेवा और मानवता का संदेश दिया। उनके अनुसार बाइबिल के उद्धरणों का उद्देश्य केवल नैतिक मूल्यों को प्रस्तुत करना था। वहीं आलोचकों का मत है कि विधानसभा जैसी लोकतांत्रिक संस्था में किसी एक धर्मग्रंथ का उल्लेख भविष्य में धार्मिक बहसों को जन्म दे सकता है।

तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से द्रविड़ आंदोलन और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा से प्रभावित रही है। ऐसे राज्य में किसी विधानसभा अध्यक्ष द्वारा खुले तौर पर धार्मिक उद्धरण देना एक असामान्य घटना मानी जा रही है। यही कारण है कि यह मामला मीडिया और सोशल मीडिया में तेजी से चर्चा का विषय बना हुआ है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीवीके और मुख्यमंत्री विजय की राजनीति पारंपरिक द्रविड़ राजनीति से अलग पहचान बनाने की कोशिश कर रही है। प्रभाकर की नियुक्ति और उनका धार्मिक रूप से प्रेरित संबोधन इसी व्यापक राजनीतिक परिवर्तन का हिस्सा माना जा सकता है।

इसके बावजूद, प्रभाकर का राजनीतिक अनुभव और प्रशासनिक समझ उन्हें एक मजबूत अध्यक्ष के रूप में स्थापित कर सकती है। चार दशक से अधिक लंबे राजनीतिक जीवन में उन्होंने विभिन्न दलों और नेताओं के साथ काम किया है। विधानसभा संचालन, विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच संतुलन बनाए रखना तथा लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन कराना अब उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी होगी।

तमिलनाडु विधानसभा में बाइबिल उद्धरणों के साथ कार्यवाही की शुरुआत भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एकअनोखी घटना के रूप में दर्ज हो सकती है। यह घटना केवल धार्मिक आस्था का प्रदर्शन नहीं, बल्कि राजनीति, संविधान और समाज के बीच संबंधों पर नई बहस को भी जन्म देती है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि प्रभाकर अपने कार्यकाल में किस प्रकार संतुलन बनाते हैं और क्या उनका नेतृत्व तमिलनाडु की राजनीति में किसी नए अध्याय की शुरुआत करेगा।

आलोक कुमार

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