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बुधवार, 5 अगस्त 2026

India : गोदी मीडिया के दौर में क्या निष्पक्ष पत्रकारिता संभव है?

 


"जब मीडिया पर पक्षपात के आरोप हों, तब एक पत्रकार की असली पहचान उसके सवाल तय करते हैं, न कि उसका मंच।"

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाने वाली पत्रकारिता आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। कभी मीडिया को सत्ता और जनता के बीच एक मजबूत सेतु माना जाता था, लेकिन अब उस पर पक्षपात, राजनीतिक झुकाव, कॉरपोरेट प्रभाव और टीआरपी की दौड़ में जनहित से दूर होने जैसे आरोप लगातार लगते रहते हैं। पिछले कुछ वर्षों में "गोदी मीडिया" शब्द सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन चुका है। यह शब्द उन मीडिया संस्थानों या पत्रकारों के संदर्भ में इस्तेमाल किया जाता है, जिन पर सत्ता के प्रति अत्यधिक अनुकूल रवैया अपनाने का आरोप लगाया जाता है। हालांकि यह एक राजनीतिक रूप से विवादित और मताधारित शब्द है, इसलिए हर पत्रकार या संस्थान पर इसे समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

ऐसे माहौल में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या आज भी निष्पक्ष पत्रकारिता संभव है? क्या कोई पत्रकार संस्थान, राजनीतिक दबाव और व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के बीच अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रख सकता है? इन सवालों के बीच वरिष्ठ पत्रकार **संदीप चौधरी** का नाम अक्सर चर्चा में आता है। उनकी पत्रकारिता को कई दर्शक तथ्यों पर आधारित बहस, संतुलित सवालों और संयमित प्रस्तुति के कारण अलग पहचान देते हैं, जबकि अन्य लोग उनकी शैली का मूल्यांकन अपने-अपने दृष्टिकोण से करते हैं। यही लोकतांत्रिक विमर्श की स्वाभाविक विशेषता भी है।

भारतीय टेलीविजन पत्रकारिता में संदीप चौधरी लंबे समय से सक्रिय हैं। राजनीतिक घटनाक्रम, चुनाव, संसद, सरकार की नीतियों और समसामयिक विषयों पर उनकी पकड़ उन्हें अनुभवी एंकरों की श्रेणी में खड़ा करती है। उनकी एंकरिंग शैली का एक महत्वपूर्ण पहलू यह माना जाता है कि वे बहस को केवल शोर-शराबे तक सीमित रखने के बजाय तथ्यों और तर्कों के आधार पर आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं। यही कारण है कि उनके कार्यक्रमों को केवल राजनीतिक समर्थक ही नहीं, बल्कि विभिन्न विचारधाराओं के दर्शक भी देखते हैं।

उनके करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ जुलाई 2023 में आया, जब उन्होंने लगभग नौ वर्षों तक कार्य करने के बाद **News24** से अलग होने की घोषणा की। 19 जुलाई 2023 को अपने लोकप्रिय कार्यक्रम **"सबसे बड़ा सवाल"** के लाइव प्रसारण के दौरान उन्होंने स्वयं दर्शकों को बताया कि वह चैनल से विदा ले रहे हैं। यह निर्णय मीडिया जगत में चर्चा का विषय बना, क्योंकि वे उस चैनल की प्रमुख पहचान बन चुके थे।

इसके बाद उन्होंने **ABP News** में नई पारी शुरू की। शुरुआत में यह सवाल उठे कि क्या नए संस्थान में भी उनकी वही कार्यशैली बनी रहेगी, जिसने उन्हें अलग पहचान दिलाई थी। लेकिन कुछ ही समय में उन्होंने अपने कार्यक्रमों के माध्यम से यह संदेश दिया कि किसी पत्रकार की वास्तविक ताकत केवल चैनल का नाम नहीं, बल्कि उसकी विश्वसनीयता, अनुभव और प्रस्तुति की शैली होती है।

दिलचस्प बात यह है कि ABP News उनके लिए पूरी तरह नया मंच नहीं था। वर्ष 2003 से 2005 के बीच, जब यह चैनल **स्टार न्यूज़** के नाम से जाना जाता था, तब भी संदीप चौधरी वहां कार्य कर चुके थे। उस दौरान उन्होंने **"देश विदेश"**, **"कौन बनेगा मुख्यमंत्री"** और **"कौन बनेगा प्रधानमंत्री"** जैसे चर्चित कार्यक्रमों का संचालन किया था। इसलिए उनकी वापसी को कई मीडिया विश्लेषकों ने "घर वापसी" के रूप में भी देखा।

ABP News में उन्हें प्राइम टाइम कार्यक्रम **"सीधा सवाल"** की जिम्मेदारी सौंपी गई। यह कार्यक्रम राजनीतिक बहसों, सरकारी नीतियों, विपक्ष के आरोपों, चुनावी रणनीतियों और जनसरोकार के मुद्दों पर केंद्रित रहता है। उनकी कोशिश रहती है कि चर्चा केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित न रहे, बल्कि तथ्यों, आंकड़ों और तर्कों के आधार पर आगे बढ़े। यही शैली उनके समर्थकों के बीच उनकी विश्वसनीयता का प्रमुख कारण मानी जाती है।

संदीप चौधरी की पत्रकारिता की एक विशेषता यह भी मानी जाती है कि वे सत्ता पक्ष और विपक्ष—दोनों से कठिन सवाल पूछते हैं। उनके कार्यक्रमों में विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रवक्ता शामिल होते हैं और उनसे तीखे प्रश्न किए जाते हैं। हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी पत्रकार की निष्पक्षता का अंतिम आकलन वस्तुनिष्ठ रूप से करना आसान नहीं होता। अलग-अलग दर्शक, अलग-अलग राजनीतिक दृष्टिकोण और व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर पत्रकारों का मूल्यांकन करते हैं। इसलिए किसी भी पत्रकार की निष्पक्षता पर मतभेद होना लोकतांत्रिक समाज का सामान्य हिस्सा है।

ABP News ने उन्हें केवल प्रमुख एंकर ही नहीं, बल्कि **Consulting Editor** की जिम्मेदारी भी सौंपी। इस भूमिका में उन्हें संपादकीय स्तर पर भी योगदान देने का अवसर मिला। समाचारों के चयन, बहस के विषयों की प्राथमिकता और कार्यक्रमों की प्रस्तुति में उनकी भागीदारी ने उन्हें केवल स्क्रीन पर दिखाई देने वाले एंकर तक सीमित नहीं रखा, बल्कि संपादकीय निर्णय प्रक्रिया का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया।

आज मीडिया की दुनिया तेजी से डिजिटल हो रही है। पहले जहां टीवी की टीआरपी सफलता का प्रमुख पैमाना होती थी, वहीं अब यूट्यूब, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म भी पत्रकारों की लोकप्रियता तय करने लगे हैं। संदीप चौधरी के कार्यक्रमों को डिजिटल माध्यमों पर भी बड़ी संख्या में देखा जाता है। चुनावी विश्लेषण, संसद की कार्यवाही, छात्र आंदोलनों, आर्थिक नीतियों और राष्ट्रीय मुद्दों पर उनके वीडियो लाखों दर्शकों तक पहुंचते हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने केवल पारंपरिक टेलीविजन दर्शकों ही नहीं, बल्कि डिजिटल पीढ़ी के बीच भी अपनी जगह बनाई है।

फिर भी भारतीय पत्रकारिता के सामने चुनौतियां कम नहीं हैं। टीआरपी की प्रतिस्पर्धा, सोशल मीडिया की तेज़ रफ्तार, फेक न्यूज, राजनीतिक ध्रुवीकरण, आर्थिक दबाव और विज्ञापन आधारित मॉडल ने मीडिया संस्थानों के सामने नई कठिनाइयां खड़ी कर दी हैं। ऐसे वातावरण में किसी भी पत्रकार के लिए संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होता। उसे सरकार से भी सवाल पूछने होते हैं, विपक्ष से भी जवाब मांगना होता है और जनता के वास्तविक मुद्दों को भी प्राथमिकता देनी होती है।

इसी कारण आज पत्रकारिता में व्यक्ति की विश्वसनीयता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। दर्शक अब केवल चैनल का नाम नहीं देखते, बल्कि यह भी देखते हैं कि पत्रकार सवाल किससे पूछ रहा है, किस तरह पूछ रहा है और किन मुद्दों को प्राथमिकता दे रहा है। यही कारण है कि कई वरिष्ठ पत्रकार अपनी व्यक्तिगत पहचान के कारण संस्थान बदलने के बाद भी दर्शकों का विश्वास बनाए रखते हैं।

संदीप चौधरी की यात्रा इसी तथ्य को रेखांकित करती है कि पत्रकार की सबसे बड़ी पूंजी उसकी विश्वसनीयता, अनुभव, तथ्यों पर पकड़ और संवाद की शैली होती है। संस्थान बदल सकते हैं, मंच बदल सकते हैं और मीडिया का स्वरूप भी बदल सकता है, लेकिन यदि पत्रकार अपनी पेशेवर साख बनाए रखता है तो दर्शक उसके साथ बने रहते हैं।

अंततः, लोकतंत्र में पत्रकारिता का उद्देश्य किसी सरकार या विपक्ष का समर्थन करना नहीं, बल्कि जनता के हितों से जुड़े प्रश्नों को मजबूती से उठाना है। निष्पक्ष पत्रकारिता एक आदर्श है, जिसकी ओर निरंतर प्रयास किया जाना चाहिए। किसी भी पत्रकार की निष्पक्षता पर अंतिम निर्णय समय, उसके कार्य और जनता की सामूहिक राय से तय होता है। संदीप चौधरी का उदाहरण यह संकेत अवश्य देता है कि बदलते मीडिया परिदृश्य में भी ऐसे पत्रकार अपनी विशिष्ट शैली, तथ्यपरक प्रस्तुति और सवाल पूछने की क्षमता के बल पर अलग पहचान कायम रख सकते हैं। यही किसी भी पत्रकार की सबसे बड़ी पेशेवर उपलब्धि मानी जा सकती है।

आलोक कुमार

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