पंचायतों में विकास का पैसा: गांव तक पहुंचते-पहुंचते क्या बदल जाता है?
पटना। भारत में लोकतंत्र की असली तस्वीर केवल संसद और विधानसभा में नहीं दिखाई देती। इसकी सबसे महत्वपूर्ण झलक गांव की चौपाल, पंचायत भवन, ग्रामीण सड़क, नाली, स्कूल और पेयजल व्यवस्था में मिलती है। पंचायती राज व्यवस्था का उद्देश्य यही है कि गांव की समस्याओं की पहचान स्थानीय स्तर पर हो, योजनाएं ग्रामीण जरूरतों के अनुसार बनें और विकास का पैसा वास्तविक जरूरतों पर खर्च हो।
लेकिन वर्षों से एक सवाल ग्रामीण समाज में बना हुआ है—सरकार से पंचायत तक पहुंचने वाला विकास का पैसा गांव के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचते-पहुंचते कितना प्रभावी रह जाता है?
यह सवाल केवल भ्रष्टाचार का नहीं है। इसके साथ पारदर्शिता, जवाबदेही, योजना की गुणवत्ता, प्रशासनिक निगरानी और स्थानीय लोकतंत्र की विश्वसनीयता भी जुड़ी हुई है।
पैसा आता है, फिर भी विकास अधूरा क्यों?
गांवों में सड़क, नाली, पेयजल, स्ट्रीट लाइट, स्वच्छता, सामुदायिक भवन, जल संरक्षण और दूसरी बुनियादी सुविधाओं के लिए अलग-अलग योजनाओं के तहत धन उपलब्ध कराया जाता है। कागज पर किसी योजना की स्वीकृति हो सकती है, निर्माण पूरा दिखाया जा सकता है और भुगतान भी जारी हो सकता है।
लेकिन जमीन पर तस्वीर हमेशा वैसी नहीं होती।
कहीं नई बनी सड़क कुछ महीनों में टूट जाती है, कहीं नाली बनने के बाद भी जलजमाव खत्म नहीं होता और कहीं पेयजल योजना होने के बावजूद ग्रामीणों को पुराने जलस्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है।
यहीं से फाइल और जमीन के बीच का अंतर सामने आता है।
विकास राशि की पूरी प्रक्रिया समझना जरूरी
पंचायत का पैसा सामान्यतः एक लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरता है। योजना का चयन, स्वीकृति, तकनीकी प्रक्रिया, कार्यादेश, निर्माण, मापी, बिल और भुगतान जैसे कई चरण होते हैं। इस दौरान पंचायत प्रतिनिधियों के साथ अधिकारी, तकनीकी कर्मचारी और कार्य एजेंसियां भी भूमिका निभाती हैं।
यदि इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता बनी रहे तो अनियमितता की गुंजाइश कम हो सकती है। समस्या तब पैदा होती है जब ग्रामीणों को यह पता ही नहीं होता कि उनके गांव में किस योजना के लिए कितना पैसा स्वीकृत हुआ है।
एक सामान्य ग्रामीण के लिए यह जानना कठिन हो सकता है कि योजना की लागत कितनी है, काम कब पूरा होना है, किसके माध्यम से कराया जा रहा है और भुगतान की स्थिति क्या है।
जब जनता को जानकारी नहीं मिलेगी तो वह निगरानी कैसे करेगी?
सूचना बोर्ड केवल औपचारिकता न बने
किसी विकास कार्य के स्थल पर योजना की जानकारी देने वाला बोर्ड ग्रामीणों के लिए महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है। उसमें योजना का नाम, लागत, काम की अवधि और संबंधित जानकारी स्पष्ट रूप से होनी चाहिए।
यदि सड़क निर्माण की लागत लाखों रुपये है तो ग्रामीणों को यह जानने का अधिकार है कि सड़क कितनी लंबी है और निर्माण का निर्धारित मानक क्या है।
सूचना जितनी सरल और स्पष्ट होगी, जनता की निगरानी उतनी ही मजबूत होगी।
यही कारण है कि पंचायत स्तर पर सामाजिक अंकेक्षण और जन निगरानी को केवल सरकारी प्रक्रिया नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी के रूप में देखना चाहिए।
खराब गुणवत्ता भी सार्वजनिक नुकसान है
भ्रष्टाचार की चर्चा अक्सर पैसे की हेराफेरी तक सीमित हो जाती है, जबकि घटिया निर्माण भी जनता के लिए बड़ा नुकसान है।
मान लीजिए किसी सड़क का निर्माण पूरा हुआ और सरकारी रिकॉर्ड में पूरी राशि खर्च हो गई। लेकिन कुछ ही समय बाद सड़क टूटने लगी। ऐसी स्थिति में केवल सड़क की मरम्मत का सवाल नहीं है। दोबारा मरम्मत के लिए फिर सार्वजनिक धन खर्च होगा।
इसलिए किसी योजना की सफलता केवल इस बात से तय नहीं होनी चाहिए कि उस पर पैसा खर्च हुआ या नहीं।
असल सवाल होना चाहिए—उस पैसे से बना काम कितने समय तक ग्रामीणों के लिए उपयोगी रहा?
पंचायत प्रतिनिधियों की जिम्मेदारी
पंचायत प्रतिनिधियों की भूमिका केवल योजना पारित कराने या उद्घाटन तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्हें ग्रामसभा को मजबूत बनाने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
गांव में यदि पीने के पानी की समस्या गंभीर है तो विकास की प्राथमिकता उसी दिशा में होनी चाहिए। यदि स्कूल तक जाने वाली सड़क खराब है तो पहले उसका समाधान जरूरी हो सकता है।
स्थानीय लोकतंत्र का अर्थ ही यही है कि विकास की प्राथमिकताएं गांव की वास्तविक जरूरतों से तय हों।
ग्रामसभा को मजबूत करना होगा
ग्रामसभा पंचायत व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी है। लेकिन यदि ग्रामसभा केवल बैठक, हस्ताक्षर और उपस्थिति तक सीमित रह जाए तो उसका उद्देश्य कमजोर हो जाता है।
ग्रामीणों को योजनाओं के बारे में सवाल पूछने का अधिकार महसूस करना चाहिए।
मसलन—
योजना की कुल लागत कितनी है?
काम कब शुरू हुआ?
पूरा होने की समय-सीमा क्या है?
काम किस एजेंसी या व्यक्ति के माध्यम से हो रहा है?
गुणवत्ता की जांच किसने की?
कितना भुगतान किया गया?
काम पूरा होने के बाद उसकी देखरेख कौन करेगा?
ऐसे सवाल पंचायत को कमजोर नहीं करते। बल्कि वे स्थानीय लोकतंत्र को मजबूत करते हैं।
डिजिटल पारदर्शिता का बेहतर इस्तेमाल
आज पंचायतों से जुड़ी योजनाओं और सरकारी खर्च की जानकारी को डिजिटल माध्यमों से अधिक पारदर्शी बनाया जा सकता है। योजना की स्वीकृति, लागत, प्रगति, भुगतान और पूर्णता जैसी जानकारी सार्वजनिक होने से ग्रामीणों को निगरानी का अवसर मिलेगा।
हालांकि केवल वेबसाइट पर जानकारी उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। डिजिटल जानकारी ऐसी भाषा और स्वरूप में होनी चाहिए जिसे सामान्य ग्रामीण भी आसानी से समझ सके।
हर पंचायत भवन में एक 'विकास सूचना पट' बनाया जा सकता है, जहां चल रही और पूरी हो चुकी प्रमुख योजनाओं का विवरण सरल भाषा में प्रदर्शित हो।
भुगतान के साथ गुणवत्ता की जिम्मेदारी भी तय हो
किसी विकास कार्य का भुगतान हो जाना अपने आप में उसकी सफलता का प्रमाण नहीं होना चाहिए। यदि काम घटिया है तो यह सवाल भी उठना चाहिए कि उसकी गुणवत्ता की जांच किस स्तर पर हुई।
सिर्फ निर्माण करने वाली एजेंसी या व्यक्ति पर जिम्मेदारी डाल देना पर्याप्त नहीं है। यह भी देखना जरूरी है कि संबंधित प्रक्रिया में गुणवत्ता की पुष्टि किसने की और भुगतान की अनुमति किस आधार पर दी गई।
जिम्मेदारी जितनी स्पष्ट होगी, व्यवस्था उतनी जवाबदेह होगी।
हर पंचायत को भ्रष्ट मानना भी सही नहीं
पंचायतों में भ्रष्टाचार की शिकायतों पर गंभीरता से जांच होनी चाहिए, लेकिन हर पंचायत प्रतिनिधि या कर्मचारी को भ्रष्ट मान लेना भी उचित नहीं है।
देश के गांवों में ऐसे अनेक जनप्रतिनिधि और कर्मचारी हैं जो सीमित संसाधनों में ईमानदारी से काम करते हैं। अच्छे काम को सामने लाना भी उतना ही जरूरी है जितना गलत काम पर कार्रवाई करना।
इससे ईमानदार प्रतिनिधियों का मनोबल बढ़ेगा और अनियमितता करने वालों पर सामाजिक तथा प्रशासनिक दबाव बनेगा।
ग्रामीण केवल लाभार्थी नहीं, निगरानीकर्ता भी हैं
ग्रामीण विकास की सबसे बड़ी ताकत स्वयं ग्रामीण जनता हो सकती है। जिस गांव में लोग योजनाओं की जानकारी रखते हैं, ग्रामसभा में भाग लेते हैं और काम की गुणवत्ता पर सवाल पूछते हैं, वहां व्यवस्था अधिक जवाबदेह बन सकती है।
जनता की भूमिका केवल पंचायत चुनाव के समय वोट देने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। पूरे कार्यकाल में प्रतिनिधियों और प्रशासन के साथ संवाद जरूरी है।
निष्कर्ष
पंचायतों में विकास का पैसा गांव तक पहुंचते-पहुंचते तभी कमजोर पड़ता है जब पारदर्शिता कम हो, जनता की निगरानी कमजोर हो और जिम्मेदारी स्पष्ट न हो। इसके उलट ग्रामसभा सक्रिय हो, योजनाओं की जानकारी सार्वजनिक हो, गुणवत्ता की जांच मजबूत हो और अनियमितता पर समय रहते कार्रवाई हो तो सरकारी धन का वास्तविक लाभ ग्रामीणों तक पहुंच सकता है।
इसलिए सवाल केवल यह नहीं होना चाहिए कि पंचायत को कितना पैसा मिला।
असली सवाल यह होना चाहिए कि उस पैसे से गांव को कितना स्थायी और उपयोगी विकास मिला।
सरकारी पैसा किसी नेता, अधिकारी या पंचायत का निजी संसाधन नहीं है। यह जनता के संसाधनों से आता है। इसलिए जनता का अपने विकास के पैसे का हिसाब मांगना किसी व्यवस्था के खिलाफ जाना नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करना है।
गांव की सड़क मजबूत हो, नाली काम करे, पानी मिले, स्कूल बेहतर हों और सार्वजनिक सुविधाएं लंबे समय तक टिकें—यही विकास राशि की वास्तविक सफलता है।
आलोक कुमार