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शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

India :विदेशी फंड पाने वाले NGOs पर सरकार की कड़ी निगरानी की तैयारी


विदेशी फंड पर सरकार की सबसे बड़ी सर्जिकल निगरानी! FCRA में प्रस्तावित नए बदलाव क्या NGOs की पारदर्शिता बढ़ाएंगे या उनकी स्वतंत्रता पर नए सवाल खड़े करेंगे? संसद में पेश होने वाला संशोधन विधेयक इसी बहस का केंद्र बनने जा रहा है।

नई दिल्ली। केंद्र सरकार विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) में व्यापक संशोधन करने की तैयारी में है। प्रस्तावित विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक सोमवार को लोकसभा में पेश किया जा सकता है। सरकार का दावा है कि इस विधेयक का उद्देश्य विदेशी फंड प्राप्त करने वाले गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) की कार्यप्रणाली को अधिक पारदर्शी बनाना, जवाबदेही बढ़ाना और विदेशी धन के उपयोग पर प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करना है। वहीं, नागरिक समाज के कई संगठनों का मानना है कि नए प्रावधानों से स्वैच्छिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और सामाजिक कार्यों पर अतिरिक्त प्रशासनिक दबाव बढ़ सकता है।

भारत में हजारों गैर-सरकारी संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, बाल अधिकार, पर्यावरण संरक्षण, आपदा राहत और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों में कार्य करते हैं। इनमें से अनेक संस्थाएं विदेशी दान या अनुदान के माध्यम से अपने कार्यक्रम संचालित करती हैं। ऐसे में FCRA कानून इन संस्थाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि विदेशी अंशदान प्राप्त करने और उसके उपयोग का पूरा ढांचा इसी कानून के तहत संचालित होता है।

केंद्रीय प्राधिकरण करेगा संपत्तियों का प्रबंधन

प्रस्तावित संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान यह है कि केंद्र सरकार एक नामित केंद्रीय प्राधिकरण का गठन करेगी। यदि किसी संस्था का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है, समाप्त हो जाता है या नवीनीकृत नहीं होता, तो विदेशी अंशदान से खरीदी गई उसकी संपत्तियों का प्रबंधन यही प्राधिकरण करेगा।

सिर्फ प्रबंधन ही नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर यह प्राधिकरण उन परिसंपत्तियों को बेचने का अधिकार भी रखेगा। सरकार का तर्क है कि इससे विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियों का दुरुपयोग रोका जा सकेगा और उनका उपयोग सार्वजनिक हित के अनुरूप सुनिश्चित किया जाएगा।

विदेशी अनुदान के उपयोग की तय होगी समय-सीमा

विधेयक में यह भी प्रस्तावित किया गया है कि विदेशी फंड के उपयोग के लिए एक निश्चित समय-सीमा निर्धारित की जाएगी। यदि कोई संस्था निर्धारित अवधि के भीतर प्राप्त राशि का उपयोग नहीं कर पाती है, तो सरकार उसके संबंध में आवश्यक कार्रवाई कर सकेगी।

सरकार का मानना है कि कई मामलों में विदेशी धन वर्षों तक बिना उपयोग के पड़ा रहता है, जिससे धन के वास्तविक उद्देश्य पर प्रश्न उठते हैं। नई व्यवस्था के माध्यम से यह सुनिश्चित करने की कोशिश होगी कि प्राप्त राशि समय पर निर्धारित परियोजनाओं में खर्च हो।

नवीनीकरण के समय देनी होगी विस्तृत जानकारी

FCRA लाइसेंस के नवीनीकरण की प्रक्रिया को भी अधिक कठोर और विस्तृत बनाने का प्रस्ताव है। अब संस्थाओं को केवल वित्तीय विवरण ही नहीं, बल्कि विदेशी अनुदान से संचालित परियोजनाओं, खर्च की गई राशि, शेष निधि, खरीदी गई परिसंपत्तियों और उनके उपयोग का विस्तृत ब्यौरा भी देना होगा।

सरकार का कहना है कि इससे जवाबदेही बढ़ेगी और किसी भी प्रकार की वित्तीय अनियमितता या दुरुपयोग की संभावना कम होगी। डिजिटल रिकॉर्ड और दस्तावेजों के माध्यम से निगरानी प्रक्रिया भी अधिक प्रभावी बनाई जाएगी।

जांच प्रक्रिया में भी प्रस्तावित बदलाव

प्रस्तावित संशोधनों में जांच प्रक्रिया से जुड़े महत्वपूर्ण बदलाव भी शामिल हैं। किसी संस्था के विरुद्ध औपचारिक जांच शुरू करने से पहले संबंधित अधिकारियों को केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति लेनी होगी।

सरकार का कहना है कि इससे अनावश्यक और मनमानी जांच की संभावना कम होगी तथा जांच प्रक्रिया अधिक व्यवस्थित और जवाबदेह बनेगी। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे जांच प्रक्रिया लंबी भी हो सकती है।

कुछ अपराधों में सजा होगी कम

विधेयक में कुछ अपराधों के लिए अधिकतम सजा को पांच वर्ष से घटाकर एक वर्ष करने का प्रस्ताव भी रखा गया है। सरकार का तर्क है कि सभी प्रकार के उल्लंघन गंभीर आपराधिक अपराध की श्रेणी में नहीं आते, इसलिए दंड व्यवस्था को अधिक संतुलित और व्यावहारिक बनाया जाना आवश्यक है।

इस बदलाव का उद्देश्य तकनीकी या प्रक्रियागत त्रुटियों और गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करना बताया जा रहा है।

सरकार का पक्ष

केंद्र सरकार का कहना है कि विदेशी अंशदान का उपयोग पूरी तरह पारदर्शी होना चाहिए। सरकार के अनुसार विदेशी धन का उपयोग केवल उन्हीं उद्देश्यों के लिए होना चाहिए जिनके लिए उसे प्राप्त किया गया है। यदि किसी स्तर पर धन के दुरुपयोग, गलत उपयोग या राष्ट्रीय हितों के विपरीत गतिविधियों की आशंका होती है, तो उसके लिए प्रभावी कानूनी व्यवस्था आवश्यक है।

सरकार का यह भी कहना है कि प्रस्तावित संशोधन ईमानदारी से कार्य करने वाले संगठनों के लिए किसी प्रकार की बाधा नहीं बनेंगे, बल्कि पारदर्शी संस्थाओं की विश्वसनीयता और मजबूत होगी।

सामाजिक संगठनों की चिंता

दूसरी ओर कई सामाजिक संगठन, मानवाधिकार कार्यकर्ता और नागरिक समाज से जुड़े समूह इन प्रस्तावित संशोधनों को लेकर चिंता व्यक्त कर रहे हैं। उनका कहना है कि पहले से ही FCRA के नियम काफी सख्त हैं और नए प्रावधानों से प्रशासनिक नियंत्रण और बढ़ सकता है।

इन संगठनों का तर्क है कि यदि निगरानी और रिपोर्टिंग की प्रक्रिया अत्यधिक जटिल हो गई तो छोटे और मध्यम स्तर के NGOs के लिए अपने सामाजिक कार्यक्रमों को संचालित करना कठिन हो सकता है। विशेष रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण, आदिवासी क्षेत्रों और ग्रामीण विकास में कार्यरत संस्थाओं पर इसका अधिक प्रभाव पड़ सकता है।

संसद में होगी व्यापक बहस

अब सभी की निगाहें संसद पर टिकी हैं। लोकसभा और राज्यसभा में इस विधेयक पर विस्तृत चर्चा होने की संभावना है। विपक्षी दल, सामाजिक संगठन और नीति विशेषज्ञ इस बात पर अपने-अपने तर्क रखेंगे कि विदेशी अंशदान के नियमन और नागरिक समाज की स्वतंत्रता के बीच संतुलन किस प्रकार बनाया जाए।

यदि यह विधेयक पारित हो जाता है, तो भारत में विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्थाओं के संचालन, वित्तीय प्रबंधन और जवाबदेही की पूरी व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिल सकते हैं। आने वाले दिनों में संसद की बहस यह तय करेगी कि सरकार के प्रस्तावित संशोधन राष्ट्रीय सुरक्षा, वित्तीय पारदर्शिता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता के बीच किस प्रकार का संतुलन स्थापित कर पाते हैं।

आलोक कुमार