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मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026

Bihar : कैसे घटे, उनकी आमदनी कैसे बढ़े और सरकारी सहायता का लाभ उन तक कैसे पहुंचे?

 


खेती की लागत बढ़ने से छोटे किसान क्यों परेशान हैं? बीज, खाद, सिंचाई और बाजार की चुनौतियों का समाधान

 महंगे कृषि इनपुट, अनिश्चित मौसम, सिंचाई का खर्च और फसल का उचित मूल्य नहीं मिलने से छोटे किसानों की आर्थिक स्थिति पर दबाव बढ़ता है। आखिर खेती को लाभकारी बनाने के लिए सरकार, प्रशासन और किसान स्तर पर क्या बदलाव जरूरी हैं?

खेती की बढ़ती लागत छोटे किसानों के लिए बड़ी चुनौती

भारत में खेती केवल अनाज पैदा करने का काम नहीं है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था, रोजगार और लाखों परिवारों की आजीविका का आधार है। इसके बावजूद छोटे और सीमांत किसानों के सामने खेती को लाभकारी बनाए रखने की चुनौती लगातार बनी हुई है। खेत तैयार करने से लेकर फसल काटने और बाजार तक पहुंचाने में पैसा खर्च होता है। दूसरी ओर, फसल की बिक्री से कितनी आमदनी होगी, इसका भरोसा हमेशा नहीं रहता।

छोटे किसानों के पास अक्सर सीमित जमीन, कम बचत और निवेश के साधन होते हैं। ऐसे में बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल, बिजली, मजदूरी और परिवहन की लागत बढ़ने पर उनका बजट बिगड़ जाता है। यदि मौसम खराब हो जाए या बाजार में फसल की कीमत गिर जाए, तो पूरे सीजन की मेहनत के बावजूद किसान को अपेक्षित आमदनी नहीं मिलती।

सवाल यह है कि खेती की लागत बढ़ने का असर छोटे किसानों पर अधिक क्यों पड़ता है और इस समस्या का व्यावहारिक समाधान क्या हो सकता है?

1. महंगे बीज और खाद से बढ़ता आर्थिक दबाव

खेती की शुरुआत बीज से होती है। किसान अच्छी पैदावार की उम्मीद में प्रमाणित बीज खरीदना चाहते हैं, लेकिन सीमित आमदनी के कारण कई बार उन्हें खर्च और गुणवत्ता के बीच समझौता करना पड़ता है। बीज की गुणवत्ता खराब होने या नकली बीज मिलने पर अंकुरण प्रभावित हो सकता है। इसका नुकसान केवल बीज की कीमत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दोबारा बुवाई, अतिरिक्त मजदूरी और समय की बर्बादी के रूप में भी सामने आता है।

इसी तरह खाद और कीटनाशकों की जरूरत पूरी करने में भी खर्च होता है। यदि किसान को समय पर आवश्यक कृषि सामग्री उपलब्ध नहीं होती, तो उसे दूसरे स्रोतों से महंगे दाम पर खरीदना पड़ सकता है।

समाधान क्या है? कृषि विभाग और स्थानीय प्रशासन को प्रमाणित बीज तथा कृषि सामग्री की उपलब्धता सुनिश्चित करनी चाहिए। किसानों को अधिकृत विक्रेताओं से खरीदारी करनी चाहिए और बिल अवश्य लेना चाहिए। कृषि विशेषज्ञों की सलाह के बिना जरूरत से ज्यादा खाद या कीटनाशक का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। मिट्टी की जांच के आधार पर उर्वरकों का उपयोग लागत घटाने में मदद कर सकता है।

2. सिंचाई का खर्च और अनिश्चित मौसम

छोटे किसानों की दूसरी बड़ी समस्या सिंचाई है। जिन क्षेत्रों में नहर, तालाब या अन्य जलस्रोत पर्याप्त नहीं हैं, वहां किसानों को पंप, डीजल या बिजली पर निर्भर रहना पड़ता है। डीजल से सिंचाई करने पर बार-बार खर्च बढ़ता है। बिजली की आपूर्ति अनियमित होने पर फसल को समय पर पानी देना कठिन हो सकता है।

बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य में भी कई ग्रामीण क्षेत्रों में जलनिकासी, सिंचाई और स्थानीय जल प्रबंधन की समस्याएं खेती को प्रभावित करती हैं। कहीं सूखे जैसी स्थिति पैदा होती है, तो कहीं अत्यधिक बारिश और जलजमाव से फसल बर्बाद होने का खतरा रहता है।

छोटे किसान के लिए सिंचाई की एक अतिरिक्त लागत भी महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि उसके पास खर्च पूरा करने के लिए पर्याप्त वित्तीय सुरक्षा नहीं होती।

समाधान क्या है? गांवों में तालाबों का पुनर्जीवन, वर्षा जल संचयन, नहरों की मरम्मत और सामुदायिक सिंचाई व्यवस्था पर ध्यान दिया जाना चाहिए। जहां उपयुक्त हो, वहां ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी जल-बचत तकनीकों को बढ़ावा दिया जा सकता है। किसानों को उपलब्ध सरकारी सहायता की पात्रता और आवेदन प्रक्रिया की जानकारी भी दी जानी चाहिए।

3. मजदूरी, मशीन और परिवहन की लागत

खेती में जुताई, बुवाई, निराई, कटाई और ढुलाई के लिए मजदूरों तथा मशीनों की जरूरत पड़ती है। छोटे किसान के पास अपना ट्रैक्टर, हार्वेस्टर या अन्य कृषि उपकरण होना जरूरी नहीं कि संभव हो। उसे किराये पर मशीनें लेनी पड़ती हैं।

यदि गांव में मशीनें समय पर उपलब्ध न हों, तो बुवाई और कटाई में देरी हो सकती है। इससे उत्पादन और गुणवत्ता पर असर पड़ने की आशंका रहती है। फसल को खेत से बाजार या खरीद केंद्र तक पहुंचाने में भी परिवहन खर्च जुड़ता है।

समाधान क्या है? किसान उत्पादक संगठन (FPO), किसान समूह और कृषि यंत्र बैंक के माध्यम से मशीनें साझा उपयोग के लिए उपलब्ध कराई जा सकती हैं। इससे प्रत्येक किसान को महंगी मशीन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ेगी। पंचायत और कृषि विभाग को स्थानीय स्तर पर किराये की मशीनों की उपलब्धता तथा दरों की जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए।

4. फसल का उचित मूल्य नहीं मिलना

खेती की लागत बढ़ने के बावजूद किसान को अपनी उपज का लाभकारी मूल्य हमेशा नहीं मिल पाता। फसल तैयार होने के समय बाजार में आपूर्ति बढ़ने से कीमतें गिर सकती हैं। छोटे किसानों के पास भंडारण की पर्याप्त सुविधा नहीं होने के कारण उन्हें तत्काल बिक्री करनी पड़ती है।

यदि परिवार को कर्ज चुकाना हो, बच्चों की पढ़ाई का खर्च देना हो या अगली फसल के लिए बीज और खाद खरीदनी हो, तो किसान कम कीमत मिलने के बावजूद उपज बेचने को मजबूर हो सकता है। दूसरी ओर, परिवहन, छंटाई और बाजार शुल्क जैसी लागू लागतें उसकी वास्तविक आमदनी को प्रभावित कर सकती हैं।

न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) घोषित होना और प्रत्येक किसान की उपज का उसी कीमत पर खरीदा जाना अलग-अलग बातें हैं। सरकारी खरीद निर्धारित फसलों, क्षेत्रों, समय-सीमा और नियमों के अनुसार होती है।

समाधान क्या है? किसानों को सरकारी खरीद की प्रक्रिया, पंजीकरण, जरूरी कागजात और स्थानीय खरीद केंद्रों की जानकारी समय पर मिलनी चाहिए। सहकारी समितियों, किसान उत्पादक संगठनों और सामूहिक विपणन के माध्यम से किसान बेहतर बाजार तक पहुंच बना सकते हैं। गांवों में छोटे भंडारण केंद्र और फसल के उचित रखरखाव की सुविधाएं विकसित करना भी उपयोगी होगा।

5. कर्ज और सरकारी योजनाओं की जानकारी का अभाव

जब खेती की लागत उपलब्ध बचत से अधिक हो जाती है, तो किसान उधार लेने पर निर्भर हो सकता है। यदि फसल खराब हो जाए या बिक्री से पर्याप्त पैसा न मिले, तो कर्ज चुकाना कठिन हो जाता है। अगली फसल के लिए दोबारा कर्ज लेने की जरूरत पड़ सकती है और परिवार पर आर्थिक दबाव बढ़ता जाता है।

कई बार पात्र किसान भी सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं उठा पाते, क्योंकि उन्हें आवेदन, दस्तावेज, बैंक खाते, बीमा या शिकायत प्रक्रिया की पूरी जानकारी नहीं होती।

समाधान क्या है? किसानों को कृषि ऋण, फसल बीमा और अन्य लागू योजनाओं की शर्तों की जानकारी पंचायत, कृषि समन्वयक, किसान सलाहकार और संबंधित बैंक के माध्यम से दी जानी चाहिए। किसान किसी योजना का लाभ लेने से पहले पात्रता, समय-सीमा, आवश्यक दस्तावेज और सहायता की वास्तविक शर्तें जांचें। केवल मौखिक आश्वासन पर निर्भर रहने के बजाय आवेदन की रसीद और संबंधित रिकॉर्ड सुरक्षित रखें।

6. खेती को लाभकारी बनाने के लिए साझा जिम्मेदारी

खेती की बढ़ती लागत का समाधान केवल किसान को कम खर्च करने की सलाह देने से नहीं निकलेगा। इसके लिए सरकार, प्रशासन, कृषि वैज्ञानिकों, सहकारी संस्थाओं और बाजार व्यवस्था को मिलकर काम करना होगा।

सरकार को कृषि सामग्री की उपलब्धता, सिंचाई, ग्रामीण सड़कों, भंडारण और बाजार तक पहुंच मजबूत करनी चाहिए। कृषि विभाग को किसानों तक व्यावहारिक प्रशिक्षण और मौसम संबंधी जानकारी पहुंचानी चाहिए। स्थानीय प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सरकारी खरीद और सहायता योजनाओं की जानकारी सरल भाषा में उपलब्ध हो तथा शिकायतों का समय पर निपटारा किया जाए।

किसानों को भी मिट्टी की जांच, फसल विविधीकरण, सामूहिक खरीद, उपलब्ध बाजारों की तुलना और खर्च का रिकॉर्ड रखने जैसी आदतें अपनानी चाहिए। हालांकि, फसल बदलने या नई तकनीक अपनाने से पहले स्थानीय मिट्टी, पानी, बाजार और संभावित जोखिम का आकलन जरूरी है।

निष्कर्ष: किसान की आमदनी बढ़ाने के लिए लागत और बाजार दोनों पर ध्यान जरूरी

छोटे किसान की परेशानी केवल महंगे बीज, खाद या डीजल तक सीमित नहीं है। असली समस्या तब गंभीर बनती है, जब बढ़ती लागत के मुकाबले फसल की आमदनी अनिश्चित रहती है। सिंचाई की कमी, मौसम का जोखिम, मशीनों का खर्च, भंडारण का अभाव और बाजार तक सीमित पहुंच मिलकर किसान की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर सकते हैं।

इसलिए कृषि नीति का लक्ष्य केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं, बल्कि किसान की वास्तविक लागत घटाना, फसल का उचित मूल्य दिलाना और जोखिम के समय सहायता उपलब्ध कराना भी होना चाहिए। जब किसान को गुणवत्तापूर्ण कृषि सामग्री, सस्ती और समय पर सिंचाई, उचित बाजार तथा सरकारी योजनाओं तक आसान पहुंच मिलेगी, तभी खेती को अधिक टिकाऊ और लाभकारी बनाने की दिशा में ठोस प्रगति संभव होगी।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती खेतों में मेहनत करने वाले किसानों की आर्थिक सुरक्षा से जुड़ी है। किसान की लागत और आमदनी के बीच संतुलन बनाना केवल कृषि क्षेत्र की जरूरत नहीं, बल्कि पूरे समाज के हित में है।

 खेती की लागत बढ़ रही है, लेकिन क्या छोटे किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य मिल रहा है? महंगे बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और बाजार की अनिश्चितता किसानों की आर्थिक स्थिति पर दबाव डालती है। पढ़िए खेती की लागत घटाने और किसानों की आमदनी बढ़ाने के व्यावहारिक उपाय। इस लेख को किसानों और ग्रामीण क्षेत्रों से जुड़े लोगों तक जरूर पहुंचाएं।

आलोक कुमार

शनिवार, 19 सितंबर 2026

India : किसान सिर्फ फसल बेचने वाला नहीं, उद्यमी भी बन सकता है

 


किसान सिर्फ फसल बेचने वाला नहीं, उद्यमी भी बन सकता है

भारत में किसान को अक्सर खेत, फसल, मौसम और मंडी के बीच सीमित करके देखा जाता है। किसान ने धान उगाया, गेहूं पैदा किया, सब्जियां उगाईं और मंडी में बेच दीं—मानो उसकी भूमिका यहीं खत्म हो गई। लेकिन बदलती अर्थव्यवस्था में किसान की भूमिका इससे कहीं बड़ी हो सकती है। किसान केवल उत्पादक नहीं, उद्यमी भी बन सकता है।

उसके पास जमीन है, उत्पादन का अनुभव है, स्थानीय संसाधनों की समझ है और खेती से जुड़ा व्यावहारिक ज्ञान है। यदि इन क्षमताओं को बाजार, तकनीक, प्रसंस्करण और बेहतर प्रबंधन से जोड़ा जाए तो किसान अपनी आय के साथ-साथ पूरे ग्रामीण क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ा सकता है।

फसल बेचने से आगे बढ़ने की जरूरत

किसान के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अक्सर अपनी उपज को कच्चे माल के रूप में बेच देता है। उदाहरण के लिए किसी किसान ने टमाटर पैदा किया। मंडी में टमाटर बेचने के बाद उसका काम खत्म हो गया। लेकिन इसी टमाटर से सॉस, प्यूरी, अचार और दूसरे खाद्य उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।

इसी तरह दूध बेचने के बजाय दही, पनीर और घी तैयार किया जा सकता है। गेहूं से पैक किया हुआ आटा, मक्का से विभिन्न खाद्य और पशु आहार उत्पाद, फलों से जैम और जूस तथा मखाना, हल्दी, मिर्च और मसालों की सफाई, पैकिंग और ब्रांडिंग की जा सकती है।

यानी किसान यदि उत्पादन से आगे बढ़कर मूल्य संवर्धन करे तो उसकी उपज से आर्थिक गतिविधियों की एक लंबी श्रृंखला तैयार हो सकती है।

खेती में बाजार की समझ जरूरी

किसान उद्यमी बनने का मतलब केवल नई फसल उगाना नहीं है। उसे बाजार की मांग को समझना भी होगा।

किस उत्पाद की मांग कब बढ़ती है? किस बाजार में उसकी अच्छी कीमत मिल सकती है? कौन-सी उपज लंबे समय तक सुरक्षित रखी जा सकती है? किस उत्पाद को पैक करके दूसरे शहरों में भेजा जा सकता है? कौन-सी वस्तु ऑनलाइन बेची जा सकती है?

ऐसे सवाल खेती की योजना का हिस्सा बनने चाहिए। खेती केवल यह तय करने का नाम नहीं है कि खेत में क्या उगाया जाए। यह भी देखना जरूरी है कि किसके लिए, किस बाजार में और किस तरीके से बेचा जाए।

छोटे किसानों के लिए सामूहिकता जरूरी

छोटे किसान के लिए अकेले बड़ा कारोबार शुरू करना कठिन हो सकता है। इसलिए किसान उत्पादक संगठन, स्वयं सहायता समूह, सहकारी समितियां और ग्रामीण उद्यम समूह महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

कई किसान मिलकर उत्पादन, खरीद, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और बिक्री की व्यवस्था कर सकते हैं। सामूहिक रूप से काम करने पर उत्पाद की मात्रा बढ़ती है, कुछ लागत कम हो सकती है और बड़े खरीदारों तक पहुंच बनाना आसान हो सकता है।

छोटे किसान की बड़ी चुनौती उसका छोटा पैमाना है। सामूहिक संगठन इस समस्या को काफी हद तक अवसर में बदल सकता है।

डिजिटल तकनीक से बढ़ सकता है बाजार

आज मोबाइल फोन किसान उद्यमिता का महत्वपूर्ण साधन बन सकता है। किसान बाजार भाव, मौसम, खरीदारों और कृषि तकनीक से जुड़ी जानकारी प्राप्त कर सकता है।

सोशल मीडिया और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए स्थानीय उत्पादों की पहचान भी बनाई जा सकती है। यदि किसी गांव में अच्छा शहद, अचार, मखाना, मसाला या अन्य स्थानीय खाद्य उत्पाद तैयार होता है तो उसकी अच्छी पैकेजिंग, सही जानकारी और डिजिटल प्रचार के माध्यम से उसे व्यापक बाजार तक पहुंचाने की कोशिश की जा सकती है।

हालांकि ऑनलाइन बिक्री में गुणवत्ता, सही उत्पाद विवरण, सुरक्षित भुगतान, समय पर डिलीवरी और ग्राहक सेवा का ध्यान रखना भी जरूरी है।

फसल के बाद होने वाले नुकसान को कम करना

किसान उद्यमिता का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र फसल के बाद होने वाले नुकसान को कम करना है। फल और सब्जियों जैसी जल्दी खराब होने वाली उपज के लिए भंडारण और प्रसंस्करण की सुविधा बेहद जरूरी है।

गांव या पंचायत स्तर पर छोटे कोल्ड स्टोरेज, सौर ऊर्जा आधारित सुखाने की व्यवस्था, ग्रेडिंग सेंटर, पैकिंग केंद्र और छोटी प्रसंस्करण इकाइयां विकसित की जा सकती हैं। इससे किसानों को मजबूरी में तुरंत कम कीमत पर अपनी उपज बेचने से राहत मिल सकती है।

इन इकाइयों से किसानों के साथ-साथ मशीन संचालन, पैकिंग, परिवहन और विपणन से जुड़े लोगों को भी रोजगार मिल सकता है।

एक खेत से कई आय के रास्ते

किसान उद्यमी बनने का अर्थ यह नहीं है कि हर किसान खेती छोड़कर फैक्टरी लगाए। उद्यमिता का अर्थ अपनी मौजूदा कृषि गतिविधि को बेहतर आर्थिक मॉडल में बदलना भी है।

कोई किसान मशरूम उत्पादन शुरू कर सकता है। कोई मधुमक्खी पालन को खेती के साथ जोड़ सकता है। कोई बकरी या मुर्गी पालन कर सकता है। कोई पौधों की नर्सरी तैयार कर सकता है। कोई कृषि उपकरण किराये पर उपलब्ध करा सकता है।

इस तरह एक खेत और एक परिवार से कई आय के स्रोत विकसित किए जा सकते हैं। इससे किसी एक फसल या एक बाजार पर निर्भरता भी कम हो सकती है।

बिहार के किसानों के लिए बड़ी संभावना

बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्य में किसान उद्यमिता की सोच विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। छोटे और सीमांत किसानों के लिए केवल फसल की कीमत पर निर्भर रहना जोखिमपूर्ण हो सकता है।

खेती के साथ पशुपालन, बागवानी, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन, मशरूम उत्पादन, खाद्य प्रसंस्करण और स्थानीय उत्पादों की ब्रांडिंग को जोड़ा जा सकता है।

मखाना, लीची, शहद, सब्जियां, मसाले, मक्का और दुग्ध उत्पाद जैसे क्षेत्रों में उत्पादन के साथ-साथ सफाई, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, परिवहन और बिक्री के अवसर भी विकसित किए जा सकते हैं।

रास्ते में कई चुनौतियां भी हैं

किसान उद्यमिता का रास्ता आसान नहीं है। पूंजी की कमी, बाजार की जानकारी का अभाव, प्रशिक्षण की कमी, पैकेजिंग और ब्रांडिंग की समस्या, परिवहन, भंडारण और बाजार तक सीधी पहुंच जैसी चुनौतियां मौजूद हैं।

इसलिए केवल कर्ज या सब्सिडी देना पर्याप्त नहीं होगा। किसान को व्यवसाय चलाने का प्रशिक्षण, बाजार की जानकारी, तकनीकी सहायता और बिक्री का नेटवर्क भी उपलब्ध कराना जरूरी है।

बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को भी कृषि उद्यमों को केवल ऋण लेने वाले ग्राहक के रूप में नहीं, बल्कि संभावित ग्रामीण व्यवसाय के रूप में देखना होगा।

युवा बन सकते हैं बदलाव की कड़ी

किसान उद्यमिता में ग्रामीण युवाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है। गांव का पढ़ा-लिखा युवा यदि खेती को केवल पारंपरिक काम मानने के बजाय आधुनिक व्यवसाय के रूप में देखे तो बदलाव की गति बढ़ सकती है।

ड्रोन सेवा, डिजिटल रिकॉर्ड, ऑनलाइन बिक्री, आधुनिक पैकेजिंग, कृषि उपकरणों की सेवा, प्रसंस्करण और बाजार प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में युवा अपनी नई भूमिका बना सकते हैं।

वे अपने परिवार की खेती को अधिक व्यवस्थित करने के साथ दूसरे किसानों को भी सेवाएं देकर रोजगार का रास्ता बना सकते हैं।

किसान को उत्पाद की पूरी कीमत समझनी होगी

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसान को केवल उपज की कीमत नहीं, बल्कि उत्पाद की पूरी मूल्य श्रृंखला समझनी होगी।

खेत से मंडी और मंडी से ग्राहक तक पहुंचने के दौरान किसी उत्पाद का मूल्य कई चरणों में बढ़ता है। यदि किसान इनमें से कुछ गतिविधियां स्वयं संभाल सके—जैसे सफाई, ग्रेडिंग, प्रसंस्करण, पैकेजिंग और सीधी बिक्री—तो उसके लिए अधिक मूल्य प्राप्त करने की संभावना बन सकती है।

किसान का भविष्य केवल अधिक फसल पैदा करने में नहीं, बल्कि बेहतर मूल्य पैदा करने में भी है।

खेत किसान की ताकत है, लेकिन बाजार की समझ, तकनीक, संगठन और उद्यमशीलता उस ताकत को आर्थिक अवसर में बदल सकती है। किसान को सम्मान केवल इसलिए नहीं मिलना चाहिए कि वह अन्नदाता है, बल्कि उसे ऐसा आर्थिक वातावरण भी मिलना चाहिए जिसमें उसके श्रम और उत्पाद का उचित मूल्य हासिल करने के अवसर बढ़ें।

अब किसान को केवल मंडी में बोरी लेकर खड़े व्यक्ति के रूप में देखने की जरूरत नहीं है। वह उत्पादक है, प्रबंधक है, संभावित ब्रांड निर्माता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का उद्यमी भी है।

जिस दिन किसान अपनी फसल के साथ उसका मूल्य भी पैदा करने की दिशा में आगे बढ़ेगा, उस दिन खेती केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि मजबूत और टिकाऊ ग्रामीण व्यवसाय का आधार बन सकती है।

आलोक कुमार

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