✦ Latest News Loading...
विशेष रिपोर्ट लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
विशेष रिपोर्ट लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, 9 जून 2026

Bihar: पप्पू यादव ने गडकरी से की संपर्क पथ निर्माण की मांग

दियारा से विकास की राह: पप्पू यादव ने गडकरी से की संपर्क पथ निर्माण की मांग, सीमांचल को जोड़ने की नई पहल

"किसी भी क्षेत्र का विकास केवल बड़े पुलों और चौड़ी सड़कों से नहीं मापा जाता, बल्कि इस बात से तय होता है कि उस विकास का लाभ आखिरी व्यक्ति तक पहुंच रहा है या नहीं। जब करोड़ों रुपये की परियोजनाएं बन जाएं, लेकिन गांव का किसान, छात्र, मरीज और मजदूर उससे सीधे लाभान्वित न हो सके, तब विकास की तस्वीर अधूरी दिखाई देती है। बिहार के दियारा क्षेत्र की कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जहां आधुनिक बुनियादी ढांचे के बावजूद संपर्क मार्गों की कमी लोगों की परेशानियां बढ़ा रही है।"

इसी समस्या को प्रमुखता से उठाते हुए पूर्णिया संसदीय क्षेत्र के सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने नई दिल्ली में केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी से मुलाकात कर दियारा क्षेत्र के विकास से जुड़ी महत्वपूर्ण मांगों को उनके समक्ष रखा। इस दौरान उन्होंने केवल एक सड़क निर्माण की मांग नहीं की, बल्कि बिहार के दियारा, कोसी और सीमांचल क्षेत्र की कनेक्टिविटी को मजबूत करने की दिशा में व्यापक पहल की आवश्यकता पर जोर दिया।

गडकरी को सौंपा स्मरण पत्र

नई दिल्ली में हुई शिष्टाचार मुलाकात के दौरान सांसद पप्पू यादव ने दियारा विकास संघर्ष समिति, पटना एवं सारण की ओर से पूर्व में प्रेषित निवेदन के क्रम में केंद्रीय मंत्री को एक विस्तृत स्मरण पत्र सौंपा।

ज्ञापन में विशेष रूप से जेपी सेतु के समानांतर राष्ट्रीय राजमार्ग-139 के अंतर्गत गंगा नदी पर निर्मित दीघा-सोनपुर 6-लेन पुल से ग्राम पंचायत नकटा दियारा नया टोला तक संपर्क स्थापित करने के लिए पिलर संख्या-16 के निकट एप्रोच रोड रैम्प निर्माण की मांग की गई।

सांसद ने मंत्री को बताया कि वर्तमान में इस संपर्क मार्ग के अभाव में हजारों ग्रामीणों को रोजमर्रा के आवागमन में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। बड़ी परियोजनाएं बनने के बावजूद स्थानीय आबादी को उनका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है।

सड़क नहीं, जीवन की जरूरत है यह परियोजना

सांसद पप्पू यादव ने अपने आग्रह में स्पष्ट किया कि यह मांग केवल सड़क निर्माण तक सीमित नहीं है। इसका सीधा संबंध शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, रोजगार और आपातकालीन सेवाओं तक आम लोगों की पहुंच से जुड़ा हुआ है।

दियारा क्षेत्र में रहने वाले लोगों को अक्सर अस्पताल, स्कूल, कॉलेज, बाजार और सरकारी कार्यालयों तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। कई बार मरीजों और गर्भवती महिलाओं को समय पर चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पाती, जिससे गंभीर परिस्थितियां उत्पन्न हो जाती हैं।

यदि नकटा दियारा नया टोला से पिलर संख्या-16 तक एप्रोच रोड रैम्प का निर्माण हो जाता है, तो हजारों लोगों का आवागमन आसान हो जाएगा और क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक विकास को नई गति मिलेगी।

दियारा क्षेत्र की वर्षों पुरानी मांग

गंगा और उसकी सहायक नदियों के किनारे बसे दियारा क्षेत्र लंबे समय से बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझते रहे हैं। बाढ़, कटाव और परिवहन सुविधाओं के अभाव ने इन क्षेत्रों के विकास को प्रभावित किया है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि बड़े पुल और राष्ट्रीय राजमार्ग बनने के बावजूद गांवों को उनसे जोड़ने वाले संपर्क मार्गों की कमी के कारण अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा है।

ऐसे में दियारा क्षेत्र के लिए संपर्क पथ का निर्माण केवल एक स्थानीय मांग नहीं बल्कि क्षेत्रीय विकास की आवश्यकता बन चुका है।पटना से पूर्णिया 

तक बेहतर कनेक्टिविटी की पहल

मुलाकात के दौरान सांसद पप्पू यादव ने केवल दियारा क्षेत्र की समस्या नहीं उठाई, बल्कि पटना से पूर्णिया तक बेहतर कनेक्टिविटी विकसित करने का भी आग्रह किया।

उन्होंने कहा कि बिहार के पूर्वी हिस्से, विशेषकर सीमांचल और कोसी क्षेत्र, अभी भी मजबूत सड़क नेटवर्क की दृष्टि से और अधिक निवेश की मांग करते हैं। बेहतर सड़क संपर्क न केवल आवागमन को आसान बनाएगा, बल्कि व्यापार, पर्यटन और निवेश को भी प्रोत्साहित करेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सीमांचल क्षेत्र की कनेक्टिविटी मजबूत होती है, तो इसका सकारात्मक प्रभाव पूरे पूर्वी बिहार की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा।

पूर्णिया एयरपोर्ट तक फोरलेन सड़क की मांग


सांसद ने केंद्रीय मंत्री को सौंपे गए ज्ञापन में एक और महत्वपूर्ण मांग रखी। उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्ग-31 के जीरो माइल (गुलाबबाग) से पूर्णिया एयरपोर्ट तक फोरलेन सड़क अथवा सीधा राष्ट्रीय राजमार्ग विकसित करने का आग्रह किया।

वर्तमान में शहर के भीतर बढ़ते ट्रैफिक दबाव के कारण यात्रियों को जाम की समस्या का सामना करना पड़ता है। यदि एयरपोर्ट तक सीधा और चौड़ा मार्ग उपलब्ध हो जाए, तो यात्रा समय में कमी आएगी और क्षेत्रीय विकास को भी बढ़ावा मिलेगा।

विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी एयरपोर्ट की सफलता केवल उसके रनवे पर निर्भर नहीं करती, बल्कि वहां तक पहुंचने वाली सड़क व्यवस्था भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है।

स्मार्ट सिटी और इंटरनेशनल स्टेडियम का भी उठाया मुद्दा

सड़क परियोजनाओं के अलावा सांसद पप्पू यादव ने पूर्णिया के समग्र विकास से जुड़े अन्य मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया।

उन्होंने पूर्णिया को स्मार्ट सिटी का दर्जा दिलाने की आवश्यकता पर बल दिया। उनका मानना है कि सीमांचल का सबसे महत्वपूर्ण शहर होने के बावजूद पूर्णिया अभी भी कई आधुनिक शहरी सुविधाओं से वंचित है।

इसके साथ ही उन्होंने केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण से मुलाकात कर पूर्णिया में एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्टेडियम के निर्माण की मांग करने की भी बात कही है।

यदि यह परियोजना साकार होती है, तो इससे न केवल खेल प्रतिभाओं को अवसर मिलेगा, बल्कि क्षेत्र में खेल पर्यटन और आर्थिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलेगा।

 विकास की राजनीति या जनहित का मुद्दा?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बुनियादी ढांचे से जुड़े मुद्दे किसी भी क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। सड़क, पुल, एयरपोर्ट और खेल सुविधाएं सीधे तौर पर रोजगार, निवेश और सामाजिक विकास को प्रभावित करती हैं।

ऐसे में दियारा संपर्क पथ, पूर्णिया एयरपोर्ट फोरलेन और स्मार्ट सिटी जैसी मांगों को केवल राजनीतिक बयानबाजी के रूप में नहीं देखा जा सकता। यदि इन परियोजनाओं पर अमल होता है, तो लाखों लोगों को इसका प्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है।

निष्कर्ष

नई दिल्ली में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से सांसद पप्पू यादव की मुलाकात ने बिहार के दियारा और सीमांचल क्षेत्र की कई महत्वपूर्ण विकासात्मक मांगों को राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में ला दिया है। नकटा दियारा संपर्क पथ, पूर्णिया एयरपोर्ट फोरलेन, स्मार्ट सिटी और अंतरराष्ट्रीय स्टेडियम जैसी परियोजनाएं केवल निर्माण कार्य नहीं हैं, बल्कि क्षेत्र के भविष्य से जुड़ी उम्मीदें हैं।

अब निगाहें केंद्र सरकार और संबंधित मंत्रालयों की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। यदि इन प्रस्तावों को स्वीकृति और गति मिलती है, तो दियारा से लेकर सीमांचल तक विकास की नई राह खुल सकती है और लंबे समय से बुनियादी सुविधाओं की प्रतीक्षा कर रहे लाखों लोगों की उम्मीदों को नया आधार मिल सकता है।

आलोक कुमार



Bihar : शहर में ऑटो और टेंपू किराए में वृद्धि कर दी गई

       पटना में बैटरी से चलने वाली हवा-हवाई टेंपू का भाड़ा,'हवा-हवाई' का नया गणित: ईंधन बढ़े या न बढ़े, जेब ढीली होना तय है!


"महंगाई
का असर जब आम आदमी की जेब पर पड़ता है, तो वह केवल आंकड़ों का विषय नहीं रह जाता। वह रोजमर्रा की जिंदगी की हकीकत बन जाता है। लेकिन सवाल तब उठता है, जब बढ़ती लागत के नाम पर ऐसी वसूली शुरू हो जाए, जिसका वास्तविक खर्च से सीधा संबंध ही न हो।"

बिहार की राजधानी पटना इन दिनों कुछ ऐसे ही सवालों से जूझ रही है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी के बाद शहर में ऑटो और टेंपू किराए में वृद्धि कर दी गई है। पहली नजर में यह फैसला सामान्य लग सकता है, क्योंकि ईंधन महंगा होने पर परिवहन लागत बढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन बहस तब शुरू हुई जब सीएनजी और बैटरी से चलने वाले वाहनों ने भी लगभग उसी अनुपात में किराया बढ़ा दिया।

अब यात्रियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि किसी वाहन का संचालन पेट्रोल या डीजल पर निर्भर ही नहीं है, तो फिर ईंधन मूल्य वृद्धि का बोझ यात्रियों पर क्यों डाला जा रहा है?

सुबह की शुरुआत अब किराए की बहस से

पटना की सड़कों पर सुबह का दृश्य कुछ बदला-बदला नजर आता है। पहले लोगों की चिंता समय पर कार्यालय, कॉलेज या बाजार पहुंचने की होती थी, लेकिन अब यात्रा शुरू होने से पहले ही किराए को लेकर बहस छिड़ जाती है।

बस स्टैंड, ऑटो स्टैंड और प्रमुख चौक-चौराहों पर अक्सर यात्रियों और चालकों के बीच किराए को लेकर नोकझोंक देखी जा सकती है। कोई पुराने किराए पर जाने की मांग करता है तो कोई नए निर्धारित किराए का हवाला देता है। नतीजा यह है कि सफर शुरू होने से पहले ही तनाव का माहौल बन जाता है।

तीन रुपये की बढ़ोतरी, लेकिन असर कहीं ज्यादा

टेंपू चालक यूनियनों द्वारा कई रूटों पर न्यूनतम किराया बढ़ाकर दस रुपये कर दिया गया है। देखने में यह वृद्धि मामूली लग सकती है, लेकिन इसका प्रभाव उन हजारों लोगों पर पड़ता है जो प्रतिदिन कई बार सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करते हैं।

एक छात्र, जो रोज चार बार ऑटो या ई-रिक्शा से यात्रा करता है, उसके लिए प्रतिदिन कुछ रुपये का अतिरिक्त खर्च महीने के अंत तक सैकड़ों रुपये का बोझ बन जाता है। यही स्थिति नौकरीपेशा कर्मचारियों, छोटे व्यापारियों और दैनिक मजदूरों की भी है।

महंगाई पहले से ही घरेलू बजट पर दबाव बना रही है। ऐसे में परिवहन खर्च में बढ़ोतरी आम लोगों के लिए एक और चुनौती बन गई है।

सबसे बड़ा सवाल: बैटरी और सीएनजी वाहन क्यों महंगे हुए?

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि पटना में चलने वाले लगभग सभी प्रकार के सार्वजनिक वाहनों ने किराया बढ़ा दिया है।

पेट्रोल और डीजल से चलने वाले वाहनों के साथ-साथ सीएनजी वाहन और बैटरी चालित ई-रिक्शा भी नए किराए पर यात्रियों से पैसे वसूल रहे हैं।

यहीं से जनता के सवाल शुरू होते हैं।

यदि ई-रिक्शा में पेट्रोल या डीजल का उपयोग नहीं होता, तो ईंधन मूल्य वृद्धि का तर्क वहां कैसे लागू हो सकता है? क्या केवल इसलिए कि अन्य वाहन किराया बढ़ा रहे हैं, सभी श्रेणियों के वाहनों को भी ऐसा करने का अधिकार मिल जाना चाहिए?

यह प्रश्न केवल आर्थिक नहीं, बल्कि तार्किक और नीतिगत भी है।

चालकों की अपनी मजबूरियां भी हैं

दूसरी ओर, चालकों का पक्ष भी पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता।

कई ई-रिक्शा चालक बताते हैं कि वाहन खरीदने में उन्हें भारी निवेश करना पड़ा है। बैंक ऋण की किस्तें, बैटरी बदलने का खर्च, मरम्मत, टायर, पार्किंग शुल्क और रखरखाव की लागत लगातार बढ़ रही है।

कुछ चालक बिजली दरों में वृद्धि का भी हवाला देते हैं। उनका कहना है कि बैटरी चार्जिंग की लागत पहले की तुलना में अधिक हो गई है।

इन तर्कों में वास्तविकता जरूर दिखाई देती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या इन लागतों का कोई आधिकारिक और पारदर्शी आकलन किया गया है? यदि किया गया है, तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?

यूनियन का दबाव और प्रतिस्पर्धा का सवाल

इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। कई चालकों का कहना है कि वे व्यक्तिगत रूप से कम किराया लेने के पक्ष में हों, तब भी ऐसा करना आसान नहीं है।

कुछ चालक स्वीकार करते हैं कि यूनियन द्वारा तय किराए से कम वसूली करने पर उन्हें विरोध या दबाव का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में अधिकांश चालक निर्धारित दरों का पालन करने को मजबूर हो जाते हैं।

यहीं से मामला केवल किराया वृद्धि का नहीं रह जाता, बल्कि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के अधिकार का भी बन जाता है।

यदि कोई चालक कम किराए पर बेहतर सेवा देना चाहता है, तो उसे ऐसा करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। लेकिन यदि सामूहिक दबाव इस स्वतंत्रता को सीमित करता है, तो यह बाजार व्यवस्था के लिए भी चिंता का विषय है।

जनता और चालक के बीच फंसा प्रशासन

पटना जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहर में सार्वजनिक परिवहन लाखों लोगों की दैनिक आवश्यकता है। छात्र, कर्मचारी, छोटे व्यवसायी, मजदूर और बुजुर्ग बड़ी संख्या में ऑटो, टेंपू और ई-रिक्शा पर निर्भर हैं।

इसके बावजूद किराया निर्धारण की प्रक्रिया आम लोगों के लिए स्पष्ट नहीं दिखती।

कई यात्रियों का कहना है कि उन्हें यह तक जानकारी नहीं होती कि कौन-सा किराया अधिकृत है और कौन-सा नहीं। सार्वजनिक स्थानों पर किराया सूची का अभाव भी भ्रम और विवाद की स्थिति पैदा करता है।

ऐसे में प्रशासन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि किराया बढ़ाना आवश्यक है, तो उसका आधार स्पष्ट होना चाहिए। जनता को बताया जाना चाहिए कि परिचालन लागत कितनी बढ़ी और किराया किस गणना के आधार पर तय किया गया।

पारदर्शिता ही समाधान का रास्ता

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि पेट्रोल, डीजल, सीएनजी और बैटरी चालित वाहनों की परिचालन लागत अलग-अलग होती है। इसलिए सभी श्रेणियों के वाहनों पर एक समान किराया वृद्धि लागू करना आर्थिक दृष्टि से उचित नहीं माना जा सकता।

जरूरत इस बात की है कि प्रत्येक श्रेणी के वाहन की वास्तविक लागत का अध्ययन किया जाए और उसी आधार पर किराया निर्धारित किया जाए।

यदि किराया निर्धारण की प्रक्रिया पारदर्शी होगी, तो यात्रियों और चालकों दोनों के बीच विश्वास बढ़ेगा तथा विवाद की स्थिति भी कम होगी।

निष्कर्ष: सवाल केवल तीन रुपये का नहीं, भरोसे का है

पटना की सड़कों पर दौड़ते ऑटो, टेंपू और ई-रिक्शा केवल परिवहन के साधन नहीं हैं। वे उस व्यवस्था का आईना भी हैं, जिसमें आम आदमी रोजाना महंगाई और बढ़ते खर्चों से जूझ रहा है।

जनता जानना चाहती है कि यदि किराया बढ़ा है तो उसका आधार क्या है? क्या यह वास्तविक लागत वृद्धि का परिणाम है या फिर एक सामूहिक निर्णय, जिसका बोझ सीधे यात्रियों पर डाला जा रहा है?

आखिरकार सवाल केवल तीन रुपये का नहीं है। सवाल पारदर्शिता, जवाबदेही और भरोसे का है। जब तक इन सवालों के स्पष्ट जवाब नहीं मिलते, तब तक पटना की सड़कों पर किराए को लेकर यह बहस जारी रहेगी और आम आदमी की जेब पर बढ़ता बोझ भी।

आलोक कुमार