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रविवार, 30 अगस्त 2026

Bihar : बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि आज भी सबसे महत्वपूर्ण आधारों में शामिल

बिहार के किसानों की लागत और बाजार भाव के बीच बढ़ती दूरी: खेत में मेहनत किसान की, कीमत तय करने की ताकत किसकी?

पटना। बिहार की अर्थव्यवस्था में कृषि आज भी सबसे महत्वपूर्ण आधारों में शामिल है। गांवों कीबड़ी आबादी खेती, पशुपालन, कृषि मजदूरी, मंडी कारोबार और उससे जुड़े छोटे व्यवसायों पर निर्भर है। धान, गेहूं, मक्का, दलहन, तेलहन, सब्जियां और फल जैसी फसलें किसानों की आय का प्रमुख साधन हैं। लेकिन कृषि की तस्वीर का दूसरा पहलू यह है कि फसल पैदा करने की लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि किसान को मिलने वाला बाजार भाव कई बार उसकी उम्मीद के अनुरूप नहीं होता।

यही अंतर बिहार के किसान की सबसे बड़ी आर्थिक चुनौती बनता जा रहा है। खेती में जोखिम किसान का है, मौसम का असर किसान झेलता है, उत्पादन की लागत किसान उठाता है, लेकिन फसल तैयार होने के बाद उसकी कीमत तय करने की ताकत अक्सर उसके हाथ में नहीं रहती।

बीज से बाजार तक बढ़ता खर्च

आज खेती पहले की तुलना में अधिक खर्चीली हो गई है। खेत की जुताई, बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई, मजदूरी, डीजल, कृषि मशीनरी और फसल को बाजार तक पहुंचाने में पैसा खर्च होता है। जिन किसानों के पास अपनी मशीन या सिंचाई का साधन नहीं है, उनके लिए लागत और बढ़ जाती है।

इसके अलावा प्राकृतिक जोखिम भी कम नहीं हुए हैं। कभी अत्यधिक बारिश, कभी सूखा, कभी बाढ़ तो कभी फसल में रोग किसानों की पूरी गणित बिगाड़ देते हैं। किसान पहले से यह निश्चित नहीं कर सकता कि मौसम उसके साथ कितना सहयोग करेगा।

छोटे और सीमांत किसानों की स्थिति और कठिन है। सीमित पूंजी के कारण उन्हें खेती के लिए कई बार उधार लेना पड़ता है। फसल तैयार होने के बाद कर्ज चुकाने, अगली फसल की तैयारी करने और परिवार का खर्च चलाने का दबाव सामने होता है। ऐसे में बाजार भाव कम होने के बावजूद किसान अपनी उपज रोककर रखने की स्थिति में नहीं होता।

फसल तैयार होते ही क्यों गिर जाता है किसान का विकल्प?

किसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय वह होता है जब फसल बाजार में पहुंचती है। यदि उस समय कीमत अच्छी है तो उसकी पूरी साल की मेहनत कुछ हद तक सफल हो सकती है। लेकिन कीमत गिर गई तो नुकसान की भरपाई करना मुश्किल हो जाता है।

इसका एक बड़ा कारण भंडारण की सीमित सुविधा है। जिसके पास पर्याप्त गोदाम या सुरक्षित भंडारण की व्यवस्था नहीं है, वह लंबे समय तक फसल रोक नहीं सकता। उसे जल्दी बिक्री करनी पड़ती है।

यहीं किसान की मजबूरी उसकी सौदेबाजी की शक्ति को कमजोर करती है।

शहर में उपभोक्ता किसी कृषि उत्पाद के लिए अधिक कीमत चुका सकता है, लेकिन खेत से निकलने वाली वही उपज किसान को अपेक्षाकृत कम कीमत पर बेचनी पड़ सकती है। परिवहन, छंटाई, पैकेजिंग, थोक कारोबार और खुदरा बिक्री के अलग-अलग खर्च इसमें जुड़ते हैं। सवाल यह है कि इस पूरी मूल्य-श्रृंखला में किसान की हिस्सेदारी कैसे बढ़ाई जाए?

केवल बिचौलिये को दोष देना समाधान नहीं

किसानों को कम कीमत मिलने की चर्चा होते ही बिचौलियों का नाम सामने आता है। लेकिन समस्या को केवल बिचौलियों तक सीमित करना कृषि बाजार की पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।

असल सवाल यह है कि किसान के पास विकल्प कितने हैं।

यदि किसान के आसपास कई खरीदार हों, उसे अलग-अलग बाजारों के भाव की जानकारी हो, उसकी उपज रखने के लिए गोदाम हो और परिवहन की सुविधा उपलब्ध हो, तो वह बेहतर कीमत के लिए बातचीत कर सकता है।

इसके विपरीत यदि गांव में एक-दो खरीदार ही उपलब्ध हैं और किसान के पास फसल रखने की सुविधा नहीं है, तो उसकी स्थिति कमजोर हो जाती है। इसलिए कृषि बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के साथ-साथ किसान की सौदेबाजी की क्षमता बढ़ाना भी जरूरी है।

एमएसपी की घोषणा और वास्तविक बिक्री में अंतर

न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी किसानों के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था है। लेकिन किसी फसल का एमएसपी घोषित होना और प्रत्येक किसान का अपनी पूरी उपज उस कीमत पर बेच पाना अलग-अलग बातें हैं।

किसान के लिए वास्तविक सुरक्षा तभी बनेगी जब खरीद व्यवस्था उसके नजदीक हो, खरीद प्रक्रिया स्पष्ट हो और भुगतान समय पर मिले। सरकारी खरीद केंद्रों की पहुंच, उनकी सक्रियता और खरीद की समयबद्धता इसलिए महत्वपूर्ण है।

बिहार में किसानों के लिए ऐसी व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है जिसमें सरकारी खरीद का लाभ केवल कागज पर नहीं, बल्कि वास्तविक रूप से खेत और गांव तक पहुंचे।

मक्का और सब्जी उत्पादकों की परेशानी अलग

मक्का जैसे उत्पादों के किसानों को बाजार की कीमतों में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता है। वहीं सब्जी उत्पादकों की समस्या और भी संवेदनशील है क्योंकि उनकी फसल जल्दी खराब हो सकती है।

टमाटर, फूलगोभी, भिंडी और हरी सब्जियों की कीमत किसी क्षेत्र में उत्पादन बढ़ने पर अचानक गिर सकती है। किसान के सामने ऐसी स्थिति में मुश्किल विकल्प होता है—कम कीमत पर बेच दे या फसल खराब होने का खतरा उठाए।

इस समस्या का समाधान केवल अधिक उत्पादन नहीं है। ग्रामीण स्तर पर कोल्ड स्टोरेज, गोदाम, ग्रेडिंग सेंटर, प्रसंस्करण इकाइयां और स्थानीय खाद्य उद्योग विकसित करने की जरूरत है। इससे किसान को अपनी उपज तुरंत बेचने की मजबूरी कुछ हद तक कम हो सकती है।

एफपीओ से बढ़ सकती है किसानों की ताकत

एक छोटा किसान अकेले बाजार में बड़ी मात्रा में उपज बेचने वाले कारोबारी से बराबरी की बातचीत नहीं कर पाता। लेकिन कई किसान मिलकर किसान उत्पादक संगठन यानी एफपीओ बनाएं तो स्थिति बदल सकती है।

सामूहिक खरीद से इनपुट की लागत कम करने, सामूहिक बिक्री से बेहतर कीमत प्राप्त करने और ग्रेडिंग-पैकेजिंग जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल करने की संभावना बढ़ती है।

हालांकि केवल एफपीओ बना देना पर्याप्त नहीं होगा। इन्हें बाजार की जानकारी, प्रशिक्षित प्रबंधन, कार्यशील पूंजी और बड़े खरीदारों से सीधे संपर्क की जरूरत है।

मोबाइल पर भाव की जानकारी से आगे बढ़ना होगा

आज किसान के हाथ में मोबाइल फोन है। अलग-अलग बाजारों की कीमतों की जानकारी डिजिटल माध्यम से उपलब्ध हो सकती है। लेकिन सूचना तभी उपयोगी है जब किसान उसके आधार पर वास्तविक व्यापारिक निर्णय ले सके।

किसान को यह पता होना चाहिए कि उसकी उपज की कीमत अलग-अलग बाजारों में कितनी है, वहां तक परिवहन का खर्च कितना आएगा और किस खरीदार से बेहतर सौदा संभव है।

इसलिए भविष्य की कृषि व्यवस्था में डिजिटल जानकारी को डिजिटल बाजार और वास्तविक बिक्री व्यवस्था से जोड़ना महत्वपूर्ण होगा।

कृषि नीति का अंतिम पैमाना किसान की शुद्ध आय हो

कृषि विकास का अर्थ केवल उत्पादन बढ़ाना नहीं होना चाहिए। किसान के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि सभी खर्च निकालने के बाद उसके पास कितना पैसा बचा।

यदि उत्पादन बढ़ता है लेकिन लागत भी उसी गति से बढ़ती है और किसान की शुद्ध आय नहीं बढ़ती, तो कृषि विकास अधूरा माना जाएगा।

बिहार में कृषि नीति को किसान की वास्तविक आय से जोड़ने की जरूरत है। सस्ती सिंचाई, गुणवत्तापूर्ण बीज, सामूहिक खरीद, बेहतर ग्रामीण सड़क, परिवहन, भंडारण, प्रसंस्करण और पारदर्शी बाजार व्यवस्था को एक साथ मजबूत करना होगा।

किसान को सिर्फ उत्पादक नहीं, बाजार का भागीदार बनाना होगा

बिहार के किसान की चुनौती केवल खेत तक सीमित नहीं है। उसकी आर्थिक स्थिति इस बात पर भी निर्भर करती है कि फसल बाजार तक पहुंचने के बाद उसके पास कितने विकल्प हैं।

किसान को केवल उत्पादन बढ़ाने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है। उसे लागत कम करने, जोखिम घटाने और बेहतर कीमत प्राप्त करने के साधन भी देने होंगे।

अगर किसान के पास भंडारण की सुविधा हो, बाजार की सही जानकारी हो, कई खरीदारों तक पहुंच हो और सामूहिक रूप से बिक्री करने की क्षमता हो तो उसकी सौदेबाजी मजबूत होगी।

आखिरकार कृषि की सफलता का वास्तविक पैमाना यह नहीं होना चाहिए कि खेत से कितनी फसल निकली। सवाल यह होना चाहिए कि उस फसल से किसान की शुद्ध आय कितनी बढ़ी

बिहार के कृषि भविष्य के लिए यही सबसे बड़ा सवाल है—क्या ऐसी बाजार व्यवस्था तैयार की जा सकती है जिसमें किसान अपनी उपज बेचने के लिए मजबूर न हो, बल्कि सही समय और सही कीमत चुनने के लिए उसके पास पर्याप्त विकल्प हों?

कृषि तभी टिकाऊ बनेगी जब खेत की मेहनत का उचित हिस्सा किसान की जेब तक पहुंचे।


आलोक कुमार

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