सोमवार, 1 सितंबर 2025

फिर जवाबदेही क्यों नहीं?

 

संसद का समय जनता का, खर्च भी जनता का – फिर जवाबदेही क्यों नहीं?


नई दिल्ली. लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जनता के टैक्स से चलने वाली संसद ही अक्सर ठप पड़ी रहती है. दमन और दीव से निर्दलीय सांसद उमेश पटेल का संसद परिसर में किया गया विरोध इसी बीमार व्यवस्था पर सीधा प्रहार है.उनका सवाल बड़ा सरल है—जब सदन नहीं चलता, तो खर्च जनता क्यों उठाए? सांसदों की जेब से ही इसकी वसूली क्यों न हो?यह सवाल असहज करने वाला है, क्योंकि संसद का एक-एक मिनट करोड़ों रुपये का होता है.जब सत्ता और विपक्ष बहस छोड़कर हंगामा करते हैं, तो यह सीधे-सीधे राष्ट्रीय संसाधनों की बर्बादी है. उमेश पटेल का बैनर—“माफी मांगो, सत्ता पक्ष और विपक्ष माफी मांगो”—असल में हर उस करदाता की आवाज़ है, जो संसद टीवी पर हंगामे का तमाशा देखकर खुद को ठगा महसूस करता है.

इस बार के सत्र के आंकड़े बताते हैं कि 120 घंटे तय चर्चा में से महज़ 37 घंटे ही बहस हो सकी.बाकी वक्त शोर-शराबे की भेंट चढ़ गया.नतीजा यह हुआ कि 14 में से 12 विधेयक बिना चर्चा के पारित कर दिए गए.क्या यही है लोकतंत्र की आत्मा? संसद बहस के लिए बनी है, न कि ‘मशीनरी’ की तरह बिल ठेलकर पास करने के लिए.

ऐतिहासिक उदाहरण

भारत की संसदीय परंपरा में बहस और तर्क को ही लोकतंत्र की जान माना गया है। जवाहरलाल नेहरू से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक के दौर में तीखी बहस हुईं, लेकिन संसद का गरिमा और संवाद अभी भटका नहीं.आज की स्थिति इन आदर्श उदाहरणों के उलट है—जहाँ बहस की जगह नारेबाजी और जिद ने ले ली है.

अन्य देशों की मिसाल

दुनिया के कई लोकतंत्रों में ऐसी बर्बादी पर कड़ी व्यवस्था है.उदाहरण के तौर पर, ब्रिटेन की संसद में अगर सांसद लगातार गैर-हाजिर रहते हैं या अनुशासनहीनता करते हैं, तो उनके वेतन में कटौती हो जाती है.अमेरिका में भी टैक्स-पेयर से जुड़ी जवाबदेही पर संसद का अनुशासन बेहद सख्त है. जापान और दक्षिण कोरिया में तो सांसदों पर अनुशासनहीनता की स्थिति में भारी जुर्माना लगाया जाता है. सवाल उठता है कि भारत में ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं?

असली बहस

सवाल यह नहीं कि सत्ता या विपक्ष कौन दोषी है, बल्कि यह है कि जनता के पैसों का अपव्यय आखिर कब तक चलेगा. जब आम नागरिक समय पर टैक्स देता है, तो उसे यह अधिकार भी होना चाहिए कि वह अपने प्रतिनिधियों से जवाब मांगे—आपका एक-एक घंटा कहाँ खर्च हुआ?उमेश पटेल की मांग आज सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की असल आत्मा को बचाने का आह्वान है. संसद में मौजूद हर दल को यह समझना होगा कि संसद हंगामे का अखाड़ा नहीं, बल्कि जनता की उम्मीदों का मंदिर है। अगर यह मंदिर बार-बार अपवित्र होगा, तो जनता अब और चुप नहीं बैठेगी.


आलोक कुमार

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

welcome your comment on https://chingariprimenews.blogspot.com/

The Configure Featured Post option in Blogger allows you to highlight a selected post prominently on

How to Configure Popular Posts in Blogger The Popular Posts widget highlights your most viewed post