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12056 रूपए मासिक मानदेय से समाज में मान-सम्मान नहीं बढ़ रहा है

 

पटना.विकास मित्रों का समय और जिंदगी बर्बाद हो गया है.यह सोच विकास मित्रों में विकसित हो गयी है.आखिर हो क्यों नहीं?12056 रूपए मासिक मानदेय से समाज में मान-सम्मान नहीं बढ़ रहा है.उल्टे सामाजिक- आर्थिक  स्थिति दिन प्रति दिन बहुत ही खराब होती जा रही है. 

   


विकास मित्रों का कहना है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने साल 2010 में विकास मित्रों का नियोजन किया था.प्रारंभिक दौर में विकास मित्र का मानदेय मात्र: तीन हजार रुपये था.मानदेय में मंथरगति से वृद्धि कर 13 साल के बाद मात्र:12056 रुपये कर दिया है.यह राशि महंगाई डायन खात जात में ऊंट के मुंह में जीरा की तरह है.फिर भी हमलोग कमरतोड़ महंगाई में कम मानदेय में ही अधिकाधिक कार्य निष्पादन कर सरकार के अधिकारियों को खुश कर रहे हैं.

    महादलित विकास मिशन की तहत पंचायत के 21 विकास मित्रों को विकास रजिस्टर वर्जन 2.0 को अपडेट करने को लेकर प्रशिक्षण दिया गया. विकास मित्रों को सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न प्रकार की विकास योजनाओं में महादलित अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की भागीदारी की स्थिति वर्तमान में क्या है, इसको महादलित विकास मिशन के पोर्टल पर विकास रजिस्टर 2.0 वर्जन में अपडेट करने के संबंध में विस्तार से जानकारी दी गई. मास्टर ट्रेनर प्रखंड कल्याण पदाधिकारी विकास कुमार ने बताया कि सरकार की सभी प्रकार की योजनाएं जैसे कौशल प्रशिक्षण, शौचालय, जलापूर्ति, सार्वजनिक वितरण प्रणाली, प्रधानमंत्री आवास योजना, सामाजिक सुरक्षा पेंशन, आईसीडीएस, बास भूमि, स्वास्थ्य दहेज प्रथा एवं बाल विवाह जैसी योजना से संबंधित डाटा संकलन कर उसे अपडेट किया जाना है.

      इस बीच जापानी इंसेफिलाइटिस (जेई) व (एईएस) चमकी बुखार को लेकर अब विकास मित्र महादलित टोलों के लोगों को जागरूक करेंगे. इसके लिए इन सभी को बैठक के माध्यम से निर्देशित किया गया है. विकास मित्रों के साथ बैठक में प्रखंड कल्याण कार्यालय में कल्याण पदाधिकारी रवि कुमार ने कहा कि इस कार्य में सभी जुट जाएं. उपस्थित विकास मित्रों को इस रोग से संबंधित जागरूकता के लिए पोस्टर भी उपलब्ध कराया गया.अधिकारी ने कहा कि इन्हें महादलित टोलों के सार्वजनिक स्थलों पर लगाना सुनिश्चित करें.लोगों को इस रोग के लक्षण, पहचान करने के तरीके व इससे बचाव के बारे में जानकारी दें। लोगों को समझाना है कि ओझा गुनी के चक्कर में नहीं पड़ कर ऐसे मरीजों को पीएचसी में लेकर जाएं.इसका उपचार संभव है. बस समय से इसकी पहचान व इलाज जरूरी है.

    इसके बाद राज्य में शराबबंदी कानून लागू होने के बाद शराब निर्माण, बिक्री या इसके सेवन को लेकर चौकीदार एवं दफादारों को सूचना का मुख्य माध्यम बनाया गया था. पिछले दिनों मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की समीक्षा के बाद कानून को प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए नई रणनीति बनी है.अब विकास मित्र, आंगनबाड़ी केंद्र की सेविका एवं सहायिका, आशा एवं एएनएम की भी मदद ली जाएगी. उनसे शराब निर्माण, बिक्री और सेवन की जानकारी ली जाएगी.

आलोक कुमार

कैंडल लाइट कर विरोध व्यक्त किया

 

कोच्चि.इन दिनों केरल में मलयालम लेखक फ्रांसिस नोरोन्हा की कहानी पर आधारित एक नाटक, 'कक्कुकली' को लेकर ईसाई समुदाय आक्रोशित हैं.इस संदर्भ में केरल राज्य में कैथोलिक चर्च की सर्वोच्च संस्था केरल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल (केसीबीसी) ने राज्य सरकार से एक मलयालम नाटक के मंचन पर प्रतिबंध लगाने का आग्रह किया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि इसमें ईसाई धर्म के साथ-साथ इसकी मंडलियों और कॉन्वेंट को गलत तरीके से चित्रित किया गया है.वहीं कैंडल लाइट कर विरोध व्यक्त किया गया.

         बताया जाता है कि ईसाई धर्म केरल का तीसरा सबसे व्यापक धर्म है, भारत सरकार की जनगणना के अनुसार जनसंख्या का 18 प्रतिशत है. अल्पसंख्यक समुदाय होने के बावजूद केरल में ईसाई समुदाय संपूर्ण भारत के ईसाई समुदाय की तुलना में आनुपातिक रूप से बहुत बड़ा है.इस बड़ी जनसंख्या वाले ईसाई समुदाय को मलयालम लेखक फ्रांसिस नोरोन्हा की कहानी पर आधारित एक नाटक, 'कक्कुकली' हिलाकर रख दिया है.मलयालम लेखक ने 'कक्कुकली' नाटक में एक युवा नन और उसके संघर्षों और चुनौतियों के इर्द-गिर्द घूमती जिंदगी को दर्शाया है, जिसका सामना वह एक कॉन्वेंट में करती है.

        वास्तव में अलापुझा स्थित नेथल नाटक संघम द्वारा मंच पर लाया गया नाटक केबी अजय कुमार द्वारा लिखित और जॉब मडाथिल द्वारा निर्देशित है.यह एक ईसाई लड़की की कहानी बताती है जो ईसाई चर्च में शामिल हो गई और अपने पिता की इच्छा का विरोध करते हुए नन बन गई, जो एक कम्युनिस्ट थे.नाटक उस चुनौतीपूर्ण स्थिति से संबंधित है जिसका सामना एक कॉन्वेंट के नियमों और विनियमों के भीतर रहते हुए नन करती है.इसको आधार बनाकर मलयालम लेखक फ्रांसिस नोरोन्हा ने एक नाटक 'कक्कुकली' बना दिया है.अलप्पुझा स्थित नेथल नाटक संघम ने जॉब मदाथिल के निर्देशन में कहानी को एक मंचीय रूपांतर दिया है.

        कॉन्वेंट में एक युवा नन के संघर्ष से संबंधित एक नाटक से परेशान, विश्वासियों के एक वर्ग ने गुरुवयूर में इसके मंचन को रोकने की कोशिश की. उसने कुछ कार्यकर्ताओं को नाराज कर दिया है जो दावा करते हैं कि यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में घुसपैठ है और नाटक के लिए और अधिक चरणों का वादा किया है.मलयालम लेखक फ्रांसिस नोरोना की एक कहानी पर आधारित एक नाटक "कक्कुकली' तूफान के केंद्र में है, जिसमें केसीबीसी समर्थक जीवन कार्यकर्ताओं ने इसका विरोध करते हुए कहा कि यह ईसाई धर्म का अपमान करता है.                                                                                       जब मंदिर में वार्षिक उत्सव के एक भाग के रूप में गुरुवायुर नगर पालिका के सांस्कृतिक कार्यक्रमों में प्रदर्शन करने के लिए नाटक तैयार किया गया था, तो केरल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल (केसीबीसी)  समर्थक जीवन कार्यकर्ताओं ने विरोध किया और यहां तक कि आयोजकों को नाटक के मंचन से पीछे हटने के लिए प्रभावित करने की कोशिश की.

       केरल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल (केसीबीसी) प्रो-लाइफ आंदोलन के जेम्स अझचांगड के अनुसार, "शुरुआत से लेकर अंत तक, कक्कुकली पूरे धर्म, विशेष रूप से ईसाई धर्म के पुजारियों और ननों का अपमान करने की कोशिश कर रही है." हालांकि, नाटक के समर्थन में एआईवाईएफ और अन्य संगठन सामने आए थे.एआईवाईएफ जिला समिति द्वारा जारी एक आधिकारिक बयान में कहा गया है कि नाटक के खिलाफ अनावश्यक विवाद केवल समाज में लोगों के बीच विभाजन को बढ़ावा देंगे और इस तरह की प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित नहीं किया जाना चाहिए.आधिकारिक बयान में कहा गया है, "इस तरह के हस्तक्षेप को केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में घुसपैठ माना जाएगा." एआईवाईएफ ने नेथल नाटक संघम के लिए चरणों की व्यवस्था करने की इच्छा भी व्यक्त की, अगर वे त्रिशूर में इसे फिर से करने के लिए तैयार थे.

         राज्य में कैथोलिक चर्च की सर्वोच्च संस्था केरल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल (केसीबीसी) ने राज्य सरकार से एक मलयालम नाटक के मंचन पर प्रतिबंध लगाने का आग्रह किया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि इसमें ईसाई धर्म के साथ-साथ इसकी मंडलियों और कॉन्वेंट को गलत तरीके से चित्रित किया गया है.

     केसीबीसी के अध्यक्ष कार्डिनल बेसेलियोस क्लेमिस की अध्यक्षता में धर्माध्यक्षों और विभिन्न कलीसियाओं के प्रमुखों की हाल ही में हुई एक बैठक में 'कक्कुकली' नाटक की निंदा की गई और कहा गया कि इसका मंचन केरल की संस्कृति पर एक धब्बा है.अलप्पुझा स्थित नेथल नाटक संघम ने जॉब मदाथिल के निर्देशन में कहानी को एक मंचीय रूपांतर दिया है.

    बैठक में केसीबीसी के प्रतिनिधियों ने कहा कि नाटक और साहित्यिक कृतियों का सुधार, परिवर्तन और सामाजिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त करने का इतिहास रहा है.शीर्ष निकाय ने एक बयान में कहा, लेकिन अत्यधिक अपमानजनक सामग्री और इतिहास की विकृति के साथ महिमामंडन अस्वीकार्य है.

    यह घोर निंदनीय था कि समाज को अनूठी सेवाएं देने वाली हजारों ननों और मण्डलियों के आत्म-विश्वास और स्वाभिमान को ठेस पहुँचाने वाली 'कक्कूकली' को राज्य सरकार के अन्तर्राष्ट्रीय नाट्य उत्सव में शामिल कर विशाल पुरस्कार दिया गया है.वामपंथी संगठनों द्वारा प्रचार, बयान में आगे कहा गया है.


कैथोलिक निकाय ने भी सांस्कृतिक समाज से नाटक की निंदा करने का आग्रह किया और सरकार से इसके मंचन पर प्रतिबंध लगाने के लिए तत्काल कदम उठाने की मांग की.


हालांकि, नाटक के निर्देशक जॉब मैडाथिल ने आलोचनाओं को खारिज कर दिया है और कहा है कि मंडली इसके मंचन के साथ आगे बढ़ेगी. उन्होंने कहा, 'नाटक का मंचन 15 जगहों पर हो चुका था और मुझे समझ नहीं आया कि अब अचानक से विरोध क्यों शुरू हो गया .

आलोक कुमार

ईसाई समुदाय के द्वारा विरोध व्यक्त किया


पटना.बिहार जाति आधारित गणना,2022 का प्रथम चरण 7 जनवरी से 21 जनवरी तक मकानों की गणना की गई.अब द्वितीय चरण में 1 से 30 अप्रैल तक जातिवार गणना होगा.इस पर ईसाई समुदाय के द्वारा विरोध व्यक्त किया जा रहा है.प्रशांत कुमार नामक ईसाई का कहना है कि ईसाई धर्मावलंबी को केवल दो कोड में रखा गया है. ईसाई धर्मावलंबी (हरिजन) की जाति कोड 10 है और ईसाई धर्मावलंबी (अन्य पिछड़ी जाति) की जाति कोड 11 है.बिहार में जन्मे और रहने वाले ईसाई धर्मावलंबी आदिवासी का कोड नहीं दिया गया है.इसका मतलब आदिवासी कहकर उरांव,धागंड़ कहते ही (उरांव) की जाति कोड 12 में डाल देंगे.जो ईसाई धर्म नहीं दर्शाता है.उसे हिंदू ही समझा जाएगा.इसमें परिवर्तन करने की जरूरत है.         

   विदित हो कि बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार जाति आधारित गणना,2022 मुहिम के रूप में शुरू किया था.इसके प्रथम चरण में शनिवार 7 जनवरी से जातिगत जनगणना के तहत मकानों की गणना शुरू किया गया. खुद ही पटना में डीएम डॉ. चंद्रशेखर सिंह ने मकान की गणना में लगाए गए कर्मियों के साथ इसकी शुरुआत की थी.राज्य सरकार के अनुसार जातिगत जनगणना से आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचितों एवं पिछड़ों की पहचान होगी और उनके हिसाब से योजनाएं बनाई जा सकेगी. सरकार का दावा है कि जून में पूरी रिपोर्ट जारी कर दी जाएगी.

   बता दें कि पहले चरण में 7 जनवरी से 21 जनवरी तक मकानों की गणना शुरू की गई. इन 15 दिनों के दरम्यान गणनाकर्मी लगातार हर मकान में गए.  हर मकान को खास नंबर अलॉट किए.यह यूनिक नंबर लाल रंग से मकान पर मार्क भी किए और इस रिकॉर्ड को लोगों को रिकॉर्ड के रूप में इसे अपने पास भी लिखकर रख लेना चाहिए, क्योंकि यह एक तरह से पता हो जाएगा. अब तक नगर निगम मकान नंबर जारी किया करता था, लेकिन उसे पता के रूप में खोजना असंभव हो जाता था. दावा है कि इस बार दिया जा रहा नंबर हर आदमी के पते के रूप में रिकॉर्ड बनकर दर्ज हो जाएगा.मकान की गणना करते समय गणनाकर्मी घर के मुखिया का नाम भी लिख रहे हैं, ताकि यह रिकॉर्ड रहे कि मकान नंबर फलां किस व्यक्ति का है.गणनाकर्मी यह भी दर्ज कर रहे हैं कि उस परिवार में कुल कितने सदस्य हैं. साथ ही बेघर लोगों का भी रिकॉर्ड उनके अस्थायी आशियाने-ठिकाने पर लिया गया.प्रत्येक कर्मी 150 मकानों की गिनती किए. इसके लिए उन्हें हर रोज मैनुअल डेटा अपलोड करना पड़ा. अगर कोई घर बंद मिला तो मोबाइल नंबर लेकर उनसे उनकी पूरी जानकारी लिए.यह गणनाकर्मी की जिम्मेदारी थी.

दूसरे चरण में 1 से 30 अप्रैल तक जातिवार गणना होगा.इस दौरान जाति पूछेंगे, साथ ही काम और आय जानेंगे. मकान के मुखिया और परिवार के सदस्यों की कुल संख्या का रिकॉर्ड कागजों पर दर्ज किया जा रहा है.यह 21 जनवरी तक प्रक्रिया पूरी हो गयी. इसके साथ ही इस डाटा को अपलोड किए जाने पर ऑनलाइन फॉर्म तैयार होता चला गया.उसी फॉर्म में अगले चरण के दौरान बाकी जानकारी फीड की जाएगी.पूरे अप्रैल महीने गणनाकर्मी इसी ऑनलाइन फॉर्म में बाकी सूचनाएं भरेंगे. उस दौरान मकान नंबर के हिसाब से परिवार के मुखिया के पास पहुंच उनकी जाति के साथ परिवार के सदस्यों की जानकारी ली जाएगी. उनके पास कौन-कितनी गाड़ियां हैं, कितने मोबाइल है, आय का स्रोत क्या है, नौकरी करते हैं या स्वरोजगार या बेरोजगार हैं, क्या-क्या हुनर जानते हैं...जैसी जानकारी भी ली जाएगी.

आलोक कुमार

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