✦ Latest News Loading...
कोसी का कहर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
कोसी का कहर लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 18 अगस्त 2026

Bihar : कोसी का कहर

 

कोसी का कहर: छह माह में रिपोर्ट का वादा, छह साल में निष्कर्ष और 18 साल बाद भी अधूरे जख्म

छह महीने में जांच पूरी करने का दावा था, लेकिन रिपोर्ट आने में करीब छह साल लग गए। रिपोर्ट आई तो सवालों के जवाब और जवाबदेही दोनों अधूरे रह गए। 18 साल बाद भी कोसी के हजारों परिवारों के लिए टूटे पुल, अधूरे घर, मुआवजे और पुनर्वास के सवाल जिंदा हैं।

18 अगस्त 2008 की तारीख कोसी अंचल के लाखों लोगों की स्मृति में आज भी एक भयावह त्रासदी के रूप में दर्ज है। नेपाल के कुसहा क्षेत्र में पूर्वी कोसी तटबंध टूटने के बाद नदी ने अपना रास्ता बदल लिया। सुपौल, मधेपुरा, सहरसा समेत कोसी क्षेत्र के कई हिस्सों में पानी फैल गया। गांव डूबे, घर उजड़े, खेत बर्बाद हुए और बड़ी संख्या में लोगों की जान चली गई।

सरकारों ने इसे बड़ी राष्ट्रीय आपदा माना। राहत और पुनर्वास के वादे हुए। भविष्य में ऐसी त्रासदी रोकने के लिए बेहतर व्यवस्था का भरोसा दिया गया। लेकिन 18 वर्ष बाद सवाल यह है कि उन वादों का हिसाब कौन देगा?

छह महीने की जांच, छह साल में रिपोर्ट

कोसी त्रासदी के कारणों की जांच के लिए 10 सितंबर 2008 को पटना उच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश राजेश बालिया की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित किया गया। आयोग की प्रारंभिक अवधि मार्च 2010 तक निर्धारित थी। इसके बाद अवधि बढ़ाई गई और चौथा विस्तार 31 मार्च 2012 तक हुआ।

इसके बावजूद रिपोर्ट तत्काल सामने नहीं आई। करीब छह वर्ष बाद, 1 अगस्त 2014 को आयोग की रिपोर्ट बिहार विधानसभा में रखी गई।

यहीं पहला बड़ा सवाल खड़ा होता है—जिस त्रासदी के कारणों की जांच जल्द पूरी करने की जरूरत थी, उसकी रिपोर्ट सामने आने में इतना लंबा समय क्यों लगा?

रिपोर्ट में निगरानी व्यवस्था की कमियों, बाढ़ नियंत्रण से जुड़ी संस्थाओं की भूमिका, चेतावनी व्यवस्था और कटाव निरोधक कार्यों की मॉनिटरिंग जैसे मुद्दों पर सवाल उठाए गए। अभियंताओं की क्षमता और तैनाती तथा पूर्व में कराए गए कटाव निरोधक कार्यों की जांच की जरूरत का भी उल्लेख किया गया।

लेकिन रिपोर्ट के बाद कार्रवाई कितनी हुई? किस अधिकारी की जिम्मेदारी तय हुई? कितनों पर विभागीय या कानूनी कार्रवाई हुई? जनता को इसका स्पष्ट और सार्वजनिक हिसाब कितना मिला?

यही वह अंतर है जहां जांच, रिपोर्ट और कार्रवाई के बीच की दूरी लोकतांत्रिक जवाबदेही पर सवाल खड़ा करती है।

18 साल बाद भी बाढ़ के पुराने जख्म

कोसी की त्रासदी केवल 2008 की घटना नहीं है। इसके निशान आज भी बुनियादी ढांचे और लोगों के रोजमर्रा के जीवन में दिखाई देते हैं।

मधेपुरा के चौसा प्रखंड में धनेशपुर चौक से मोरसंडा गोठ बस्ती की ओर जाने वाले मार्ग पर पुलों की समस्या लंबे समय से लोगों के लिए परेशानी का कारण रही है। मरम्मत के बाद भी बाढ़ में संरचनाओं के क्षतिग्रस्त होने की शिकायतें सामने आती रही हैं। कहीं पुल टूटता है, कहीं डायवर्सन बनता है और फिर अगली बाढ़ पुराने संकट को वापस ले आती है।

सवाल यह नहीं कि कोसी में बाढ़ क्यों आती है। सवाल यह है कि जिस क्षेत्र में हर वर्ष बाढ़ का खतरा रहता है, वहां स्थायी और टिकाऊ बुनियादी ढांचा क्यों नहीं तैयार किया जाता?

बाढ़ के समय नाव लोगों की मजबूरी बन जाती है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है। मरीजों को अस्पताल पहुंचाना कठिन हो जाता है। किसानों की फसल और बाजार तक पहुंच दोनों प्रभावित होते हैं।

पुनर्वास की अधूरी कहानी

आपदा के बाद राहत तत्काल जरूरत पूरी कर सकती है, लेकिन स्थायी पुनर्वास ही प्रभावित परिवारों को सामान्य जीवन में लौटाता है। यही वजह है कि पुनर्वास योजनाओं की स्थिति सबसे महत्वपूर्ण सवालों में शामिल होनी चाहिए।

मधेपुरा में 2 लाख 36 हजार 632 घरों के प्रभावित होने और करीब एक लाख घरों के निर्माण की योजना से जुड़ी जानकारी सामने आई थी। लेकिन योजना बंद होने तक लगभग एक चौथाई घर ही बन पाने की बात कही गई। यदि उपलब्ध आंकड़े सही हैं, तो यह पुनर्वास की गति पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।

आपदा के बाद वर्षों तक यदि परिवार पक्के घर की प्रतीक्षा करता रहे तो राहत का अर्थ अधूरा रह जाता है। पुनर्वास सिर्फ मकान बनाने की योजना नहीं है। इसमें सड़क, बिजली, पानी, स्कूल, स्वास्थ्य सेवा और रोजगार की व्यवस्था भी शामिल होनी चाहिए।

मुआवजे के आंकड़े भी पूछते हैं सवाल

मृतकों के परिजनों को सहायता देने के लिए सरकार ने विभिन्न मदों में मुआवजे और अनुदान की व्यवस्था की थी। लेकिन मधेपुरा से जुड़ी उपलब्ध जानकारी में आधिकारिक तौर पर 272 मौतें दर्ज होने और 181 मृतकों के परिवारों को सरकारी अनुदान मिलने की बात सामने आती है।

यदि ये आंकड़े सही हैं तो सवाल बेहद सीधा है—बाकी परिवारों को सहायता क्यों नहीं मिली?

आपदा में मृतकों की संख्या केवल सरकारी आंकड़ा नहीं होती। प्रत्येक संख्या के पीछे एक परिवार, एक घर और कई अधूरे सपने होते हैं। इसलिए मुआवजे की सूची, भुगतान की स्थिति और लंबित मामलों का सार्वजनिक विवरण होना चाहिए।

यदि अलग-अलग सरकारी रिकॉर्ड में मृतकों या लाभुकों की संख्या अलग है, तो प्रशासन को उन आंकड़ों का मिलान भी सार्वजनिक रूप से करना चाहिए।

आपदा सिर्फ पानी से नहीं बनती

कोसी ने यह भी सिखाया कि आपदा का प्रभाव केवल प्राकृतिक कारणों से तय नहीं होता। कमजोर निगरानी, लचर प्रशासन, निर्णय में देरी, खराब निर्माण, अधूरी योजनाएं और जवाबदेही की कमी किसी प्राकृतिक संकट को लंबे सामाजिक संकट में बदल सकती हैं।

18 अगस्त 2008 को पानी आया और बहुत कुछ बहा ले गया। लेकिन पानी उतरने के बाद भी हजारों परिवारों का संघर्ष खत्म नहीं हुआ। कहीं सड़क नहीं बनी, कहीं पुल का स्थायी समाधान नहीं हुआ, कहीं पुनर्वास अधूरा रहा और कहीं मुआवजे का सवाल लंबित रहा।

अब श्रद्धांजलि नहीं, सार्वजनिक हिसाब चाहिए

18 वर्ष बाद कोसी को केवल त्रासदी की बरसी पर याद करना पर्याप्त नहीं है। अब पुराने वादों और योजनाओं का सार्वजनिक सामाजिक ऑडिट होना चाहिए।

सरकार को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए—

  • 2008 की त्रासदी के कारणों पर जांच आयोग की रिपोर्ट के बाद क्या कार्रवाई हुई?

  • कितने अधिकारियों या संस्थाओं की जिम्मेदारी तय हुई?

  • पुनर्वास के लिए कितने घर स्वीकृत हुए और कितने वास्तव में बने?

  • कितने परिवारों को मुआवजा मिला और कितने मामले अभी लंबित हैं?

  • टूटे और जर्जर पुलों की स्थायी मरम्मत के लिए क्या समयबद्ध योजना है?

  • भविष्य की बाढ़ से निपटने के लिए चेतावनी और निगरानी व्यवस्था कितनी मजबूत हुई है?

कोसी के लोगों को फिर केवल आश्वासन नहीं चाहिए। उन्हें योजनाओं की स्थिति, खर्च हुए धन और लंबित काम का सार्वजनिक हिसाब चाहिए।

क्योंकि आपदा का पानी उतर जाता है, लेकिन सरकार की जिम्मेदारी नहीं उतरती।

18 अगस्त 2008 की त्रासदी को 18 वर्ष पूरे हो चुके हैं। अब समय है कि कोसी के पुराने जख्मों पर सिर्फ भाषण नहीं, बल्कि ठोस काम दिखाई दे।

कोसी का पानी भले उतर गया हो, लेकिन कोसी के सवाल आज भी ऊंचे हैं।


आलोक कुमार