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शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

Bihar : सीलिंग का डर नहीं, समाधान चाहिए: छोटे दुकानदारों को नियम समझा

 


सीलिंग का डर नहीं, समाधान चाहिए: छोटे दुकानदारों को नियम समझाइए, आजीविका मत छीनिए

 जिस मकान से वर्षों तक नगर निगम ने टैक्स लिया, उसी मकान में चल रही छोटी-सी दुकान आज अचानक ‘अवैध’ कैसे हो गई? अगर व्यवस्था को वर्षों से सब पता था, तो कार्रवाई से पहले संवाद क्यों?

शहरों में कानून और व्यवस्था जरूरी है, लेकिन कानून लागू करने का तरीका भी उतना ही महत्वपूर्ण है। खासकर तब, जब किसी कार्रवाई का सीधा असर हजारों छोटे दुकानदारों और उनके परिवारों की रोजी-रोटी पर पड़ रहा हो। पटना सहित शहरी क्षेत्रों में आवासीय मकानों के व्यावसायिक उपयोग का मामला आज इसी वजह से गंभीर सार्वजनिक बहस का विषय बन गया है।

2017 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ओर से राजधानी पटना सहित राज्य के शहरी क्षेत्रों में आवासीय मकानों के व्यावसायिक उपयोग का सर्वे कराने और वास्तविक उपयोग के आधार पर कर निर्धारण की बात सामने आई थी। इस सोच का मूल उद्देश्य केवल कार्रवाई करना नहीं, बल्कि व्यवस्था को वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप नियमित, पारदर्शी और व्यावहारिक बनाना था। यानी जिस संपत्ति का जैसा वास्तविक उपयोग हो रहा है, उसके अनुरूप कर और नियम तय हों तथा नागरिक स्पष्ट व्यवस्था के भीतर अपना व्यवसाय चला सकें।

आज सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी और उसके बाद नगर निगम की कार्रवाई के संदर्भ में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या वर्षों से किसी आवासीय मकान के हिस्से में छोटी दुकान चलाकर परिवार का पालन-पोषण करने वाले व्यक्ति के सामने सीधे सीलिंग का डर खड़ा करना ही समाधान है?

कानून और न्यायालय के निर्देशों का पालन होना चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती। लेकिन कानून का पालन कराने के साथ प्रशासन की जिम्मेदारी यह भी है कि प्रभावित नागरिकों को नियम समझाए जाएं, उनकी स्थिति सुनी जाए और जहां संभव हो, वैधानिक समाधान का रास्ता बताया जाए।

छोटी दुकान के पीछे पूरा परिवार

शहर में हजारों छोटे दुकानदार ऐसे हैं जिनका कारोबार किसी बड़े व्यावसायिक परिसर में नहीं, बल्कि अपने मकान के एक कमरे, बरामदे या सड़क से लगे छोटे हिस्से में चलता है। कहीं किराना की दुकान है, कहीं दर्जी की मशीन, कहीं मोबाइल रिपेयरिंग, कहीं स्टेशनरी, चाय-नाश्ता या छोटी वर्कशॉप।

इन दुकानों के पीछे कोई बड़ा कारोबारी साम्राज्य नहीं होता। वहां एक परिवार की रोज की जरूरतें जुड़ी होती हैं।

ऐसे में किसी दुकान का शटर बंद होने का अर्थ सिर्फ एक व्यापारिक गतिविधि बंद होना नहीं है। इसका मतलब परिवार की आमदनी रुकना, बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होना, घर का खर्च संकट में पड़ना और कई मामलों में वर्षों की मेहनत से खड़ी आजीविका का समाप्त हो जाना है।

इसलिए प्रशासनिक कार्रवाई का उद्देश्य नियम लागू करना जरूर होना चाहिए, लेकिन आजीविका पर अचानक प्रहार करना नहीं।

वर्षों तक टैक्स लिया गया तो संवाद क्यों नहीं?

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न नगर निगम की पुरानी व्यवस्था से भी जुड़ा है। यदि किसी मकान में लंबे समय से व्यावसायिक गतिविधि चल रही थी, संपत्ति नगर निगम के रिकॉर्ड में दर्ज थी, उसका असेसमेंट होता रहा और संपत्ति कर भी जमा किया जाता रहा, तो संबंधित नागरिक के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि उसे अब तक स्पष्ट रूप से नियम क्यों नहीं बताया गया?

यहां किसी अधिकारी या विभाग को दोषी ठहराने के बजाय व्यवस्था की समीक्षा जरूरी है।

नागरिकों को स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि आवासीय और व्यावसायिक उपयोग में अंतर क्या है। किस प्रकार का उपयोग व्यावसायिक श्रेणी में आता है? उस पर कितना कर लागू होगा? कौन-से दस्तावेज चाहिए? क्या उपयोग परिवर्तन, अनुमति या नियमितीकरण की कोई प्रक्रिया उपलब्ध है? यदि किसी प्रकार की कमी है तो उसे दूर करने के लिए कितना समय मिलेगा?

कानून का पालन जरूरी है, लेकिन कानून के नाम पर भय का माहौल बनाना जरूरी नहीं है।

सीलिंग से पहले काउंसलिंग

नगर निगम को बड़े पैमाने पर काउंसलिंग और जागरूकता अभियान चलाना चाहिए। प्रत्येक वार्ड में सहायता शिविर लगाकर नागरिकों को नियम समझाए जा सकते हैं। संपत्ति मालिकों और दुकानदारों को उनके मामलों की स्थिति बताई जा सकती है और आवश्यक दस्तावेजों की जानकारी दी जा सकती है।

इसके बाद सर्वे, नोटिस, कर निर्धारण और आवश्यक वैधानिक प्रक्रिया पूरी की जानी चाहिए।

सीलिंग यदि कानून के तहत आवश्यक हो तो वह अंतिम कार्रवाई हो सकती है, लेकिन हर मामले में उसे पहला कदम बना देना व्यावहारिक समाधान नहीं लगता—विशेषकर उन छोटे कारोबारियों के मामले में जो वर्षों से खुले तौर पर अपना व्यवसाय चला रहे हैं।

पार्षद बनें जनता और प्रशासन के बीच सेतु

इस पूरे मामले में स्थानीय पार्षद की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। पार्षद सिर्फ नोटिस या कार्रवाई की जानकारी देने वाला जनप्रतिनिधि नहीं होना चाहिए। उसकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी जनता और प्रशासन के बीच सेतु बनना है।

यदि किसी वार्ड में बड़ी संख्या में मकानों के व्यावसायिक उपयोग का मामला है तो पार्षद को नगर निगम अधिकारियों के साथ बैठक करनी चाहिए। नागरिकों को नियम समझाने चाहिए, दुकानदारों की समस्याएं सुननी चाहिए और प्रशासन के सामने व्यावहारिक समाधान रखना चाहिए।

जनप्रतिनिधि का काम सिर्फ यह बताना नहीं होना चाहिए कि कार्रवाई होने वाली है। उसका काम यह सुनिश्चित करना भी है कि लोगों को यह पता हो कि कार्रवाई से बचने के लिए वैधानिक रास्ता क्या है।

नागरिक को अपराधी नहीं, करदाता समझिए

व्यवस्था में यदि वर्षों से कोई कमी रही है तो उसका पूरा बोझ अचानक नागरिक के सिर डालना भी उचित नहीं होगा। प्रशासन को यह देखना चाहिए कि संबंधित व्यक्ति ने जानबूझकर नियमों की अनदेखी की या वह ऐसी व्यवस्था में काम करता रहा जहां स्पष्ट मार्गदर्शन और प्रभावी निगरानी नहीं थी।

नागरिक को अपराधी मानकर नहीं, करदाता और शहर के हिस्सेदार के रूप में देखना होगा।

पटना जैसे शहर की अर्थव्यवस्था केवल बड़े मॉल, शोरूम और कॉरपोरेट प्रतिष्ठानों से नहीं चलती। शहर की आर्थिक गतिविधियों में हजारों छोटे दुकानदारों की भी बड़ी भूमिका है। सुबह शटर उठाकर देर शाम तक मेहनत करने वाला दुकानदार शहर की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करता है और उसी कमाई से अपने परिवार का जीवन चलाता है।

नियम भी रहें, रास्ता भी मिले

नगर निगम को चाहिए कि इस विषय पर स्पष्ट और चरणबद्ध नीति सामने रखे।

पहले व्यापक सर्वे हो। फिर वास्तविक उपयोग के आधार पर संपत्तियों की स्थिति स्पष्ट की जाए। इसके बाद संबंधित लोगों को नोटिस देकर नियम और आवश्यक प्रक्रिया समझाई जाए। जहां वैधानिक विकल्प उपलब्ध हो, वहां नियमितीकरण या उपयोग परिवर्तन की प्रक्रिया बताई जाए। कर निर्धारण की जरूरत हो तो वह किया जाए और लोगों को उचित समय दिया जाए।

इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता सबसे जरूरी है।

साथ ही वर्षों से कर जमा करने वाले संपत्ति मालिकों के मामलों की भी निष्पक्ष समीक्षा होनी चाहिए। यदि निगम के रिकॉर्ड और वास्तविक उपयोग में अंतर है तो उसे संवाद के माध्यम से ठीक करने का प्रयास होना चाहिए।

सवाल कानून का नहीं, कानून लागू करने के तरीके का है

यह बहस कानून के विरोध की नहीं है। सवाल यह है कि कानून लागू कैसे किया जाए?

यदि नियम के अनुसार व्यावसायिक उपयोग पर अलग कर देना है, तो कर निर्धारण की प्रक्रिया पूरी कीजिए। यदि अनुमति या उपयोग परिवर्तन जरूरी है, तो उसका रास्ता बताइए। यदि दस्तावेज चाहिए, तो उसकी सूची सार्वजनिक कीजिए। यदि समय चाहिए, तो उचित समय दीजिए।

हर मामले में पहला हथियार सीलिंग क्यों हो?

राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से इस समस्या का समाधान नहीं होगा। जरूरत है स्पष्ट नियम, प्रशासनिक संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण की।

छोटे दुकानदार कानून से भागना नहीं चाहते। वे केवल चाहते हैं कि नियम स्पष्ट हों, उन्हें सुना जाए, उचित समय मिले और उनकी वर्षों पुरानी आजीविका अचानक खत्म न कर दी जाए।

नगर निगम को भी याद रखना होगा कि उसकी जिम्मेदारी केवल टैक्स वसूलना और कार्रवाई करना नहीं है। नगर निगम का मूल उद्देश्य शहर का नियमन करते हुए नागरिकों की सुविधा और सार्वजनिक हित की रक्षा करना है।

इसलिए आज सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या हम सीलिंग के डर से शहर चलाएंगे या संवाद और समाधान से?

कानून लागू हो, कर निर्धारित हो, शहर व्यवस्थित हो और नियमों का पालन भी हो—लेकिन छोटे दुकानदार की रोजी-रोटी को बचाते हुए।

कार्रवाई हो तो नियम के अनुसार, संवाद हो तो सम्मान के साथ और समाधान हो तो मानवीय दृष्टिकोण से।

क्योंकि किसी गरीब की दुकान का शटर बंद करना आसान है, लेकिन उसके घर का चूल्हा जलाए रखना ही असली प्रशासनिक संवेदनशीलता है।

सीलिंग का भय नहीं—काउंसलिंग और समाधान चाहिए।


आलोक कुमार