Bihar : बिहार में अल्पसंख्यक आयोग के गठन
राज्य के सभी अधिसूचित अल्पसंख्यकों—मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी—के हितों की रक्षा करना है
बिहार में अल्पसंख्यक आयोग के गठन और उसके अध्यक्ष पद को लेकर समय-समय पर राजनीतिक बहस होती रही है। बिहार राज्य अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1991 के तहत इस आयोग का गठन अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की रक्षा, सामाजिक सुरक्षा, शैक्षणिक विकास और सरकारी योजनाओं की निगरानी के उद्देश्य से किया गया था। 12 अगस्त 1991 को यह अधिनियम अधिसूचित हुआ और इसके बाद बिहार राज्य अल्पसंख्यक आयोग ने औपचारिक रूप से कार्य करना शुरू किया। आयोग का उद्देश्य केवल किसी एक समुदाय का प्रतिनिधित्व करना नहीं, बल्कि राज्य के सभी अधिसूचित अल्पसंख्यकों—मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन और पारसी—के हितों की रक्षा करना है।
हालांकि, पिछले तीन दशकों का इतिहास देखें तो आयोग के अध्यक्ष पद पर लगभग हमेशा मुस्लिम समुदाय के नेताओं की ही नियुक्ति होती रही है। इसी कारण यह प्रश्न उठता रहा है कि क्या बिहार में अल्पसंख्यक आयोग वास्तव में सभी अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व करता है, या फिर यह केवल एक बड़े समुदाय के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मंच बनकर रह गया है।
बिहार की राजनीति में मुस्लिम समुदाय की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। राज्य की कुल आबादी में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 17 प्रतिशत से अधिक है। यह संख्या अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की तुलना में कहीं अधिक है। दूसरी ओर ईसाई, सिख, जैन और बौद्ध समुदाय की जनसंख्या बहुत कम है। राजनीतिक दल अक्सर जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व तय करते हैं, क्योंकि लोकतंत्र में संख्या का महत्व सबसे अधिक माना जाता है। यही कारण है कि चाहे सत्ता में आरजेडी रही हो, जेडीयू रही हो या भाजपा गठबंधन, आयोग के अध्यक्ष पद पर मुस्लिम समुदाय का दबदबा बना रहा।
लेकिन अब परिस्थिति धीरे-धीरे बदलती दिखाई दे रही है। बिहार में सत्ता परिवर्तन और भाजपा के बढ़ते प्रभाव के बाद छोटे अल्पसंख्यक समुदायों में नई उम्मीद जगी है। विशेषकर ईसाई समुदाय के बीच यह चर्चा तेज हुई है कि “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास” की नीति के तहत भाजपा नेतृत्व परंपरागत व्यवस्था को बदल सकता है। ईसाई समुदाय का मानना है कि यदि आयोग वास्तव में सभी अल्पसंख्यकों का है, तो अध्यक्ष पद पर रोटेशन प्रणाली लागू होनी चाहिए, ताकि हर समुदाय को प्रतिनिधित्व का अवसर मिले।
बिहार भाजपा अल्पसंख्यक मोर्चा में कई ईसाई नेता वर्षों से सक्रिय रहे हैं। पटना के राजन क्लेमेंट साह और बेतिया के रवि माइकल जैसे नेताओं का नाम अक्सर चर्चा में आता है। ये नेता लंबे समय से संगठन और राष्ट्रवादी राजनीति के साथ जुड़े रहे हैं। भाजपा के भीतर ऐसे नेताओं की सक्रियता यह संकेत देती है कि पार्टी छोटे अल्पसंख्यक समुदायों में भी अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करना चाहती है। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या भविष्य में किसी ईसाई नेता को बिहार राज्य अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष बनाया जा सकता है।
इस संभावना के पक्ष में कुछ मजबूत तर्क भी दिए जाते हैं। पहला, भाजपा लंबे समय से “तुष्टिकरण की राजनीति” का विरोध करती रही है। पार्टी का आरोप रहा है कि पूर्ववर्ती सरकारों ने केवल मुस्लिम वोट बैंक को ध्यान में रखकर राजनीति की और अन्य अल्पसंख्यकों की उपेक्षा की। यदि भाजपा किसी ईसाई या अन्य छोटे अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्ति को अध्यक्ष बनाती है, तो यह एक बड़ा राजनीतिक संदेश होगा कि सरकार सभी समुदायों को समान अवसर देना चाहती है।
दूसरा, सांकेतिक राजनीति का भी बड़ा महत्व होता है। किसी छोटे समुदाय को बड़ा पद देकर सरकार यह संदेश दे सकती है कि वह केवल वोट बैंक की राजनीति नहीं कर रही, बल्कि वास्तविक समावेशी व्यवस्था स्थापित करना चाहती है। इससे ईसाई समुदाय में भाजपा की स्वीकार्यता भी बढ़ सकती है।
हालांकि इसके विपरीत कई राजनीतिक चुनौतियां भी हैं। बिहार की राजनीति अभी भी मुस्लिम वोट बैंक को अत्यंत महत्वपूर्ण मानती है। भाजपा पिछले कुछ वर्षों से “पसमांदा मुस्लिम” समुदाय तक पहुंच बनाने का प्रयास कर रही है। ऐसे में यदि पार्टी अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष पद से मुस्लिम प्रतिनिधित्व कम करती है, तो उसका राजनीतिक संदेश उल्टा भी पड़ सकता है। भाजपा यह जोखिम शायद नहीं लेना चाहेगी कि मुस्लिम समाज में यह धारणा बने कि उन्हें किनारे किया जा रहा है।
इसके अलावा बिहार में गठबंधन राजनीति भी एक बड़ा कारक है। जेडीयू और नीतीश कुमार का मुस्लिम समुदाय के साथ पारंपरिक समीकरण रहा है। गठबंधन की राजनीति में ऐसे निर्णय केवल भाजपा अकेले नहीं ले सकती। इसलिए किसी ईसाई नेता को अध्यक्ष बनाने का निर्णय राजनीतिक सहमति के बिना आसान नहीं होगा।
फिर भी यह भी सच है कि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व केवल जनसंख्या के आधार पर नहीं होना चाहिए। यदि आयोग का उद्देश्य सभी अल्पसंख्यकों की आवाज बनना है, तो उसमें विविधता दिखाई देनी चाहिए। केवल उपाध्यक्ष या सदस्य पद देकर छोटे समुदायों को संतुष्ट करना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। ईसाई समुदाय का तर्क है कि यदि राष्ट्रपति, राज्यपाल, मंत्री या न्यायपालिका जैसे पदों पर विभिन्न समुदायों को अवसर मिल सकता है, तो अल्पसंख्यक आयोग में भी रोटेशन की परंपरा विकसित की जा सकती है।आज देश में समावेशी राजनीति और सामाजिक संतुलन की चर्चा बढ़ रही है। ऐसे समय में बिहार सरकार यदि अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष पद पर किसी ईसाई, सिख या जैन समुदाय के व्यक्ति को अवसर देती है, तो यह केवल राजनीतिक निर्णय नहीं बल्कि सामाजिक संदेश भी होगा। इससे यह विश्वास मजबूत होगा कि सरकार वास्तव में सभी समुदायों को साथ लेकर चलना चाहती है।
हालांकि वर्तमान राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए यह कहना कठिन है कि निकट भविष्य में यह बदलाव होगा। संभावना अभी सीमित दिखाई देती है, क्योंकि राजनीतिक दल चुनावी गणित को प्राथमिकता देते हैं। फिर भी बदलते राजनीतिक माहौल और छोटे अल्पसंख्यक समुदायों की बढ़ती सक्रियता को देखते हुए भविष्य में नई परंपरा की शुरुआत से इनकार भी नहीं किया जा सकता। बिहार की राजनीति में यदि प्रतिनिधित्व की नई सोच विकसित होती है, तो अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष पद भी केवल एक समुदाय तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वास्तव में सभी अल्पसंख्यकों की साझी भागीदारी का प्रतीक बन सकता है।
आलोक कुमार
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