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शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

Bihar : कोशी हर साल रास्ता बदलती है, क्या सरकार अब समाधान का रास्ता बदलेगी?

 

कोशी हर साल रास्ता बदलती है, क्या सरकार अब समाधान का रास्ता बदलेगी?

 हर साल कोशी आती है, घर बहाती है, खेत निगलती है और हजारों लोगों को बेघर कर जाती है। फिर राहत की नाव आती है, कुछ दिनों का राशन मिलता है और सरकारी फाइलों में बाढ़ की कहानी बंद हो जाती है। लेकिन कोशी तटबंध के भीतर रहने वाले लोगों की जिंदगी में यह कहानी कभी खत्म नहीं होती। सवाल यही है—आखिर कब तक कोशी के नाम पर पीढ़ियां विस्थापन, कटाव, मुआवजे की प्रतीक्षा और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जीती रहेंगी?

कोशी नदी को बिहार की त्रासदी और जीवनदायिनी नदी—दोनों रूपों में देखा जाता है। इसकी धाराएं खेतों को उपजाऊ बनाती हैं, लेकिन जब नदी उफनती है तो वही पानी घर, खेत, सड़क और जीवन की पूरी व्यवस्था को तहस-नहस कर देता है। खासकर तटबंध के भीतर रहने वाले परिवारों के लिए बाढ़ कोई कभी-कभार आने वाली प्राकृतिक आपदा नहीं है। यह उनके जीवन का स्थायी संकट बन चुकी है।

इसी लंबे संकट को कोशी नव निर्माण मंच (KNM) ने 20 अगस्त 2026 को जिला अधिकारी, सुपौल को सौंपे ज्ञापन के माध्यम से सामने रखा। ज्ञापन में बाढ़ और कटाव से प्रभावित लोगों के पुनर्वास, मुआवजे, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, राजस्व व्यवस्था और कोशी समस्या के स्थायी समाधान से जुड़ी 10 प्रमुख मांगें रखी गई हैं। इन मांगों को केवल प्रशासनिक मांगों की सूची मानना इस समस्या की गंभीरता को कम करके देखना होगा। यह उन परिवारों की पीड़ा का दस्तावेज है, जिनके लिए हर साल बाढ़ के साथ एक नया संघर्ष शुरू होता है।

पुनर्वास सबसे बड़ा सवाल

ज्ञापन में बेला गोठ, बगहा, पंचगछिया, खोखनहा, ढोली, सियानी और पिपराही जैसे गांवों के कटाव पीड़ितों को तत्काल सरकारी जमीन या निर्धारित पुनर्वास स्थल पर बसाने की मांग की गई है। वहीं पिछले वर्ष लालगंज, तेलवा, दुबियाही और घोधररिया सहित प्रभावित इलाकों के लोगों को आपदा विभाग के मानकों के अनुरूप गृह-क्षति का बकाया भुगतान देने की मांग भी उठाई गई है।

दरअसल, बाढ़ के बाद सबसे बड़ी समस्या सिर्फ घर टूटना नहीं होती। घर टूटने के साथ परिवार की सामाजिक और आर्थिक सुरक्षा भी टूट जाती है। दस्तावेज, रोजगार, बच्चों की पढ़ाई, पशुधन और भविष्य की योजनाएं—सब कुछ प्रभावित होता है। ऐसे में मुआवजे के लिए महीनों या वर्षों तक सरकारी कार्यालयों के चक्कर लगाना पीड़ित परिवारों के संकट को और बढ़ाता है।

तटबंध के भीतर का पानी भी बाढ़ है

ज्ञापन की एक महत्वपूर्ण मांग यह है कि तटबंध के भीतर आए पानी को भी बाढ़ मानते हुए आपदा प्रबंधन विभाग की मानक संचालन प्रक्रिया यानी SOP के अनुसार राहत उपलब्ध कराई जाए।

यह सवाल प्रशासनिक परिभाषा से अधिक मानवीय है। पानी जब किसी परिवार के घर में घुसता है, खेत को डुबोता है, पशुओं को प्रभावित करता है और रोजमर्रा की जिंदगी रोक देता है, तो उस परिवार के लिए वह बाढ़ ही है। राहत का आधार सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि पानी किस प्रशासनिक सीमा या तकनीकी श्रेणी में आता है।

जमीन मिले, लेकिन वास्तविक पीड़ितों को

मंच ने तटबंध के बीच और कटाव के बाद बेघर हुए लोगों का व्यापक सर्वेक्षण कराने की मांग की है। साथ ही पुनर्वास स्थलों पर हुए कथित कब्जों को हटाकर वास्तविक पीड़ितों को जमीन उपलब्ध कराने की बात कही गई है।

यहां सरकार के सामने दोहरी जिम्मेदारी है। एक तरफ पुनर्वास के लिए जमीन उपलब्ध कराना, दूसरी तरफ यह सुनिश्चित करना कि उसका लाभ उन्हीं परिवारों तक पहुंचे जिन्होंने बाढ़ और कटाव में अपना घर खोया है। यदि पुनर्वास की जमीन ही वास्तविक पीड़ितों तक नहीं पहुंचेगी तो पूरी नीति सवालों के घेरे में आ जाएगी।

बाढ़ में चापाकल और शौचालय भी जीवनरक्षक हैं

तटबंध के भीतर ऊंचे टीलों पर सुरक्षित शरणस्थल, चापाकल, शौचालय, रोशनी और सामुदायिक रसोई की मांग भी महत्वपूर्ण है। बाढ़ के समय ये सुविधाएं सामान्य विकास योजनाओं का हिस्सा नहीं, बल्कि जीवन बचाने वाली व्यवस्थाएं बन जाती हैं।

इसी तरह अनुबंधित नावों की सूची सार्वजनिक करने की मांग प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़ी है। बाढ़ के समय नाव ही कई परिवारों के लिए अस्पताल, बाजार, स्कूल और सुरक्षित स्थान तक पहुंचने का एकमात्र माध्यम बन जाती है। इसलिए नावों की संख्या, संचालन और उपलब्धता की जानकारी सार्वजनिक होना जरूरी है।

बच्चों का भविष्य भी बचाना होगा

तटबंध के भीतर स्कूल, आंगनवाड़ी केंद्र, उप स्वास्थ्य केंद्र और निःशुल्क कोशी छात्रावास खोलने की मांग बताती है कि कोशी संकट सिर्फ आज के विस्थापन का मुद्दा नहीं है। यह आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल भी है।

लगातार बाढ़ और विस्थापन के बीच बच्चों की पढ़ाई बाधित होती है। स्वास्थ्य सेवाओं की कमी से महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को विशेष परेशानी होती है। यदि किसी इलाके में वर्षों तक बुनियादी संस्थान नहीं पहुंचते, तो वहां गरीबी और पिछड़ापन पीढ़ी-दर-पीढ़ी कायम रह सकता है।

राजस्व और जमीन के अधिकार का प्रश्न

ज्ञापन में चार हेक्टेयर तक लगान माफी के बावजूद कथित वसूली पर रोक और वसूली गई राशि वापस करने की मांग की गई है। इसके साथ तटबंध के भीतर की जमीन का लगान और सेस माफ करने तथा नदी में समाहित जमीनों को सर्वे में रैयतों के नाम पर दर्ज रखने की मांग भी की गई है।

नदी का कटाव किसी परिवार की जमीन छीन सकता है, लेकिन क्या उसके साथ उसका कानूनी और सामाजिक अधिकार भी खत्म हो जाना चाहिए? यही सवाल इस मांग के केंद्र में है।

बिना पुनर्वास के विस्थापन नहीं

ज्ञापन की एक मानवीय मांग यह भी है कि तटबंध या स्पर पर बसे बाढ़ पीड़ितों को बिना पुनर्वास के वहां से न हटाया जाए। प्रशासन को अवैध कब्जे और मजबूरी में बसे विस्थापित परिवारों के बीच अंतर करना होगा।

किसी परिवार को हटाना प्रशासनिक कार्रवाई हो सकती है, लेकिन उसे सुरक्षित और सम्मानजनक स्थान देना प्रशासन की वास्तविक जिम्मेदारी है।

प्रधानमंत्री आवास योजना से जुड़ी मांग भी इसी सोच को आगे बढ़ाती है। जो परिवार तटबंध से बाहर जमीन खरीद चुके हैं, उन्हें वहां घर बनाने का अवसर मिलना चाहिए। पुनर्वास का उद्देश्य लोगों को फिर से असुरक्षित परिस्थितियों में धकेलना नहीं, बल्कि सुरक्षित जीवन देना होना चाहिए।

कोशी का स्थायी समाधान कब?

सबसे बड़ा सवाल फिर भी कोशी के स्थायी समाधान का है। सभी छाड़न धाराओं का सर्वे कर उन्हें पुनर्जीवित करने और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ स्थानीय लोकज्ञान को जोड़ने की मांग इसी दिशा में महत्वपूर्ण संकेत देती है।

कोशी को केवल बांध, तटबंध और राहत की समस्या मानकर समाधान नहीं निकाला जा सकता। नदी का स्वभाव, उसकी धाराएं, गाद, भूगोल और सदियों से नदी के साथ जी रहे लोगों का अनुभव—इन सभी को नीति निर्माण में शामिल करना होगा।

अब सरकार के सामने विकल्प साफ है—हर साल बाढ़ आने का इंतजार कर राहत बांटी जाए या कोशी के भीतर रहने वाले लोगों के भविष्य का स्थायी समाधान खोजा जाए।

कोशी नव निर्माण मंच का ज्ञापन सरकार के लिए सिर्फ दस मांगों का कागज नहीं होना चाहिए। यह कोशी क्षेत्र की नीति को राहत-केंद्रित व्यवस्था से अधिकार, पुनर्वास और स्थायी विकास की दिशा में बदलने का अवसर हो सकता है।

बाढ़ के बाद नाव भेज देना प्रशासनिक कार्रवाई है, लेकिन बाढ़ से पहले सुरक्षित घर, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र, सड़क और सम्मानजनक जीवन उपलब्ध कराना सुशासन की असली पहचान है।

कोशी हर साल अपना रास्ता खोजती है। अब सरकार को भी कोशी पीड़ितों के लिए स्थायी समाधान का रास्ता खोजना होगा।

आलोक कुमार