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FCRA Amendment Bill 2026 | विदेशी फंड लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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मंगलवार, 11 अगस्त 2026

India : विदेशी फंड रुकने का डर कम, FCRA के तहत परिसंपत्ति जाने की चिंता ज्यादा?

 


विदेशी अंशदान पर सरकार की निगरानी जरूरी है, लेकिन असली सवाल यह है कि FCRA पंजीकरण खत्म होने की स्थिति में विदेशी योगदान से वर्षों में बनाई गई संपत्तियों का क्या होगा? कानून की सख्ती और संस्थाओं के अधिकारों के बीच संतुलन आखिर कैसे बनेगा?

विदेशी फंडिंग को लेकर प्रस्तावित **FCRA Amendment Bill, 2026** ने एक बार फिर भारत में चर्च, ईसाई संस्थाओं और गैर-सरकारी संगठनों के बीच बहस और चिंता को तेज कर दिया है। हालांकि इस पूरे विवाद को केवल विदेशी फंड मिलने या बंद होने के सवाल तक सीमित करके देखना शायद सही तस्वीर पेश नहीं करता। असली चिंता अब उन **परिसंपत्तियों** को लेकर सामने आ रही है, जिन्हें विदेशी अंशदान से वर्षों के दौरान बनाया गया है।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से कैथोलिक बिशप्स कॉन्फ्रेंस ऑफ इंडिया (CBCI) के प्रतिनिधिमंडल की मुलाकात के बाद इस बहस को एक नया आयाम मिला। 10 जुलाई को नई दिल्ली में हुई इस मुलाकात में सरकार की ओर से कथित तौर पर यह आश्वासन दिया गया कि प्रस्तावित कानून किसी धर्म विशेष को निशाना बनाने के उद्देश्य से नहीं लाया जा रहा है। सरकार का तर्क है कि विदेशी फंडिंग की व्यवस्था में पारदर्शिता, जवाबदेही और निगरानी को मजबूत करना आवश्यक है।

यह तर्क अपने आप में असंगत नहीं है। किसी भी संप्रभु देश के लिए यह जानना जरूरी है कि विदेश से आने वाला पैसा किस संस्था के पास पहुंच रहा है, उसका इस्तेमाल किन गतिविधियों में किया जा रहा है और क्या वह निर्धारित उद्देश्य के अनुरूप खर्च हो रहा है। विदेशी अंशदान के नाम पर कानून का उल्लंघन हो तो कार्रवाई भी होनी चाहिए।

लेकिन यहीं एक दूसरा और ज्यादा जटिल सवाल सामने आता है—'अगर विदेशी फंड मुख्य चिंता है, तो विदेशी फंड से बनी परिसंपत्तियां इतनी बड़ी चिंता क्यों बन रही हैं?'

परिसंपत्तियों पर क्यों बढ़ी चिंता?

चर्च और उससे जुड़े अनेक संस्थान भारत में दशकों से शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में काम कर रहे हैं। देश के विभिन्न हिस्सों में मिशनरी संस्थाओं द्वारा स्कूल, अस्पताल, छात्रावास, प्रशिक्षण केंद्र और सामाजिक सेवा संस्थान संचालित किए जाते हैं। इनमें से कुछ संस्थाओं ने अपने काम के लिए विदेशी अंशदान का भी इस्तेमाल किया है।

अब यदि किसी संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है या उसका नवीनीकरण नहीं होता, तो विदेशी योगदान से बनाई गई संपत्तियों की कानूनी स्थिति क्या होगी? क्या संस्था उन परिसंपत्तियों का उपयोग पहले की तरह कर पाएगी? क्या उनके प्रबंधन पर कोई विशेष नियंत्रण होगा? क्या किसी दूसरी संस्था को उनका हस्तांतरण किया जा सकता है? और सबसे महत्वपूर्ण, ऐसी कार्रवाई के खिलाफ संस्था को प्रभावी कानूनी उपाय किस स्तर पर उपलब्ध होंगे?

ये सवाल केवल ईसाई संस्थाओं के नहीं हैं। भारत में अनेक गैर-सरकारी संगठन विदेशी अंशदान के माध्यम से सामाजिक क्षेत्र में काम करते हैं। इसलिए यदि कानून में परिसंपत्तियों से संबंधित कोई बड़ा बदलाव प्रस्तावित है, तो उसकी स्पष्टता सभी संगठनों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण होगी।

सरकार की जिम्मेदारी भी कम नहीं

सरकार का यह अधिकार है कि वह विदेशी धन के प्रवाह को नियंत्रित करे। विदेशी फंड का इस्तेमाल देश की सुरक्षा, संप्रभुता या कानून के विरुद्ध न हो, यह सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है। इसी तरह किसी संस्था को प्राप्त धन का हिसाब-किताब भी पारदर्शी होना चाहिए।

लेकिन कानून की सख्ती और प्रशासनिक कार्रवाई के बीच 'न्यायिक तथा प्रक्रियात्मक संतुलन' बेहद जरूरी है।

यदि किसी संस्था का पंजीकरण रद्द किया जाता है, तो उसके पीछे स्पष्ट कारण हों। संस्था को अपना पक्ष रखने का पर्याप्त अवसर मिले। निर्णय पारदर्शी हो और अपील या न्यायिक समीक्षा का प्रभावी रास्ता उपलब्ध रहे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि समान परिस्थितियों में अलग-अलग संस्थाओं के साथ अलग व्यवहार न हो।

कानून का उद्देश्य विदेशी फंडिंग को नियंत्रित करना होना चाहिए, न कि किसी धार्मिक या वैचारिक पहचान को निशाना बनाना।

पिछली तारीख से लागू न करने का आश्वासन

बैठक के संदर्भ में यह भी सामने आया कि प्रस्तावित बदलावों को पिछली तारीख से लागू नहीं किया जाएगा। यदि यह बात औपचारिक रूप से कानून में स्पष्ट होती है, तो इससे पुरानी परिसंपत्तियों और पुराने मामलों को लेकर पैदा होने वाली कई आशंकाओं को कम किया जा सकता है।

अमित शाह ने कथित तौर पर CBCI से उन एनजीओ की जानकारी भी मांगी, जिनके FCRA पंजीकरण को संगठन अनुचित तरीके से रद्द या निलंबित किए जाने का दावा करते हैं।

यदि ऐसे मामलों की वास्तविक जांच होती है और जहां प्रशासनिक स्तर पर गलती हुई है, वहां सुधार किया जाता है, तो यह सरकार और धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं के बीच विश्वास बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

मणिपुर का मुद्दा भी महत्वपूर्ण

बैठक में मणिपुर की स्थिति पर भी चर्चा हुई। अमित शाह ने कथित तौर पर वहां की स्थिति को साम्प्रदायिक संघर्ष के बजाय जातीय संघर्ष के रूप में देखने की बात कही और चर्च नेतृत्व से शांति स्थापित करने में सहयोग की अपील की।

साथ ही ईसाई समुदाय के खिलाफ कथित आक्रामक घटनाओं की शिकायत पुलिस में दर्ज कराने और शिकायत दर्ज न होने की स्थिति में गृह मंत्रालय तक मामला पहुंचाने की बात कही गई।

यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी भी समुदाय में सुरक्षा को लेकर भय पैदा होने पर केवल राजनीतिक बयान पर्याप्त नहीं होते। शिकायतों की निष्पक्ष जांच और दोषियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई ही विश्वास बहाल कर सकती है।

सवाल सिर्फ चर्च का नहीं

FCRA पर बहस को केवल सरकार बनाम चर्च के रूप में देखना समस्या को छोटा कर देगा। यह भारत में 'नागरिक समाज, धार्मिक संस्थाओं, गैर-सरकारी संगठनों और सरकार के बीच संबंधों' से जुड़ा व्यापक प्रश्न है।

एक तरफ विदेशी धन की निगरानी और पारदर्शिता जरूरी है। दूसरी तरफ उन संस्थाओं को भी यह अधिकार है कि उनके खिलाफ कार्रवाई कानून की स्पष्ट प्रक्रिया के तहत हो।

ईसाई संस्थाओं और अन्य एनजीओ की भी जिम्मेदारी है कि वे विदेशी योगदान से प्राप्त प्रत्येक राशि का पारदर्शी हिसाब रखें। विदेशी धन से बनाई गई संपत्तियों का रिकॉर्ड, स्वामित्व, उपयोग और वित्तीय स्रोत स्पष्ट होना चाहिए। पारदर्शिता केवल सरकार से मांगने की चीज नहीं है; संस्थाओं को भी इसे अपने काम का हिस्सा बनाना होगा।

दूसरी ओर सरकार को यह भरोसा पैदा करना होगा कि FCRA किसी संस्था की धार्मिक पहचान के आधार पर लागू नहीं किया जा रहा है। नियम सभी के लिए एक जैसे हों और कार्रवाई भी समान मानकों पर हो।

संतुलन ही रास्ता है

आखिरकार FCRA की बहस का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह नहीं होना चाहिए कि सरकार जीतेगी या चर्च। सवाल यह होना चाहिए कि 'भारत में विदेशी अंशदान की व्यवस्था कितनी पारदर्शी, जवाबदेह और न्यायपूर्ण बनेगी।'

विदेशी फंडिंग पर नियंत्रण होना चाहिए, लेकिन नियम स्पष्ट होने चाहिए। उल्लंघन पर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन कार्रवाई निष्पक्ष होनी चाहिए। FCRA पंजीकरण रद्द किया जाए तो उसके परिणामों की कानूनी स्थिति साफ होनी चाहिए। और विदेशी अंशदान से वर्षों में बनाई गई परिसंपत्तियों को लेकर किसी भी नए प्रावधान में अधिकार, प्रक्रिया और अपील की व्यवस्था पूरी तरह स्पष्ट होनी चाहिए।

सरकार और धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं के बीच संवाद इस दिशा में सबसे बेहतर रास्ता हो सकता है। यदि सरकार पारदर्शिता और राष्ट्रीय हित को केंद्र में रखे और संस्थाएं जवाबदेही तथा कानून के पालन को प्राथमिकता दें, तो टकराव की जगह सहयोग का रास्ता खुल सकता है।

'क्योंकि विदेशी फंड का हिसाब जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है कानून का हिसाब—किस पर लागू हुआ, कैसे लागू हुआ और उसके परिणामों में न्याय कितना था।'


आलोक कुमार