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Bihar : प्रशिक्षण, अप्रेंटिसशिप और रोजगार के बीच की दूरी

 प्रशिक्षण, अप्रेंटिसशिप और रोजगार के बीच की दूरी युवाओं के लिए चुनौती क्यों है?

किसी युवा के लिए ITI, Polytechnic या किसी अन्य तकनीकी पाठ्यक्रम में प्रवेश लेना रोजगार की दिशा में पहला कदम होता है। इसके बाद प्रशिक्षण पूरा होता है और कई युवाओं को अप्रेंटिसशिप या व्यावहारिक अनुभव का अवसर मिलता है। लेकिन इन दोनों चरणों के बाद भी एक महत्वपूर्ण सवाल सामने रहता है—क्या प्रशिक्षण और अप्रेंटिसशिप वास्तव में युवा को स्थायी रोजगार तक पहुंचा पाते हैं?

यही वह जगह है जहां कई युवाओं की उम्मीद और रोजगार की वास्तविकता के बीच अंतर दिखाई देता है। प्रमाणपत्र मिल जाता है, कुछ व्यावहारिक अनुभव भी मिल जाता है, लेकिन स्थायी और सम्मानजनक नौकरी हासिल करना फिर भी आसान नहीं होता।

प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल प्रमाणपत्र नहीं होना चाहिए

तकनीकी प्रशिक्षण का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य किसी युवा को काम के लिए तैयार करना है। लेकिन प्रशिक्षण की गुणवत्ता और उसकी उपयोगिता इस बात से तय होती है कि विद्यार्थी ने वास्तव में क्या सीखा।

कक्षा में किसी मशीन, उपकरण या तकनीकी प्रक्रिया के बारे में पढ़ना और उसी काम को वास्तविक कार्यस्थल पर करना अलग-अलग अनुभव हैं। इसलिए प्रशिक्षण में प्रैक्टिकल कार्य का पर्याप्त हिस्सा होना जरूरी है।

यदि विद्यार्थी प्रशिक्षण के दौरान वास्तविक उपकरणों पर काम करने, समस्या पहचानने और उसका समाधान करने का अभ्यास करता है तो नौकरी मिलने के बाद उसे कार्यस्थल समझने में अपेक्षाकृत कम परेशानी हो सकती है।

अप्रेंटिसशिप क्यों महत्वपूर्ण है?

अप्रेंटिसशिप प्रशिक्षण और रोजगार के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी बन सकती है। इसमें युवा वास्तविक कार्यस्थल के वातावरण को समझता है और अपने तकनीकी ज्ञान का इस्तेमाल करना सीखता है।

कार्यस्थल पर समय की पाबंदी, सुरक्षा नियम, टीम के साथ काम करना, वरिष्ठों से संवाद, मशीनों का रखरखाव और काम की जिम्मेदारी जैसी बातें किताबों से पूरी तरह नहीं सीखी जा सकतीं।

इसीलिए अप्रेंटिसशिप को केवल प्रशिक्षण की औपचारिकता मानने के बजाय रोजगार की तैयारी का चरण समझना चाहिए।

लेकिन यहां एक बड़ी चुनौती भी है। यदि अप्रेंटिसशिप के अवसर सीमित हों, प्रशिक्षण केवल नाम के लिए हो या युवा को उसके ट्रेड से संबंधित काम न मिले तो उसका वास्तविक लाभ कम हो सकता है।

अप्रेंटिसशिप के बाद क्या?

सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि अप्रेंटिसशिप समाप्त होने के बाद युवा कहां जाता है।

हर अप्रेंटिस को उसी संस्था में स्थायी नौकरी मिले, यह जरूरी नहीं है। किसी कंपनी की अपनी भर्ती नीति, जरूरत और उपलब्ध पदों की संख्या होती है। इसलिए अप्रेंटिसशिप को स्थायी नौकरी की गारंटी के रूप में देखना सही नहीं होगा।

लेकिन अप्रेंटिसशिप के बाद युवा के पास ऐसा कौशल और अनुभव जरूर होना चाहिए जिससे वह दूसरी कंपनियों में भी नौकरी के लिए प्रतिस्पर्धा कर सके।

यहीं पर रोजगार से जुड़ी जानकारी, करियर मार्गदर्शन और कंपनियों से संपर्क की व्यवस्था महत्वपूर्ण हो जाती है।

प्रशिक्षण और उद्योग के बीच तालमेल जरूरी

किसी तकनीकी पाठ्यक्रम की उपयोगिता तभी बढ़ती है जब उसमें सिखाया जाने वाला कौशल रोजगार बाजार की जरूरतों से जुड़ा हो।

उद्योगों में तकनीक बदलती रहती है। मशीनों में बदलाव, डिजिटल उपकरणों का इस्तेमाल, ऑटोमेशन और नई उत्पादन प्रक्रियाएं लगातार विकसित हो रही हैं। ऐसे में प्रशिक्षण संस्थानों के लिए भी जरूरी है कि वे उद्योगों की बदलती जरूरतों को समझें।

यदि प्रशिक्षण पूरा करने वाला युवा ऐसी तकनीक से परिचित है जिसकी मांग रोजगार बाजार में है तो उसके अवसर बढ़ सकते हैं। दूसरी ओर, प्रशिक्षण और उद्योग की जरूरतों के बीच अधिक अंतर होने पर प्रमाणपत्र होने के बावजूद नौकरी पाना कठिन हो सकता है।

ग्रामीण युवाओं के सामने अलग चुनौती

बिहार जैसे राज्यों में बड़ी संख्या में युवा छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों से आते हैं। उनके लिए समस्या केवल कौशल हासिल करने तक सीमित नहीं रहती।

प्रशिक्षण संस्थान उनके घर से दूर हो सकता है। अप्रेंटिसशिप किसी दूसरे शहर में मिल सकती है और नौकरी के लिए फिर किसी औद्योगिक क्षेत्र में जाना पड़ सकता है।

इस पूरी प्रक्रिया में यात्रा, रहने और भोजन का खर्च जुड़ता है। कम आय वाले परिवार से आने वाले युवा के लिए यह खर्च रोजगार की तलाश को कठिन बना सकता है।

इसलिए रोजगार नीति में केवल नौकरी की संख्या नहीं, बल्कि युवा की नौकरी तक पहुंचने की वास्तविक लागत को भी समझना जरूरी है।

छोटी शुरुआत को कम नहीं समझना चाहिए

तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाले युवाओं में कुछ लोग पहली नौकरी से ही अच्छी आय की उम्मीद करते हैं। लेकिन करियर की शुरुआत में मिलने वाली नौकरी हमेशा अंतिम मंजिल नहीं होती।

पहली नौकरी में सीखने का अवसर, सुरक्षित कार्यस्थल, उचित व्यवहार और कौशल बढ़ाने की संभावना भी महत्वपूर्ण होती है। यदि युवा को शुरुआती चरण में काम सीखने और आगे बढ़ने का अवसर मिलता है तो वह समय के साथ बेहतर रोजगार हासिल कर सकता है।

इसलिए युवाओं को नौकरी की तलाश में वेतन के साथ-साथ काम की प्रकृति, सीखने का अवसर और भविष्य की संभावना भी देखनी चाहिए।

संस्थानों की जिम्मेदारी क्या हो सकती है?

ITI और Polytechnic संस्थानों में प्रशिक्षण पूरा होने से पहले विद्यार्थियों को रोजगार की वास्तविक प्रक्रिया समझाना उपयोगी हो सकता है। रिज्यूमे बनाना, इंटरव्यू की तैयारी, नौकरी के लिए आवेदन करना, अप्रेंटिसशिप के अवसर तलाशना और संबंधित कंपनियों की जानकारी प्राप्त करना जैसे कौशल भी करियर का हिस्सा हैं।

संस्थान यदि अपने पूर्व विद्यार्थियों का रोजगार रिकॉर्ड रखें तो यह पता लगाने में भी मदद मिल सकती है कि कौन से पाठ्यक्रम और कौशल विद्यार्थियों को बेहतर अवसर दिला रहे हैं।

इसके अलावा स्थानीय उद्योगों के साथ नियमित संपर्क और रोजगार मेलों की व्यवस्था युवाओं को कंपनियों तक सीधे पहुंचने का अवसर दे सकती है।

सरकार और उद्योग की भूमिका

सरकार प्रशिक्षण संस्थानों और उद्योगों के बीच सहयोग को बढ़ावा दे सकती है। स्थानीय स्तर पर अधिक अप्रेंटिसशिप अवसर, रोजगार मेले, कौशल आधारित मार्गदर्शन और रोजगार की विश्वसनीय जानकारी युवाओं के लिए उपयोगी हो सकती है।

उद्योगों की भी जिम्मेदारी है कि वे प्रशिक्षित युवाओं को केवल अनुभवी उम्मीदवारों से तुलना करके बाहर न करें। शुरुआती स्तर पर प्रशिक्षण लेने वाले युवाओं को सीखने का अवसर देना भविष्य के कुशल कर्मचारियों की तैयारी में निवेश हो सकता है।

रोजगार तक पहुंचने के लिए पूरी श्रृंखला मजबूत करनी होगी

युवा को केवल प्रशिक्षण देने से समस्या हल नहीं होगी। प्रशिक्षण के बाद अप्रेंटिसशिप, अप्रेंटिसशिप के बाद रोजगार की जानकारी और फिर नौकरी में आगे बढ़ने का अवसर—इन सभी चरणों को एक-दूसरे से जोड़ना जरूरी है।

अगर प्रशिक्षण एक जगह हो, अप्रेंटिसशिप की जानकारी दूसरी जगह मिले और नौकरी की सूचना तीसरी जगह खोजनी पड़े, तो कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाला युवा बीच में ही पीछे छूट सकता है।

इसलिए जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें प्रशिक्षण से लेकर रोजगार तक की पूरी यात्रा युवा के लिए अधिक स्पष्ट और आसान हो।

आखिरकार तकनीकी शिक्षा की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितने युवाओं ने प्रमाणपत्र हासिल किया। यह भी देखना होगा कि उनमें से कितने युवा अपने सीखे हुए कौशल का इस्तेमाल करके वास्तविक रोजगार तक पहुंच पाए।

प्रशिक्षण, अप्रेंटिसशिप और रोजगार तीन अलग-अलग पड़ाव नहीं, बल्कि एक ही रोजगार यात्रा की कड़ियां हैं। इन कड़ियों के बीच जितनी मजबूती होगी, युवाओं के लिए तकनीकी शिक्षा उतनी ही उपयोगी साबित होगी।

आलोक कुमार

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