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India : क्या हमारी राजनीति ऐसी भाषा और ऐसी बहस को बढ़ावा दे रही है ?

 


‘राहुल मियां’: शब्द का अर्थ बड़ा या राजनीति की नीयत?

राजनीति में कभी-कभी एक छोटा-सा शब्द भी बड़ी बहस खड़ी कर देता है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन द्वारा राहुल गांधी के लिए इस्तेमाल किए गए संबोधन “राहुल मियां” को लेकर ऐसी ही चर्चा सामने आई है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि ‘मियां’ शब्द का अर्थ क्या है। असली सवाल यह है कि सार्वजनिक राजनीति में किसी शब्द का इस्तेमाल किस संदर्भ में, किस लहजे में और किस उद्देश्य से किया गया।

राजनीति में नेताओं के बयान केवल व्यक्तिगत बातचीत का हिस्सा नहीं होते। सार्वजनिक मंच से कही गई हर बात हजारों-लाखों लोगों तक पहुंचती है और उसका राजनीतिक अर्थ निकाला जाता है। इसलिए किसी नेता के संबोधन और भाषा को उसके संदर्भ से अलग करके देखना हमेशा सही नहीं होता।

‘मियां’ शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है?

सबसे पहले यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ‘मियां’ अपने आप में कोई गाली या अपशब्द नहीं है।

भारतीय भाषाई और सामाजिक व्यवहार में ‘मियां’ शब्द के कई अर्थ और प्रयोग रहे हैं। उर्दू और हिंदी के अलग-अलग संदर्भों में इसका इस्तेमाल पुरुष के संबोधन, पति या किसी व्यक्ति के लिए आत्मीय अथवा सम्मानसूचक तरीके से भी हुआ है।

इसलिए केवल शब्द देखकर यह निष्कर्ष निकाल देना कि उसका इस्तेमाल अनिवार्य रूप से अपमानजनक या सांप्रदायिक था, उचित नहीं होगा।

लेकिन दूसरी ओर यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि शब्द का शब्दकोशीय अर्थ और राजनीतिक संदर्भ हमेशा एक जैसा नहीं होता।

किसी शब्द का अर्थ उसके आसपास बोले गए शब्दों, वक्ता के लहजे और पूरे राजनीतिक संदर्भ से भी प्रभावित होता है।

विवाद शब्द से ज्यादा संदर्भ का है

अगर “राहुल मियां” सामान्य बोलचाल या आत्मीय संबोधन के तौर पर कहा गया था, तो केवल इस संबोधन को अपने आप में आपत्तिजनक मानना कठिन होगा।

लेकिन यदि किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को संबोधित करते समय यही शब्द उसकी धार्मिक पहचान की ओर संकेत करने, उसका मजाक उड़ाने या किसी समुदाय से जोड़कर राजनीतिक संदेश देने के लिए इस्तेमाल किया गया हो, तो मामला अलग हो जाता है।

यही वजह है कि ऐसे मामलों में केवल एक शब्द को अलग करके देखने के बजाय पूरा बयान और उसका संदर्भ देखना जरूरी है।

राजनीतिक भाषा की असली परीक्षा यहीं होती है।

क्या राजनीति में व्यक्तिगत संबोधन जरूरी है?

भारतीय राजनीति में नेताओं द्वारा एक-दूसरे के लिए अलग-अलग उपनाम, संबोधन और व्यंग्यात्मक शब्द इस्तेमाल करने की परंपरा नई नहीं है।

कई बार ऐसे संबोधन राजनीतिक हास्य का हिस्सा होते हैं। कभी वे समर्थकों के बीच लोकप्रिय हो जाते हैं और कभी विवाद पैदा करते हैं।

समस्या तब पैदा होती है जब राजनीतिक बहस नीतियों और विचारों से हटकर व्यक्ति की पहचान, परिवार, धर्म, जाति या निजी जीवन की तरफ जाने लगे।

लोकतंत्र में किसी नेता की आलोचना करना पूरी तरह स्वाभाविक है। लेकिन आलोचना का स्तर यह तय करता है कि राजनीतिक बहस कितनी स्वस्थ है।

राहुल गांधी की आलोचना मुद्दों पर क्यों नहीं?

राहुल गांधी की राजनीति, कांग्रेस की नीतियों, उनके भाषणों और राजनीतिक रणनीति की आलोचना की जा सकती है। उनके बयानों पर सवाल उठाए जा सकते हैं। उनकी नीतिगत सोच से असहमति जताई जा सकती है।

इसी तरह भाजपा और उसके नेताओं की आलोचना भी विपक्ष कर सकता है।

लेकिन बेहतर राजनीतिक बहस वही होगी जिसमें सवाल यह हो कि किसकी नीति बेहतर है, किसका तर्क मजबूत है और जनता के लिए कौन-सा रास्ता अधिक उपयोगी है।

अगर बहस का केंद्र किसी नेता को किस नाम से बुलाया गया, यह बन जाए तो मूल राजनीतिक मुद्दा पीछे छूट सकता है।

नितिन नवीन जैसे युवा नेता से उम्मीद

नितिन नवीन बिहार की राजनीति से राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी तक पहुंचे हैं। ऐसे में उनके सार्वजनिक बयानों पर स्वाभाविक रूप से अधिक ध्यान जाता है।

युवा नेताओं से यह उम्मीद की जाती है कि वे राजनीति में नई भाषा और नई बहस लेकर आएं।

राजनीतिक विरोध होना लोकतंत्र की जरूरत है। तीखी आलोचना भी लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है। लेकिन तीखी आलोचना और व्यक्तिगत कटाक्ष के बीच एक सीमा होती है।

किसी नेता की राजनीतिक कमजोरी बताने के लिए मजबूत तर्क और तथ्य अधिक प्रभावी होते हैं। इससे जनता को भी यह समझने का अवसर मिलता है कि दोनों पक्षों के विचारों में वास्तविक अंतर क्या है।

क्या ‘मियां’ को धार्मिक पहचान से जोड़ना उचित है?

यहां सावधानी जरूरी है।

‘मियां’ शब्द का प्रयोग केवल मुसलमानों के लिए होता है, ऐसा कहना भाषाई दृष्टि से सही नहीं है। इसके कई सामाजिक और भाषाई प्रयोग हैं।

लेकिन भारत जैसे विविध समाज में शब्दों के सांस्कृतिक अर्थ भी होते हैं। इसलिए सार्वजनिक मंच पर किसी शब्द का इस्तेमाल करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि उसे अलग-अलग समुदाय और राजनीतिक समर्थक किस तरह समझ सकते हैं।

यही सार्वजनिक भाषा की जिम्मेदारी है।

किसी शब्द का इस्तेमाल कानूनी या शब्दकोशीय रूप से गलत न हो, फिर भी उसका राजनीतिक प्रभाव विवाद पैदा कर सकता है। इसलिए नेताओं को केवल यह नहीं देखना चाहिए कि “मैंने जो कहा उसका शाब्दिक अर्थ क्या है”, बल्कि यह भी सोचना चाहिए कि जनता तक उसका संदेश किस रूप में पहुंच रहा है।

समान कसौटी सभी नेताओं पर लागू हो

राजनीतिक भाषा को लेकर सबसे जरूरी बात है—दोहरा मापदंड नहीं होना चाहिए।

अगर किसी नेता के संबोधन को इसलिए गलत माना जाता है कि उसमें किसी की पहचान को लेकर संकेत है, तो यही कसौटी दूसरे राजनीतिक दलों और नेताओं पर भी लागू होनी चाहिए।

सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, राष्ट्रीय नेता हो या स्थानीय नेता—सार्वजनिक भाषा के लिए एक समान मर्यादा होनी चाहिए।

राजनीति में आलोचना के अधिकार की रक्षा तभी संभव है जब राजनीतिक दल अपने लिए और विरोधियों के लिए समान मानक स्वीकार करें।

जनता को भी संदर्भ देखना चाहिए

सोशल मीडिया के दौर में किसी नेता के बयान का केवल कुछ सेकंड का वीडियो तेजी से फैल सकता है। कई बार पूरा संदर्भ सामने नहीं आता और एक शब्द ही बहस का केंद्र बन जाता है।

इसलिए किसी राजनीतिक बयान पर राय बनाने से पहले पूरा बयान, उसका संदर्भ और वक्ता का आशय देखना अधिक उचित है।

लोकतंत्र में नागरिकों की जिम्मेदारी केवल नेताओं से सवाल पूछना नहीं, बल्कि राजनीतिक दावों को समझदारी से परखना भी है।

असली बहस कैसी होनी चाहिए?

भारत जैसे लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के बीच तीखी प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है। लेकिन जनता के सामने असली सवाल रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, कृषि, बुनियादी सुविधाओं, कानून-व्यवस्था और विकास जैसे मुद्दों के हैं।

किस नेता ने क्या कहा, यह चर्चा का हिस्सा हो सकता है, लेकिन राजनीति का मुख्य केंद्र नहीं बनना चाहिए।

“राहुल मियां” संबोधन पर विवाद ने कम से कम इतना सवाल जरूर खड़ा किया है कि क्या हमारी राजनीतिक भाषा मुद्दों की बहस को मजबूत कर रही है या उसे व्यक्तिगत और पहचान आधारित बहस की ओर ले जा रही है?

इसका जवाब राजनीतिक दलों के साथ-साथ जनता को भी देना होगा।

अंततः “मियां” शब्द का शब्दकोशीय अर्थ अपने आप में विवाद का पूरा जवाब नहीं देता। असली प्रश्न उसका संदर्भ, लहजा और राजनीतिक उद्देश्य है।

लोकतंत्र में विरोधी को हराने का सबसे मजबूत हथियार व्यक्तिगत संबोधन नहीं, बल्कि तथ्य, तर्क, नीति और बेहतर काम होना चाहिए।

नेता बदलेंगे, राजनीतिक दल बदलेंगे और चुनाव आते-जाते रहेंगे। लेकिन सार्वजनिक भाषा का स्तर लोकतंत्र की राजनीतिक संस्कृति पर लंबे समय तक असर डालता है।

इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि “राहुल मियां” कहना सही था या गलत?

बड़ा सवाल यह है—क्या हमारी राजनीति ऐसी भाषा और ऐसी बहस को बढ़ावा दे रही है जिसमें व्यक्ति से ज्यादा विचार, पहचान से ज्यादा नीति और कटाक्ष से ज्यादा तथ्य महत्वपूर्ण हों?

यही लोकतांत्रिक राजनीति की असली कसौटी होनी चाहिए।

‘राहुल मियां’ संबोधन पर उठे विवाद में शब्द के अर्थ से ज्यादा उसके संदर्भ और राजनीतिक नीयत को समझना क्यों जरूरी है? जानिए राजनीतिक भाषा, मर्यादा और लोकतांत्रिक बहस का महत्व।

आलोक कुमार

India : असली आजादी 2014 में मिली तो अटल बिहारी वाजपेयी का दौर क्या था?

 


असली आजादी 2014 में मिली तो अटल बिहारी वाजपेयी का दौर क्या था?

 आजादी की तारीख इतिहास तय करता है, राजनीति नहीं। अगर 2014 से पहले का भारत “असली आजाद” नहीं था, तो अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 1998 से 2004 तक चली भाजपा सरकार को किस रूप में देखा जाएगा?

भारत को 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता मिली। यह स्वतंत्रता किसी एक राजनीतिक दल, नेता या सरकार की देन नहीं थी, बल्कि स्वतंत्रता आंदोलन के लंबे संघर्ष, असंख्य बलिदानों और करोड़ों भारतीयों की आकांक्षाओं का परिणाम थी। इसके बाद देश ने लोकतांत्रिक संविधान अपनाया, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव कराए और सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण की लोकतांत्रिक परंपरा विकसित की।

ऐसे में जब यह कहा जाता है कि भारत को “असली आजादी” 2014 के बाद मिली, तो यह इतिहास का तथ्य कम और राजनीतिक व्याख्या अधिक बन जाता है।

भाजपा सांसद कंगना रनौत के 2014 के बाद “असली आजादी” मिलने संबंधी पुराने बयान को लेकर भी इसी कारण बहस होती रही है। 2014 के बाद भारत में क्या बदला, इस पर खुलकर चर्चा हो सकती है। सरकार की उपलब्धियों, नीतियों, आर्थिक फैसलों, राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक बदलावों का मूल्यांकन भी लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या 1947 से 2014 तक की भारत की पूरी लोकतांत्रिक यात्रा को ही कमतर करके 2014 को एक निर्णायक शुरुआत के रूप में पेश किया जाना चाहिए?

यहीं भाजपा के अपने इतिहास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है—अटल बिहारी वाजपेयी का दौर।

अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के सबसे बड़े और सम्मानित नेताओं में रहे। वे 1996 में थोड़े समय के लिए प्रधानमंत्री बने और फिर 1998 से 2004 तक प्रधानमंत्री के रूप में देश का नेतृत्व किया। उस समय भी भारत वही लोकतांत्रिक गणराज्य था, जिसकी नींव 1947 की स्वतंत्रता और 1950 के संविधान के बाद मजबूत हुई थी।

तो यदि 2014 से पहले का भारत “असली आजाद” भारत नहीं था, तो 1998 से 2004 के बीच का भारत क्या था?

क्या उस समय भारतीय नागरिकों को मतदान का अधिकार नहीं था?

क्या देश में लोकतांत्रिक चुनाव नहीं होते थे?

क्या संसद अस्तित्व में नहीं थी?

क्या सरकार जनता के जनादेश से नहीं बनी थी?

और क्या भाजपा स्वयं उस लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा नहीं थी?

इन सवालों का उत्तर स्वाभाविक रूप से हाँ है—भारत तब भी एक संप्रभु, लोकतांत्रिक गणराज्य था। जनता सरकार चुनती थी, सरकारें बदलती थीं और संविधान देश के शासन का आधार था।

वाजपेयी का दौर भाजपा की राजनीतिक विरासत का महत्वपूर्ण अध्याय है। उनके नेतृत्व में भारत ने कई महत्वपूर्ण घटनाओं और चुनौतियों का सामना किया। पोखरण-II परमाणु परीक्षणों के बाद भारत की रणनीतिक स्थिति पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक चर्चा हुई। 1999 का कारगिल युद्ध भी उनके प्रधानमंत्री कार्यकाल की बड़ी घटनाओं में शामिल रहा। उसी दौर में राष्ट्रीय राजमार्ग विकास, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और संचार क्षेत्र में विस्तार जैसे मुद्दे भी राजनीतिक चर्चा के केंद्र में रहे।

इसलिए 2014 को भारतीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण सत्ता परिवर्तन मानना बिल्कुल उचित है, लेकिन उसे भारत की आजादी का दूसरा जन्म बताना ऐतिहासिक दृष्टि से अलग तरह का दावा है।

2014 एक राजनीतिक परिवर्तन का वर्ष है; 1947 एक राष्ट्रीय स्वतंत्रता का वर्ष।

दोनों घटनाओं का महत्व अलग है।

यही अंतर लोकतांत्रिक विमर्श को स्वस्थ बनाता है। किसी सरकार की उपलब्धियों को रेखांकित करने के लिए देश के पिछले 67 वर्षों को असफल या अधूरा बताना आवश्यक नहीं है। इसी तरह 2014 से पहले की सरकारों की उपलब्धियों को स्वीकार करने का अर्थ यह नहीं है कि 2014 के बाद हुए बदलावों से असहमति नहीं हो सकती।

भारत की कहानी किसी एक सरकार से शुरू नहीं होती और किसी एक सरकार पर खत्म भी नहीं होती।

कांग्रेस के शासन में देश ने कई संस्थाएं और नीतियां विकसित कीं। जनता पार्टी के दौर में सत्ता परिवर्तन की लोकतांत्रिक क्षमता सामने आई। भाजपा के नेतृत्व वाली वाजपेयी सरकार ने अपनी अलग राजनीतिक और आर्थिक पहचान बनाई। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकारों ने आर्थिक नीति, अधिकार आधारित कानूनों और विभिन्न सामाजिक योजनाओं के माध्यम से अपनी छाप छोड़ी। 2014 के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भी अनेक नीतिगत और राजनीतिक बदलाव हुए।

इन सभी चरणों को जोड़कर ही आधुनिक भारत की तस्वीर बनती है।

देश की आजादी किसी एक पार्टी की संपत्ति नहीं है।

15 अगस्त 1947 का महत्व इसलिए नहीं है कि उस दिन कोई एक सरकार सत्ता में आई थी। उसका महत्व इसलिए है कि सदियों की गुलामी और औपनिवेशिक शासन के बाद भारत ने अपने भविष्य का फैसला स्वयं करने का अधिकार हासिल किया था।

इसी तरह 2014 का महत्व इसलिए है कि उस वर्ष केंद्र में सत्ता का एक बड़ा राजनीतिक परिवर्तन हुआ। लेकिन सत्ता परिवर्तन और स्वतंत्रता प्राप्ति को समान अर्थ देना इतिहास और राजनीति के बीच की सीमा को धुंधला कर सकता है।

भाजपा यदि 2014 के बाद की उपलब्धियों पर गर्व करती है, तो उसे पूरा अधिकार है। लेकिन उसी राजनीतिक विरासत का हिस्सा होने के कारण उसे अटल बिहारी वाजपेयी के दौर पर भी गर्व होना चाहिए।

क्योंकि यदि वाजपेयी का शासन भाजपा की लोकतांत्रिक विरासत का गौरवपूर्ण अध्याय है, तो यह स्वीकार करना भी जरूरी है कि 2014 से पहले का भारत गुलाम भारत नहीं था।

वह वही भारत था जिसने संविधान को स्वीकार किया, चुनावों की लंबी परंपरा बनाई, सत्ता परिवर्तन देखे, युद्ध झेले, आर्थिक संकटों से निकला, विज्ञान और तकनीक में आगे बढ़ा और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में अपनी पहचान कायम की।

इसलिए बहस यह नहीं होनी चाहिए कि “असली आजादी” किस सरकार के समय मिली।

बहस यह होनी चाहिए कि आजादी मिलने के बाद भारत को और अधिक स्वतंत्र, समान, सुरक्षित, समृद्ध और लोकतांत्रिक बनाने के लिए किस सरकार ने क्या किया।

क्योंकि किसी पुराने दौर को छोटा करके किसी नए दौर की उपलब्धि बड़ी नहीं होती।

लोकतंत्र की असली ताकत यही है कि हर सरकार अपने काम से इतिहास में जगह बनाए—इतिहास को अपनी सुविधा के अनुसार दोबारा परिभाषित करके नहीं।


आलोक कुमार


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