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India : गोदी मीडिया के दौर में क्या निष्पक्ष पत्रकारिता संभव है?

 

गोदी मीडिया के दौर में क्या निष्पक्ष पत्रकारिता संभव है?

जब मीडिया पर सत्ता के करीब होने के आरोप लगते हों, विज्ञापन राजस्व पर निर्भरता बढ़ रही हो, टीआरपी और क्लिक की दौड़ तेज हो और सोशल मीडिया खबरों का बड़ा मंच बन चुका हो, तब सवाल किसी एक पत्रकार या चैनल का नहीं, बल्कि पूरी पत्रकारिता की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता का है।

“गोदी मीडिया” शब्द पिछले कुछ वर्षों में भारतीय सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन गया है। इसका इस्तेमाल आमतौर पर उन मीडिया संस्थानों या पत्रकारिता की शैली के लिए किया जाता है, जिन पर सत्ता के प्रति अत्यधिक नरम या पक्षधर होने का आरोप लगाया जाता है। दूसरी ओर, इस शब्द की आलोचना करने वाले इसे राजनीतिक लेबल मानते हैं और कहते हैं कि इससे पत्रकारिता पर गंभीर बहस व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप में बदल जाती है।

इसलिए असली सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन “गोदी मीडिया” है और कौन नहीं। बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत में पत्रकारिता सत्ता, बाजार और राजनीतिक दबाव से स्वतंत्र रहकर जनता को सही और संतुलित सूचना दे सकती है?

जवाब है—हां, लेकिन इसके लिए पत्रकारिता की संस्थागत स्वतंत्रता, संपादकीय जिम्मेदारी और आर्थिक मजबूती जरूरी है।

मीडिया स्वामित्व का असर

मीडिया की स्वतंत्रता पर चर्चा करते समय सबसे पहले उसके स्वामित्व को समझना जरूरी है। आज समाचार संस्थान केवल पत्रकारों के समूह नहीं हैं। बड़े मीडिया संगठन कंपनियों, निवेशकों और कारोबारी समूहों से जुड़े होते हैं।

स्वामित्व अपने आप में पत्रकारिता की निष्पक्षता साबित या खारिज नहीं करता। लेकिन जब किसी मीडिया संस्थान के मालिकों के दूसरे कारोबारी हित बड़े हों, तब संपादकीय स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

इसलिए एक स्वस्थ मीडिया व्यवस्था में मालिकाना हित और संपादकीय निर्णयों के बीच स्पष्ट दूरी जरूरी है। संपादक और पत्रकार को यह स्वतंत्रता मिलनी चाहिए कि वे सत्ता, विपक्ष, उद्योग और अपने ही संस्थान से जुड़े प्रभावशाली लोगों पर भी सवाल पूछ सकें।

विज्ञापन और आर्थिक निर्भरता

पत्रकारिता केवल विचार नहीं, बल्कि एक आर्थिक गतिविधि भी है। अखबारों, टीवी चैनलों और डिजिटल पोर्टलों को पत्रकार, कैमरा, स्टूडियो, तकनीक, सर्वर और रिपोर्टिंग नेटवर्क चलाने के लिए पैसा चाहिए।

यह पैसा विज्ञापन, सदस्यता, सब्सक्रिप्शन और दूसरे स्रोतों से आता है।

यहीं पत्रकारिता के सामने कठिन चुनौती आती है। यदि किसी मीडिया संस्थान की आय का बड़ा हिस्सा कुछ बड़े विज्ञापनदाताओं पर निर्भर हो, तो उनके खिलाफ खबर प्रकाशित करते समय संस्थान पर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष दबाव पड़ सकता है।

सरकारी विज्ञापन भी भारतीय मीडिया अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसलिए सत्ता और मीडिया के संबंधों में विज्ञापन नीति की पारदर्शिता महत्वपूर्ण विषय है।

लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है। हर सरकारी विज्ञापन को “खरीदी हुई पत्रकारिता” कहना भी उचित नहीं होगा। किसी सरकार की विज्ञापन नीति और किसी खबर के संपादकीय निर्णय को अलग-अलग देखना चाहिए।

निष्पक्षता का अर्थ सरकार की हर नीति की आलोचना करना नहीं, बल्कि सही नीति की प्रशंसा और गलत नीति पर सवाल—दोनों करने की स्वतंत्रता रखना है।

TRP और क्लिक की दौड़

टेलीविजन पत्रकारिता में TRP और डिजिटल मीडिया में क्लिक, व्यू और एंगेजमेंट ने खबरों की भाषा और प्रस्तुति को काफी बदल दिया है।

टीवी पर तेज बहस, बड़े शीर्षक, लगातार ब्रेकिंग न्यूज और टकराव वाले कार्यक्रम दर्शकों का ध्यान खींचते हैं। डिजिटल मीडिया में क्लिक बढ़ाने के लिए सनसनीखेज शीर्षक और भावनात्मक प्रस्तुति का इस्तेमाल किया जाता है।

समस्या तब शुरू होती है जब दर्शक का ध्यान सूचना की गुणवत्ता से अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

किसी खबर का वायरल होना यह प्रमाण नहीं है कि वह पत्रकारिता की दृष्टि से अच्छी खबर है। इसी तरह कम व्यू वाली खोजी रिपोर्ट जरूरी नहीं कि कम महत्वपूर्ण हो।

पत्रकारिता का मूल्य केवल यह देखकर तय नहीं होना चाहिए कि कितने लोगों ने खबर देखी, बल्कि यह भी देखा जाना चाहिए कि खबर कितनी सटीक, प्रमाणित, प्रासंगिक और सार्वजनिक हित में है।

डिजिटल मीडिया ने तस्वीर बदली

सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने पत्रकारिता को लोकतांत्रिक बनाने का एक नया अवसर दिया है। अब छोटी वेबसाइट, स्वतंत्र पत्रकार और स्थानीय रिपोर्टर भी अपनी खबर सीधे पाठकों तक पहुंचा सकते हैं।

पहले किसी खबर को बड़े मीडिया संस्थान के माध्यम की जरूरत पड़ती थी। अब मोबाइल फोन से रिकॉर्ड की गई रिपोर्ट लाखों लोगों तक पहुंच सकती है।

लेकिन इसके साथ नई समस्या भी आई है—फेक न्यूज, अधूरी जानकारी, पुराने वीडियो को नई घटना बताना, AI-generated सामग्री और बिना सत्यापन के सोशल मीडिया पोस्ट को खबर बना देना।

इसलिए डिजिटल पत्रकारिता में गति से ज्यादा महत्वपूर्ण फैक्ट-चेक और स्रोतों की पुष्टि हो गई है।

क्या पत्रकारिता पूरी तरह निष्पक्ष हो सकती है?

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है।

पत्रकार एक इंसान है और उसके अपने विचार, सामाजिक अनुभव और राजनीतिक समझ हो सकती है। इसलिए पूर्ण व्यक्तिगत निष्पक्षता एक कठिन आदर्श है।

लेकिन पत्रकारिता की प्रक्रिया निष्पक्ष हो सकती है।

एक जिम्मेदार पत्रकार को तथ्य और राय के बीच अंतर रखना चाहिए। आरोप लगाने वाले पक्ष के साथ दूसरे पक्ष का जवाब भी लेना चाहिए। किसी दस्तावेज या आंकड़े को प्रकाशित करने से पहले उसकी पुष्टि करनी चाहिए। गलती होने पर उसे स्वीकार करके सुधार करना चाहिए।

यही संपादकीय विश्वसनीयता का आधार है।

सत्ता से सवाल करना पत्रकारिता का मूल काम

लोकतंत्र में मीडिया को केवल सरकार की आलोचना करने वाला संस्थान समझना भी गलत है और सरकार का प्रचार माध्यम समझना भी।

सत्ता चाहे किसी भी राजनीतिक दल के पास हो, पत्रकारिता का काम उससे सवाल पूछना है।

लेकिन वही कसौटी विपक्ष पर भी लागू होनी चाहिए। यदि विपक्ष गलत जानकारी देता है, भ्रष्टाचार का आरोप झूठा साबित होता है या उसकी नीतियों में गंभीर कमियां हैं, तो मीडिया को उस पर भी सवाल करना चाहिए।

सच्ची निष्पक्षता का अर्थ “दोनों पक्ष बराबर गलत हैं” कहना नहीं है। इसका अर्थ है—जिसके पक्ष में तथ्य हों, उन्हें तथ्य के आधार पर सामने रखना।

पत्रकार की स्वतंत्रता क्यों जरूरी है?

यदि पत्रकार को नौकरी जाने का डर हो, संपादक पर मालिक का दबाव हो, संस्थान विज्ञापनदाता से डरता हो या रिपोर्टर को राजनीतिक दबाव का सामना करना पड़े, तो स्वतंत्र पत्रकारिता कमजोर होती है।

इसलिए पत्रकारिता की स्वतंत्रता केवल संविधान में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होने से सुनिश्चित नहीं होती। इसके लिए संस्थागत सुरक्षा, पेशेवर संपादकीय मानक, पारदर्शी स्वामित्व और आर्थिक स्थिरता भी जरूरी है।

स्वतंत्र पत्रकारिता का मतलब यह भी है कि पत्रकार अपनी गलती स्वीकार कर सके और किसी प्रभावशाली व्यक्ति के खिलाफ तथ्य सामने रखने से न डरे।

पाठक की भी जिम्मेदारी है

मीडिया की गुणवत्ता केवल पत्रकारों से तय नहीं होती। पाठक और दर्शक भी इसके हिस्सेदार हैं।

यदि दर्शक केवल उत्तेजक बहस देखेंगे, क्लिकबेट शीर्षकों पर क्लिक करेंगे और बिना सत्यापन के राजनीतिक संदेश साझा करेंगे, तो बाजार उसी तरह की सामग्री को बढ़ावा देगा।

इसलिए नागरिकों को भी खबर और राय, तथ्य और प्रचार तथा रिपोर्ट और सोशल मीडिया दावे के बीच अंतर समझना होगा।

निष्पक्ष पत्रकारिता का रास्ता क्या है?

भारत में निष्पक्ष पत्रकारिता संभव है, लेकिन इसके लिए कुछ बुनियादी सिद्धांतों को मजबूत करना होगा—

  • खबर और राय को स्पष्ट रूप से अलग किया जाए।

  • एक ही राजनीतिक विचारधारा पर निर्भर रहने के बजाय विभिन्न स्रोतों से जानकारी ली जाए।

  • विज्ञापन और संपादकीय सामग्री के बीच स्पष्ट अंतर रखा जाए।

  • स्वामित्व और कारोबारी हितों में पारदर्शिता हो।

  • तथ्यात्मक गलती होने पर तुरंत सुधार प्रकाशित किया जाए।

  • सोशल मीडिया दावों की स्वतंत्र पुष्टि की जाए।

  • सत्ता और विपक्ष दोनों से समान पत्रकारिता मानकों के तहत सवाल किए जाएं।

  • पत्रकारों को संपादकीय स्वतंत्रता और पेशेवर सुरक्षा मिले।

आखिर में “गोदी मीडिया” शब्द पर बहस से ज्यादा महत्वपूर्ण है विश्वसनीय पत्रकारिता की पहचान

लोकतंत्र को न तो ऐसी पत्रकारिता चाहिए जो हर सरकारी निर्णय को सही बताए और न ऐसी जो हर सरकारी निर्णय को गलत साबित करने की कोशिश करे। लोकतंत्र को ऐसी पत्रकारिता चाहिए जो सत्ता से सवाल करे, विपक्ष की भी जांच करे, जनता की समस्याओं को जगह दे और तथ्य को राजनीतिक पसंद से ऊपर रखे।

इसलिए निष्पक्ष पत्रकारिता संभव है—लेकिन वह किसी एक चैनल, पत्रकार या विचारधारा से पैदा नहीं होगी। वह संपादकीय स्वतंत्रता, तथ्य-जांच, पारदर्शिता, आर्थिक स्वायत्तता और पत्रकारों की पेशेवर ईमानदारी से मजबूत होगी।

“गोदी मीडिया” बनाम “एंटी-सरकार मीडिया” की बहस से आगे बढ़कर अब सवाल होना चाहिए—क्या हमारी पत्रकारिता जनता के प्रति जवाबदेह है?

यही कसौटी किसी भी लोकतांत्रिक समाज में मीडिया की असली स्वतंत्रता को परख सकती है।

आलोक कुमार

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