पटना में बैटरी से चलने वाली हवा-हवाई टेंपू का भाड़ा,'हवा-हवाई' का नया गणित: ईंधन बढ़े या न बढ़े, जेब ढीली होना तय है!
"महंगाई का असर जब आम आदमी की जेब पर पड़ता है, तो वह केवल आंकड़ों का विषय नहीं रह जाता। वह रोजमर्रा की जिंदगी की हकीकत बन जाता है। लेकिन सवाल तब उठता है, जब बढ़ती लागत के नाम पर ऐसी वसूली शुरू हो जाए, जिसका वास्तविक खर्च से सीधा संबंध ही न हो।"
बिहार की राजधानी पटना इन दिनों कुछ ऐसे ही सवालों से जूझ रही है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी के बाद शहर में ऑटो और टेंपू किराए में वृद्धि कर दी गई है। पहली नजर में यह फैसला सामान्य लग सकता है, क्योंकि ईंधन महंगा होने पर परिवहन लागत बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन बहस तब शुरू हुई जब सीएनजी और बैटरी से चलने वाले वाहनों ने भी लगभग उसी अनुपात में किराया बढ़ा दिया।
अब यात्रियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी वाहन का संचालन पेट्रोल या डीजल पर निर्भर ही नहीं है, तो फिर ईंधन मूल्य वृद्धि का बोझ यात्रियों पर क्यों डाला जा रहा है?
सुबह की शुरुआत अब किराए की बहस से
पटना की सड़कों पर सुबह का दृश्य कुछ बदला-बदला नजर आता है। पहले लोगों की चिंता समय पर कार्यालय, कॉलेज या बाजार पहुंचने की होती थी, लेकिन अब यात्रा शुरू होने से पहले ही किराए को लेकर बहस छिड़ जाती है।बस स्टैंड, ऑटो स्टैंड और प्रमुख चौक-चौराहों पर अक्सर यात्रियों और चालकों के बीच किराए को लेकर नोकझोंक देखी जा सकती है। कोई पुराने किराए पर जाने की मांग करता है तो कोई नए निर्धारित किराए का हवाला देता है। नतीजा यह है कि सफर शुरू होने से पहले ही तनाव का माहौल बन जाता है।
तीन रुपये की बढ़ोतरी, लेकिन असर कहीं ज्यादा
टेंपू चालक यूनियनों द्वारा कई रूटों पर न्यूनतम किराया बढ़ाकर दस रुपये कर दिया गया है। देखने में यह वृद्धि मामूली लग सकती है, लेकिन इसका प्रभाव उन हजारों लोगों पर पड़ता है जो प्रतिदिन कई बार सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करते हैं।
एक छात्र, जो रोज चार बार ऑटो या ई-रिक्शा से यात्रा करता है, उसके लिए प्रतिदिन कुछ रुपये का अतिरिक्त खर्च महीने के अंत तक सैकड़ों रुपये का बोझ बन जाता है। यही स्थिति नौकरीपेशा कर्मचारियों, छोटे व्यापारियों और दैनिक मजदूरों की भी है।
महंगाई पहले से ही घरेलू बजट पर दबाव बना रही है। ऐसे में परिवहन खर्च में बढ़ोतरी आम लोगों के लिए एक और चुनौती बन गई है।
सबसे बड़ा सवाल: बैटरी और सीएनजी वाहन क्यों महंगे हुए?
इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि पटना में चलने वाले लगभग सभी प्रकार के सार्वजनिक वाहनों ने किराया बढ़ा दिया है।
पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों के साथ-साथ सीएनजी वाहन और बैटरी चालित ई-रिक्शा भी नए किराए पर यात्रियों से पैसे वसूल रहे हैं।
यहीं से जनता के सवाल शुरू होते हैं।
यदि ई-रिक्शा में पेट्रोल या डीजल का उपयोग नहीं होता, तो ईंधन मूल्य वृद्धि का तर्क वहां कैसे लागू हो सकता है? क्या केवल इसलिए कि अन्य वाहन किराया बढ़ा रहे हैं, सभी श्रेणियों के वाहनों को भी ऐसा करने का अधिकार मिल जाना चाहिए?
यह प्रश्न केवल आर्थिक नहीं, बल्कि तार्किक और नीतिगत भी है।
चालकों की अपनी मजबूरियां भी हैं
दूसरी ओर, चालकों का पक्ष भी पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।
कई ई-रिक्शा चालक बताते हैं कि वाहन खरीदने में उन्हें भारी निवेश करना पड़ा है। बैंक ऋण की किस्तें, बैटरी बदलने का खर्च, मरम्मत, टायर, पार्किंग शुल्क और रखरखाव की लागत लगातार बढ़ रही है।
कुछ चालक बिजली दरों में वृद्धि का भी हवाला देते हैं। उनका कहना है कि बैटरी चार्जिंग की लागत पहले की तुलना में अधिक हो गई है।
इन तर्कों में वास्तविकता जरूर दिखाई देती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इन लागतों का कोई आधिकारिक और पारदर्शी आकलन किया गया है? यदि किया गया है, तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?
यूनियन का दबाव और प्रतिस्पर्धा का सवाल
इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। कई चालकों का कहना है कि वे व्यक्तिगत रूप से कम किराया लेने के पक्ष में हों, तब भी ऐसा करना आसान नहीं है।
कुछ चालक स्वीकार करते हैं कि यूनियन द्वारा तय किराए से कम वसूली करने पर उन्हें विरोध या दबाव का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में अधिकांश चालक निर्धारित दरों का पालन करने को मजबूर हो जाते हैं।
यहीं से मामला केवल किराया वृद्धि का नहीं रह जाता, बल्कि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के अधिकार का भी बन जाता है।
यदि कोई चालक कम किराए पर बेहतर सेवा देना चाहता है, तो उसे ऐसा करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। लेकिन यदि सामूहिक दबाव इस स्वतंत्रता को सीमित करता है, तो यह बाजार व्यवस्था के लिए भी चिंता का विषय है।
जनता और चालक के बीच फंसा प्रशासन
पटना जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहर में सार्वजनिक परिवहन लाखों लोगों की दैनिक आवश्यकता है। छात्र, कर्मचारी, छोटे व्यवसायी, मजदूर और बुजुर्ग बड़ी संख्या में ऑटो, टेंपू और ई-रिक्शा पर निर्भर हैं।
इसके बावजूद किराया निर्धारण की प्रक्रिया आम लोगों के लिए स्पष्ट नहीं दिखती।
कई यात्रियों का कहना है कि उन्हें यह तक जानकारी नहीं होती कि कौन-सा किराया अधिकृत है और कौन-सा नहीं। सार्वजनिक स्थानों पर किराया सूची का अभाव भी भ्रम और विवाद की स्थिति पैदा करता है।
ऐसे में प्रशासन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि किराया बढ़ाना आवश्यक है, तो उसका आधार स्पष्ट होना चाहिए। जनता को बताया जाना चाहिए कि परिचालन लागत कितनी बढ़ी और किराया किस गणना के आधार पर तय किया गया।
पारदर्शिता ही समाधान का रास्ता
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि पेट्रोल, डीजल, सीएनजी और बैटरी चालित वाहनों की परिचालन लागत अलग-अलग होती है। इसलिए सभी श्रेणियों के वाहनों पर एक समान किराया वृद्धि लागू करना आर्थिक दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता।
जरूरत इस बात की है कि प्रत्येक श्रेणी के वाहन की वास्तविक लागत का अध्ययन किया जाए और उसी आधार पर किराया निर्धारित किया जाए।
यदि किराया निर्धारण की प्रक्रिया पारदर्शी होगी, तो यात्रियों और चालकों दोनों के बीच विश्वास बढ़ेगा तथा विवाद की स्थिति भी कम होगी।
निष्कर्ष: सवाल केवल तीन रुपये का नहीं, भरोसे का है
पटना की सड़कों पर दौड़ते ऑटो, टेंपू और ई-रिक्शा केवल परिवहन के साधन नहीं हैं। वे उस व्यवस्था का आईना भी हैं, जिसमें आम आदमी रोजाना महंगाई और बढ़ते खर्चों से जूझ रहा है।
जनता जानना चाहती है कि यदि किराया बढ़ा है तो उसका आधार क्या है? क्या यह वास्तविक लागत वृद्धि का परिणाम है या फिर एक सामूहिक निर्णय, जिसका बोझ सीधे यात्रियों पर डाला जा रहा है?
आखिरकार सवाल केवल तीन रुपये का नहीं है। सवाल पारदर्शिता, जवाबदेही और भरोसे का है। जब तक इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं मिलते, तब तक पटना की सड़कों पर किराए को लेकर यह बहस जारी रहेगी और आम आदमी की जेब पर बढ़ता बोझ भी।